सुंदर संत कथा ५(श्री भक्तमाल-श्री मधवदासजी) Bhaktmal Katha

श्री मधवदासजी एक उच्च कोटि के संत हुए है।श्री मधवदासजी कान्यकुब्ज ब्राह्मण थे ।जब इनकी पत्नी स्वर्गलोकको सिधारी,तब इनके हृदयमे संसार से सहसा वैराग्य हो गया और घर छोड़ कर जगन्नाथपुरीका रास्ता पकड़ा।

वहाँ पहुंचकर समुद्रके किनारे एकांत में पड़े रहे और अपने आप को भगवत ध्यान मे तल्लीन कर दिया। ये ऐसे ध्यानमग्न हुए के अन्न-जलकी भी सुध न रही।इस प्रकार जब बिना अन्न-जलके आपको कई दिन बीत गये,तब दयालु जगन्नाथजीने लक्ष्मीजी को आज्ञा दी कि आप स्वयं उत्तम-से-उत्तम भोग सुवर्ण थालमे रखकर मेरे भक्त माधव के पास पंहुचा दे। लक्ष्मी जी प्रभु की आज्ञा पाकर सुवर्ण-थाल श्री मधवदासजी के पास रखकर चली आयी।जब मधवदासजी का ध्यान समाप्त हुआ,तब वे स्वर्ण का थाल देखकर भगवत्कृपाका अनुभव करते हुए अनन्दाश्रु बहाने लगे। भोग लगाया,प्रसाद पा थालको एक ओर रख दिया;फिर ध्यानमग्न हो गए।

उधर जब भगवान के पट खुले,तब पुजारियोंने सोने का एक थाल न देख बहुत शोर-गुल मचाया। पुरिभरमें तलाशी होने लगी। ढूंढते-ढूंढते थाल मधवदासजी के पास पड़ा पाया गया। माधवदासजी को चोर समझकर उनको चाबुक पड़ने लगे। रात्रिमें पुजारियोंको भगवान् ने स्वप्न में कहा-‘मैंने मधवकी चोट अपने ऊपर ले ली,अब तुम्हारा अनिष्ट कर दूंगा;नहीं तो चरणोंपर पड़कर अपने अपराध क्षमा करवा लो।’ बेचारे पण्डा दौड़ते हुए मधवदासजी के पास आये और उनके चरणोमे जा गिरे। मधवदासजीने तुरंत क्षमा प्रदानकर उन्हें निर्भय किया।

अब माधवदासजीके प्रेमकी दशा ऐसी हो गयी कि जब कभी भगवत्दर्शनके लिए मंदिरमे जाते,तब प्रभुकी मूर्तिको ही एकटक देखते रह जाते।दर्शन समाप्त होने पर तल्लीन अवस्थामे वाही खड़े खड़े पुजारियों के देखते देखते अदृश्य हो जाते।एक बार श्री मधवदासजी रात्रिमें मंदिरमे ही रुके रहे। वह जब रात्रिमें इन्हें ठण्ड लगने लगी तो स्वयं जगन्नाथजीने अपनी रजाई इन्हें ओढ़ा दी।
एक बार मधवदासजीको अतिसाका रोग हो गया।वह समुद्र किनारे दूर जा पड़े।वहाँ इतने दुर्बल हो गए कि उठ-बैठ नहीं सकते थे।ऐसी दशा में जगन्नाथजी स्वयं सेवक बनकर आपकी सुश्रुषा करने लगे ,मल साफ़ करने लगे। जब मधवदासजी को होश आया,तब उन्होंने तुरंत पहचान लीया की हो-न-हो यह प्रभु ही हैं।

यह समझ झट उनके चरण पकड़ लिए और विनीत भावसे कहने लग – ‘नाथ! मुझ जैसे अधम के लिये क्यों आपने इतना कष्ट उठाया?फिर प्रभो! आप तो सर्वशक्तिमान् हैं। अपनी शक्तिसे ही मेरे दुःख क्यों न हर लिये,वृथा इतना परिश्रम क्यों किया ?’ भगवान कहने लगे – ‘माधव! मुझसे भक्तों का कष्ट नहीं सहा जाता,इसी कारण तुम्हारी सेवा मैंने स्वयं की।तुम जानते हो कि प्रारब्ध भोगने से ही नष्ट होता है-यह मेराही नियम है,इसे मै कैसे तोडू? इसीलिए केवल सेवा करके प्रारब्ध-भोग भक्तोसे करवाता हूं और इसकी सत्यता संसारको दिखलाता हूं।’भगवन् यह कहकर अंतर्धान हो गए।

इन घटनाओं से लोगों को बड़ा आश्चर्य हुआ। अब तो माधवदास जी की महिमा चारों ओर फैलने लगी। लोग इनको बहुत घेरने लगे। भक्तों के लिये सकामी संसारी जीवों से घिर जाना एक बड़ी आपत्ति है। आपकों यह सूझा कि अब पागल बन जाना चाहिये। बस, आप पागल बन इधर-उधर हरि-ध्वनि करते घूमने लगे। एक दिन आप एक स्त्री के द्वारपर गये और भिक्षा माँगी। वह स्त्री उस समय चौका दे रही थी, उसने मारे क्रोधसे चौकेका पोतना माधव जी के मुँह पर फेककर मारा। आप बड़े प्रसन्न होकर उस पोतने को अपने डेरेपर ले गये। उसे धो-सुखाकर भगवानके मन्दिर में जा उसकी बत्ती बनाकर जलायी, जिसका यह फल हुआ कि उस पोतनेकी बत्ती से ज्यों-ज्यों मन्दिर में प्रकाश फैलने लगा, त्यों-त्यों उस स्त्री के हृदय-मन्दिर में भी ज्ञानका प्रकाश होना प्रारम्भ हुआ। यहाँ तक कि अन्त में वह स्त्री परम भक्तिमती हो गयी और रात-दिन भगवान के ध्यान में मस्त रहने लगी।

एक बार एक शास्त्री पण्डित शास्त्रार्थद्वारा दिग्विजय करते हुए माधवजी के पाण्डित्य की चर्चा सुनकर शास्त्रार्थ करने जगन्नाथपुरी आये और माधवदासजी से शास्त्रार्थ करने का हठ करने लगे। भक्तों को शास्त्रार्थ निर्रथक प्रतीत होता है। माधवदासजीने बहुत मना किया, पर पंडित भला कैसे मानते ? अन्त में माधवदास जी ने एक पत्र पर यह लिखकर हस्ताक्षर कर दिया, ‘माधव हारा, पंडित जीते। पंडित जी इसपर फूले न समाए। तुरंत काशी चल दिए। वहाँ पंडितों की सभा कर वे अपनी विजय का वर्णन करने लगे और वह प्रमाणपत्र लोगों को दिखाने लगे। पंडितों ने देखा तो उस पर यह लिखा पाया, ‘पंडितजी हारे, माधव जीता।’ अब तो पंडित जी क्रोध के मारे आगबबूला हो गए। उल्टे पैर जगन्नाथपुरी पहुँचे। वहाँ माधवदासजी को जी खोल गालियाँ सुनायीं और कहा कि ‘शास्त्रार्थमें जो हारे’ वही काला मुँह कर गदहे पर चढ़ नगर भरमें घूमे।’ माधवदासजी ने बहुत समझाया, पर वे क्यों मानने लगे ? अवकाश पाकर भगवान् माधवदासजी का रूप बना पंडित जी से शास्त्रार्थ करने पहुँचे और भरी सभा में उन्हें खूब छकाया।

अन्त में उनकी शर्त के अनुसार उनका मुँह काला कर गदहेपर चढ़ा, सौ-दो-सौ बालकों को ले धूल उड़ाते नगर में सैर की। माधवदासजीने जब यह हाल सुना, तब भागे और भगवान् के चरण पकड़ उनसे पंडितजीके अपराधों की क्षमा चाही। भगवान् तुरंत अन्तर्धान ध्यान हो गए। माधवदासजी ने पंडित जी को गदहे से उताकर क्षमा माँगी, उनका रोष दूर किया। धन्य है भक्तों की सहिष्णुता और दयालुता ! एक बार माधवदासजी व्रजयात्रा को जा रहे थे। मार्ग में एक बाई आपको भोजन कराने ले गयी। बाई ने बड़े प्रेम से आपको भोजन करवाया।

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s