सुंदर कथा ३(श्री भक्तमाल-श्री रामदास जी) Sri Bhaktmal – Sri Ramdas ji

श्री द्वारकापुरी के समीप ही डाकोर नाम का एक गाँव है,वहा श्री रामदासजी नाम के भक्त रहते थे।वे प्रति एकादशीको द्वारका जाकर श्री रणछोड़जीके मंदिर में जागरण कीर्तन करते थे।जब इनका शरीर वृद्ध हो गया,तब भगवन ने आज्ञा दी, की अब एकादशीकी रात का जागरण घरपर ही कर लिया करो। पर इन्होने ठाकुरजी की यह बात नहीं मानी। भक्तका दृढ़ नियम देखकर भाव में भरकर भगवन बोले-अब तुम्हारे यहाँ आने का कष्ट मुझसे सहन नहीं होता है,इसलिए अब मै ही तुम्हारे घर चलूँगा। अगली एकादशी को गाडी ले आना और उसे मंदिरके पीछे खिड़कीकी ओर खड़ा कर देना ।मै खिड़की खोल दूंगा,तुम मुझे गोद में भरकर उठा ले जाना और गाडी में पधराकर शीघ्र ही चल देना।
भक्त रामदासजी ने वैसा ही किया.जागरण करने
के लिए गाडीपर चढ़कर आये।सभी लोगो ने समझा की भक्त जी अब वृद्ध हो गए है ।अतः गड़ीपर चढ़कर आये है।
एकादशीकी रातको जागरण हुआ ,द्वादशी की आधी रातको वे खिड़की के मार्गसे मंदिरमे गए।श्री ठाकुरजीके श्रीविग्रह पर से सभी आभूषण उतारकर वही मंदिरमे रख दिए। इनको तो भगवानसे सच्चा प्रेम था ,आभूषणोंसे क्या प्रयोजन?
श्री रणछोडजी को गाड़ीमें पधराकर चल दिए।

प्रातः काल जब पुजारियोंने देखा तो मंदिर सूना उजड़ा पड़ा है।लोग समझ गए की श्री रामदासजी गाड़ी लाये थे,वही ले गए। पुजारियोंने पीछा किया।उन्हें आते देखकर श्री रामदासजीने कहा की अब कौन उपाय करना चाहिए?भगवानने कहा -मुझे बावली में पधरा दो।भक्तने ऐसा ही किया और सुखपूर्वक गाडी हांक दी ।पुजारियोंने रामदासजी को पकड़ा और खूब मार लगायी।इनके शरीरमे बहुत-से-घाव हो गए।

भक्तजी को मार-पीटकर पुजारी लोगोंने गाड़ीमे तथा गाडीके चारो ओर भगवानको ढूँढने लगे,पर वे कही नहीं मिले।तब सब पछताकर बोले की इस भक्तको हमने बेकार ही मारा। इसी बीच उनमेसे एक बोल उठा-मैंने इस रामदास को इस ओर से आते देखा,इस ओर यह गया था। चलो वाहां देखे।सभी लोगोने जाकर बावलीमें देखा तो भगवान मिल गए।उसका जल खूनसे लाल हो गया था।भगवनने कहा- तुम लोगोने जो मेरे भक्तको मारा है।

उस चोट को मैंने अपने शरीरपर लिया है ,इसीसे मेरे शरीरसे खून बह रहा है,अब मै तुम लोगों के साथ कदापि नहीं जाऊंगा।यह कहकर श्री ठाकुरजीने उन्हें दूसरी मूर्ति एक स्थानमे थी,सो बता दी और कहा की उसे ले जाकर मंदिरमे पधराओ, अपनी जीविका के लिए इस मूर्ति के बराबर सोना ले लो और वापस जाओ। पुजारी लोभवश राजी हो गए और बोले-तौल दीजिये।रामदासजी के घरपर आकर भगवानने कहा-रामदास,तराजू बांधकर तौल दो।रामदासजी की पत्नी के कानमे एक सोनेकी बाली थी,उसीमे उन्होंने भगवानको तौलदिया और पुजारियों को दे दिया। पुजारी अत्यंत लज्जित होकर अपने घर को चल दिए।

श्री रणछोडजी रामदासजी के घरमें ही विराजे.इस प्रसंगमे भक्तिका प्रकट प्रताप कहा गया है। भक्तके शरीरपर पड़ी चोट प्रभुने अपने उपर ले लिया,तब उनका ‘आयुध-क्षत’ नाम हुआ। भगवान् ने भक्त् से अपनी एकरूपता दिखानेके लिए ही चोट सही, अन्यथा उन्हें भला कौन मार सकता है?भगवान को ही डाकू की तरह लूट लाने से उस गाँव का नाम डाकौर हुआ , भक्त  रामदास के वंशज स्वयं को भगवान के डाकू कहलाने में अपना गौरव मानते है । आज भी श्री रणछोड़ भगवान को पट्टी बाँधी जाती है। धन्य है भक्त श्री रामदासजी।

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