सुंदर कथा २३ (श्री भक्तमाल – श्री एकनाथ जी) Sri Bhaktamal- Sri Eknath ji…भाग २

आदरणीय श्री लक्ष्मण पांगारकर द्वारा एकनाथ चरित्र, संत महीपति औ केशव कृत नाथ चरित्र ,संत केशव कृत नाथ चरित्र ,श्री एकनाथ जी के १३ वे वंशज पूज्य श्री वेणीमाधव जी के आशीर्वाद एवं वारकरी संप्रदाय के ग्रंथो पर आधारित । कृपया अपने नाम से प्रकाशित ना करे ।
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श्री एकनाथ महाराजने भगवान् की ऐसी निरुपम सेवा की कि उनके संगति सुखके स्नेह से भगवान् ने उनके यहाँ बारह वर्ष रहकर उनकी सेवा की । “वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः ” इस गीताके वचनके अनुसार सदा सर्वत्र परमात्माको ही देखनेवाले दुर्लभ महात्माओंकी कोटिमे जब श्री एकनाथ महाराज पहुंचे तब स्वयं भगवान् ब्राह्यणरूपसे उनके यहां आकर रहने लगे । भक्तने भगवान की ऐसी सेवा की कि भगवान् को यह इच्छा हुई कि अब हम भक्तकी सेवा करें । श्री एकनाथजी ने भगवान और संतो से इतना प्रेम किया इतना प्रेम किया कि उसे शब्दों में वर्णन करना अत्यंत कठिन है, या यूं कहे संभव ही नहीं है।
संत श्रीज्ञानदेव लिखते है- उसके संगके खुखके लिये मुझ विदेह को देह धारण करना पड़ता है, यही नहीं बल्कि उसके लिये देह धारण करना मुझे इतना प्रिय होता है कि जिसकी कोई उपमा नहीं ।
– ज्ञानेश्वरी ग्रंथ, अध्याय १२

एकनाथ महाराजकी भक्ति एवं अगाध प्रेम से मोहित होकर भगवान् श्रीकृष्ण ब्राह्मण वेशमें एक बार नाथके घर आये और उन्हें नमस्कार कर सामने खड़े हो गये । उस समय उन दोनोंका इस प्रकार संवाद हूआ :

नाथ – आप केसे आये?

ब्राह्मण – आपका नाम सुना, इच्छा हुई कि आपके साथ अखण्ड समागम हो और आपकी कुछ सेवा बन पड़े इसीलिये आया हूं । सदासे मैं सन्तोका सेवक ही रहा हूं । मुझे वेतन नहीं चाहिये । पेटभर अन्न प्रसाद मिले और आपकी सेवा हो, इतनी ही इच्छा है ।

नाथ – आपके परिवार में कौन-कौन हैं ?

ब्राह्मण- मैं अकेला ही हूँ मेरे न कोई स्त्री है न बच्चे । इस शरीरको श्रीकृष्ण या श्रीखण्डिया कहते हैं ।

नाथ – आपसे सेवा लेनेक्री मुझे कोई आवशयकता नहीं है। तथापि आप अन्न-वस्त्र लेकर आनन्दसे यहाँ परमार्थ साधन कर सकते हैं ।

ब्रह्मण- बस, इतनी ही कृपा चाहिये। अपने कष्टसे अन्न प्राप्त करनेकी इस दासको अनुमति हो । मेरी सेवा आप अवश्य ग्रहण करें।

श्रीखंड्या नाथके घर रहने लगा । उसने अपने गुणोंसे सबको मोह लिया । भगवान् की लीला कुछ ऐसी अपरंपार है कि सब प्राणियोंमें भगवान् को देखनेवाले नाथ भी उनके उस वास्तविक रूपको नहीं पहचान सके । भगवान् ने अपनी मायाका परदा बीचमें रखा, अन्यथा नाथ जैसे भक्तश्रेष्ठ एक क्षण भी भगवान् से सेवा कराते । परन्तु भगवान् को नाथक्री सेवा करना प्रिय था, इसलिये नाथ जैसे पूर्ण पुरुष भी उन्हें पहचान नहीं सके । श्रीकृष्णने माता यशोदाको चौदहों भुवन अपने मुँहके अन्दर दिखा दिये तो भी माताके हदयका पुत्रभाव ज्यों-का- त्थों बना ही रहा । वैसी ही बात यहां भी समझनी चाहिये । भगवान् एकनाथ महाराजके यहाँ नित्य पानी भरें, देव्-पूजाके निमित्त चन्दन घिसें, ब्राह्मण-भोजनके पश्चात् जूठी पत्तलें उठायें और नाथकी हर तरहसे सेवा करें ।

धर्मंराज युधिष्ठिर के राज़सूय यज्ञके समयखे उन्हें जूठी पत्तले उठाने की मानो अदात ही पड़ गयी है । जिनके चरणों से भागीरथी प्रकट हुई वह नाथके घर पूजाके लिये पानी भरा करते थे । जिनकी प्राप्तिक्रे लिये हजारों तपस्वी सूखकर काठ बन गये, वह नाथके घर देव पुजा के निमित्त चन्दन घिसा करते थे । जिनकी कीर्ति गाते-गाते नेति-नेति  कहकर श्रुतिने हार मानी, वह नाथके गुण गानेवाले भाट बने । जिनके चरणों की रज के लिये भर्तृहरि जैसे मनस्वी पुरुषो ने राजपाट त्याग दिया, वह नाथके पैर दबाया करते थे । जिनके प्रकाशसे चन्द्र सूर्य प्रकाशमान हुए, वह नाथके घर दीपक जलाया करते थे । इंद्रादि देवता जिनके आज्ञाकारी हो, वह नाथकी आज्ञाकी प्रतीक्षामें उनके द्वारपर खड़े रहते थे । जिनके स्मरणमात्र से योगी विमलाशय हो जाते हैं, वह नाथके घर पूजाके पात्र मला करते थे । लक्ष्मी जिनके पांव तले पड़ी रहती हैं वह नाथ पत्नी के चरणोंके पास बैठा करते थे । सब देवता जिनकी आज्ञासे विश्वचक्रको चलाते हैं, वह गिरिजाबाई(नाथ पत्नी) के घरके काम काजकी छोटी से छोटी बात भी बहुत मन लगाकर किया करते थे । धन्य हैं वह एकनाथ, जिनके भक्तिभाव् से मोहित होकर भगवान् भी उनके अंकित हो गये ।

नाथके घर श्रीखण्ड (दिव्य चन्दन) घिसकर उन्होंने अपना श्रीखंड्या नाम सार्थक किया । भगवान् अपने सारे ऐश्वर्यको भुलाकर नाथके घर बारह वर्ष सेवा करते रहे । भूतदया जिनके रोम रोमसे प्रकट हो रही थी, उन एकनाथके घर वह भूतभावन भूतेश स्वयं सेवक बनकर रहे । नाथ का योगक्षेम भगवान ने वहन किया, इसमें आश्चर्य ही क्या है ?नाथके उत्सव में गंगाजलसे भरे हुए पात्र घृतसे भरे हुए निकले, इसमें भी आश्चर्यकी कोई बात नहीं । नाथके यहां ३०- ३५ वर्षतक ब्राह्मण से लेकर चाण्डालतक सबके लिये सदावर्त था । नाथके द्वारपर से कोई भी अतिथि खाली हाथ नहीं गया । उन्होंने सहस्त्रो जीवोंक को भक्ति पथमें प्रवृत्त किया । उन्हें अन्न देकर उनके शरीरका और ब्रह्मज्ञान देकर उनकी ब्रुद्धिका पोषण किया । बड़े बड़े राजाओंको भी जिस दानीपनका यश नहीं मिलता, वह यश उन्हें मिला । भगबान् का सख्य प्राप्त करनेके कारण और स्वयं भगवान् के ही उनके घर सेवा करनेके कारण उन्हें लोग ‘ दीनोंका कल्पवृक्ष’ कहने लगे । भगवान् की सेवा करनेवाले भक्त करोडों हैं, पर भगवान् जिसकी सेवा करके अपनेको धन्य मानते हैं, ऐसे भक्त तो भक्तमणिगणो के चक्रवर्ती ही हैं । नाथके पुण्यप्रतापकी यह हद हो गयी और भक्ति पन्थके महत्कार्यपर कलश चढ गया ।

इस प्रकार बारह वर्ष चीते । तब भगवान् ने स्वयं अन्तर्धान होकर भक्तका यश प्रकट करनेका संकल्प किया । उन सत्यसंकल्प, दयानिधि और भक्तवत्सल भगबान् को नाथका रहन सहन देखकर बहुत संतोष हुआ। अन्दर बाहर एक रहनेवाले भक्तसे विदा होना भगवान् के लिये कठिन हो गया, तथापि भक्तजनों के उद्धारार्थ भक्तोंका यश भगवान् को बढाना ही पड़ता है ।

उम समय द्वारकामें एक ब्राह्मण अनुष्ठान कर रहा था । युक्ताहारविहार रहकर यम नियमादिका पालन करके सदा सुखसे ‘कृष्ण कृष्ण’ कहा करता था । भगवान् के ही छन्दस्ने वह परिपूर्ण हो गया था है उसे सदा भगबान्का ही निदिध्यास लगा रहता था । शीत और उष्णको सहन करते और मनक्रो एकाग्र करते हुए उसने हृदयमे जो भगवान् को धारण किया, उससे भगवान् को करुणा आ गयी । उस ब्राहाणक्रो भगवान् ने स्वप्नमे दर्शन देकर कहा कि मैं पैठणमें एकनाथ के घरपर हूं। उसकी सेवा से मैं प्रसन्न हुआ है । वहाँ  श्रीखण्डिया नाम धारणकर मैं रहता हूं, वहाँ जाओ, वहां मेरे दर्शन होंगे । वह ब्राह्मण पैठणमें पहुंचा, वहाँ सबसे पहले गोदावरीके दर्शन हुए, उसके निर्मल जलसे हाथ पैर धोकर मुखमार्जन करके वह बस्तीमें पहुंचा और एकनाथ महाराजका मकान दूंढ़ने लगा। वह ब्राह्मण गदगद हुआ नाथके मकानपर आया, अन्दर घुसा नाथ देवगृहमें थे । वह सीधे वहीं उनके पास पहुँचा । भगबान् के दर्शन करने आया हुआ वह ब्राह्मण थोडी देरके लिये भगवान् को भी भूल गया और भत्के तेज को देखते ही तन्मय हो गया है उसके शरीरपर सात्विक अष्टभाव उदय हो आये (स्तम्भित होना, पसीना आना, रोंगटे खड़े होना, स्वरका कांपना, कंपकपी होना, रंग उड़ जाना, अश्रुपात होना और मृतव्त् हो जाना यह सात्विक अष्टभाव् हैं । )

उसके नेत्रोंसे अश्रु धाराएँ बहने लगी । कंठ रुँध गया, उसी हालतमें उसने काँपते हुए स्वरमें कहा कि महाराज, मुझे श्रीकृष्णके दर्शन कराइये । उसकी वह हालत देखकर नाथ महाराजने कहा – श्रीकृष्ण तो सर्वत्र रम रहे हैं । वह सम्पूर्ण विश्वके अन्दर और बाहर व्याप्त हैं जहाँ हो वहीं देखो, तब तुम्हें वह दर्शन देंगे । वह जहाँ है, वहीं है । उन्हें अलग करके कैसे देख सकते हो ?दृश्य, दर्शन, द्रष्टा तीनोको पारकर देखो तो तुम्ही श्रीकृष्ण हो । यह सुनकर उस ब्राह्मणने कुछ झुंझलाकर कहा, ‘ मुझे इस ब्रहाज्ञानकी जरूरत नहीं । मुझे तो भगवान् ने यह स्वप्न दिया है कि एकनाथ महाराजके यहाँ तुझे मेरे साक्षात् दर्शन होंगे । श्रीखण्डिया कहां है, यह मुझे बताइये । उससे मुझे मिलाइये । यह सुनते ही एकनाथजी के हृदयपर चोट-सी लगी और उद्धव आदि सब लोग श्रीखण्डियाक्रो दूँढ़ने निकले । चारों और खोज हुई पर कहीं पता न लगा । नाथ अपने आसनपर बैठे थोडी देर

ध्यानमग्न हो गये और उनके ध्यानमें सब बातें आ गयीं । नाथ रोमांचित हो उठे और फिर सोचने लगे, ‘ भगवान् को मैंने कितना कष्ट दिया हैं लगातार बारह वर्ष उनसे ऐसी सेवा करायी । ऐसे ऐसे कम कराये जो कभी न कराने चाहिये थे । यह सोचकर उनका कोमल ह्रदय अत्यन्त व्यथित हुआ । वह और गिरिजाषाई दोनों ही बेबस होकर रोने लगे । फिर उन्होंने भगवान् को पुकारा । उस समय साक्षात् भगवान् श्रीकृष्ण सामने प्रकट हुए । एकनाथ, गिरिजाबाई और उस तपस्वी ब्राह्मणक्रो अत्यानन्द हुआ । तीनों भगवान् के चरणोंपर लोट गये । वह वार्ता बात ही बातमें सर्वत्र फैल गयी और एकनाथ महाराजक दर्शनोंके लिये हजारों लोग दौड़े आये ।

श्रीखंड्या जिस कुण्डेमें पानी भरा करता था, वह कुण्डा अभीतक एकनाथ महाराजके घरमें है और षष्ठीके दिन लोग हजारों गगरी पानी उसमें डालें तो भी, कहते हैं कि जबतक भगवान् की गगरी भरकर उसमें नहीं डालते, तबतक वह नहीं भरता और ज्यों ही भगवान् की गगरीका पानी उसमें आ जाता है, त्यों ही पानी भरकर बाहर बहने लगता है।
श्री प्रह्लाद जी का पुण्यबल महान् था, इससे भगवान् उनके पोते बाली के द्वारपाल बने और श्री भानुदासका पुण्यबल भी महान् था, इससे भगवान् भानुदासके परपोते के यहां सेवक बनकर रहे ।

श्री एकनाथ जी का वैकुण्ठ धाम पधारना

शाके १५२१ (संवत् १६५६ ) का फाल्गुन मास आया । एकनाथ महाराज ने कह दिया कि अब शीघ्र ही यह चोला छोड़ देना है । गृहस्थाश्नम में रहते हुए भी उन्हें संसारका कोई बन्धन नहीं था, चारों दिशाओ से लोग उनके दर्शनों-के लिये आने लगे । एकनाथ महाराज के कीर्तन हुए, नाम-सप्ताह होने लगे और सारे नगरमें हरिनाम गूँजने लगा । चैत बदी ६ का दिन उदय हुआ और गुरुपूजा तथा ब्राह्मणभोजन हो जानेपर नाथ बोले कि अब शरीर छोड़नेका समय है । उनका शरीर स्वस्थ था । किसी प्रकार का कोई विकार या पीड़ा नहीं थी । सभी मनुष्य उनके कहेनुसार नदी किनारे एकत्र हुए ।
एकनाथ महाराज का अन्तिम कीर्तन हुआ ।

उनके श्रीमुख से निकले हुए अमृताक्षर सुनकर सब लोग चित्रवत मुग्ध और तल्लीन हो गये । आरती हुई, प्रसाद बाँटा गया । नाथ फिर नदीमे उतरे । पूर्ण स्वस्थता के साथ उन्होंने गोदावरी स्नान किया । काया, वाचा, मनसा किसी भी प्रकार से उन्होंने जाग्रत ,स्वप्न , सुषुप्ति किसी भी अवस्था मे कोईं भी पाप नहीं किया था, इससे जब देहावसान का समय उपस्थित हुआ, तब उनका मन या तनका कोई भी अंग जरा भी विकल नहीं हुआ । सारा जीवन हरिमय था । हरि सिवाय उस शरीर और मनमें और था ही क्या ? तब मृत्यु के समय मे भी हरिस्मरण के सिवाय और क्या हो सकता है ?

पवित्र गोदावरी को सम्मुख करके पीड़ेपर बैठे और श्री कृष्णस्वरूप का ध्यान करने लगे ,वह ध्यान फिर कभी न टूटा ! वह उसी परमानन्द में लीन हो गये, इसी अवस्था में देह छोड़ दी और आप निजधाम को चले गये ! पैठण क्षेत्र में उन्होंने भगवन्नाम वर्षा की और भूलौक का दुरितदैन्य दूर किया । उन सच्चिदानन्दस्वरूप संत श्री एकनाथ महाराज के चरणो।में हमारे अनन्त प्रणाम है: ।

नाथ के कुछ शिष्यों के चरित्र भी पढ़ने योग्य है, जैसे श्री दण्डवत् स्वामी और श्री गावबाजी। इन भक्तो के चरित्र पढ़ने के लिए आगे दिए नाम पर क्लिक करे :

१. श्री गावबा जी

२. श्री दण्डवत् स्वामी जी

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