सुंदर कथा २३ (श्री भक्तमाल – श्री एकनाथ जी) Sri Bhaktamal- Sri Eknath ji…भाग १

आदरणीय श्री लक्ष्मण पांगारकर द्वारा एकनाथ चरित्र, संत महीपति औ केशव कृत नाथ चरित्र ,संत केशव कृत नाथ चरित्र ,श्री एकनाथ जी के १३ वे वंशज पूज्य श्री वेणीमाधव जी के आशीर्वाद एवं वारकरी संप्रदाय के ग्रंथो पर आधारित । कृपया अपने नाम से प्रकाशित ना करे ।
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संत श्रेष्ठ श्री एकनाथ जी का जीवन चरित्र अध्यात्म मार्ग के साधको के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है । उनके जीवन के कुछ प्रसंग यहां निचे दिए गए है । श्री एकनाथ जी को जिस गुरु परंपरा से ज्ञान, भक्ति ,वैराग्य प्राप्त हुआ वह इस प्रकार है :
श्री आदिनारायण – श्री ब्रह्मा – श्री अत्रि मुनि – श्री दत्तात्रेय महामुनि – श्री जनार्दन सवामी – श्री एकनाथ और आगे …। श्री दत्तात्रेय भगवान् के ३ शिष्य हुए है – सहस्त्रार्जुन , यदु और कलियुग में श्री जनार्दन स्वामी । श्री जनार्दन स्वामी संत एकनाथ जी के गुरुदेव है ।

क्रोध दिलाने पर २०० रुपये इनाम और ब्राह्मण पर एकनाथ जी की कृपा-
श्रीधाम पंढरपुर के पास पैठण नाम का गांव पड़ता है जहां संत श्रीएकनाथजी विराजते थे ।गांव में एक चबूतरा था जहा कुछ दुष्ट बैठकर गप शप किया करते थे और एकनाथ महाराज की फजीहत करने की घातमें रहा करते थे ।कैसे एकनाथ जी का मज़ाक बनाया जाए यह सोचते रहते थे। वह चबूतरा कुचरचौतरा कहलाता था । एकनाथ महाराज का कीर्तन सुनकर जिनका सिर दर्द करता ऐसे और भी कुछ अभागे लोग पैठण मे रहते थे । इस चबूतरे पर बैठकर ये लोग नशा किया करते थे और देर रात तक यहीं बैठकर शतरंज आदि खेलते थे । बेमतलब हंसना हंसाना,निन्दा करना, षडयन्त्र रचना, भद्दी बाते करना, कोई न कोई उपद्रव खड़ा करना एवं नाना प्रकरके बेकार काम करना, यही सब वहां हुआ करता था।

एक दिन ये निशाचर लोग रात को इसी तरह अपनी मौज में थे, इस बीच एक ब्राह्मण पथिक वहां पहुंचा । पैठण भले और विद्वान् लोगों का स्थान होनेसे वह ब्राह्मण वहा इस आशासे आया था कि लड़केके उपनयन (जनेऊ) संस्कार के लिये यहांसे सौ दोसौ रुपये मिल जायंगे । दुर्भाग्य से वह सबसे पहले इस चबूतरेपर ही पहुंचा और उसे यही लोग दिखे । ब्राह्मण भी कुछ अपने ही ढंगका आदमी था । इन लोगो ने उससे कहा- यहां पहली बार देखा तुम्हे ? पैठण में नए हो क्या ? उस ब्राह्मण ने पैठण में आने का कारण उन लोगो को बताया । दुष्ट लोग बोले -यहां एकनाथ नामके एक बड़े भारी महात्मा हैं । बड़े ही शान्त हैं । उन्हें कभी क्रोध तो आता ही नहीं । तुम यदि कोई ऐसा काम करो कि उन्हें चिढा दो तो तुम्हें हम दो सौ रुपये देंगे ।उस ब्राह्मण ने एकनाथ महाराज की शान्ति भंग करनेका निश्चय किया । इन दुष्टो को मनोरंजन की यह नयी सामग्री मिली ।

अब एकनाथ महाराजको चिढानेका उपाय सोचता सोचता वह ब्राह्मण दूसरे दिन सबेरे एकनाथ महाराज के घर पहुँचा । महाराज उस समय पूजामें थे । यह ब्राह्मण घरमें घुसकर बिना हाथ पैर धोये, बिना पूछे, बिना कपड़े उतारे और तो और जूते पहन कर सीधे ठाकुरघर में पहुँचा और उसी हालत में उनके आसन से कुछ दूर नहीं, उनके पास भी नहीं, उन्ही की पालथीपर (गोदमें) जाकर बैठ गया । वह समझता था कि अब एकनाथजी को क्रोध आये बिना रह ही नहीं सकता । पर शान्ति के सागर और धैर्य के मेरु क्या इससे क्षुब्ध हो जायेंगे ? किंचित् हँसकर एकनाथ जी ने उस ब्राह्मण से कहा कि आपके दर्शन से मुझे बडा आनन्द हुआ । मिलने तो बहुत लोग आते हैं पर अपका प्रेम कुछ विलक्षण है । बाजू में पत्नी गिरिजाबाई भगवान् के लिए चंदन घिसने की सेवा कर रही थी । उनसे एकनाथ जी बोले – यह ब्राह्मण देव हमसे इतना प्रेम करते है की इनको हमसे मिलने की लालसा में जूते निकालने तक होश नहीं रहा । हे ब्राह्मणदेव ! आपने ज्यों ही घरमें पैर रखा त्यों ही मुझे आपसे मिलने की प्रबल उत्कंठा हुई, यह सचमुच ही आपके ही प्रेमका प्रभाव है । इस प्रकार ब्राह्मण का पहला वार खाली गया । उसने समझा मामला जरा टेढा है पर दो सौ रुपये का लोभ उसके मन में था । उसने फिर एक बर प्रयत्न करने का निश्चय किया ।

एकनाथ महाराज स्नान संध्या आदि से निवृत हो चुके थे, मध्याह्न् भोजनका समय था। भोजनके लिये उस ब्राह्मणका आसन एकनाथजी के आरानके समीप ही लगाया गया था । पत्तले परोसी गयीं, घी परोसनेके लिये गिरिजा बाई आयी और ब्राह्मणके सामने दोनेमें घी डालनेके लिये ज्यों ही वह झुकी ,त्यों ही ब्राह्मण लपककर उनकी पीठपर चढ़ बैठा । तब एकनाथजी महाराज गिरिजाबाईंसे कहते है- हाँ, सँभलना, ब्राह्मण कहीं नीचे न गिर पड़े । गिरिजा-बाई भी एकनाथ महाराजकी ही धर्मपत्नी थीं । उन्होंने मुसकराते हुए उत्तर दिया- कोई हर्ज नहीं, हरिपण्डित को( पुत्रको) पीठपर लादे काम करते रहनेका मुझे अभ्यास है ! मैं भला अपने इस दूसरे बच्चेको नीचे कैसे गिरने दूंगी।

यह सब देखकर ब्राह्मणके होश उड़ गये, वह नीचे लुढककर एकनाथ महाराजके चरणोंपर गिर पडा । श्री एकनाथ जी ने उसे उठाया । ब्राहाणने सब हाल कह सुनाया और इस बातपर दु:ख भी प्रकट किया कि मेरे दो सौ रुपये गये । तब एकनाथ महाराजने उससे कहा कि है यदि यह बात थी तो मुझसे पहले भी कह देते ।तुम्हें इनाम मिलनेवाला था, यह मुझे मालूम होता तो मैं जरूर तुम्हारे ऊपर क्रोध करने का नाटक करता । संत एकनाथ जी ने उस ब्राह्मण को अपनी एक अंगूठी बेच कर रुपये दिए और उसे सम्मान के साथ विदा किया । यात्रा करने का किराया और कुछ वस्त्र अन्नादि भी दिए ।

शरीर पर थूकने वाले यवन पर संत एकनाथ की कृपा –
पैठण में एकनाथ महाराज के घर से गोदावरी को जानेवाले रास्तेमें एक जगह एक धर्मशाला सी है । वहा एक यवन रहा करता था । वह उस रास्ते से आने जानेवाले श्रद्धालुओं को बहुत तंग किया करता था । एकनाथ महाराज जब स्नान करके लौटते तब वह इनके उपर कुल्ला करके पिचकारी छोड़ता था । इससे एकनाथ महाराज को किसी किसी दिन चार चार पांच पांच बार स्नान करना पड़ जाता । जहाँ वह स्नान करके लौटने लगे कि यह उन्मत्त मनुष्य फिर उनपर थूके देता और महाराज फिर स्नान करने जाना पड़ता ।

इस हरकत से कोई भी आदमी चिढ़ जाता और चिढ़ना भी बिलकुल स्वाभाविक था, पर एकनाथ महाराज की शान्ति ऐसी विलक्षण थी कि बार बार एकनाथ महाराज गोदावरी गंगाजी आदि पवित्र नदियो का स्मरण वन्दन करके आनन्द से स्नान करते और धन्यवाद देते कि उस यवन के कारण मुझे इनती बार पवित्र नदियों में सना करने का अवसर प्राप्त होता है। एक दिन तो यह बात हुई कि वह यवन उस मौके पर नहीं था, पर नाथ उसका नियम भंग न हो इस खयाल से कुछ कालतक उसकी राह देखते हुए वही ठहर आये । कुछ काल प्रतीक्षा करके उसके अनेका कोई लक्षण नहीं देखा तब आगे बढे ।

एक बार वह यवन अत्यन्त उन्मत्त होकर एकनाथ जी की देहपर बार बार थूकता ही रहा। वह थूकता जाय और महाराज पुनः स्नान करते जाय, इस तरह कहते हैं कि एक सौ आठ बार हुआ (कई संतो ने २१ बार कहा है )। तथापि महाराज की शान्ति जरा भी भंग नहीं हुई । उन्मत्त क्रोध और शान्त सहिष्णुता का यह द्वन्द देखने के लिये हजारों लोग वहां जुटे थे । अन्त में यवन थक गया । लज्जित हुआ और महाराज के चरणोंपऱ लोट गया ।

यवन ने महाराज के महात्मापन की यहीं स्तुति की । इतनेपर भी वह अपनी मसजिदपर अपने चार बार नमाज पढ़ने की तारीफ करने से बाज न आया ।उसे संत के सन्मुख झुकने पर भी अपने चार बार नमाज़ पढ़ने का अभिमान था। एकनाथ जी उसके भीतर की बात जान गए ,तब श्रीएकनाथ जी महाराजने हंसकर कहा-

मसजिदमें ही जो अल्लाह खडा । तो और स्थान क्या खाली पडा? ।।
चारों वक्त नमाजो के । तो क्या और वक्त हैं चोरोंके?।। एका जनार्दनका बंदा । जमीन आसमान भरा खुदा ।।

तात्पर्य-अल्लाह यानी परमात्मा किसी एक जगहमें ही बंधा नहीं, वह सब जगह मौजूद है । सर्वव्यापी, सर्वज्ञ और सर्वसाक्षी है । सबका है, सबके हृदयमे है और उसकी यथार्थ स्तुति यही हो सकती है कि मनुष्य उसका अखण्ड स्मरण करे, सब कुछ वहीं करता है, यह जाने और निरहंकार होकर रहे । उसने अब श्री एकनाथ जी के चरण पकड़ लिए और किये हुए कार्य पर पश्चाताप करने लगा । उसने कहा – महाराज हमसे बहुत बड़ा अपराध हुआ है ,आप क्षमा करे ।वह संत के चरणों में पड़कार बहुत रोने लगा ।

श्री एकनाथ जी बोले – मै तो मुर्ख और आलसी हूँ , पर तुम्हारे कारण मुझे इतनी बार गंगा स्नान( गोदावरी दक्षिणी गंगा कही जाती है ) करने का अवसर प्राप्त हुआ है । इतने पर भी जब उसने रोना बंद नही किया तब एकनाथ जी बोले – तुम्हे इसका कोई पाप नही लगेगा । तुम्हारे तो बहुत उपकार है मुझपर , इस पुण्य का आधा भाग मै तुम्हे अर्पण करता हूँ । तुम रोना बंद करो और मेरे साथ घर चलो ,मै तुम्हे शरबत पिलाता हूँ ,तुम्हे अच्छा लगेगा । संत ह्रदय देख कर वह यवन पहचान गया कि एकनाथ महाराज बड़े ऊँचे औलिया (परम संत)हैं और तबसे वह उनके साथ बड़े विनय और नम्रता से पेश आने लगा ।

नाथ का अनोखा अतिथि सत्कार
एक बार आधी रातके समय चार प्रवासी ब्राह्मण पैठणमे आये और रहनेके लिये आश्रय दूंढ़ने लगे । मार्गके श्रमसे वे बहुत क्षुधित थे । उनसे कुछ दुष्ठोंने कहा- आपलोगो-के ठहरने लायक एक स्थान है । यह सामने जो मकान है इसमें एकनाथ नामका एक बडा दाता रहता है । सैकडों ब्राह्मण एक साथ भी आ जाय तो भी सबको भोजन कराके वह सन्तुष्ट करता है । उसे सिद्धियां भी प्राप्त हैं । आपलोग वहीं जाइये ।

सात दिनसे रात दिन ऐसी मूंसलधार वृष्टि हो रही थी कि नाथ महाराज-के यहाँ सूखा इंधन बिलकुल नहीं रह गया था । जब ये प्रवासी नाथ महाराजके यहा पहुंचे तब सदा की भांति उनका आगत स्वागत हुआ । जब मालूम हुआ कि प्रवासी ब्राह्मण भूके हैं तब नाथ महाराज ने बहुत जल्द रसोई बनाने को गिरिजाबाई से कहा । लकडी गीली होने से रसोई जल्दी न बनेगी यह सोचकर उन प्रवासियों की क्षुधा व्याकुलता से नाथका चित्त बडा ही व्याकुल हो उठा और उन्होंने उद्धव से कहा कि – देखो, अपना यह मकान लकडी का ही तो है । एक मंजिल गिराकर लकडी इकट्ठी करो । पर यह सोचकर कि इसमें कुछ देर लगेगी, उन्होंने और भी जल्दी का एक उपाय किया ।

अपने पलंग की निवार खोFTल दी और पावा पाटी तोड़कर इंधन प्रस्तुत कर दिया और चट रसोई बनाने को कहा ! नाथ ऐसी खातिर करनेवाले थे कि इस मौके पर ठण्डे पानीसे स्नान करनेमें प्रवासियों को कष्ट होगा यह सोचकर उन्होंने तुरंत पानी गरम कराया और स्नान करनेके लिये गरम पानी दिया । गिरिजाबाई ने स्वयं रसोई बनायी और भोजन परोसा। भोजनके समय गरमाहट के लिये अगीठियां ब्राह्मणो के समीप रखी गयी ।

ब्राह्मणों ने यथेष्ट भोजन किया और उनके सन्तोष से नाथ को भी बडा सन्तोष हुआ । नाथ महाराज का यह अतिथि प्रेम देखकर उन ब्राह्मणोंने उनकी बडी सराहना की और कहा कि भोजनार्थियों को तृप्त करनेवाले आप ही जैसे धन्य हैं । है नाथ जो कुछ करते, अंतकरणपूर्वक करते थे । चार भले अदमी हमें अच्छा कहें और हमारा नाम हो, इस खयालात से भी अतिथिसत्कार करनेवाले लोग होते हैं पर नाथ जो अतिथिसत्कार करते थे वह स्वधर्म जानकर निष्काम बुद्धिसे करते थे । ऐसा शुद्ध भाव, ऐसा सच्चा प्रेम हमारे अंदर कब कहां जाग उठता है, यह जिस तिसको स्वयं ही देख लेना चाहिये ।

नाथ महाराज की सहनशीलता और अतिथि प्रेम-
किसी-न-किसी प्रकार से लोगोंके कान भगवान् का नाम सुनें, इसलिये नाथ महाराज़ ने कई दिन यह उपाय किया कि जब कोई कीर्तन सुनने आता उसे अंजलि भर शक्कर बाँटते थे।

एक बार वडारी जाति के दो पुरुष और एक स्त्री शक्कर पानेकी आशासे महाराज के यहाँ आये, कीर्तन सुननेवाले श्रोताओंकी इतनी भीड़ थी कि इन्हें कहीं बैठने या खड़े होनेकी भी जगह न मिली । इसलिये ये लोग नाथके शयनागारमे ही घुस गये । कभी कीर्तन तो सुना था नहीं, यह अभ्यास ही नहीं था कि घडी दो-घडी आसन लगाकर बैठते और श्रवण करते । शयनागारमें जो घुसे सो निद्रा की इच्छा हुई । दोनों पुरुष नाथका पलंग मुलायम देखकर, उसपर जो जरा लेट गये कि उन्हें नींद आ गयी और उनके पायताने वह स्वी भी स्रो गयी । जब कीर्तन हो चुका, तब शक्वार लेकर सब लोग अपने अपने घर चले गये ।

मकान के बाहरी दरवाजे बंद करके उद्धव जब नाथका बिस्तर लगानेके लिये उनके शयनागारमें गये तब उन्होंने उन स्त्री पुरुषों को खर्राटे मारते हुए बेढंगे तौरपर पड़े देखा । उद्धवने शोर मचाना शुरू किया, तब नाथ उस कमरेमे आये और वे लोग भी जाग उठे । उद्धव मारे क्रोधके उनपर झपटे पर नाथने उनका हाथ पकड़कर उन्हें अलग किया और वडारियोंसे बड़े प्रेमसे बोले, तुम लोगों को नींद अच्छी लगी थी न, उद्धवने व्यर्थ ही तुम्हें जगाया । तुम लोग सोओ, आरामसे सोओ, अब तुम्हें कोई नहीं जगावेगा और कोई गुस्सा भी नहीं होगा ।

सबेरेतक आनन्द से सो रहो । यह सुनकर वडारी बड़े लज्जित हुए, नाथ के चरणोंपर लोट गये । आधी रात बीत चुकी थी, इसलिये नाथने उन्हें रातभर अपने ही यहाँ टिका लिया और दूसरे दिन उन्हें भोजन कराकर, पुरुषो को धोती और स्त्री को साडी देकर विदा किया ।

गधे को प्राणदान –
काशी की यात्रा करके नाथ रामेश्वर जा रहे थे । रामेश्वरके समीप पहुँचे तब उद्धव आदि पीछे पीछे आ रहे थे और नाथ भगवान् का भजन करते हुए आगे आगे चल रहे थे । ऐसे समय पास के रेतीले मैंदानमें नाथ को एक गधा लोट-पोट करता दिखायी दिया । नाथ उसके समीप गये । देखा, गधा प्यासा है पानीके विना छटपटा रहा है । नाथने तुरंत अपनी काँवर से पानी लेकर उसके मुँहमे डाला । त्यों ही गधा उठा और मजेमें वहांसे चल दिया ।

उद्धव आदि सब लोगो ने पास आकर प्रयागका जल गधेको पिलाते देखा तब मन ही मन उन लोगोंने सोचा कि प्रयागका गंगाजल व्यर्थ ही गया और यात्रा भी निष्कल हो गयी । तब नाथ महाराजने हँसकर उन लोगोंसे कहा- भले मानसो बार बार सुनते हो कि भगवान् पब प्राणियोंके अंदर हैं, फिर भी ऐसे बावरे बनते हो ! समयपर याद न रहे तो वह ज्ञान किस कामका ? प्रसंग पर काम न आना क्या ज्ञानका लक्षण है ? यह मच्छर है और यह हाथी, यह चाण्डाल है और यह ब्राह्मण, यह गौ है और यह गधा इस तरहका भेद क्या आत्मामे भी है ? मेरी पूजा तो यहीं-से श्रीरामेश्वर को पहुंच गयी । भगवान् सर्वगत और सद्रूप हैं। भगवान् से खाली भी क्या कोई जगह हो सकती है?

देहको ही देखो तो राजाका देह और गधेका देह समान ही तो है । इन्द्र और एक चींटी दोनों देहत: समान की हैं । देहमात्र ही नश्वर है । ब्रह्मा से लेकर चींटीतक सबके शरीर नाशवान हैं । शरीरका परदा हटाकर देखो तो सर्वत्र भगवान् ही हैं । अपनी दृष्टि चिन्मय हो तो सर्वत्र चैतन्य ही है नाथ के ये शब्द सुनकर उद्धवादिको महाराजके समदर्शन का फिर एक बार स्मरण हो आया । मयूर कविने कहा है कि एकनाथने प्यासे गधेको जो दयार्द्र अंतःकरण से पानी पिलाया, उनका यह सत्कर्म लक्ष विप्र भोजन के समान ही हुआ ।

श्री विष्णुसहस्त्रनाम का पाठ –
नाथ के मकान के समीप ही एक उद्यमी आदमी रहता था । उसे द्रव्योपार्जन जे सिवा और कोई बात नहीं सुझती थी । कभी दर्शनके लिये किसी मंदिर में जाना, हरिकीर्तन अथवा कथा पुराण सुनने में उसे कोई आनंद नहीं आता था । वह केवल शिश्नोदरपरायण था ।

संत अकारण कृपा करने वाले है। नाथको उसपर दया आ गयी और वह स्वयं ही रोज उसकी दूकान पर जाकर बैठने लगे । नित्य उसे एक श्लोक लिख देते, उससे वह याद करता और फिर दूसरे श्लोकका पाठ देते । यह क्रम था । होते होते उसे अनायास समग्र विष्णुसरहस्त्र नाम कंठ हो गया । तब उससे कहा कि इसका पाठ रोज किया करो । फिर कुछ दिन बाद एकनाथ महाराजने उसे एक आसन सिखाया और नित्य ब्राह्ममुहूर्त में स्नान करके आसन लगाकर इसके दस पाठ करने कोे कहा ।

इस तरह उसकी वाणीपर कुछ ऐसा संस्कार हुआ कि मृत्युकाल में वह अस्खलित वाणी से विष्णुसहस्त्रनाम का पाठ करता रहा । उसके प्राण अनायास निकले और वह स्वयं विष्णुलोक को प्राप्त हुआ ।

श्री एकनाथ जी द्वारा वेश्या का उद्धार –
पैठणमें एक वेश्या बडी चतुर, सुंदर और नृत्य गायनादिमें निपुण थी । नाथ महाराज के यहाँ श्री हरि कीर्तनादि श्रवण करनेके लिये कोई भी जा सकता था, किसीको भी मनाई नहीं थी । यह वेश्या भी महाराजका भागवत पुराण सुननेके लिये जाया करती थी । उसका पैसा खराब था और दुराचार बढ़ानेवाले पैसे को कोई भी अच्छा नहीं कह सकता । पर यह मानना पड़ेगा कि उसके भी हृदय-में भगन्नाम् का प्रेम था ।

नाथ की अमृतमय वाणी से भागवत के पिंगलाख्यान को जब उसने सुना तबसे उसकी चित्तवृत्तिमे बडी क्रान्ति हो गयी । पिंगला के समान उसके मनमें भी विराग उत्पन्न हुआ । मनुष्यका शरीर कितना गंदा है यह उसने देख लिया और उसे इससे घृणा हो गयी ।

शरीरके अंदर से कैसी विलक्षण दुर्गन्ध आती है । यही दुर्गन्ध नवो द्वारों से रात दिन बहा करती है । मैला बराबर बाहर निकल रहा है । देखकर अपना ही जी अपनेको हट जाता है । ये मल रातदिन जलसे धोनेपर भी साफ होनेवाले नहीं हैं । यह शरीर हड्डी और मांस सेे घिरा विष्ठा मूत्रका गोला है जिसे बार बार आलिंगन किया और फिर भी जिससे जी नहीं भरा । भगवान् श्रीकृष्ण ने जिसे अपना वह सुख दिया जो किसी भी हालतमें नष्ट नहीं होता, उस हदयस्थ आनन्द को मैं भूल गयी और कामकी तृप्ति ही जहाँ नहीं हो सकती उसपर लटूटू हुई । ऐसे ऐसे भाव हृदयमे उठने लगे, उनसे वह वेश्या अत्यन्त सन्तप्त हुई ।

आठ दिन वह अपने घर के द्वार बंद करके अकेली ही बैठो रही । एकनाथ महाराजका बारम्बार स्मरण होता और वह यह सोचती कि क्या इस पापराशिके इस पापसदनमें महाराज़के पवित्र चरण आ सकते हैं । एक दिन इसी प्रकार वह सोच रही थी, उसी समय गोदवरी स्नान करके एकनाथ महाराज उसी रास्तेसे लौट रहे थे । ऊपर से उसने महाराज को देखा और दरवाजेपर आकर वह बड़े विनम्रतासे बोली – क्या महाराजके चरण इस घरको पवित्र करेंगे? नाथ महाराजने कहा, हाँ चल सकता हूं। है यह कहकर वह उसके पीछे-पीछे उपर गये ।

नाथ के सेवक शिष्य उद्धव भी साथ ही थे । उन्हें यह अच्छा नहीं लगा और यह सोचकर कि दुष्टो को निन्दा करनेका यह अच्छा अवसर दिया, वह बहुत दुखी हुए । उद्धव भी नाथके पीछे ऊपर गये । वहां एक चौकी रखी थी । जिसके चारों ओर चौक पूरा गया था । इस चौकी पर उसने महाराज को बैठाया और स्वयं कमरेके द्वारपर अष्टभाव रोमांचित होकर खडी रही । उसके मुँहसे शब्द न निकले, कहाँ यह उच्च कोटि के महात्मा और कहां मैं महापापिनि ! फिर भी विनती करते ही यह यहाँ आ गये, यह इनकी कितनी बडी दया है । यह सोचकर उसका कण्ट रुँध गया ।

सूर्य के उदय के साथ ही सारा अन्धकार नष्ट हो जाता है, उसी तरह नाथके दर्शन मात्र से उसकी ह्रदयकी सारी पाप- वासनाएँ नष्ट हो गयीं । इसे सच्चा अनुताप हुआ है और इसके हृदयमे सच्चा भगवत् प्रेम जाग उठा है । यह देखकर महाराजके चित्तमे दया आ गयी और उन्होंने उसे धैर्य दिलाया। उसके आखों से अखण्ड अश्रुधारा बह रही थी और इसके साथ सारा पाप निकला जा रहा था । बीज को शुद्ध देखकर नाथ ने ‘रामकृष्णहरी’ मन्त्र का उपदेश कर उसे सत्कर्म का क्रम बताया । तदनुसार अपनी जीवनचर्या बनाकर वह दस वर्षमें इतनी विमल हो गयी कि मृत्युकालमें श्रीकृष्ण स्वरूप का ध्यान और कृष्ण मन्त्रका घोष करते हुए उसने बडी शान्तिसे देह त्याग किया ।

चोरोंका सत्कार-
एकनाथ महाराजके यहाँ एक दिन रातको हरिकीर्तन हो रहा था, जब तीन चोर श्रोताओं की भीड़में घुसे और इस विचार से कि कीर्तन समाप्त होनेपर सब लोग अपने अपने घर चले जायेंगे और घरमें सब लोग सो जायंगे तब अपना काम बनायेंगे, ये लोग मौका देखते हुए एक जगह छिपे बैठे थे । कीर्तन समाप्त हुआ और सब लोग अपने अपने घर चले गये । दो बजे लगभग चेरोंने अपना काम आरम्भ किया । कपडा लत्ता और कुछ अच्छे बर्तन जो हाथ लगे इन्होंने पिछले दरवाजे के पास ला रखे, दरवाजा खोलकर बाहर निकलवाने तैयार हुए, पर इस लोभ से कि और जो कुछ मिल जायें, दबे पाँव घरमे इधर-उधर दूंढ़ने लगे ।

देवगृहके पास पहुंचे, वहां देखा अंदर एक दीपक टिमटिमा रहा है और एकनाथ महाराज आसनपर बैठे समाधिमें मग्न हैं । यह दृश्य एक बार उन्होंने देखा और उनकी दृष्टि नष्ट हो गयी, फिर उन्हें कुछ दिखायी नहीं दिया । कुछ खुलता ही नहीं था, अगला-पिछला कोई दरवाजा ही नहीं मिलता था । वे बर्तनोंपर जा गिरे, और नाथ देवगृह से बाहर निकले । चेरोंने महाराज को देखा था और यह समझ लिया था कि इसी महात्मा के प्रभाव् से हमलोगों की आंखे अन्धी हो गयी हैं । वे महाराजक चरणोंपर गिर पड़े और रोने लगे । एकनाथ महाराजने उनकी आंखोंपर हाथ फेरा तब उन्हें पूर्ववत दृष्टि प्राप्त हुई। चोर यह चमत्कार देखकर अत्यन्त चकित हुए, उनकी बुद्धि भी पलट गयी ।

उन्होंने महाराज को बता दिया कि हमलोग चोर हैं और चोरी करके ये कपड़े और बर्तन लिये जा रहे थे । चोरोंने कपड़े और बर्तन उन्हें दरवाजेके पास ले जाकर दिखा दिये । एकनाथ महाराजकी ममता अटल थी । उन्होंने चोरोसे कहा तुमलोग बहुत थक गये होगे, इसलिये पहले भोजन कर लो और पीछे यह सब सामान ले जाओ । हमलोग कोई रुकावट नहीं करेंगे । बल्कि तुम्हारे लिये मैं इसे तुम्हारे स्थानतक ढोकर पहुंचा भी सकता हूं । कोई सोच संकोच मत करो । चोरी करना तुम्हारा धन्धा है । तुमलोग यह सब ले जाओ । शान्ति, क्षमा, दया हमलोगो का धर्म है, उसका पालन हमलोग करेंगे । यह कहकर नाथ महाराजने अपनी ऊँगली से अंगूठी निकालकर वह भी उनकी ओर फेंक दी ।

नाथके इस निष्कपट सौज़न्य से वे चोर अत्यन्त चकित हुए तथा और भी अधिक नम्र हो गये। दुर्जन भी सज्जनों के व्यवहारसे सज्जन बनते हैं । संसारमें दुर्जनता अनेक बार हमारी दुर्जनतासे ही बढा करती है । सौजन्यका व्यवहार देखकर भी यदि दुर्जन न चेते तो उनकी दुर्जनताका कोई इलाज ही इस मृत्युलोकमें नहीं है यही कहना पड़ेगा। परंतु सौज़न्य की इस सामर्थ्य का भरोसा संतो के समान साधारण मनुष्यों को न होनेसे साधारण मनुष्य जस को तस का राजसी उपाय ही किया करते हैं ।

जस को तस के न्यायसे दुर्जनों को वश करना जितना सम्भव है, उससे अधिक सम्भव सौज़न्य से उन्हें वशमें करना है । इस बातके उदाहरण सन्तोके चरित्रों से मिलते हैं । अब उन चोरोंका मन पलट गया । महाराजने गिरिजाबाई और उद्धव को जगाकर रसोई तैयार करायी और चोरों को भोजन कराया । चोर अपने साथ कुछ भी नही ले गये । ले गये केवल एकनाथ महाराजकी उदारताका स्मरण और उस स्मरणसे शुद्ध होकर उन्होंने चोरी करना छोड़ दिया, वे सदाचारपूर्वक रहने लगे और बार बार एकनाथ महाराज के कीर्तन सुनकर सद्गति को प्राप्त हुए ।

ब्राह्मण और पारस –
पैठण में एक ब्राह्मण के पास पारस पत्थर था ।पारस एक ऐसा चमत्कारी पत्थर होता है जो लोहे को स्पर्श करते ही उसको स्वर्ण में परिवर्तीत कर देता है। इस पत्थर को वह अपने प्राणोंसे भी अधिक प्यार करता था । एक बार उसे यात्राके निमित्त कहीं दूर जाना था । अब यह पारस कहाँ रखा जाय ,इसकी चिंता हुई।

एकनाथ पूर्ण भगवद्भक्त हैं यह जानकर ब्राह्मणने पारस उन्ही के पास दिया। एकनाथ महाराजने उसे देवताओ के सिंहासन के नीचे रख दिया । दूसरे दिन जब उद्धव देवताओं का निर्माल्य उठाने लगे तब उसके साथ पारस भी आ गया । निर्माल्य के साथ पारस भी नदी में गया । देढ वर्ष पश्चात् वह ब्राह्मण लौटा और अपना पारस मांगने लगा । नाथ को अबतक कभी उसका स्मरण भी नहीं हुआ था । उन्होंने उद्धव से कहा कि देखो, सिंहासन के नीचे कहीं होगा उसे उठा लाओ । पर वह अब वहां काहे को मिलता ,उद्धवने कहा कि निर्माल्य के साथ पारस भी गोदावरी नदी में प्रवाह हो गया होगा ।

ब्राह्मणक्रो एकनाथ महाराजपर सन्देह हुआ । सोचा, दालमें कुछ काला है । वह और क्या सोचता ,वह पारस को जितना मूंल्यबान् समझता था, उतना ही मूल्यवान् उसे एकनाथ महाराज भी समझते होंगे, इससे अधिक वह और क्या समझ सकता था ? हर कोई हर किसीको अपनी ही कसौटीपर कसा करता है । वह बेचारा यह क्या जाने कि है भगवान् के चरणोंमें आधे क्षण की स्थिति भी इतने अनुपम आनन्दकी होती है कि उसके सामने भक्तलोग त्रिभुवन की संपत्ति को भी तृणप्राय मानते हैं ।

एकनाथ महाराज उस ब्राह्मण को नदी किनारे ले गये, जलमें उतरकर गोता लगाया और दोनों हाथ भरकर पत्थर उठा लाये, हाथ ऊपर करके बोले – इनमें जो तुम्हारा पारस हो उसे निकाल लो । ब्राहाणने अपनी जेबसे पारसकी परीक्षाके लिये लोह खण्ड निकाला । देखकर आश्चर्य हुआ, सभी के सभी पत्थर पारस थे । एकनाथ महाराजने एक पत्थर उसे दिया और बाकी गंगाजीमें डाल दिये । जिस महात्माके हाथके स्पर्शसे जीव ब्रह्म हो जाता है वह क्या सोना मोतीसे ललचा सकता है ? नालेके लिये वर्षाका भले ही बडा महत्त्व हो पर इससे समुद्रको क्या?

कुष्ठ रोगी ब्राह्मण पर कृपा –
एक दिन एकनाथ महाराज मध्याह्न संध्याके लिये नदी तट पर जा रहे थे । रास्तेमें एक बच्चा अपनी मांके पीछे दौडता जा रहा था । यह लोग अपने को छोटी जाती का समझते थे। माँ पानी भरने जा रही थी, जल्दीमें कुछ आगे बढ़ गयी और बच्चा पीछे कहीं लड़खड़ाकर गिर पडा । बालूका वह मैदान सूर्य की प्रखर क्रिरणों से भट्ठी हो रहा था । बच्चे के मुंहसे लार और नाकसे सीड़े निकल रही थीं । बच्चा तेजीसे दौड़ नही सकता था और मां को आगे जाते देख उसका मन पीछे लौटनेको भी न होता था ।

इस हालतमें पड़े, धूपसे हैरान उस बच्चे को देखकर नाथका अन्त:करण विकल हो उठा । उन्होंने चट उस बच्चे को गोदमें उठा लिया, उसका नाक मुंह साफ किया और उसे अपनी धोती ओढ़कर धूपखे बचाते हुए उसकी बस्तीमें ले आये । बहां पहुंचते ही बच्चेने अपना घर पहचान लिया । घरमेंसे उसका पिता दौड़ता हुआ बाहर आया, इतनेमें मां भी नागरी लिये आ पहुंची । महाराजने बच्चे को उसके मां बापके हवाले किया और बच्चों को ऐसे छोड़ न देना चाहिये, उनको हर तरहसे पालना पोसना चाहिये, इसमें लापरवाही करना ठोक नहीं है इत्यादि उपदेश करक चले गये । स्नान संध्यादि करके महाराज घर गये और नित्य कर्ममें लगे ।

इस घटना के कुछ दिन श्री त्र्यम्बकेश्वर से एक वृद्ध ब्राह्मण पैठणमें आया । इसे कुष्ठरोग हो गया था और उससे यह बहुत ही पीडित था । पैठणमें आकर एकनाथका घर पूछता हुआ बह सीधे एकनाथ महाराजके ही पर पहुंचा । मध्याह्न का समय था । महाराज काकबलि डालने दरवाजेके बाहर आये तो यह दुखी ब्राह्मण उनके पास गया और अपना हाल बताने लगा । अपना नाम ठिकाना सब बताकर उसने कहा- यह कुष्ट जाय इसके लिये मैंने त्र्यम्बकेश्वरमें अनुष्ठान किया । आठ दिन हुए, भगवान् शिव ने स्वप्नमें दर्शन देकर मुझसे कहा कि जाओ तुम पैठणमें जाकर एकनाथसे मिलो और व्याकुल होकर उसने जो एक बच्चे के प्राण बचाये है उसकी उसे याद दिलाओ । इस उपकार का पुण्य यदि वह तुम्हारे हाथपर संकल्प कर दे तो तुम रोगमुक्त हो जाओगे । यह कहकर वह ब्राह्मण रोने लगा और नाथ के चरणोंपर लोट गया ।

नाथ महाराजने ब्राह्मणक्री सब व्यथा सुनी और कहा, मेरे न कोई पाप है न क्रोईं पुण्य । मैंने क्या पुण्य किया यह भगवान् शिव ही जाने ! ऐसा कोई भी पुण्य मैंने जन्मसे लेकर आजतक किया हो, तो मैं उसका तुम्हारे हाथपर संकल्प करता हूँ । है यह कहकर एकनाथ महाराजने जलपात्र हाथमे लिया और संकल्प करनेही बढे थे, इतनेमें उस ब्राहाणने रोका और कहा कि नहीं, आपका सब पुण्य मुझे नहीं चाहिये, केवल उतना ही चाहिये जितने के लिये महादेवकी आज्ञा हुईं है । ब्राह्मणक्री इस इच्छा के अनुसार महाराजने वैसा ही संकल्प किया और जल उसके हाथपर छोड़ा । उसी क्षण उस ब्राह्मणका रोग नष्ट हो गया और उसकी काया निर्मल हो गयी । दस पांच दिन यह ब्राह्मण एकनाथ जी के यहाँ रहा, उनके अलौकिक गुणों को देख-देखकर उसकी प्रसन्नता दिन दिन बढती गयी । उन्ही के गुण गाता वह त्र्यम्बकेश्वर लौट गया ।

संत श्री ज्ञानदेव का दर्शन और ज्ञानेश्वरी के प्रचार की आज्ञा

शाके १५०४ में एकनाथ महाराज पवित्र क्षेत्र आलंदी पधारे जहां संत श्री ज्ञानदेव की समाधी है । आलंदी आने का कारण है की एक दिन महाराज के गले में सूजन आ गयी और पीडा होने लगी । बहुत सी दवाएं की गयी पर सूजन कम न हुई । तीसरे दिन स्वप्न में संत ज्ञानेश्वर महाराज ने दर्शन देकर उनसे कहा, ” मेरे गले में अंजानवृक्षकी जड़ का फंदा पडा हुआ है । उसे तुम स्वयं यहा आकर दूर करो । इससे तुम्हारे गले की पीडा दूर होगी । तब साथमें भक्त समुदाय को लेकर कीर्तन करते हुए एकनाथ महाराज आलंदी पहुंचे ।
नाथ आलंदी पहुंचे तब वहां बस्ती नहीं थी । चारों और धनी लताये और वृक्ष थे लोग अंदर जाते डरते थे । आलंदी में श्री सिद्धेश्वर का स्थान अत्यन्त प्राचीन है । वहाँ उम समय दिव्य तपोवन था । साथ के लोगो को बाहर ही बैठाकर ज्ञानेश्वर महाराज की समाधि की खोज करने एकनाथ महाराज अकेले ही उस वनमें अंदर गए । समाधि के समीप अंजानवृक्ष था । दूरसे उसे उन्होंने देखा। तब उन्हें बडा ही आनन्द हुआ ।ज्ञानेश्वर महाराज की समाधिपर जो अंजान नामक अश्वत्थ वृक्ष है, वह ज्ञानेश्वर महाराज का ही लगाया हुआ बताया जाता है ।
समाधि मंदिर का द्वार खेलकर वह अंदर गये । सहज वज्रासन लगाकर वहाँ ज्ञानदेव महाराज विराज रहे हैं । ऐसा तेजपुंज दिव्य स्वरूप कि जिसकी कोई उपमा नहीं । संत ज्ञानदेव जी के दर्शन होते ही एकनाथ उनके चरणोंपर लोट गये । संत केशवकृत एकनाथ चरित्र में लिखा है कि वहा ज्ञानेश्वर महाराज के साथ एकनाथ महाराज तीन दिन और तीन रात एकान्तमें रहे । इस एकांत में केसा ब्रह्मानन्द का संमुद्र उमड़ा होगा, उसकी कल्पना करना कठिन है । एक तो एकनाथ स्वयं ही पूर्ण पुरुष थे । दूसरे, अंजानवृक्ष की जड़ मस्तकमें लगने की लीला द्वारा श्रीज्ञानेश्वर महाराज ने उन्हें साक्षात् दर्शन दिया और यह आज्ञा भी दी कि ज्ञानेश्वरी (श्रीमद्भगवद् गीता पर टीका )का प्रचार करो ।

नाथ जब समाधी मंदिर के बाहर आ गए तब लोगोंने उसका प्रवेशद्वार फिर पत्थर लगाकर चूने से बंद कर दिया । यह घटना शाके १५०५ के ज्येष्ठमास में हुई । आलन्दी में नाथ एकादशी तक रहे । उस दिन उन्होंने कीर्तन किया । नाथके साथ बहुत लोग थे । सबके लिये सीधा सामान -पानी का प्रबन्ध करना बडा कठिन हुआ, तब भगवान् ने एक लिंगायत के वेशमें आकर खंभा गाड़कर वहां एक दूकान खोल दी । द्वादशी के दिन जिसको जितना सीधा सामान,पानी जरूरी हुआ उतना उसे उस दूकानदार से मिल गया । दाम किसी को भी नहीं देना पडा । उस दूकानदार ने किसी से दाम लिया ही नहीं, उसने कहा – एकनाथ समर्थ हैं उनसे हम सब हिसाब समझ लेंगे । जब एकनाथ सब लोगोंके साथ वहांसे चलने-को हुए तब वह लिंगायत अकस्मात् अन्तर्धान हो गया । इस धटना-का वर्णन स्वयं एकनाथ महाराजने दो अभंगो में किया है ।

आलन्दी में ही रहते हुए एकनाथ ने चारों भाई बहन पर (ज्ञानदेव जी और उनके भाई बहन)अभंग रचे और आलंदी की महिमा का वर्णन करते हुए कहा कि यहां के वृक्ष पाषाण सभी देवता हैं । इस स्थानके माहात्म्य-के संबंध में एकनाथ महाराज ने स्पष्ट ही कहा है – अंजानवृक्ष के पत्ते खाकर आलन्दीमें बैठकर जो २१ बार ज्ञानेश्वरी का पारायण करेंगे उन्हें सद्य: ज्ञान प्राप्त होगा । नाथ जब पैठण में लौट आये तब आते ही उन्होंने ज्ञानेश्वरी के संशोधन का काम आरम्भ कर दिया । लेखकों और पाठकों की भूलसे जो अशुद्ध और असंबद्ध पाठ घुस गये थे, उन्हें उन्होंने निकाल दिया और ज्ञानेश्वरी की शुद्ध पोथी तैयार कर दी ।

ज्ञानेश्वरी के संशोधन का यह कार्य शाके १५०६ तारणनाम संवत्सर में समाप्त हुआ । आगे ज्ञानेश्वरी में अपनी कुछ पंक्तिया वे जोड़ने पर वे काम कर रहे थे ।एकनाथ महाराज के समय मे ही पैठणमें मौलाना रून नामके एक मुसलमान औलिया थे । वे बड़े विरक्त, ज्ञानी और स्वानुभव संपन्न महात्मा थे । एक दिन एकनाथ महाराज सनंध्यासमय मस्जिद के याससे होकर जा रहे थे तब उन्होंने इस औलिया को देखा । वह एक शालमे धज्जियाँ लगा रहा था । एकनाथ ने उनसे पूछा, यह आप क्या कर रहे हैं ?उसने उत्तर दिया, मैंने सुना है कि एकनाथ ज्ञानेश्वरी में रद्दोबदल कर के कुछ अपनी बनायी ओवियाँ उसमें छोड़ने वाले हैं । मैं इस शाल में धज्जियाँ लगाकर यह देख रहा हूँ कि वह ज्ञानेश्वरी कैसो होगी ? यह सुनते ही एकनाथ महाराज ने अपना यह संकल्प त्याग दिया और सबके लिये यह निर्बन्ध लगाया कि ज्ञानेश्वरी की दिव्य वाणी में कोई भी अपने शब्द मिलाने का प्रयत्न न करे।

रनिया महार और उसकी स्त्री

रनिया उर्फ़ विवेक नामका एक महार जाती का व्यक्ति पैठणमें रहता था । वह बडा श्रद्धालु और सदाचारी था । उसकी स्त्री भी उसके ही समान सुशीला थी । स्त्री पुरुष दोनों ही एकनाथ महाराज़ के कीर्तन में प्रतिदिन आया करते थे और बाहर बैठकर नामघोष किया करते थे ।

एकनाथ महाराज गोदावरी स्नान के लिये जायँ उससे पहले रनिया और उसकी स्त्री उनके चलने का रास्ता झाड़ देकर साफ करते थे । एक दिन एकनाथ महाराज ज्ञानेश्वरी(संत ज्ञानदेव द्वारा श्रीमद्भगवद् गीत पर टीका) के प्रवचन में विश्वरूप दर्शन का प्रसंग सुनाया था । प्रवचन जब समाप्त हुआ तब रनिया ने महाराज़ से पूछा – महाराज ! भगवान् श्री कृष्ण ने जब विश्वरूप धारण किया तब यह रनिया कहाँ था ? महाराज ने तत्काल ही उत्तर दिया- तुम भी श्रीकृष्ण रूप में ही थे ।अबतक उन लोगो को लगता था की भगवान् केवल विशिष्ट व्यक्तियो के शरीर में गोटा है पर महाराज की वाणी सुनकर रनिया और उसकी स्त्री ने घर जाकर सोचा की जब सारे विश्व में भगवान् ही रम रहे हैं, तब हमारा शरीर महार जाती का होनेपर भी अपने हृदय मे तो भगवान ही विराज रहे हैं ।

कुछ दिन बीतने पर उन पति-पत्नी की यह इच्छा हुई कि एक दिन एकनाथ महाराज को अपने यहाँ भोजन के लिये बुलाना चाहिये । उनका इस प्रकार समागम होनेसे इम-लोगो का उद्धार हो जायगा । रनिया और उसकी स्त्री शुचिता और स्वच्छता के साथ रहा करते थे, अशुद्ध पदार्थ को ग्रहण अथवा स्पर्श भी नहीं करते थे । मुखसे सदा भगवान् के नामका जप करते हुए अपने प्रत्येक काम में दक्ष रहते थे । शरीर अवश्य ही महारका था, पर अनावरण सर्वथा ब्राहाणका सा था । उनकी बिरादरी के लोग विनोदसे उन्हें अपनी बिरादरी का ब्राह्मण ही कहा करते थे और शुद्धाचरण तथा भगवद्भक्तिमें तो वे दोनों सचमुच ही लाखों महात्माओ की अपेक्षा अधिक श्रेष्ठ थे । एकनाथ महाराज को उन्होंने एक दिन भोजन के लिये न्योता दिया ,नाथ महाराज ने उसे स्वीकार किया । नगर के कुछ लोगो जब यह बात मालूम हुई तब उन्होंने बडा कोलाहल मचाया ।

नाथ महाराज ने इस कोलाहल का यही उत्तर दिया कि है वह अन्त्यज तो है उसके ज्ञानमें मेंरा-तेरा हैं इस भेदभाव की कोई पहचान नहीं है । लोगो ने सोचा कि देखे, एकनाथ महाराज उस रनिया के यहाँ केसे भोजन करने जाते हैं । एकनाथ महाराज के घरसे रनिया के घरतक रास्ते में थोड़ेथोड़े दूरीपर ब्राह्मणो को वहाँ बिठा दिया । नाथ बेखटके सबके सामने घर से बाहर निकले और रनिया के घर पहुँचे । रनिया और उसकी स्त्री ने एक साथ उनकी पूजा की, भोजन के लिये आसन बिछाया, थाल रखी, चौक पूरा और महाराज से बैठने-के लिये प्रार्थना की ।

महाराज आसनपर बैठे, पक्वान्न परोसे गये और महाराजने भोजन किया । पर इसी समय एक चमत्कार हुआ । वह यह कि जिस समय नाथ यहाँ भोजन कर रहे थे, उसी समय बहुतो ने उन्हें अपने घरपर भी उसी रूप और भेषमें देखा था । एक ही एकनाथ एक ही समयमे कहां तो अपने घरपर भागवत का प्रवचन कर रहे हैं और कहां उसी समय रनियाके यहाँ भोजन भी कर रहे हैं । यह चमत्कार जब उन निंदक लोगो और ब्राह्मणोंने देखा तब उन्हें बडा ही आश्चर्य हुआ और उनके लिये यह समझना कठिन हो गया कि उन दोनों में से सच्चे एकनाथ कौन हैं ? तब कुछ व्यक्तियो ने कहा की महाराज तो कबसे कथा प्रवचन में लगे हुए है। अंत में वे लोग समझ गए की संत एकनाथ बड़े महात्मा है ,रनिया का सद्भाव जानकर भक्तवत्सल भगवान् पाण्डुरंग ने ही एकनाथ के भेषमें रनिया के घर जाकर भोजन किया होगा ।

कैदखाने से भागे चोर का उद्धार

पैठण में एक व्यक्ति चोरी करके ही अपनी जीविका चलाता था । एक दिन चोरी करता हुआ वह पकडा गया, पैरोंमें बेडियां पडी और कारागार पहुँचाया गया । कारागार में उसे खाने को नहीं मिला, शरीर को बड़े कष्ट हुए, सिरपर बाल बढे, उनमें जूएँ पड़ गयी और सर्वांग विकल हो गया एवं प्राण आँखोंमें आकर अटक रहे । इस हालत में उसके पैरों की बेडियाँ निकाल ली गयीं । वह अधमरा सा मनुष्य कई दिन कारागार के परिसर में लोट पोट करता पडा रहता था ।

एक दिन रातको इसी हालत में उसने एकनाथ महाराज के कीर्तन की ध्वनि दूरसे आती हुई सुन ली और सुनते ही उसे अपना छुटकारा करा लेनेकी बात सूझी। वह धीरेधीरे रेंगता हुआ हिम्मत करके कैदखाने के परिसर से बहार निकला और किसी तरह रास्ता तय करके श्री एकनाथ महाराज के द्वारपर जा पहुंचा । उसकी रोने की आवाज ज्यों ही नाथ महाराज के कानोंमें पडी त्यों ही वह बाहर आये ,उसका हाल देखा । उसके मुँहसे स्पष्ट शब्द नहीं निकल याता था, फिर भी संकेत से उसने सुझा दिया कि पेटमें अन्न नहीं है । नाथ महाराज ने तुरंत खीर तैयार कराके उसके मुँहमें डाली । बिछाने और ओढ़नेक्रो उसे वस्त्र दिये, सोने के लिये स्थान भी दिखा दिया। वह जब सुख से सो गया तब नाथ सोने के लिये अपने कमरे मे गये ।

दूसरे दिन एकनाथ महाराज ने हाकिमों को चोर के छूट जाने की खबर दी और साथ ही यह विनती की कि दवा-पानी के लिये इसे अब मेरे ही यहाँ रहने दिया जाय । एकनाथ जी का सभी सम्मान करते थे अतः महाराज की बात ली गयी और बाकी सजा भी माफ जाकर दी । तीन महीने वह नाथ महाराज के यहाँ रहा, उसकी बडी सेवा सुश्रुषा हुई और तीन महीने में वह पहले जैसा हट्टा कट्टा हो गया । संत के प्रसादी अन्नका ऐसा प्रभाव पड़ा कि उसकी सारी मलिन वासनाएँ धुल गयीं । एकनाथ महाराज के प्रति उसके हृदयमे परम पूज्यभाव उत्पन्न हुआ । पहले का कुमार्ग छोड़कर महाराज की कृपा से वह भगवान् की भक्ति में लग गया ।

इस घटना के कुछ काल बाद एक दिन की बात है कि नाथ गोदावरी स्नान को जा रहे थे, रास्ते में एक अश्वत्थ वृक्ष के नीचेसे होकर ज्यों ही महाराज आगे बढे त्यों ही वृक्षपर रहनेवाला ब्रह्मराक्षस नीचे उतरकर महाराज के सामने खडा हो गया । उसने महाराज़ से कहा -आजतक आपनेे जितने संत ब्राह्मणो को भोजन कराया , उन सबका अथवा कैदखाने से भगाकर आये हुए व्यक्ति की जो आपने सेवा की उसका, दोनो में से किसी एक का पुण्य मुझे दीजिये, इससे मैं इस योनि के भयंकर कष्टो से मुक्त हो जाऊँगा ।

ब्रहाराक्षस की यह प्रार्थना उन्होंने सुनी, पर याप और पुण्य तो सकाम कर्मोंसे होते हैं, एकनाथ महाराज कायिक, वाचिक, मानसिक सारे ही कर्म निष्काम भाव से करते थे, इससे पाप-पुण्यका कोई हिसाब उनके पास नहीं था । पाप और पुण्य नरक और स्वर्गके देनेवाले हैं सन्त तो इनके परे नैष्कर्म्य बोधक द्वारा सर्वथा मुक्तानन्दमें रहते हैं । अखण्ड आत्मरूपानन्द ही उनका स्वरूप होता है । एकनाथ महाराज ने कैदखाने से छूटे हुए व्यक्ति की सेवा सुश्रुषा के पुण्यपर जल छोडा और जल छोडने पर ब्रहाराक्ष दिव्य शरीर धारण करके भगवान् के धाम को चला गया ।

नाथपुत्र हरि पण्डित का अभिमान दूर होना और एक भक्ता का संकल्प पूर्ण करना

संत श्री एकनाथ के पुत्र श्रीहरि पण्डित बड़े विद्वान् और बुद्धिमान।थे । अल्प आयु में ही इन्होंने सब शास्त्रो का अध्ययन पूरा किया और विद्वन्मान्य हुए । इन्हें एकनाथ महाराज का ढंग पसन्द नहीं था । इन्हें संस्कृत भाषा का बडा अभिमान था और इनके पिता जो सरल जनता को समझ मे आये इस कारण मराठी में ग्रन्थ लिखते, मराठी में ही कीर्तन और प्रवचन करते तथा प्राकृतजनों का ही संग-लाय करते, यह बात इन्हें गौरवजनक नहीं मालूम होती थी । एकनाथ महाराज उनसे पूछते कि है संस्कृतवाणी तो देवताओं ने निर्माण की, पर प्राकृत को क्या दस्युओने पैदा किया ? वह इन्हें समझाते कि भगवान् को वाणीका कोई अभिमान नहीं है, संस्कृत हो या प्राकृत, दोनों उनके लिये समान हैं। जिस भाषा में ब्रह्मकथन होता है, वह उसी से सन्तुष्ट होते हैं ।

प्राकृतजनों के उद्धारार्थ जो ग्रन्थ लिखे जायें और जो कथानिरूपण, व्याख्यान हों वे प्राकृत में ही होने चाहिये, यह बात उन्होंने अपने भागवतग्रन्थ में अनेक स्थानों में लिखी है । विविध संतो ने अपने प्रांतीय भाषा में अपनी वाणी को प्रकट किया है, जिस कारण कलयुग के मूढ़ जड़ बुद्धि जीवो का उद्धार हो सके । वाणी कोई भी हो बस भगवान् से जोड़ दे यही संतो का मत है, पर हरी पंडित को यह सब बात नहीं पसंद आती ।

एकनाथ महाराज ज्ञानेश्वरी, अमृतानुभव आदि अनेक संतो द्वारा रचित दिव्य ग्रन्थ उनके सामने रखकर उनसे पूछते थे कि अच्छा तो यह बताओ कि ये ग्रन्थ संस्कृतभाषा के ग्रंथो से किस बातमें कम हैं ? नाथ संस्कृत का पूर्ण आदर करते थे, पर प्रांतीय भाषा से भी उनका बहुत प्रेम था । उनका सिद्धान्त यह था कि जिस वाणी में हरिकथाप्रेम है वही वाणी सरस है ,चाहे पंजाबी ,अवधि,ब्रज ,गुजराती, मारवाड़ी आदि कोई भी भाषा हो । वह सच्चे भागवत, पूर्ण अनुभवी और हरि प्रेमानन्द का अखण्ड भोग करनेवाले भक्त थे ।

उनके चित्तमें ऊंच नीच, ब्राह्मण शूद्रका कोई भेद भाव नहीं था । हरि पण्डित वर्णाश्रमक्रे पूर्ण अभिमानी, कर्मठ और केवल पण्डित थे । एकनाथ महाभक्त के नाते सभी जनों को अत्यन्त प्रिय थे और हरि पण्डित भी पैठण के विद्वानों और कर्मठ ब्राहाणों को प्रिय थे । हरि पण्डित शीलवान् थे, तथापि पिता के विचारों से सहमत न होने के कारण वह अपनी सहधर्मिणी तथा अपने प्रह्लाद और मेघश्याम नामक दो पुत्रों को साथ ले अपने विचारो के अनुकूल क्षेत्र जान काशी चले गये । राघव नामक उनका पुत्र घर ही एकनाथ महाराज के पास रहा । राघव बचपन से ही अपने दादा की ही बात मानता था, उन के कहे अनुसार चलता था और एकनाथ महाराज जब कीर्तन करते तब राघव उनके पीछे खडा रहकर ध्रुपद अलापता था ।

हरि पण्डित काशी पहुंचते ही वहा के विद्वानो में सर्वमान्य हुए । वहां उन्हें रहने के लिये एक घर भी मिल गया और काशी में उनकी अच्छी धाक जमी । चार वर्ष इस प्रकार बीतनेपर हरि पण्डित को समझाने के लिये एकनाथ महाराज स्वयं काशी गये । हरि पण्डित ने उनका बडा आदर किया ,एकनाथ महाराज कुछ दिन वहां रहे । इसके पश्चात् हरि पण्डित ने दो शर्तोपर पैठण चलना स्वीकार किया । एक तो यह कि एकनाथ महाराज मराठी ग्रंथो पर प्रवचन न करें और दूसरे परान्न ग्रहण न करे । एकनाथ महाराज ने इन दोनों शर्तो को मंजूर किया । तब हरि पण्डित उनके साथ पैठण गये । पैठण में अब एकनाथ महाराज के बदले हरि पपिडत् के प्रवचन होने लगे ।

एकनाथ महाराज जो अब वृद्ध हो गये, पुत्र के प्रवचन सुनने के लिये श्रोताओ में बैठ जाते थे । हरि पण्डित विद्वान् तो बहुत बड़े थे, पर एकनाथ जी के प्रवचन के समय, जहाँ श्रोताओं की इतनी भीड़ होती थी कि तिल धरने को जगह न मिलती वहाँ अब कुछ ही लोग दिखायी देते थे । यह हरिं पण्डित ने भी देखा और सोचने लगे कि यह क्या बात है जो पिताजी को जहाँ लोग सोलह आना पूजते हैं वहाँ मुझे दो आना भी नसीब नहीं होता ।

एकनाथ महाराज के दर्शनों के लिये अब भी सहरत्रों भक्त नित्य उनके पास आया करते थे । एकनाथ महाराज का घर भगवान् का मन्दिर हो गया था । हरि पण्डित का ह्रदय अब कुछ नरम होने लगा । यह एकनाथ महाराज ताड़ गये और उन्होंने मनमें यह विचारा कि अब इसे अहंकार के ब्रह्मपिशाच से छुड़ाना चाहिये ,इसके मन में भीड़ इकठ्ठा करने कि और हमारा सत्कार हो ऐसी भावना से कथा नही होनी चाहिए और न ही ये बिना भक्ति प्रेम का केवल कोरा कर्मकाण्डी रहना चाहिए।

पैठण में एक स्त्री ने कभी एक बार सहस्त्र ब्राह्मण भोजन कराने का संकल्प किया था, आगे उसका पति मर गया, घरमे जो कुछ सम्पत्ति थी यह भी नष्ट हो गयी और ऐसा समय आया कि उसे पेटके लिये लोगों के यहाँ पानी भरने का काम करना पडा । पर इस हालत में भी उसकी यह इच्छा थी कि सहस्त्र ब्राह्मण-भोजन का जो संकल्प किया है वह पूरा हो, पर यह नहीं समझ में आता था कि कैसे पूरा हो । गाँव में एक विद्वान थे, उन्होंने उसे यह सलाह दी कि एक ब्रह्मनिष्ठ भक्तिभाव संपन्न ब्राह्मण को भोजन करा दो, इससे सहस्त्र ब्राह्मणों को भोजन करानेका पुण्य लाभ होगा । ऐसा ब्रह्मनिष्ठ ब्राह्मण एकनाथ के सिवाय और कौन हो सकता है ? उसने एकनाथ जी को भोजन के लिये बुलाने का निश्चय किया । वह उनके पास गयी और विनती करने लगी ।

उसका शुद्ध संकल्प, विनय और आग्रह देखकर तथा हरि पण्डित का अभिमान चूर करने का यह सुअवसर जानकर उन्होंने भोजन का निमन्त्रण स्वीकार किया और रसोई बनाने के लिये स्वयं हरि पण्डित को उसके घर भेजा,क्योंकि हरी पंडित ने परान्न ग्रहण न करने की शर्त वाराणसी से आते समय जो राखी थी । हरी पण्डित ने अपने हाथ से रसोई बनायी और एकनाथ महाराज को स्वयं परोसकर भोजन पवाया । उस स्त्री को बडा आनन्द हुआ । एकनाथ महाराज ने हरि पण्डित को कहा कि जूठी पत्तल भी तुम्हीं उठाकर फेंक दो । हरि पण्डित पिताकी आज्ञा से ज्यो पत्तल उठाने लगे तो क्या हुआ कि एक पत्तल के नीचे और पत्तल आते जा रहे है , एक फेकते तो नीचे दूसरी पत्तल, दूसरी फेकते तो नीचे तीसरी इस तरह एकनाथ जी ने जिस पत्तलपर भोजन किया था उसके नीचे एक हजार पत्तलें निकली ।

एक सहस्त्र ब्राह्मणभोजन का संकल्प इस तरह भगवान् की कृपा से पूरा हुआ देखकर उस स्त्री के आनन्द की कोई सीमा न रही और हरि पण्डित का गर्व भी चूर-चूर हो गया ,वो समझ गए की संत एकनाथ जी महान संत है । वह पिता की शरण में गये और तबसे उन्होंने पिता की आज्ञा को ही शास्त्र आज्ञा मानकर चलना स्वीकार किया । एकनाथ महाराज पर उनके जो आक्षेप थे वे नष्ट हो गये और उनका अहंकार भी लीन हो गया । वह नाथके कृपापात्र हुए । बहुत समय बीत चुका था कि नाथ का कीर्तन या प्रवचन लोगोंने नहीं सुना । लोग उस अमृतवाणी को फिरसे सुनने के लिये बड़े ही उत्सुक हो रहे थे । एकनाथ महाराज के कीर्तन प्रवचन फिर आरम्भ हुए और उनसे पैठण साक्षात् भूवैकुंठ हो गया ।
नाथ अब बहुत वृद्ध हो गये थे । पिता-पुत्रका जबसे मेल हुआ तबसे घरमे छाई विरोध न रह गया । नाथसे द्वेष करनेवाले बहुतसे तो ठंडे हो गये। संत एकनाथ के जीवन काल में उन्होंने पात्र अपात्र सबका उद्धार किया ।

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श्री एकनाथ चरित्र भाग २

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