मौन की शक्ति

* मौन रहना त्याग है, तपस्या है। मौन रहने से शरीर में ऊर्जा बढ़ती है। मौन के बल से कई सिद्धियां प्राप्त कर सकते हैं। महावीर 12 वर्ष व महात्मा बुद्ध 10 वर्ष तक मौन रहने के उपरांत ज्ञान प्राप्त कर सके। महर्षि रमण व चाणक्य भी मौन के उपासक थे.

* योग कहता है कि मौन ध्यान की ऊर्जा और सत्य का द्वार है। मौन से जहाँ मन की मौत हो जाती है वहीं मौन से मन की ‍शक्ति भी बढ़ती है। जिसे मोक्ष के मार्ग पर जाना है वह मन की मौत में
विश्वास रखता है और जिसे मन का भरपूर व
सही उपयोग करना है वह मन की शक्ति पर विश्वास करेगा। जब तक मन है तब तक सांसारिक उपद्रव है और मन गया कि संसार खत्म

* चुपचाप रहने का अभ्यास करें और व्यर्थ
की बातों से स्वयं को अलग कर लें। सिर्फ श्वासों के आवागमन पर ही अपना ध्यान लगाए रखें और सामने जो भी दिखाई या सुनाई दे रहा है उसे उसी तरह देंखे जैसे कोई शेर सिंहावलोकन करता है। सोचे बिल्कुल नहीं और कहें कुछ भी नहीं, बल्कि ज्यादा से ज्यादा चुप रहने का अभ्यास करें। साक्षी भाव में रहें
अर्था किसी भी रूप में इन्वॉल्व ना हों।

* यदि आप ध्यान कर रहे हैं तो आप
अपनी श्वासों की आवाज सुनते रहें और उचित
होगा कि आसपास का वातावण
भी ऐसा हो कि जो आपकी श्वासों की आवाज
को सुनने दें। पूर्णत: शांत स्थान पर मौन का मजा लेने वाले जानते हैं कि उस दौरान वे कुछ भी सोचते या समझते नहीं हैं बल्कि सिर्फ
हरीभरी प्रकृति को निहारते हैं और स्वयं के अस्तित्व को टटोलते हैं।

* परमात्मा हमेशा मौन है। यह उसका सहज स्वभाव है। उसने कभी अपना नाम नहीं बताया। उसने कभी यह तक नहीं कहा कि उसका कोई नाम नहीं है। उसके सारे नाम ज्ञानियों और भक्तों द्वारा दिए गए नाम हैं। उसने कभी अपने परमात्मा होने का भी दावा नहीं किया। उसे बोलने की,
दावा करने की और अपना अस्तित्व सिद्ध करने
की कभी जरूरत नहीं पड़ती। जिसे ऐसा करना पड़े वह परमात्मा नहीं है। दावा अहंकार का, अज्ञान का, अशक्ति का लक्षण है। परमात्मा आख़िर क्यों दावा करे? सत्य इतना विराट और इतना अनंत है कि उसे किसी भी तरह से अभिव्यक्त नहीं किया जा सकता। अनंत को भला सीमा में कैसे बाँधा जा सकता है?
दरअसल सत्य को संवादों के जरिए
कभी अभिव्यक्त किया ही नहीं जा सकता।
इसलिए ज्ञानियों के बीच अक्सर संवाद संभव
नहीं हो पाते।

* जब हम बोलते हैं तो हम कई गुना अधिक ऑक्सीजन उपयोग करते हैं| अधिक बात करने से हम ऊर्जा की खपत महसूस करते हैं, मन ज़रूरत से ज़्यादा गरम हो जाता है और हमारी प्रतिक्रया पर भी उसका प्रभाव पड़ता है| हम गुस्सा करते हैं और अपना संयम खो देते हैं| एक शांत मन से क्रिया नहीं कर पाते| ऐसे लोगों को अधिक सुनना जो अधिक बात करते हैं
भी हमारी ऊर्जा क्षति का कारण बन जाता है|

* बोलना आत्म स्वभाव नहीं,
बोलना आवश्यक भी नहीं है,
बोलना प्रत्येक
आदमी की अपनी कमजोरी है।
कोई भी पशु पक्षी आवश्यक होने पर ही आवाज करते हैं..उनकी भी भाषा होती है.. जैसे कुत्ते को देख लीजिए, वो दिनरात नहीं भौकता.. कीसीपर भौकता है तब तक ही.. बाकी समय शांति से बैठे रहता है.

* अल्बर्ट आइंस्टीन ने एक खोज की,
उसकी खोज बहुत गजब की है। उसने स्वयं ने कई महीनों तक इस खोज को अपने मन में रखी और विज्ञान जगत को इसकी सूचना नहीं दी.. खोज ऐसी थी कि लोग सोचेंगे कि वह पागल हो गया है। परंतु खोज इतनी महत्वपूर्ण थी की उसने अपनी बदनामी की कीमत पर जंग जाहिर करने का तय किया।
खोज यह थी कि गुरुत्वाकर्षण के बाहर तुम्हारी उम्र बढ़नी रूक जाती है।

* * परंतु गुरुत्वाकर्षण के बाहर होने की अनुभूति ध्यान में भी पाई जा सकती है—ऐसा होता है। और यह कोई लोगों को भटका देती है। अपनी बंद आँखो के साथ जब तुम पूरी तरह से मौन हो.. विचार शून्य हो… तुम गुरुत्वाकर्षण के बाहर
हो। परंतु मात्र तुम्हारा मौन गुरुत्वाकर्षण के बाहर है, तो तुम्हारा शरीर नहीं। परंतु उस क्षण में जब तुम अपने मौन से एकाकार होते हो, तुम महसूस करते हो कि तुम ऊपर उठ रहे हो।

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