सुंदर कथा २२(श्री भक्तमाल -श्री कूबाजी ) Bhaktamal katha Sri Kubaji

राजपूताना के किसी गांवमें कुम्हार जातिके एक कूबाजी नामके भगवद्भक्त रहते थे । ये अपनी पत्नी पुरीके साथ महीनेभरमें मिट्टीके तीस बर्तन बना लेते और उन्हींको बेचकर पति पत्नी जीवन निर्वाह करते थे । धनका लोभ था नहीं भगवान् के भजनमें अधिक से अधिक समय लगना चाहिये, इस विचारसे कूबाजी अधिक बर्तन नहीं बनाते थे ।घरपर आये हुए अतिथियोंकी सेवा और भगवान् का भजन, बस इन्ही दो कामोंमें उनकी रुचि थी । उनका सुन्दर नाम केवलराम था ।आपने अपनी भक्तिके प्रभावसे अपने कुलका ही नहीं, संसारका भी उद्धार किया। आप साधू संतो की बडी अच्छी सेवा करते थे ।

(१) कुएं में गिरने पर श्री भगवान् की कृपा से सकुशल लौटना-
एक बार कूबाजी के गांव में दो सौ साधू पधारे।किसीने साधुओं का सत्कार नहीं किया सबने कूबाजी का नाम बताया। आपके घरमे सब संत पधारे। उनका सप्रेम स्वागत-सत्कार किया । परंतु उस दिन घरमे अन्न धन कुछ भी न था । बडी भारी अवश्यकता थी, अत: आप कर्ज लेनेके लिये चले परंतु किसी महाज़नने कर्ज नहीं दिया । एक महाजनने कहा ,यदि मेरा कुआँ खोदनेका काम कर दो तो मैं तुम्हारे लिये आवश्यक सीधा सामान उधार दे सकता हूँ। इस बातको स्वीकारकर आपने प्रतिज्ञा की और आवश्यक अन्न-धन लाये । एकमात्र श्यामसुंदर जिन्हें प्रिय हैं, ऐसे संतोंको आपने बड़े प्रेमसे भोजन कराया ।

संतो की सेवा के लिए कुंआ खोदने का कार्य भी प्रसन्नता से मान्य कर लिया ।अब साधु संतोंकी सेवासे अवकाश पाकर श्रीकेवल रामजी महाज़नका कुंआ खोदने लगे । खोदते समय आप तोतेकी तरह भगवान् के नामोंका उच्चारण कर रहे थे । कुंआ खुद गया यह जानकर महाजनको और कूबाजीको बडी प्रसन्नता हुई । खोदते-खोदते रेतीली जमीन आ गयी और चारों ओरसे कईं हजार मन मिट्टी खिसककर गिर पडी । उसमें श्री केवलरामजी दब गये । लोगोंने सोचा कि अब इतनी मिट्टीको कैसे हटाया जाय । केवल-रामजी तो मर ही गये होगे, अब मिट्टी को हटानेसे भी क्या लाभ ! इस प्रकार शोक करतें हुए लोग अपने-अपने घरोंको चले गये ।

एक बार कुछ यात्री उधरसे जा रहे थे । रात्रिमे उन्होंने उस कुएंवाले स्थानपर ही डेरा डाला । उन्हें भूमिके भीतरसे करताल, मृदङ्ग आदिके साथ कीर्तनकी ध्वनि सुनायी पडी। उनको बडा आश्चर्य हुआ । रातभर हैं वे उस ध्वनिको सुनते रहे । सबेरा होनेपर उन्होंने गांववालोंको रातकी घटना बतायी। अब वहाँ जो जाता, जमीनमें कान  लगानेपर उसीको वह शब्द सुनायी पड़ता । वहां दूर दूरसे लोग आने लगे । समाचार पाकर स्वयं राजा अपने मंत्रियो के साथ आये । भजनकी ध्वनि सुनकर और गांववालोंसे पूरा इतिहास जानकर उन्होंने धीरे धीरे मिट्टी हटवाना प्रारम्भ किया । बहुत से लोग लग गये, कुछ घंटोंमें कुआं साफ हो गया ।लोगोंने देखा कि नीचे निर्मल जलकी धारा बह रही है ।

जब लोग आपके पास पहुंचे तो इनको भगवान् का नाम “हरे राम, हरे राम राम राम हरे हरे
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे”

उच्चारण करते सुना ।
एक ओर आसनपर शंख चक्र गदा पद्मधारी भगवान् विराजमान हैं और उनके सम्मुख हाथमें करताल लिये कूबाजी कीर्तन करते, नेत्रोंसे अश्रुधारा बहाते तन मनकी सुधि भूले नाच रहे हैं । राजाने यह दिव्य दृश्य देखकर अपना जीबन कृतार्थ माना । अचानक वह भगवान् की मूर्ति अदृश्य हो गयी। राजाने कूबाजीको कुएंसे बाहर निकलवाया। सबने उन महाभागवतकी चरण धूलि मस्तकपर चढायी । कूबाजी घर आये । दूर दूर से अब लोग कूबाजीके दर्शन करने और उनके उपदेशसे लाभ उठाने आने लगें ।

जहां आप बैठा करते थे, वहां भगवत्कृपासे एक गोल मिहराब सी जगह बन गयी थी, जिसके कारण आपका शरीर सुरक्षित था । लोगोंने देखा कि अधिक दिनोंतक झुककर बैठे रहनेसे आपकी पीठ में कूबढ़ निकल आया है । आपके समीप एक जलसे भरा हुआ स्वर्णपात्र रखा था । उसे देखकर लोगोंने श्री केबलरामजी को भगवान् का महान् कृपापात्र समझा । आपकी भक्ति और महिमाको जानकर लोगोंने बहुत भी सम्पत्ति आपको भेट की तथा दीन दुःखीयोंको बांटी ।

(२)श्री रामजी का कूबाजी पर प्रसन्न होकर उनके घर पधारना

एक बार एक महात्माजी अपने मंदिर मे पधरानेके लिये जयपुरसे बनवाकर श्यऱमवर्णका बडा ही सुन्दर श्रीरामजीका स्वरूप ले जा रहे थे । मार्गमे विश्राम करनेके लिये श्रीकूबाजीके यहाँ रुके । श्री रामजीके सुन्दर स्वरूपको देखकर श्रीकूबाजीके मनमें विचार उठा कि यदि ये प्रभु हमारे ऊपर कृपा करें और यहीं रहकर मेरी सेवा स्वीकार कों तो बहुत अच्छा हो । इनकी सन्तसेवा निष्ठा एवं प्रार्थना स्वीकार करके अन्तर्यामी भगवान् श्रीराम यहीं अचल होकर विराज गये । दूसरे दिन सन्तजी इन्हें ले जानेके लिये उठाने लगे तो अनेक उपाय करनेपर भी भगवान् वहांसे नहीं उठे । तब श्रीकूबाजीने हंसकर कहा-मुझ दासपर रीझ गये हैं । अत: यहीं रहेंगे । आपके उठानेसे नहीं उठेंगे । भगवान् ने इनके मनकी बात जान ली थी । अत: इनकी प्रतिष्ठा करके श्री कूबाजीने इनका नाम ‘जानराय रामचन्द्र’ रखा । प्रभुक्रो अपने घरमें विराजमानकर तथा उनकी सेवाका सुख प्राप्तकर श्रीकूबाजी अपने अंगमें फूले नहीं समाते थे । झोंथड़ामे जानराय रामचन्द्र अबतक विराजमान हैं ।

(३)श्री भगवान् की आज्ञा से घर पर रह कर संत सेवा करना और गोमती-सागर का संगम करवाना

एक बार श्रीकूबाजीके मनमें विचार आया कि ‘द्वारकाक्रो जाऊँ और शंख-चक्रकी छाप लेकर आऊँ । आप घरसे चल दिये, परंतु मार्गमे ही भगवान् ने आज्ञा दी कि ” तुम अपने घरपर रहकर सन्त-सेवा करो, तुम्हारे सब मनोरथ पूर्ण हो जायेंगे, अत: अन्यत्र कहीं मत जाओ । ऐसी प्रभुक्री आज्ञा पाकर श्रीकूबाजी घर लौट आये । कुछ दिन बाद घरमे रहते हुए ही इनके शरीरमें शंख-चक्र आदिकी छाप प्रकट हो गयी । इस प्रकारके नये नये चमत्कार प्रकट हुए, तब लोग श्रीकूबाजीकी किर्ती का गान करने लगे । द्वारकामे गोमती और सागर का संगम अब नहीं होता है, पहले होता था । संतोके द्वारा यह आपने सुना। भगवद् प्रेरणा से ह्रदय में इच्छा हुई कि संगम फिरसे होना चाहिए।आपने अपनी माला सुमिरनी संतो के हाथ भेज दी । दोनो के मध्यमें सुमिरनी रखते ही फिर संगम होने लगा । इस प्रकार आपने गोमती सागरका संगम कराया ।

(४)अनोखी संत सेवा रीति और स्त्री पर कृपा करना

श्रीकूबाजीके बहुत से शिष्य हुए और उन शिष्य प्रशिष्यों की अनेक शाखाएँ बढी। आपके उपदेशानुसार सभी शिष्य-प्रशिष्योंमें साधु संतोकी ही विशेष रुचि रहती थी । सन्त-सेवा की महिमा अपार है, इस रहस्यको प्रकट करके आपने दिखा दिया । एक दिन आपके यहाँ कई साधु संत पधारे । श्रीकूबाजीने पत्नी पूरीसेे कहा- इनके लिये रसोई बना लो । उसने कहा-तबियत खराब है, मैं रसोई नहीं बनाऊँगी । ये तो रोज ही आते रहते हैं, मैं कहाँतक इन्हें बनाकर खिलाऊँगी । श्रीकूबाजीने कहा-मैं चूल्हा चेताये देता हूँ तू जब रोटी बनाने लगेगी तब संत कृपासे तेरी तबियत बिलकुल ठीक हो जायेगी। इस प्रकार बहुत कहने-सुनने पर बाजरेके टिक्कर (मोटी रोटी) साधुओंके लिये उसने बनाये । हसी बीच उसका भाई आ गया तो बड़े उत्साहसे दूसरेके घर से दूध ले आयी और उसने अपने भाइके लिये खूब सुन्दर खीर बनायी । श्रीकूबाजीने देखा तो समझ गये कि इसका स्नेह अपने भाई में अधिक है । तब आपने एक सुन्दर उपाय सोचा । जल पृथ्वीपर गिराकर पत्नी से कहा- ‘तू जल्दी जल भरकर ले आ । वह जल भरने चली गयी, परंतु उसे भय था कि कहीं खीर साधुओं को न परोस दे। जबतक वह गहरे कुंए से जल भरकर आयी, तबतक आपने खीर परोसकर साधुओ को खिला दी ।

श्री कूबाजीकी स्त्री जल्दीसे जल लेकर आयी और जब उसने साधुओंके आगे खीर देखी तो उसके पुरे शरीर में आग सी लग गयी । अपने भाईके मुखकी ओर देखने लगी। भाई भी उदास हो गया।अपने भाईका तिरस्कार मानकर दुखके समुद्रमें डूब गयी ।श्री कूबाजी ने अपनी स्त्रीको भक्त और भगवान् की सेवासे विमुख जानकर उसे घरसे निकाल दिया । वह अपने भाईंके साथ पीहर चली गयी और उसने दूसरा पति कर लिया । दूसरे पतिके यहाँ उसके कई लड़के और लड़कियों हुई । कुछ दिन बाद अकाल पड़ गया । अब वह अपने बेटा बेटियोंका पालन करनेमें असमर्थ हो गयी । तब किसी दूसरी जगह जानेका विचार करने लगी, जहाँ पेट भर सके । पर ऐसा स्थान नहीं मिला, तब बडी व्याकुलता हुई । अंतमे लाचार होकर भूखसे व्याकुल बालक बालिकाओं तथा उपपतिके साथमे झोंथड़ा गांव आयी और श्रीकूबाजीके द्वारपर पड़ गयी तथा उसने अपना असह्य दुख रो रोकर सुनाया । दुख और दीनतासे भरे स्त्रीके वचन सुनकर श्रीकूबाजीके मनमें बडी दया आयी । क्योंकि ये वैष्णव . धर्मका पालन करनेमें बड़े ही निपुण एवं उदार थे । आपने उससे कहा-तू मेरे पति परमात्माको देख, जो मेरा तथा सभी जीवोंका पालन कर रहा है और अपने पतिको देख, जो अपनी स्त्री और अपने परिवार का पेट नहीं भर पा रहा है । महान् सकटमें पड़ गया है । अत: अब तुम सब यहीं बाहर द्वापर पड़े रहो और द्वारके सामने झाडू लगा दिया करो । तुम सबको भगवान् का प्रसाद पाने को मिल जाया करेगा। श्रीकूबाजीकी महिमा और दयाको देखकर वह रोने लग गयी ।

जब तक अकालका समय रहा, तबतक श्रीकूबाजी ने उन सबको भोजन-वस्त्र दिया । जब सुकाल आ गया, तब आपने उसे विदा कर दिया । वह भी अपने पति और बालकोंको साथ लेकर चली गयी । वह अपने मनमें बहुत पश्चात्ताप कर रही थी, परंतु वह स्थान और वह सुख उसे जैसे मिल सकता था, जहाँ नित्य संतोकी सभा और सत्संग है, जहाँ रसमयी प्रेमाभक्तिका रंग छाया रहता है ।

श्रीकूबाजी महाराज जिस किसीको शिष्य बनाते, उसे साधु सन्तो तथा दीनोंकी सेवाका ही आदेश-उपदेश देते हुए यहीं कहते कि जिनके रूप और गुण अनन्त हैं, ऐसे प्रभुको प्राप्त करनेकी इच्छा यदि तुम्हारे मनमें है तो कपटको त्यागकर प्रेमसे सन्त सेवा करो ।

समस्त संत भक्तो की जय।
भक्तवत्सल भगवान् की जय।।

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