संतवाणी भाग १

संतवाणी १

*अपने गुरु को यह मत बताओ की मेरी समस्या क्या है, बल्कि समस्या को यह बताओ की मेरे गुरु क्या है।

*संसार की चीज संसार को दे दो, भगवान् की चीज भगवान् को दे दो अर्थात अपने आप को भगवान् के अर्पण कर दो ।

*अंधेरा कामना से होता है, संसार की कामना के रहते हुए मनुष्य अंधेरे में रहता है, कामना के छूटते ही ह्रदय में प्रकाश हो जाता है।

*संसार में केवल दिखावटी प्रेम करने वाले हैं, असली नही.. भगवान् असली हमारे है।

*भगवान् की याद आ जाए तो खुशी मनाओ की भगवान् की कृपा हो गई।

*केवल नाशवान् का आकर्षण ही बाधा है, मनुष्य नाशवान् का आकर्षण छोड दे तो उसकी ऊंची से ऊंची स्तिथि हो जाएगी।

*एक मनुष्य शरीर में किए हुए पाप चौरासी लाख योनियां भोगने पर भी बाकी रहते हैं।

*अगर धन को अच्छी चीज समझते हो, तो फिर धन को खर्चते क्यों हो?

*देखने में एसा दिखता है की समय जा रहा है, पर वास्तव में शरीर जा रहा है।

*जो धन सदा साथ रहता है वह कमाते नही और जो धन कमाते हैं वह सदा साथ नही रहता।

*भगवान् के सिवाय दुसरे के साथ संबंध मानना ही भूल है, मोह है, बंधन है।

*सब संसार अपनी धुन में जा रहा है, हम ही जाते हुए संसार को पकडते है और फिर उसके छूटने पर रोते हैं।

*साधक शरीर नही होता, शरीर संसार की चीज है आप स्वयं परमात्मा के अंश है
जब मै शरीर नही हूँ तो शरीर द्वारा किया हुआ काम मेरा कैसे हुआ?
जब काम मेरा नही है तो उसके फल की कामना कैसे होगी?

*भगवान् की शरण ले कर मस्त हो जाओ
कौन राजी है, कौन नाराज, कौन मेरा, कौन पराया इसकी परवाह मत करो
वे निंदा करे या प्रशंसा, सत्कार करे या तिरस्कार हमे इससे कोई मतलब नहीं।

*वास्तव में दरिद्रता उसकी मिटती है जिसे धन की भूख नही है।

*रहने का तो भरोसा नहीं और जाने की तैयारी नही, यह बडी गलती और आश्चर्य की बात है।

*महानता के विकास में सबसे बडी बाधा असंयम है।

*अपना मूल्य गिरने न पाए यह सतर्कता जिसमें जितनी पाई जाती है, वह उतना प्रगतिशील है।

*चरित्रवान का वैभव कभी क्षीण नही होता।

*बिना श्रम के अपनी आवश्यकता पूर्ण करना चोरी है।

*जो मनुष्य जितना प्रसन्न होता रहता है, वह अपना आध्यात्मिक बल ऊतना बढा लेता है।

*उच्च विचार सेना से अधिक बलवान है, जिसके पास सिद्धांतो की शक्ति है, वह कभी हारता नही।

*अच्छे काम की मन में आए तो तुरंत कर दो और बुरे काम की मन में आए तो देरी कर दो।

*गरीब घर की कन्या लेने के समान कोई पुण्य नही है, यही पुण्य आपका कल्याण करेगा।

*कुटुम्ब से सुख चाहते हो, इसलिए उसका मोह छुटता नही।

*सार्थक और प्रभावी उपदेश वह है, जो वाणी से नही, आचरण से प्रस्तुत किया जाए।

*मनुष्य रोता है की स्त्री चली गई, धन चला गया, बेटा चला गया परंतु वह खुद भी चला जाएगा।

*दोष तो अपना होता है, पर अभिमान के कारण दूसरे में दोष दिखता है, नारदजी भी इसे नही समझ पाए, जब भगवान् ने माया खींची तब समझ पाए।

*भगवन्नाम सबके लिए खुला है और जीभ अपने मुख में ही है, फिर बाधा कीस बात की?

*प्रत्येक मनुष्य को भगवान् की तरफ चलना ही पडेगा, चाहे आज चले या अनेक जन्मों के बाद,
फिर देरी क्यों?

*जिसका स्वभाव सुधार जाएगा, उसके लिए दुनिया सुधर जाएगी।

*जैसे बालक मां का होकर मां को पुकारता है तो मां को सब काम छोड़ कर आना पडता है
एसे ही, भगवान् का होकर भगवान् को पुकारो तो भगवान् को आना पडता है।

*वास्तव में समझदार वह है जो अपने को बेसमझ मानता है अर्थात जिसमें समझदारी का अभिमान नही है।

*आपके परदादा ने छोडा, आपके दादा ने छोडा, आपके पिता ने छोडा, तो क्या आप रख लोगे? आप साथ ले जाओगे?

*भगवान् की माया किसी को नहीं बांधती, मनुष्य ही भगवान् की माया को अपनी और अपने लिए मानकर बांध लेता है।

*जैसे भोला बालक जो कुछ हाथ मे आए उसे मुंह में डाल देता है, एसे ही भोले भक्त भगवान् को जो भी अर्पण करते हैं भगवान् भी भोले बनकर खा लेते है।

*समय के अनुसार मत चलो प्रत्युत् समय से अपना बचाव करो।

*मीराबाई ने कहा है – मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई.. इसमे ‘दूसरो न कोई’ यह भगवान् की कमजोरी है, जिससे भगवान् दब जाते हैं।

*जैसे पतिव्रता पति की हो जाती है, ऐसे ही भगवान् के हो जाएं।

*माया का अर्थ है – वह अज्ञान, जिससे ग्रस्त होकर मनुष्य अपने को निर्दोष और सारी परिस्थितियों के लिए दूसरों को उत्तरदायी मानता है।

*सबको सुख पहुंचाने वाला ही भगवान् का भक्त होता है, किसीसे द्वेश हो तो समझे की हमारी उपासना ठीक नहीं है।

*यह नियम है की अपने लिए कुछ भी पाने या करने की इच्छा न रहने पर ‘अहम’ स्वतः नष्ट हो जाता है।

*भगवतप्राप्ति मे देरी आपके कारण हो रही है, आप देरी को सहन कर रहे हो।

*भगवान् की विशेष कृपा से मनुष्य शरीर मिलता है, उसमे भी विशेष कृपा होने से भगवद्विषयक जिज्ञासा होती है फिर और भी विशेष कृपा होने पर सत्संग मिलता है।

*आज आपको रुपये और भोग अच्छे लगते हैं बस यही बंधन का कारण है, जब तक यह अच्छे लगते रहेंगे तब तक छुटोगे नही, जब यह अच्छे लगना बंद हो जाएंगे तब भगवत्प्राप्ति हो जाएगी।

*हमे रुपये, मान, बढाई, आदर, सत्कार मिल जाएं, लोग हमे अच्छा मानें – यह भाव जिनके भीतर भरा रहता है वे गीता के मर्म को नही समझ सकते।

*मौन का अर्थ कुछ न बोलना नही, मौन का अर्थ है कुछ न सोचना ।

*मनुष्य भगवान के आधीन, भगवान नामस्मरण के आधीन ।

*जिन्हें स्तुति प्रिय नही है वह निंदा नही करेंगे।

*समाधानी मनुष्य कभी शिकायत नही करते, वह समझौता करते हैं ।

*आज मै कल जैसा नही रहा वैसे ही लोग भी कल जैसे नही रहे।

*ध्वनि की अनुपस्थिति मौन नहीं है, लेकिन स्वयं की अनुपस्थिति मौन है।

* जन्म तिथि परिपक्वता का संकेत नहीं है।

*रामनाम का छाता हमारे पास सदैव रहना चाहिए, उसे कब खोलना है यह हम तय करे।

*अच्छाइयों का स्पष्टीकरण और बुराइयों का सबूत देने की आवश्यकता नहीं है।

*मनुष्य की लक्ष्मण रेखा वह स्वयं तय करे।

*रामनाम विकल्पों को सीमित और सीमाओं को कम करता है।

*शरीर पर सोना होने से अच्छा सोने जैसे व्यक्तियों का सहवास हो।

*सद्विचार मन में अधिक समय नही ठहरते इसलिये तत्काल कार्य करे।

*मेरा अयोग्य व्यवहार मेरे सद्गुरु को दुख देता है।

*मनुष्य वही वही गलतियों को दोहरा कर देखो को आमंत्रित करता है।

*अनुभव से जिन्होंने सिखा, वह सत्पुरुष बन गए।

*अनेक व्यक्तियों को भगवत नाम जपने की प्रेरणा होती है, यही उपासना की फलश्रुति है।

*सभी लोग हमसे ठीक बर्ताव नही करते, यह भगवान की हम पर कृपा है।

*अपेक्षा नही होगी तो वह भंग भी नही होगी।

*नामस्मरण की चिंता की तो चिंता करने की कभी आवश्यकता नहीं होगी

*स्वयं की गलतियों पर स्वयं को शिक्षा देने से वह गलतियां पुनः नही होगी।

*मृत शरीर को स्पर्श करने पर बुद्धिजीवी स्नान करते हैं परंतु मूर्ख व्यक्ति पशुओं का मृत शरीर भोजन के रूप में स्वीकार करते हैं।

*अपनी मानसिक अवस्थाओं को वश में करो, उत्तेजनाओं का शासन अस्वीकार कर दो।

*प्रेम में मनुष्य सब कुछ दे कर भी यही सोचता है की अभी कम दिया।

*मजाक और धन बहुत सोच समझ कर उडाना चाहिए।

*व्यक्ति का चिंतन और चरित्र इतना ढीला हो गया है कि स्वार्थ के लिए अनर्थ करने में व्यक्ति चूकता नहीं।

*सूर्य की तरह चमकने के लिए उसकी तरह जलना भी पडता है।

*वह मूर्ख है जो पाप पसंद करते हैं और दुख भोगते है।

*इस दुर्लभ मानव जन्म को पाकर भी जो इसी जीवन मे भगवान को पाने की चेष्टा नही कराता, उसका जन्म व्यर्थ है।

*मौन, क्रोध की सर्वोत्तम चिकित्सा है।

*आप जीतना कम बोलेंगे, आपकी उतनी अधिक सुनी जाएगी

*किसी को आत्म विश्वास जगाने वाला प्रोत्साहन देना ही सर्वोत्तम उपहार है।

*तप का अर्थ शरीर को यातनाएं देना नही वरन् श्रेष्ठ जीवन क्रम अपनाना है।

*भोगी की कभी पुर्ती नही होती और त्यागी को कभी कमी नहीं होती।

*कामना का त्याग नही करोगे तो क्या त्याग करोगे? शरीर आदी तो स्वतः ही नष्ट हो रहा है।

*सुख दुख से ऊपर उठो, सुख दुख के गुलाम मत बनो। जो सुख मे हर्षित होते हैं और दुख में रोते हैं उन्हे मूर्ख बताया गया है।

*संसार की इच्छा से संसार की प्राप्ति नही होती परंतु परमात्मा की इच्छा से परमात्मा की प्राप्ति होती है।

*जो माया छोड देते हैं, माया उनकी सेवा करती है।

*काम सब करो, पर भीतर से ममता त्याग दो।

*पुराण सुनने के बाद, श्मशान से लौटने के बाद तथा मैथुन के बाद जो बुद्धि होती है वह यदि सदा बनी रहे तो कौन मुक्त नहीं हो सकता ?

*कायर, ओछे, व्यसनी, अधर्मी और दुर्गुणी लोगों का संग रखना स्वयं से दुश्मनी निभाने का तारिका है।

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