श्री रामकृष्ण परमहंस के विचार ३

श्री रामकृष्ण दक्षिणेश्वर काली मंदिर
के पास टहल रहे थे। उन्हें देखकर झाड़ू लगाने वाले रसिक मेहतर ने उन्हें दण्डवत् प्रणाम किया। ठाकुर ने प्रसन्नमुख से पूछाः
“क्यों रे रसिक ! कुशल तो है ? ”
“बाबा ! हमारी जाति हीन, हमारा कर्म हीन, हमारा क्या कुशल-मंगल !” हाथ जोड़ कर रसिक ने उत्तर दिया।

ठाकुर तेजयुक्त स्वर में बोलेः
“हीन जाति कहाँ ! तेरे भीतर नारायण हैं, तू स्वयं को नहीं जान पाया इसलिए हीनता का अनुभव कर रहा है।”
“किंतु कर्म तो हीन है।” रसिक ने कहा।
“क्या कह रहा है ! क्या कभी कोई कर्म हीन होता है !” फिर ठाकुर जोर देकर बोलेः
“यहाँ माँ का दरबार है, राधाकांत, द्वादश शिव का दरबार है, कितने साधु-संतों का यहाँ आना-जाना लगा रहता है, उनके चरणों की धूल चारों ओर फैली हुई है।
झाड़ू लगाकर तू वही धूल अपने शरीर
पर लगा रहा है। कितना पवित्र कर्म है ! कितने भाग्य से यह सब तुझे मिल रहा है !”

श्री राम
हरिः शरणम्

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