पूज्यपाद संतो के जीवन के कुछ प्रेरणात्मक सत्य प्रसंग और चमत्कार – भाग २ ।

® यह सब चरित्रा और रहस्य पूज्य संत श्री भक्तमाली जी , श्री राजेंद्रदासचार्य जी ,हरिवंशी संत श्री हितशरण जी , पंडित बाबा, श्री माधवदास बाबा जी एवं कुछ महात्माओ के निजी अनुभवो और उनके अनुयायी संतो से सुनी जानकारी के आधार पर दिया लिखा गया है । कृपया अपने नाम से कही प्रकाशित ना करे । Copyrights :www.bhaktamal.com

१. पूज्य श्री वंशीदास ब्रह्मचारी के नियम की परीक्षा :

श्री नर्मदा किनारे एक उच्च कोटि के संत विराजते थे जिनका नाम श्री वंशीदास ब्रह्मचारी जी था । उनका नित्य का नियम था की वे भगवान् को तो भोग लगते और साथ में एक अतिथि को भी भोजन प्रसाद खिलाते । ऐसा कारण के बाद ही वो स्वयं प्रसाद पाते थे । नित्य प्रति बे भगवान् को भोग लगते और इंतजार करते की कोई अतिथि आये । कोई न कोई अतिथि मिल ही जाता, कोई नहीं आया तो नर्मदा जी में मछली कछुआ को खिलाते। एक दिन कोई अतिथि नहीं आया और ना ही कोई कछुआ मछली कुछ दिखाई पड़ रहे थे । ब्रह्मचारी जी सोचने लगे की क्या आज का अन्न & ऐसे ही चला जायेगा।

बहुत समय बीत गया पर कोई दिखाई नहीं पड रहा था , अचानक संत के पास एक कुत्ता आया । कुत्ते को देखकर उसे डराकर भगा दिया  । जैसे ही भगाया ,तुरंत उसके बाद संत जी को ख्याल आया की कही अतिथि नारायण के रूप में कुत्ता ही न आया हो। उन्होंने सोचा की यही तो होगा वह, कितनी दूर गया होगा परंतु दूर दूर तक खली जमीन दिखाई पद रही थी । पश्चाताप करने लगे की इतनी देर बाद आखिर कोई अतिथि आया था पर हमने उसे भगा दिया । शाम बीत चुकी है ,अब तो मेरा नियम भंग हो गया । उस कुत्ते को बहुत ढूंधा पर कही दिखा नहीं । फिर आँख बंद करके नदी किनारे रोने लग गए , अब भगवान को दया आयी और प्रभु अचानक सामने उसी रूप में प्रकट हुए।

इस बार संत जी ने पहचान ने में भूल नहीं की और उस कुत्ते के चरण पकड़ कर कहने लगे की प्रभु ! मैं पहचान गया हूँ । आप भक्तवत्सल है ,मेरे अतिथि सत्कार के नियम की परीक्षा करने ही आप आये थे । कृपा कर के आप अपने रूप में आकर दर्शन प्रदान करो । भगवान् श्री रामचंद्र जी ने अपने निज स्वरुप का दर्शन कराया और संत जो को आनंद प्रदान किया । भगवान् श्री राम ने संत जी से कहा की जब जीवन में कोई नियम ले लेता है तो समय आनेपर उसके नियम निष्ठा की परीक्षा अवश्य होती है । यदि वह व्यक्ति नियम में दृढ़ विश्वास रखे तो भगवान् उस नियम को भंग नहीं होने देते । इस तरह श्रीराम जी ने संत जी के नियम की रक्षा की और ब्रह्मचारी जी को आशीर्वाद् देकर अंतर्धान हो गए ।

२. महाभाव की अवस्था :

श्री गौरांग महाप्रभु के विशेष कृपापात्र श्री कवी कर्णपूर एक उच्च कोटि के भक्त थे । उन्होंने बचपन से ही श्रीमन् महाप्रभु की लीलाओं का आस्वादन किया था । श्रीमन् महाप्रभु के प्रभाव से हिंस्रक पशु भी नाम संकीर्तन करते हुए नृत्य करने लगते थे , राधा कृष्ण का नाम सुनकर श्रीमन् महाप्रभु के शरीर में अष्टसत्त्विक भाव जागृत हो जाते थे , नृत्य करना , रूदन करना ,तड़पना , शरीर कांपना यह सब भाव कवी कर्णपूर ने महाप्रभु में देखे थे । श्रीमन् महाप्रभु ने अपने छः प्रमुख गोस्वामी गणो को गौड़ीय संप्रदाय और हरिनाम प्रचार हेतु वृंदावन मे भेजा हुआ था ।

एक दिन श्रीपाद रूप गोस्वामी जो षड् गोस्वामियों में से एक थे , एक वृक्ष के निचे श्री गोपी गीत पर प्रवचन रहे थे । अत्यंत मधुर प्रसंग कथा में चल रहे थे ,श्रोता मंत्रमुग्ध होकर कथा का आस्वादन कर रहे थे । श्रीपाद रूप गोस्वामी बड़ी गंभीर मुद्रा में कथा कह रहे थे । कवी कर्णपूर ने देखा की इनके शरीर पर भक्त के कोई भाव , लक्षण दिखाई नहीं पड़ते । न अश्रु है , न मुख पर कोई भाव , न विरह । वे सोचने लगे की रूप गोस्वामी महाप्रभु जी के विशेष कृपा पात्र होने पर भी उनके चित्त में प्रेम ,भक्ति , विरह के कोई भाव है ही नहीं । क्या कारण है ? यह सोचना ठीक नही है , यदि इनके हृदय मे प्रेम न होता तो इतने श्रोताओ के भीतर प्रेम जागता कैसे ।

इतने में वृक्ष का एक चिड़िया की चोंच से पेड़ का एक पत्ता पत्ता निचे गिरता हुआ आया और जैसे ही वह रूप गोस्वामी जी के नासिका के निकट आया , वह पत्ता एक क्षण में जलकर राख हो गया । कवी कर्णपूर बस एकटक देखते ही रह गए । प्रवचन प्रकट होने पर् प्रणाम करने निकट पहुंचे तब श्रीपाद रूप गोस्वामी जी की गरम श्वासों से कवि कर्णपूर के कपोल पर छाले निकल आये। उन्हें ज्ञात हो गया की रूप गोस्वामी अपने भीतर का भाव बहुत गुप्त रखते है ।उनके अंदर भगवान् के विरह का ताप इतना अधिक तीव्र है कि एक क्षण में यह पत्ता राख बन गया । यह महात्मा अपने अंदर का भाव प्रकट नहीं होने देते और किसी तरह अपना भाव अंदर छुपा कर कथा कहते है ।

अनंतश्री समपान श्री गणेशदास भक्तमाली जी महाराज के चरित्र में ऐसा ही एक प्रसंग है । एक दिन श्री भक्तमाली जी बरसाना धाम में गहमर वन के पास श्रीमद भागवत कथा कहने पधारे । उन्होंने बड़ा ही मधुुर प्रसंग सुनना आरम्भ किया , श्री रानी बरसाने से लाल जी का दर्शन करने चली और नंदगांव से श्रीकृष्ण प्रिया जी का दर्शन करने चले थे । बिच मार्ग में प्रेम सरोवर के निकट दोनों की आँखें मिली – बस इतना प्रसंग कहा की महाराज जी का शरीर थरथर कांपने लग गया । आँखों से अश्रुपात होने लगा , बहुत देर तक यही अवस्था रही ।

कथा कुछ हो नहीं पायी और जब श्री भक्तमाली जी महाराज पुनः सामान्य स्तिथि में लौट आये तब वे अपने विश्राम कक्ष में चले गए । उस समय उनके शिष्य श्री राजेंद्रदासचार्य जी महाराज ने पूछा – महाराज श्री ! आज कथा में ऐसा क्या हो गया था जो आप कथा नहीं कह पाये और शरिर कांपने लगा । यह बात सुनते ही श्री भक्तमाली जी की वही अवस्था हो गयी । बहुत देर बाद सामान्य स्तिथि में आनेपर उन्होंने शिष्य से कहा कि हमे बहुत सोच समझकर कथा कहना पड़ता है , कही भूल से भी भाव रस का स्पर्श हो गया तो फिर हम आगे कुछ कह नहीं पाते । इस अवस्था में जाने पर संसार की सुध बुध नहीं रह जाती , भूल से भी इस अवस्था अंदर का भाव बहार निकल न जाए इस दर से बहुत सिच समझकर कथा कहानी पड़ती है ।

ऐसी ही अवस्था श्री गौड़ीय संप्रदाय के महान् सिद्ध संत श्री जगद्बंधु सुंदर जी में दिखाई देती थी । उनके सामने जाते समय भक्तो को विशेष ध्यान रखना पड़ता कि कही धोखे से भी राधा नाम न निकल जाए । श्री राधा नाम सुनते ही वे ऐसी अवस्था में चले जाते की कई दिनों तक शरीर की सुध बुध नहीं होती और कभी कभी समाधि लग जाती । श्री राधा नाम तो क्या , कोई केवल रा अक्षर ही कह देता तो महाराज जी महाभाव के समुद्र में डूब जाते ।

३.सिद्ध नाम जापक संत पूज्यपाद श्री चतुर्दास जी महाराज के शब्दो का प्रभाव :

मुरैना क्षेत्र मध्य प्रदेश में एक निम्बार्क सम्प्रदाय के संत रहते थे जिनका नाम था श्री चतुर्दास जी । बाबा बड़े सिद्ध नाम जापक संत थे । अपना अधिकतम समय भगवान् के नाम् का जप करने में लगाते थे । निम्बार्क सम्प्रदाय मे यद्यपि श्री राधा कृष्ण नाम जपने की साधना परंपरा है परंतु बाबा की श्री राम नाम मे भी अद्भुत श्राद्धा थी । बाबा अधिक पढ़े लिखे भी नही थे , केवल हिंदी भाषांतर वाली गीता जी और श्री रामचरित मानस पढ़ लेते थे । वही पास मे एक गुफा थी जहां बाबा साधना करते थे । एक दिन उन्होंने एक अरब रामनाम करने का निश्चय किया । पूरा समय श्री राम नाम लेने में व्यस्त रहते थे , स्नान भोजन आदि बहुत शीघ्रता से कर लेते और शेष समय गुफा में बैठकर श्रीराम नाम करते रहते थे ।

रात्रि में बहुत कम समय विश्राम करते थे । विश्राम करने समय भी उनका कंठ हिलता रहता था । एक अरब राम नाम का जप पूरा होने पर बाबा बाहर आये । अब तो उनका एक एक क्षण श्रीराम नाम मे बीतने लाग ,चलते फिरते ,खाते पीते , विश्राम के समय भी राम नाम् चलता ही रहता । वाणी में अद्भुत सिद्धि प्रकट हो गयी । एक दिन बाबा बैठ कर नामजप कर रहे थे कि वहां से एक भेड़ बकरी चराने वाला गुजर रहा था । बाबा ने उससे कहा – सुनो ! ये भेड बकरी चराना तो तुम्हारा काम है परंतु कभी राम राम भी किया करो । बस इतना कहा कि वह बकरी चराने वाला राम नाम जप मे लग गया । वह संख्या पूर्वक लाखो की संख्या में राम नाम जपने लग गया ।

जिस किसी को बात बात मे भी बाबा यदि कह देते कि राम राम कह दिया करो । वे सभी लोग श्रीराम नाम के जप मे लग जाते । बैलगाड़ी वालो को , राह चलते लोगो को , बालको को – जिससे कह देते उसके जीवन मे नाम् जप प्रारम्भ हो जाता । चाहे कोई भक्त हो ,अभक्त हो , दुष्ट हो बाबा जिससे राम राम बोलने को कह देते वह निष्ठा पूर्वक राम नाम मे अपना जीवन व्यतीत करता । ऐसे महान सिद्ध नामजपक हुए श्री चतुर्दास बाबा ।

४. सेवा के प्रति निष्ठा :

श्री वृंदावन खाकचौक स्थान में पूज्य श्री देवदास पहाड़ी बाबा सरकार विराजते थे । वहां विचरण करते करते कई बार खाकचौक मे मंदसौर जिले के एक महंत आते थे । उनका नाम था भले बाबा क्योंकि वे बात बात मे भले शब्द का अधिक प्रयोग करते थे । अतः लोग उन्हें भले बाबा कहते थे । मंदसौर जिले में एक स्थान के महंत थे और हर साल वे एक यज्ञ करते थे । खाकचौक मे धुना घर म् अपना आसान लगाते थे । वहां प्रातः का भजन साधान समाप्त करके सेवा में लग जाते थे । संतो की सेवा और झाडू लगाने की सेवा भले बाबा करने लग जाते थे । कभी नीचे , कभी ऊपर ,कभी बाहर झाड़ू लगते रहते थे । कई घंटे झाड़ू लगते थे । आश्रम मे झाडू सेवा के लिए एक सेवक थे और एक ब्रजवासन बाई जी थी जिनका नाम सुमित्रा देवी था ।

एक दिन श्री पहाड़ी बाबा ने भले बाबा को अपने पास बुलाया और बहुत जोर की डांट लगते हुए कहा – ऐ भले ! तुमको एक जगह बैठकर चैन नही पड़ता । मै सफाई करने वालो को काम के पैसे देता हूँ ,दो दो सेवक है झाडू सेवा करने के लिए । तुम क्यों झाडू के लिए डोलते हो , जाओ बैठो अपने आसान पर और भजन करो । खबरदार अब झाडू लगाई तो । अब भले बाबा गए भीतर और अपना आसान ,कमंडल आदि लेकर महाराज जी के पास आकर साष्टांग दंडवत किया और बोले – महाराज ! इस बालक के अपराध क्षमा करना , अब मै यहां से जा रहा हूँ । लगता है दोबारा लौटकर नही आ पाएंगे । श्री पहाड़ी बाबा बोले – क्यो जा रहे हो भले । तुम तो पूरे सावन भादो ठहरते थे फिर इस बार क्यो जाना चाहते हो ?

भले बाबा बोले – जब जवानी थी तब इसी खाकचौक मे रसोई बनाते थे ,बर्तन मांजते थे । अब तो बुढापा है ,अब और कोई सेवा हमसे बनती नही है । केवल थोड़ा बहुत झाडू लगाने की सेवा हो सकती है ,वही कर लेता हूं । बिना सेवा के प्रसाद कैसे पाऊंगा ? और बिना प्रसाद पाये शरीर कैसे चलेगा ? आपने सेवा के लिए ही मना दिया । इसीलिए अब मै यहां नही आऊंगा और ऐसा कहते कहते रोने आग गया साधु । श्री पहाड़ी बाबा बोले – ऐसे कैसे चला जायेगा , बकबक करता है । जाएगा जाएगा कहता है । अब मैं मना नही करूँगा , खूब झाडू लगाओ । शिष्य को बुलाया और कहा – ये भले बाबा का आसन कमंडल उठाओ और अंदर रख दो ,ये कही नही जाएगा ।

जैसे ही श्री पहाड़ी बाबा ने सेवा की आज्ञा दी वैसे भले बाबा प्रसन्न हो गए । जिस समय की यह घटना है , उस समय भले बाबा की आयु ९० वर्ष की थी । श्री पहाड़ी बाबा कहते थे कि यही है सच्चे साधु जो किसी भी अवस्था मे सेवा का त्याग नही करते । संत सेवा ,गौ सेवा ,स्थान सेवा जैसी बन सके करते रहते है । सच्चे साधु सेवा करने के लिए सदा तत्पर रहते है और कुछ ऐसे असाधु होते है कि उन्हें सेवा बात दो तो भाग जाते है ।

५. पूज्यपाद श्री रामचंद्र डिंगरे जी महाराज का साधू स्वभाव और ढन के प्रति निस्पृहता :

श्री रामचंद्र डोंगरे जी महाराज ने अपनी जीवन काल में जितनी कथाएँ की, उनमे जो धन आता वह सब दान में जाता । एक रूपया अपने और अपने परिवार के लिए उपयोग नहीं होने देते थे । जो थोडा बहुत अन्न और वस्त्र आजाता उसका उपयोग करते , अन्य सब वस्त्र आदि संतो को दे देते । मुम्बई चौपाटी में उनकी अंतिम कथा हुई । गोरखपुर कैंसर हस्पताल , संतो की सेवा , गौ सेवा , दिन दुखियो की सेवा आदि में अब तक एक अरब रूपए दान हो चुके थे उनकी कथाओ से ।

उनकी पत्नी राजस्थान आबू में रहती थी, जब उनको मृत्यु के पांचवे दिन उन्हे खबर लगी तब वे अस्थियाँ लेजाकर गोदावरी में विसर्जित करने गए , उस समय उनके साथ मुम्बई के सबसे बड़े व्यक्ति रातिभाई पटेल गये थे । नासिक मे श्री डोंगरे जी ने रातिभाई से कहा कि रति, हमारे पास तो कुछ हैं नही ,और इसका अस्थि विसर्जन करना है । कुछ धन तो लगेगा ही, क्या करे ? फिर कहा -हमारे पास इसका मंगलसूत्र एवं कर्णफूल हैं, इन्हे बेचकर जो रुपये मिलें, उन्हे अस्थि विसर्जन में लगा देते है । यह बात जैसे ही रातिभाई ने सुनी , उन्हे बड़ा भारी धक्का लग गया । बस श्री डोंगरे जी की ओर देखते ही रह गए ।

पश्चात् रातिभाई ने कुछ परिचितों से यह बात कही – हम जीवित कैसे रह गये, आपसे कह नहीं सकते । बस हमारा हृदय रुक नहीं गया । जिन महाराजश्री के इशारेपर लोग कुछ भी करने को तैयार रहते थे, जिनके आस पास बड़े बड़े लोग रूपए लेकर खडे रहते थे , वह महापुरुष कह रहे कि पत्नी की अस्थियो के विसर्जन के लिये पैसा नहीं है और हम सामने खड़े सुन रहे है ? हम तो फुट फुट कर रो पड़े , धिक्कार है हमे ।असल में बादशाह तो संत जन ही है , हम तो व्यर्थ में अपने को बड़ा आदमी समझ बैठे थे । धन्य है भारतवर्ष जहाँ ऐसे परम संत जन्म लेते है ।

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