श्री रामचंद्र जी का स्वभाव ।

भागवान् श्री राम के जीवन के हर कार्य में मर्यादा है  । उनका स्वभाव जो जान लेता है वो उनका भजन किये बिन रह नहीं पाता। 

उमा राम सुभाउ जेहिं जाना। ताहि भजनु तजि भाव न आना॥  अर्थात –  जिसने श्री रामजी का स्वभाव जान लिया, उसे भजन छोड़कर दूसरी बात ही नहीं सुहाती।

भगवान् श्रीराम ने केवल अपने प्रेमीजनों से ही नहीं अपितु शत्रु से भी अच्छा व्यवहार किया है । युध्द करने से पहले श्री राम ने रावण को समझाने का बहुत प्रयास किया की सीता को छोड़ दो ,हम युद्ध नहीं करना चाहते  । हनुमान ,अंगद , विभीषण सब ने रावण को समझाया पर वह नहीं माना । जब राम युद्ध करने के लिए युद्ध भूमि पर गए तब पहले दूर से उन्होंने रावण को प्रणाम् किया क्योंकि रावण कैसा भी है भगवान् शिव का भक्त है, ब्राह्मण है ,वेदज्ञ है और श्री राम ने सोचा की हमें ब्राह्मण वध का अपराध लगेगा । भगवान् शिव श्री राम को अत्यंत प्रिय है, शिव उनके स्वामी ,सेवक और सखा भी है । श्री शंकर तो राम की आत्मा है ।

जब प्रभु श्री राम ने रावण से युद्ध की घोषणा की, तब प्रभु ने रावण वध के बाद लंका का राजा विभीषण जी को बनाने का वचन दिया। सुग्रीव ने श्री राम से पुछा, प्रभु आपने विभीषण को लंका का राजा बनाने की घोषणा तो कर दी, लेकिन इस बीच अगर रावण को उसकी गलती का एहसास हो गया और वह आपके शरण आ गया तो क्या आप रावण को स्वीकार नहीं करेंगे? आप फिर रावण को क्या देंगे ?

श्री रामजी ने कहा, जीतना एशवर्य लंका मे है उससे कइ ज्यादा एशवर्य अयोध्या में है। इंद्र भी अयोध्या का एशवर्य देखकर लज्जित हो जाता हैं, लंका में आसुरी संपत्ति है परंतु अयोध्या में सात्विक संपत्ति है। मुझे अपने भाई भरत पर पूर्ण विश्वास है, मै उससे कहूंगा की लंका मैंने विभीषण को दे दी है और अयोध्या तुम रावण को दे दो, भरत मना नही करेगा। रावण बस मेरी शरण में आये तो सही।

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