सुंदर कथा १ (श्री भक्तमाल – श्री रांका बांका जी) Sri Bhaktmal – Sri Ranka Banka ji

श्री रांका-बांका (पति पत्नी) जी दोनो उच्च कोटी के भक्त हुए हैं। भक्त श्रीरांकाजी पति थे और भक्तिमती श्रीबांकाजी उनकी पत्नी थी। इन दोनोके ह्रदयमें सिवा भगवान्‌ के और कुछ भी चाह नहीं थी। यह दोनो जंगलसे लकड़ियां बीनकर लाते और उन्हींको बेचकर अपनी नित्य नवीन जीविका करते थे। एक बार संत श्री नामदेवजी ने भगवान् श्रीकृष्ण से विनती की के भक्त रांका-बांकाजी की गरीबी दूर कर दीजिये । भगवान् ने कहा – मैने बहुत उपायोंसे इन्हे देना चाहा, परंतु ये लेते ही नहीं, यदि नही मानो तो मेरे संग चलो, मै इनकी निष्कामता दिखलाऊँ।

फिर तो भगवान्‌ने मार्गमें एक स्वर्णमुहरोंसे भरी थैली डाल दी और स्वयं तथा श्रीनामदेवजी दोनों जंगल में छिप गये। इतनेमें श्री रांका-बांकाजी दोनों उसी मार्गसे आये। आगे पति रांकाजी थे और पिछे पत्नी बांकाजी थी। एका एक श्री रांका जी ने मार्गमें पडी हुई मुहरोंसे भरी हुई थैली देखी। देखकर विचार किया कि मेरी पत्नी भले निष्काम है फिरभी दृष्टिपथमें आनेपर लौकिक वस्तुओं भी मन फंस जाता है, कही यह धन देखकर इसकी धन पाने की इच्छा न हो जाए। अतः पति श्रीरांकाजीने शीघ्रतापूर्वक उस थैलीपर धूल डाल दी।

श्रीबांकाजीने पतिसे पूछा – अजी, आपने यहां पृथ्वीपर झुककर क्या किया है? तब श्रीरांकाजीने सत्य बात बता दी। तब पत्नी श्रीबांकाजीने कहा, आप धूल के ऊपर धूल डालने का व्यर्थ परिश्रम क्यों कर रहे थे? अभी आपके मनमें धनका ग्यान बना ही है? यह सुनकर श्री रांकाजी बोले – लोग मुझे रांका अर्थात् रंक और तुम्हे बांका अर्थात् श्रेष्ठ कहते है, यह सत्य ही है की तुम मुझसे श्रेष्ठ हो। यह बात मैने आज देखा ली। इनकी ये बातें सुनकर भगवान् विठ्ठल श्रीकृष्ण, श्री नामदेव जी से बोले – देखो, हमारी बात सत्य हुई। ये दोनों धनके प्रति कितने निस्पृह हैं।

भगवान्‌ की जीत हुई और श्री नामदेवजी हार गये। फिर भगवान्‌ने कहा – यदि तुम्हारे मनमें विषेश परिताप है कि श्रीरांका-बांकाजी की सहायता करनी ही चाहिए तो चलो इनके लिए लकड़ी बटोरो। फिर श्रीभगवान् और श्री नामदेव जी लकड़ियां बटोरने लगे। तदुपरांत श्रीरांका-बांकाजी लकडी बीनने आये तो जहां वहां लकडीयों का ढेर देखकर इनका मन भयभीत हुआ। तब भगवान् श्रीश्यामसुंदरने प्रकट होकर दर्शन दिया। श्रीरांका-बांकाजी श्रीभगवान् को घर लिवा लाये। भगवान्‌के संग श्रीनामदेवजी को देखा तो श्रीरांकाजी ने कहां – अरे मूडफेरा! श्रीप्रभुको इस प्रकार वन वन भटकाया जाता है?

भगवान्‌ ने श्रीरांकाजी से कुछ मांगने का अनुरोध किया। तब वे हाथ जोडकर प्रार्थना करने लगे कि मुझे आपकी कृपाके सिवा और कुछ भी नहीं चाहिए। तब श्रीनामदेवजीने कहा की कुछ नही तो प्रभु का रुख रखते हुए प्रभुका एक प्रसादी वस्त्र ही शरीरपर धारण कर लीजिये।यद्यपि इतनेसे भी श्रीरांका-बांकाजी को लगा कि सिरपर भारी बोझ पड गया, परंतु उन्होने भक्त और भगवान्‌ की रुचि रखनेके लिये वस्त्रमात्र स्वीकार कर लिया ।

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