पूज्यपाद संतो के जीवन के कुछ प्रेरणात्मक सत्य प्रसंग और चमत्कार -भाग १।

® यह सब चरित्र और रहस्य पूज्य संत श्री भक्तमाली जी , श्री राजेंद्रदासचार्य जी ,हरिवंशी संत श्री हितशरण जी, पंडित बाबा, श्री रामसुखदास जी एवं कुछ अवध के महात्माओ के निजी अनुभवो और उनके अनुयायी संतो  से सुनी जानकारी के आधार पर दिया लिखा गया है । कृपया अपने नाम से कही प्रकाशित ना करे । Copyrights :www.bhaktamal.com ®

१. एक प्रेमि संत :

पूज्य श्री हरीबाबा जी महान् संत हुए है , उनके साथ नित्य कुछ न कुछ संत मंडली रहती ही थी । एक समय हरीबाबा के साथ कुछ प्रेमी संत यात्रा करने गए थे , उन संतो में एक संत के पास बड़े सुंदर शालिग्राम भगवान् थे । वे संत उन शालिग्राम जी को हमेशा साथ लिए रहते थे । ट्रेन से यात्रा करते समय बाबा ने शालिग्राम जी को बगल में रख दिया और अन्य संतो के साथ हरी चर्चा में मग्न हो गए । जब ट्रेन रुकी और सब संत उतरे तो वे शालिग्राम जी वाही गाडी में रह गए । संत अपनी मस्ती में उन्हें साथ लेकर आना ही भूल गए । बहुत देर बाद जब हरीबाबा जी के आश्रम पर सब संत पहुंछे और भोजन प्रसाद पाने का समय आया तो उन प्रेमी संत ने देखा की हमारे शालिग्राम जी नहीं है ।

संत बहुत व्याकुल हो गए , बहुत रोने लगे परंतु भगवान् मिले नहीं । उन्होंने भगवान् के वियोग अन्न जल लेना स्वीकार नहीं किया  । हरीबाबा ने कहा – महाराज मै आपको बहुत सुंदर चिन्हों से अंकित नये शालिग्राम जी देता हूँ परंतु उन संत ने कहा की हमें अपने वही ठाकुर चाहिए जिनको हम अब तक लाड लड़ते आये है । हरीबाबा बोले – आपने उन्हें कहा रखा था ,मुझे तो लगता है गाडी में ही छुट गए होंगे और अब कई घंटे बीं गए है । गाडी से किसीने निकल लिए होंगे और गाडी भी बहुत आगे निकल चुकी होगी । संत बोले – मै स्टेशन मास्टर से बात करना चाहता हूँ वहाँ जाकर ।

अन्य संतो ने हरीबाबा से कहा की एकबार इनके मन की तसल्ली के लिए हमारे साथ इनको स्टेशन जाने दीजिये । सब संत उन महात्मा को लेकर वहाँ पहुंचे । स्टेशन मास्टर से मिले और भगवान् के गुम होने की शिकायत करने लगे । उन्होंने पूछा की कौनसी गाडी में आप बैठ कर आये थे । संतो ने गाडी का नाम स्टेशन मास्टर को बताया तो वह कहने लगा – महाराज ! कई घंटे हो गए ,यह वाली गाडी ही तो यहां खड़ी, गाडी आगे ही नहीं बढ़ रही है । न कोई खराबी है न अन्य कोई दिक्कत परंतु गाडी आगे नहीं बढ़ती । महात्मा जी बोले – अभी आगे बढ़ेगी ,मेरे बिना मेरे प्यारे कही अन्यत्र कैसे चले जायेंगे ?

वे महात्मा अंदर ट्रेन के डिब्बे के अंदर गए और ठाकुर जी वही रखे हुए थे जहां महात्मा ने उन्हें पधराया था । भगवान् को महात्मा ने गले लगाया और जैसे ही महात्मा जी उतरे गाडी आगे बढ़ने लग गयी । ट्रेन का चालाक , स्टेशन मास्टर सभी आश्चर्य में पड गए और बाद में उन्होंने जब यह पूरी लीला सुनी तो वे गद्गद् हो गए । उन्होंने अपना जीवंत संत और भगवा की सेवा में लगा दिया ।

२. संत सेवा का माहात्म्य :

पुराने समय की बात है ,एक वैष्णव भक्त भगवान् से भेट करने हेतु द्वारिका पूरी की यात्रा पर निकल रहे थे। वहाँ के कोई धनि सेठ जी ने उनको १०० रूपया दिया और कहा की द्वारिका जाकर भगवान् की सेवा में ये धन अर्पित कर देना। भक्त जी यात्रा पर निकले तो मार्ग में कुछ संतो के दर्शन हुए । संतो को श्रमित जानकार भक्त ने संतो को सुंदर भोजन कराया। संतो के भोजन प्रसादी में ९८ रूपए का खर्च हुआ और २ रूपए बाकी रह गए।

भक्त द्वारिका पहुँचे। भगवान् के दर्शन किये और २ रूपए भगवान् की सेवा में दे दिए। उसी रात सेठ जी को स्वप्न हुआ और भगवान् ने स्वप्न में कहा मुझे ९८ रूपए की सेवा प्राप्त हुई है। भक्त वापस लौट आनेपर सेठ जी ने पूछा की आपने मेरे दिए रुपयो का क्या किया ? भक्त ने सही सही कह दिया की हमने संतो की सेवा में धन लगा दिया और बचा हुआ २ रूपया भगवान की दान पेटी में डाल आये। सेठ ने अपना स्वप्न भक्त जी को सुनाया। सेठ और भक्त दोनों को संतो की सेवा का माहात्म्य समझ आ गया। उसके बाद दोनों आजीवन संतो की सेवा में लगे रहे।

 पूज्य श्री पंडित बाबा का वचन सत्य होना :

श्री गिरिराज गोवर्धन जी की तरहठी में एक सिद्ध गौड़ीय वैष्णव संत रहते थे जिनको सभी श्री पंडित बाबा के नाम से जानते थे । एक ब्रजवासन स्त्री संत बाबा की सेवा करने रोज आती और उनके फल आदि दे जाती । बाबा किसीको कभी अपना शिष्य नहीं बनाते थे ।एक बार वह भोली ब्रजवासन स्त्री बाबा के पास आकर बोली – बाबा ! मुझे कौनसा मंत्र जपना चाहिए ? बाबा ने पूछा – बेटी कौनसे कुल से हो ? कौनसे संप्रदाय से हो ?

उस स्त्री ने उत्तर दिया की बाबा मै तो वल्लभ कुल की हूँ। बाबा बोले – बेटी वल्लभ कुल में तो एक ही मंत्र जपा जाता है । अष्टाक्षर मंत्र – श्री कृष्णः शरणम् मम । यही जपा करो तुम भी । ब्रजवासन स्त्री बोली – बाबा ! यह नाम ( कृष्ण ) मुन्ना के चाचा अर्थात मेरे जेठ जी का नाम है , मै नहीं जप सकती । मुझे लाज आती है । बाबा बोले – अच्छा फिर क्या जप सकती हो ?उनको क्या कहकर पुकारती हो ? स्त्री ने कहा – हम तो मुन्ना के चाचा की कहते है उनको । बाबा बोले – तो तुम “मुन्ना के चाचा शरणम मम ” जपो परंतु रूप ध्यान और स्मरण भगवान् श्रीकृष्ण का ही रखना । फिर बाबा बोले – अच्छा और क्या पूछना चाहती है बता ? स्त्री बोली – बाबा मेरे मन में एक इच्छा है की भगवान् मुझे बड़ी एकादशी के दिन ही अपने धाम लेकर जाए ।

बाबा मुस्कुराये और बोले ठीक है ऐसा ही होगा । तू यह बताया हुआ नाम जप और अंदर से भाव स्मरण भगवान् का ही रखना । बाबा के शरीर छोडने के बाद जब वह स्त्री भी बूढी हो गयी और कुछ ही समय बाद जब बड़ी एकादशी आयी तो भगवान स्वयं उसे लेने आये और कहा की चल मेरे साथ, मै तुझे ले जाने आया हूँ । भगवान् ने याद दिलाया की तूने पंडित बाबा से इच्छा कही थी की इसी दिन भगवान् मुझे अपने धाम ले जाए । मंत्र तो अजब गजब का था पर संत के मुख से निकल था ,इसी मंत्र का स्मरण करती हुई वह स्त्री श्री भगवान् के साथ गोलोक धाम को चली गयी ।

४ . पूज्य श्री रामसुखदास जी की साधुता :

एक समय श्री स्वामी जी वृन्दावन में चातुर्मास करने के लिए ठहरे थे । पास ही में एक गौशाला थी, वहाँ के कुछ लोग स्वामी जी के पास आये और कहने लगे की महाराज जी गौशाला की स्थिति ठीक नहीं है ,रूपया भी कम आ रहा है। आप के साथ बड़े बड़े सेठ और उद्योगपति रहते है ,आप किसी से कह देंगे तो दान दक्षिणा आ जायेगी । स्वामी जी ने अपने सम्पूर्ण जीवन में किसीसे भी कुछ नहीं लिया ,सम्पूर्ण रूप से प्रभु के आश्रित ही रहे। उनका मानना था की सच्चा साधु वही जो संसार से किसी चीज कि याचना न करे।

स्वामीजी ने घोषणा कर दी की कल सबेरे हम गौशाला में पूजन करने आएंगे । सुबह महाराज ने गौशाला में पूजा की ,साथ में कुछ बड़े सेठ भी आये थे। उन्होंने जब देखा की गौशाला की स्थिति ख़राब है तब उन्होंने स्वयं ही बहुत सी सेवा दे दी। अतः स्वामीजी ने गौ सेवको की भी इच्छा पूर्ण की और साधू का कर्तव्य है कुछ न माँगना ,उसकी भी मर्यादा राखी।

५. श्री रामरतनदास जी महाराज के प्रभाव से हिंस्रक पशु का शांत होना :

वृंदावन में करह आश्रम नामक श्री रामानंदी संतो का एक स्थान है । वहाँ पर एक सिद्ध संत रहते जिनका नाम था श्री रामरतनदास बाबाजी महाराज । जहां वे अपनी साधना करते थे वहाँ एक पहाड़ है और ऊपर निचे दो गुफाएं है । निचे वाली गुफा में महाराज जी अपनी साधना करते थे और ऊपर वाली गुफा में एक बड़ा भारी बब्बर शेर रहता था ।उस शेर का वहाँ बड़ा आतंक था , अच्छे अच्छे लोग वहाँ भटकने नहीं आते थे । कभी कभी वे शेर निचे वाली गुफा में महाराज जे की पीठ के पीछे आकर चुपचाप बैठ जाता और जब महाराज जी की आँख खोलकर देखते थे तब कहते थे – बच्चा ! तू जानता है की महाराज जी बहुत समय से नाम जप में बैठे है , उनकी पीठ के पीछे कोई सहारा नहीं है इसीलिए आकर तकिये का काम देता है ,हमें आराम देता है ।

वैसे तो वहाँ उस स्थानपर कोई नहीं आता था परंतु कुछ भक्तलोग महाराज जी के दर्शन के लिए आया करते थे और उनके लिए फल अन्न आदि लाकर देते थे । जब वे लोग महाराज जी के पास आते थे तब वह शेर जोरदार दहाड़ लगता । शेर को दहाड़ता देखकर महाराज जी कहते – देखो तुम्हारे दहाड़ ने से भक्त लोग दर रहे है ,तुम जबतक बैठे रहोगे तबतक भक्त लोग यहां हमारे पास नहीं आएंगे । तुम ऐसा करो ,तुम अभी ऊपर वाली गुफा में चले जाओ । महाराज जी की बात सुनकर वह शेर चुपचार ऊपर गुफा में चला जाता औए जब कोई नहीं होता तब पुनः महाराज जी की पीठ से लगकर संत के मुख से बैठकर नाम जप सुनता रहता ।

६. भगवान् की भक्ति कब प्राप्त होती है ?

श्री अयोध्या जी में एक उच्च कोटि के संत रहते थे ,इन्हें रामायण का श्रवण करने का व्यसन था । जहां भी कथा चलती वहाँ बड़े प्रेम से कथा सुनते , कभी किसी प्रेमी अथवा संत से कथा कहने की विनती करते । एक दिन राम कथा सुनाने वाला कोई मिला नहीं । वही पास से एक पंडित जी रामायण की पोथी लेकर जा रहे थे । पंडित जी ने संत को प्रणाम् किया और पूछा की महाराज ! क्या सेवा करे ? संत ने कहा – पंडित जी , रामायण की कथा सुना दो परंतु हमारे पास दक्षिणा देने के लिए रुपया नहीं है ,हम तो फक्कड़ साधु है । माला ,लंगोटी और कमंडल के अलावा कुछ है नहीं और कथा भी एकांत में सुनने का मन है हमारा । पंडित जी ने कहा – ठीक है महाराज , संत और कथा सुनाने वाले पंडित जी दोनों सरयू जी के किनारे कुंजो में जा बैठे ।

पंडित जी और संत रोज सही समय पर आकर वहाँ विराजते और कथा चलती रहती । संत बड़े प्रेम से कथा श्रवण करते थे और भाव विभोर होकर कभी नृत्य करने लगते तो कभी रोने लगते। जब कथा समाप्त हुई तब संत में पंडित जी से कहा – पंडित जी ,आपने बहुत अच्छी कथा सुनायी । हम बहुत प्रसन्न है ,हमारे पास दक्षिणा देने के लिए रूपया तो नहीं है परंतु आज आपको जो चाहिए वह आप मांगो । संत सिद्ध कोटि के प्रेमी थे , श्री सीताराम जी उनसे संवाद भी किया करते थे । पंडित जी बोले – महाराज हम बहुत गरीब है ,हमें बहुत सारा धन मिल जाये । संत बोले – संत ने प्रार्थना की की प्रभु इसे कृपा कर के धन दे दीजिये । भगवान् ने मुस्कुरा दिया , संत बोले – तथास्तु । फिर संत ने पूछा – मांगो और क्या चाहते हो ? पंडित जी बोले – हमारे घर पुत्र का जन्म हो जाए । संत ने पुनः प्रार्थना की और श्रीराम जी मुस्कुरा दिए । संत बोले – तथास्तु ,तुम्हे बहुत अच्छा ज्ञानी पुत्र होगा ।

फिर संत बोले और कुछ माँगना है तो मांग लो । पंडित जी बोले – श्री सीताराम जी की अखंड भक्ति ,प्रेम हमें प्राप्त हो । संत बोले – नहीं ! यह नहीं मिलेगा । पंडित जी आश्चर्य में पड़ गए की महात्मा क्या बोल गए । पंडित जी ने पूछा – संत भगवान् ! यह बात समझ नहीं आयी । संत बोले – तुम्हारे मन में प्रथम प्राथमिकता धन ,सम्मान ,घर की है । दूसरी प्राथमिकता पुत्र की है और अंतिम प्राथमिकता भगवान् के भक्ति की है । जब तक हम संसार को , परिवार ,धन ,पुत्र आदि को प्राथमिकता देते है तब तक भक्ति नहीं मिलती । भगवान् ने जब केवट से पूछा की तुम्हे क्या चाहिए ? केवट ने कुछ नहीं माँगा । 

प्रभु ने पूछा – तुम्हे बहुत सा धन देते है , केवट बोला नहीं । प्रभु ने कहा – ध्रुव पद लेलो ,केवट बोला – नहीं । इंद्र पद, पृथ्वी का राजा , और मोक्ष तक देने की बात की परंतु केवट ने कुछ नहीं लिया तब जाकर प्रभु ने उसे भक्ति प्रदान की । हनुमान जी को जानकी माता ने अनेको वरदान दिए – बल, बुद्धि , सिद्धि ,अमरत्व आदि परंतु उन्हे प्रसन्नता नहीं हुई । अंत में जानकी जी ने श्री राम जी का प्रेम, अखंड भक्ति का वर दिया । प्रह्लाद जी ने भी कहा की हमारे मन में मांगने की कभी कोई इच्छा ही न उत्पन्न हो तब भगवान् ने अखंड भक्ति प्रदान की ।

७. भगवान् किसको मिलते है ?

निर्मल मन जन सो मोहि पावा। मोहि कपट छल छिद्र न भावा॥ अर्थात जो मनुष्य निर्मल मन का होता है, वही मुझे पाता है। मुझे कपट और छल-छिद्र नहीं सुहाते।

वृंदावन में एक भक्त रहते थे जो स्वाभाव से बहुत ही भोले थे । उनमे छल ,कपट ,चालाकी बिलकुल नहीं थी । बचपन से ही वे भक्त जी वृंदावन में रहते थे , श्री कृष्ण स्वरुप में उनकी अनन्य निष्ठा थी और वे भगवान् को अपना सखा मानते थे । बहुत शुद्ध आत्मा वाले थे , जो मन में आता है वही भगवान से बोल देते है ।वो भक्त कभी वृंदावन से बहार गए नहीं थी ।एक दीन भोले भक्त जी को कुछ लोग जगन्नाथ पुरी में भगवान् के दर्शन करने लग गए । पुराने दिनों में बहुत भीड़ नहीं होती थी अतः वे सब लोग जगन्नाथ भगवान् के बहुत पास दर्शन करने गए । भोले भक्त जी ने जगन्नाथ जी का स्वरुप कभी देखा  नहीं था , उसे अटपटा लगा ।

उसने पूछा – ये कौनसे भगवान् है ? ऐसे डरावने क्यों लग रहे है ? सब पण्डा पूजारी लोग कहने लगे – ये भगवान् श्री कृष्ण ही है , प्रेम भाव में इनकी ऐसी दशा हो गयी है । जैसे ही उसने सुना – वो जोर जोर से रोने लग गया और ऊपर जहां भगवान् विराजमान है वहाँ जाकर चढ़ गया । सब पण्डा पुजारी देखकर भागे और उससे कहने लगे की निचे उतरो परंतु वह निचे नहीं उतरा । उसने भगवान् को आलिंगन देकर कहा – अरे कन्हैया ! ये क्या हालात बना र खी  है तूने ? ये चेहरा कैसे फूल गया है तेरा , तेरे पेट की क्या हालात होंगयी है । यहां तेरे खाने पिने का ध्यान नहीं रखा जाता क्या ? मैं प्रर्थना करता हूं ,तू मेरे साथ अपने ब्रिज में वापस चल । मै दूध, दही ,मखान खिलाकर तुझे बढ़िया पहले जैसा बना दूंगा ,सब ठीक हो जायेगा तू चल ।

पण्डा पुजारी उन भक्त जी को निचे उतारने का प्रयास करने लगे , कुछ तो निचे से पीटने भी लगे परंतु वह रो रो कर बार बार यही कह रहा था की कन्हैया , तू मेरे साथ ब्रज में चल , मै तेरा अच्छी तरह ख्याल करूँगा । तेरी ऐसी हालात मुझसे देखी  नहीं जा रही । अब वहाँ गड़बड़ मच गयी तो भगवान् ने अपने माधुर्य श्रीकृष्ण रूप के उसे दर्शन करवाये और कहा – भक्तो के प्रेम में बंध कर मैंने कई अलग अलग रूप धारण किये है , तुम चिंता मत करो । जो जिस रूप में मुझे प्रेम करता है मेरा दर्शन उसे उसी रूप में होता है , मै तो सर्वत्र विराजमान हूँ । उसे जगन्नाथ जी ने समझा बुझाकर आलिंगन वरदान किया और आशीर्वाद देकर वृंदावन वापस भेज दिया । इस लीला से स्पष्ट है की जिसमे छल कपट नहीं है ,जो शुद्ध हृदय वाला भोला भक्त है उसे भगवान् सहज मिल जाते है ।

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