यज्ञ का वैज्ञानिक महत्व

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हमारी हर परंपरा में वैज्ञानिकता का दर्शन होता हैं
अज्ञानता का नहीं ..
भारतीय ऋषि-मुनियों ने हजारों साल पहले जिस
ज्ञान का खुलासा किया था वह
कितना वैज्ञानिक था। उदाहरणस्वरूप फ्रांस के
वैज्ञानिक त्रिले ने यज्ञ-हवन क्रियाओं के संदर्भ में
जो अनुसंधान किए हैं वे आंख खोलने वाले हैं। त्रिले के
अनुसार यज्ञ-हवन में जो काष्ठ या लकड़ी जलाई
जाती है, उससे फार्मिक आल्डीहाइड नामक एक गैस
उत्पन्न होती है। त्रिले के अनुसार यह गैस जीवाणुओं
को नष्टकर वातावरण-पर्यावरण को स्वच्छ रखने में
पूणर्त: समर्थ है।
भारत के अतिरिक्त चीन, जापान, जर्मनी और यूनान
आदि देशों में अग्नि को पवित्र माना जाता है। इन
देशों में विभिन्न प्रकार की धूप जलाने का चलन है।
वस्तुत: अग्नि में जो वस्तु जलाई जाती है उसका स्वरूप
सूक्ष्म से सूक्ष्मतर हो जाता है। आधुनिक परमाणु
वैज्ञानिकों ने अब इस तथ्य को पूर्णत: आत्मसात कर
लिया है कि स्थूल से सूक्ष्म कहीं अधिक
शक्तिशाली है।
अग्नि में किसी पदार्थ के जलने पर उसके स्वरूप में
काफी हद तक गुणात्मक परिवर्तन हो जाता है। जैसे
अगर कोई व्यक्ति स्थूल रूप में किसी जहर को खा ले
तो वह शीघ्र ही मर जाएगा। वहींआयुर्वेद शास्त्र
कहता है कि यदि उसी विष को अग्नि संस्कार के
द्वारा सूक्ष्मतर बनाकर उसका उचित व सम्यक मात्र में
सेवन किया जाए तो वही विष अपने इस नए रूप-स्वरूप में
व्यक्ति को रोगमुक्त कर उसे स्वस्थ व
बलशाली बना सकेगा।

हवन
क्यों इतना पवित्र है……… और, क्यों यज्ञ करना न
सिर्फ हर इंसान का अधिकार है ….बल्कि, कर्त्तव्य
भी है….!
यह लेख 100 करोड़ हिंदुओं के लिए नहीं है…. बल्कि,
यह लेख दुनिया के 7 अरब मनुष्यों के भलाई से
सम्बंधित है…..!
अगर हम यज्ञ और हवन…. से सम्बंधित
आस्था की बात करें तो…..
हिंदू धर्म में सर्वोपरि पूजनीय वेदों और ब्राह्मण
ग्रंथों में यज्ञ/हवन
की क्या महिमा है……..उसकी कुछ झलक इन
मन्त्रों में मिलती है-
अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम्. होतारं
रत्नधातमम्…….. [ ऋग्वेद 1/1/1/]
समिधाग्निं दुवस्यत घृतैः बोधयतातिथिं. आस्मिन्
हव्या जुहोतन. ……..[यजुर्वेद 3/1]
अग्निं दूतं पुरो दधे हव्यवाहमुप ब्रुवे……… [यजुर्वेद
22/17]
सायंसायं
गृहपतिर्नो अग्निः प्रातः प्रातः सौमनस्य
दाता………. [अथर्ववेद 19/7/3]
प्रातः प्रातः गृहपतिर्नो अग्निः सायं सायं
सौमनस्य दाता. ………[अथर्ववेद 19/7/4]
तं यज्ञं बर्हिषि प्रौक्षन् पुरुषं जातमग्रतः ………
[यजुर्वेद 31/9]
अस्मिन् यज्ञे स्वधया मदन्तोधि ब्रुवन्तु
तेवन्त्वस्मान ……….[यजुर्वेद 19/58]
यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्म ………..[शतपथ ब्राह्मण
1/7/1/5]
यज्ञो हि श्रेष्ठतमं कर्म …………[तैत्तिरीय
3/2/1/4]
यज्ञो अपि तस्यै जनतायै कल्पते, यत्रैवं विद्वान
होता भवति [ऐतरेय ब्राह्मण १/२/१]
यदैवतः स यज्ञो वा यज्याङ्गं वा.. [निरुक्त ७/४]
इन मन्त्रों में निहित अर्थ और प्रार्थनाओं के अर्थ
कुछ इस प्रकार से है कि….
यज्ञ/हवन से सम्बंधित कुछ मन्त्रों के भाव सरल
शब्दों में कुछ ऐसे हैं
– इस सृष्टि को रच कर जैसे ईश्वर हवन कर रहा है वैसे
मैं भी करता हूँ.
– यह यज्ञ धनों का देने वाला है, इसे प्रतिदिन
भक्ति से करो, उन्नति करो.
– हर दिन इस पवित्र अग्नि का आधान मेरे संकल्प
को बढाता है.
– मैं इस हवन कुंड की अग्नि में अपने पाप और दुःख
फूंक डालता हूँ.
– इस अग्नि की ज्वाला के समान सदा ऊपर
को उठता हूँ.
– इस अग्नि के समान स्वतन्त्र विचरता हूँ, कोई मुझे
बाँध नहीं सकता.
– अग्नि के तेज से मेरा मुखमंडल चमक उठा है, यह
दिव्य तेज है.
– हवन कुंड की यह अग्नि मेरी रक्षा करती है.
– यज्ञ की इस अग्नि ने मेरी नसों में जान डाल
दी है.
– एक हाथ से यज्ञ करता हूँ, दूसरे से सफलता ग्रहण
करता हूँ.
– हवन के ये दिव्य मन्त्र मेरी जीत की घोषणा हैं.
– मेरा जीवन हवन कुंड की अग्नि है,
कर्मों की आहुति से इसे और प्रचंड करता हूँ.
– प्रज्ज्वलित हुई हे हवन की अग्नि! तू मोक्ष के
मार्ग में पहला पग है.
– यह अग्नि मेरा संकल्प है. हार और दुर्भाग्य इस हवन
कुंड में राख बने पड़े हैं.
– हे सर्वत्र फैलती हवन की अग्नि!
मेरी प्रसिद्धि का समाचार जन जन तक पहुँचा दे!
– इस हवन की अग्नि को मैंने हृदय में धारण किया है,
अब कोई अँधेरा नहीं.
– यज्ञ और अशुभ वैसे ही हैं जैसे प्रकाश और अँधेरा.
दोनों एक साथ नहीं रह सकते.
– भाग्य कर्म से बनते हैं और कर्म यज्ञ से. यज्ञ कर
और भाग्य चमका ले!
– इस यज्ञ की अग्नि की रगड़ से
बुद्धियाँ प्रज्ज्वलित हो उठती हैं.
– यह ऊपर को उठती अग्नि मुझे भी उठाती है.
– हे अग्नि! तू मेरे प्रिय जनों की रक्षा कर!
– हे अग्नि! तू मुझे प्रेम करने वाला साथी दे. शुभ
गुणों से युक्त संतान दे!
– हे अग्नि! तू समस्त रोगों को जड़ से काट दे!
– अब यह हवन की अग्नि मेरे सीने में धधकती है, यह
कभी नहीं बुझ सकती.
– नया दिन, नयी अग्नि और नयी जीत.
परन्तु….. इन मन्त्रों का निचोड़ यह है कि…….
हवन/यज्ञ संसार का सर्वोत्तम कर्म और….पवित्र
कर्म है जिसके करने से सुख ही सुख बरसता है.
सिर्फ इतना ही नहीं , भगवान श्रीराम
को रामायण में …….. स्थान स्थान पर ‘यज्ञ करने
वाला’ कहा गया है. ….. और, महाभारत में
भी श्रीकृष्ण सब कुछ छोड़ सकते हैं…. पर, हवन
नहीं छोड़ सकते.
महाभारत पढने वाले लोगों को यह भली-
भांति याद होगा कि……हस्तिनापुर जाने के लिए
भगवान् श्री कृष्ण… अपने रथ पर निकल पड़ते हैं…
लेकिन, जब रास्ते में ही शाम हो जाती है तो … वे
रथ रोक कर हवन करते हैं.
और, अगले दिन कौरवों की राजसभा में हुंकार भरने
से पहले अपनी कुटी में हवन करते हैं…….
यहाँ तक कि….. अभिमन्यु के बलिदान जैसी भीषण
घटना होने पर भी सबको साथ लेकर पहले यज्ञ करते
हैं….
इस तरह…. श्रीकृष्ण के जीवन का एक एक क्षण जैसे
आने वाले युगों को यह सन्देश दे रहा था कि………..
चाहे कुछ हो जाए, यज्ञ करना कभी न छोड़ना.
इस तरह…. जिस कर्म को भगवान स्वयं श्रेष्ठतम कर्म
कहकर करने का आदेश दें……… वो कर्म कर्म
नहीं धर्म है……… उसका न करना अधर्म है.
यही कारण है कि….. जब हिन्दुओं में
किसी का जन्म होता है तो…. तो वहां हवन
होता है ….. पहली बार केश कटे (मुंडन) तो हवन
हुआ. ….. नामकरण होता है तो हवन हवन
किया जाता है… !
जन्मदिन , गृह प्रवेश , मेरे व्यवसाय का आरम्भ ,
शादी , बच्चे , संकट , खुशियाँ . ….. हर काम में हवन
किया जाता है…!
अगर दूसरे शब्दों में कहूँ तो….. हर बड़ा काम करने से
पहले हवन किया जाता है ….. क्योंकि, एक
आस्था है कि …… हवन कर लूँगा…. तो , भगवान
साथ होंगे…. या फिर, मैं कहीं भी रहूँगा, भगवान
साथ होंगे. और, इस जीवन की अग्नि में सारे पाप
जलकर स्वाहा होंगे तथा मेरे सत्कर्मों की सुगंधि सब
दिशाओं में फैलेगी.
दरअसल….. हमारे ऋषि-मुनियों ने हवन के
वैज्ञानिक महत्व को लाखों -करोड़ों साल पहले
ही समझ लिया था…!
परन्तु… आप यह जानकर आश्चर्यचकित हो जायेंगे
कि…… आस्था और भक्ति के प्रतीक हवन को करने
के विचार मन में आते ही …….आत्मा में उमड़ने
वाला ईश्वर प्रेम वैसा ही है … जैसे एक माँ के लिए..
उसके गर्भस्थ अजन्मे बच्चे के प्रति भाव….. जिसे
कभी ना तो देखा….. न सुना………. फिर भी उसके
साथ एक कभी न टूटने वाला रिश्ता बन जाता है .
इस तरह की मानसिक आनंद की जो अवस्था एक
माँ की होती है……. कतिपय वही अवस्था एक
भक्त की होती है……. जो वह इस हवन के माध्यम से
वह अपने अजन्मे अदृश्य ईश्वर के प्रति भाव
पैदा करता है और उस अवस्था में मानसिक आनंद के
चरम को पहुँचता है…!
इस चरम आनंद के फलस्वरूप मन विकार मुक्त
हो जाता है……… और, मस्तिष्क और शरीर में श्रेष्ठ
रसों (होर्मोंस) का स्राव होता है जो पुराने
रोगों का निदान करता है…. और , नए
रोगों को आने नहीं देता.
इसीलिए….. हवन करने वाले के मानसिक रोग
(डिप्रेशन) दस-पांच दिनों से ज्यादा नहीं टिक
सकते.
सिर्फ इतना ही नहीं……हवन में डाली जाने
वाली सामग्री (ध्यान रहे, यह सामग्री आयुर्वेद के
अनुसार औषधि आदि गुणों से युक्त जड़ी बूटियों से
बनी होती है ) अग्नि में पड़कर ….. धुएँ के रूप में
सर्वत्र व्याप्त हो जाती है…… जिससे …. वो घर के
हर कोने में फ़ैल कर रोग के कीटाणुओं का विनाश
करती है.
आज के वैज्ञानिक शोध से भी पता चला है
कि …… हवन से निकलने वाला धुआँ हवा से फैलने
वाली बीमारियों के कारक … और, इन्फेक्शन करने
वाले बैक्टीरिया (विषाणु) को नष्ट कर देता है.
( reference – http://
articles.timesofindia.indiatimes.com/2009-08-17
/health/28188655_1_medicinal-herbs-havan-
nbri )
यहाँ ध्यान रखें कि….. विश्व स्वास्थ्य संगठन
(WHO) के अनुसार ……दुनिया भर में साल भर में
होने वाली 57 मिलियन मौत में से अकेली….. 15
मिलियन (25 % से ज्यादा) मौत इन्ही इन्फेक्शन
फैलाने वाले विषाणुओं से होती हैं…….!
वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि….. हवन करने से सिर्फ
विषाणुओं से सम्बंधित ही नहीं….. बल्कि…. अन्य ,
और भी बहुत सी बीमारी खत्म होती हैं…….जैसे
कि ……
१. सर्दी/जुकाम/नजला
२. हर तरह का बुखार
३. मधुमेह (डायबिटीज/शुगर)
४. टीबी (क्षय रोग)
५. हर तरह का सिर दर्द
६. कमजोर हड्डियां
७. निम्न/उच्च रक्तचाप
८. अवसाद (डिप्रेशन)
इन रोगों के साथ साथ विषम रोगों में भी हवन
अद्वितीय है, जैसे
९. मूत्र संबंधी रोग
१०. श्वास/खाद्य नली संबंधी रोग
११. स्प्लेनिक अब्सेस
१२. यकृत संबंधी रोग
१३. श्वेत रक्त कोशिका कैंसर
१४. Infections by Enterobacter Aerogenes
१५. Nosocomial Infections
१६. Extrinsic Allergic Alveolitis
१७. nosocomial non-life-threatening infections
और …….. यह सूची अंतहीन है….!
और…. यह जानकार तो आप ख़ुशी से उछल ही पड़ेंगे
कि….. वैज्ञानिक शोधों के अनुसार….. सौ से
भी ज्यादा आम और खास रोग…….. यज्ञ थैरेपी से
ठीक होते हैं……..!
और… यह बात तो हम सभी जानते हैं कि…… एक
स्वस्थ व्यक्ति ही ….. स्वस्थ समाज एवं देश
का निर्माण कर सकता है…..!
इसीलिए तो हमारे हमारे वेद कहते हैं कि….
हे मानवमात्र…..! हृदय पर हाथ रखकर
कहना…….क्या दुनिया में कोई दूसरी चीज इन
शब्दों का मुकाबला कर सकती है……????
हम हिन्दुओं को इस बात का गर्व होना चाहिए
कि… इस तरह के न जाने कितने चमत्कारी,
रोगनाशक, बलवर्धक और जीत के मन्त्रों से
हमारी हवन की प्रक्रिया भरी पड़ी है. …. और,
जिंदगी की सब समस्याओं का नाश करने वाली और
सुखों का अमृत पिलाने वाली यह हवन
क्रिया मेरी संस्कृति एवं हमारे धर्म
का हिस्सा है…!
याद रखें कि….. हवन कोई कर्मकांड नहीं है. ….
बल्कि, यह परमेश्वर का आदेश है,…. और, श्रीराम
की मर्यादा की धरोहर है…. श्रीकृष्ण
की बंसी की तान है……रण क्षेत्र में पाञ्चजन्य शंख
की गुंजार है…..अधर्म पर धर्म की जीत
की घोषणा है…..

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