मंदिर जाने का वैज्ञानिक महत्व

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बहुत से लोग कहते है की मंदिर जाना खाली बैठे लोगों का काम है और बुढ़ापे में यह सब करना चाहिए।
अब मैं सच बता दूं कि मंदिरों का निर्माण पूर्ण वैज्ञानिक विधि है. मंदिर की छत (गुंबद) जिसके नीचे मूर्ति की स्थापना की जाती है, ध्वनि सिद्धांत को ध्यान में रखकर बनाई जाती है।
गुंबद के शिखर के केंद्र बिंदु के ठीक नीचे मूर्ति स्थापित होती है। मंदिर की छत त्रिकोणी होती है जिसमे मन्त्र ध्वनि की शक्ति घूमती रहती है,जैसा की आप जानते है ,किसी भी यन्त्र में त्रिकोण का प्रयोग बहुत होता है और पिरामिड का भी ज्योतिष में महत्व है।
गुंबद तथा मूर्ति का मध्य केंद्र एक रखा जाता है।
गुंबद के कारण मंदिर में किए जाने वाले
मंत्रोच्चारण के स्वर और अन्य ध्वनियां गूंजती है
तथा वहां उपस्थित व्यक्ति को प्रभावित करती है। गुंबद और मूर्ति का मध्य केंद्र एक ही होने से मूर्ति में निरंतर ऊर्जा प्रवाहित होती है।
मूर्ति को स्पर्श करने से, उसके आगे सिर टिकाने से, हमारे अंदर भी ऊर्जा प्रवाहित हो जाती है और हमारे अंदर शक्ति, उत्साह, प्रफुल्लता का संचार होता है।

जब हम भगवान , बुजुर्ग, माता-पिता, संत साधु
के समक्ष हाथ जोड़कर मस्तक झुकाते है तब
हमारा अहंकार पिघलता है और अंतःकरण निर्मल होता है, हम सरल एवं सात्त्विक हो जाते हो।
साथ ही साथ नमस्कार द्वारा योग मुद्रा भी हो जाती है।
मंदिर में हमें तिलक लगाया जाता है.. तिलक
बुद्धिबल व सत्त्वबलवर्द्धक है. ललाट पर दो भौहों के बीच विचारशक्ति का केन्द्र है जिसे योगी लोग आज्ञाशक्ति का केन्द्र कहते है।
मंदिर में बजने वाले शंख और घंटों की ध्वनियां वहां के वातावरण में कीटाणुओं को नष्ट करते रहती हैं।
ऋषि-मुनियों का यही लक्ष्य था कि सुबह जब
हम अपने काम पर जाएं उससे पहले मंदिर से
ऊर्जा लेकर जाएं।

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