श्री नारदजी की द्वारा श्रीराम नाम का माहात्म्य प्रकट

भगवन्नाम का महत्व भगवान् से भी अधिक होता है । यहां तक कि भगवान् को भी अपने ‘नाम’के आगे झुकना ही पड़ता है । यही कारण है भक्त ‘नाम’के प्रभावसे भगवान् को वश में कर लेते है ।  निम्नलिखित कथासे ‘राम’ नामकी महिमापर प्रकाश पड़ता है ।

रामराज्यका समय था । मर्यादापुरुषोत्तम भगवान् श्रीराम अश्वमेध नामक महान् यज्ञका अनुष्ठान कर रहे थे । ब्रह्मर्षि वसिष्ठ और विश्वामित्र सदृश ब्रह्मवेत्ताओ के सानिध्य में यज्ञका अनुमान चल रहा था । उस पावन अव्सरका लाभ उठानेके लिये देश-विदेशो से अनेक राजा महाराजा अयोध्या पधारे हुए थे ।

एक सामन्त राजा, जो आरवेटके लिये वनमें गया हुआ था, सम्राट श्रीरामद्वारा यज्ञकी खुलना पाकर संधि अयोध्या लौट आया तथा यज्ञमण्डपके बाहरसे ही उसने ‘वसिष्ठ आदि महर्षियोंक्रो मेरा प्रणाम’ कहकर नमस्कार किया और नित्य कर्मके लिये अपने स्थान को चला गया ।

देवलोकसे देवर्षि नारद भी भगवान् श्रीरामके यज्ञ वैभव को देखनेके लिये अयोध्या आये हुए थे । सामन्त राजाके ‘वसिष्ठ आदि महर्पियोक्रो प्रणाम’ इन शब्दों को सुनकर देवर्षि नारदके मनमें एक युक्ति सूझी । उन्होंने सोचा कि इसी बहाने ‘राम’ नामकी महिमा को क्यों न लोगोंमें प्रकट किया जाय । वे तुरंत महर्षि विश्वामित्रके पास गये और बोले-

महर्षिवर देखीये आपने इस सामन्त की धृष्टता , वास्तवमें महर्षि बसिष्ठ की अपेक्षा आप महाराज श्रीरामके अत्यन्त उपकारी है । श्रीराम आपसे ही समस्त अस्त्र शस्त्रो का ज्ञान प्राप्त का सका है । आपकी ही कृपा से श्रीरामक को जनक नन्दिनी सीताजी मिली है । श्रीरामके द्वारा रावण जैसे क्रूर महाबलशाली राक्षसका समूल नाश करना आपके ही अनुग्रहका फल है । फिर इस मूर्ख सामन्तने जान बूझकर आपकी महत्ताका अपमान करनेके लिये महर्षि वसिष्टके नाम को प्रथम स्थान दिया है ।

फिर क्या था महर्षि विश्वामित्र क्रोधसे पागल से हो गये । वे तुरंत श्रीरामके सामने जाकर बोले- राजन् ! आपके दरबार में एक सामन्तने मुझे अपमानित करनेक्री चेष्टा कर अक्षम्य अपराध किया है । इसके दण्डके रूपमें आपक्रो आज़ सूर्यास्तसे पहलेे उस सामन्तके सिरको मेरे चरणों में समर्पित करना होगा अन्यथा मैं शाप दे दूँगा ।

भगवान् राम महर्षिकी आज्ञाको शिरोधार्य कर तुरंत उस सामन्त की खेजमें लग गये ।
उधर देवर्षि नारद सीधे उस सामन्त राजाके पास पहुंचे और उसे संकट की सूचना दी । सामन्त उनके चरणोंपर गिर पडा और बोला – भगवन् ! कृपया इस संकटसे मुझे बचाइये । अनजानेमें में महाराज श्रीरामके प्रति अपराधी बन गया हूँ । तीनों लोको में मुझे शरण देनेवाला कोईं नहीं दीखता । अब तो आप ही किसी उपायसे बचा सकते है ।

नारदजी कुछ सोचकर बोले – तब एक उपाय है । तुम इसी समय रामभक्त हनुमान जी की माता अञ्जना देवी की शरणमे जाओ । हनुमान जी माताके प्रति प्रगाढ़ भक्ति रखते है । वे माता की आज्ञा टाल नहीं सकते । माताकी आज्ञा होनेपर वे ही तुम्हें बचा सकते है ।

सामन्त तुरंत उस स्थानपर गया, जहां अञ्जनादेवी पूजा कर रही थीं । उसने उनके चरण पकड़कर अभय मान । पूछनेपर सारा वृत्तांत सुनाकर रक्षा करनेके प्रार्थना की । अञ्जनादेवी ने अपने पुत्र हनुमान जी को बुलाया और उनसे राजा की रक्षा करने की बात कही ।

माता की आज्ञा सुनकर हनुमान जी क्षणभरके लिये विचलित हो गये । राजाकी रक्षा करनेका अर्थ था अपने आराध्य प्रभुके नाते द्रोह । फिर भी उन्होंने माता की आज्ञा मान ली और राजा को अभयदान किया ।

हनुमान जी ने अपनी पूँछ बढायी, उसे लपेटकर एक दुर्ग बनाया और उसीके भीतर बैठकर राजाके साथ ध्यानमग्न होकर ‘राम’ नामका अनवरत जप करने लगे ।

इधर श्रीराम सामन्त को खोजते खोजते उसी स्थलपर आ पहुंचे । नारदजीने उन्हें दुर्ग को दिखाकर उसमें सामन्तके छिपे रहने की बात बतायी ।

तब श्रीरामने दुर्ग को लक्ष्यकर अपने अमोघ बाणोंका प्रयोग करना प्रारम्भ किया । आकाश गूँजने लगा । बाणोंकी सर्र-सर्रकी आवाज दिशाओं का प्रतिध्वनित करने लगी । लेकिन जिस वेगसे श्रीरामके बाण धनुषसे छूटते थे, उसी वेगसे दुर्गको प्रदक्षिणा कर श्रीरामके चरणोंमें वापस लौटकर आ गिरते थे । क्रमश: बाणोंके स्थान को अस्रोने ग्रहण किया । लेकिन सफलता नहीं मिली । श्रीरामके क्रोधका पारावार उमड़ पड़।  स्थितिको बिगड़ते देख देवर्षि नारद श्रीरामके समीप आये और बोले – महाराज ! कृपाकर अरत्रोंका प्रयोग बंद को । फिर ध्यानसे इस ध्वनि को सुनें ।

भगवान् श्रीरामने अरचोंका प्रयोग छंद किया । शान्त वस्तावरणमें ‘राम राम’ की ध्वनि स्पष्ट सुनायी देने लगी, जो दुर्गसे निकल रही थी । श्रीरामने पास जाकर देखा । दुर्गके चीता राम नाम जप रहे ध्यानमग्न मारुति और भयभीत राजा दिखायी पड़े ।

श्रीराम बोले – हनुमान् ! यह क्या मैने जिस व्यक्तिका सिर महर्षि विश्वामित्र को भेट देनेका वचन दिया है, तुम उसकी रक्षा कर रहे हो ,क्या मुझे अनृतवादी बनाना तुम्हारे लिये न्यायसंगत है ?

हनुमान् जी ने भगवान् के चरण पकड़ लिये और बोले-प्रभो ! यह मेरे बसका काम नहीं है । फिर मैं माता की  आज्ञाका तिरस्कार नहीं कर सका । तब मुझे आपके नामके सिवाय कोई रक्षक नहीं दीख पडा।

अब श्रीरामको अनृतवादी होनेसे बचाने का भार नारदजीका था । वे स्वयं आगे आकर बोले – महाराज महर्षि विश्वामित्रने इस सामन्तके सिरको उनके चरणों में  समर्पित करनेकी बात कही है । इसका अर्थ यह नहीं कि इसके सिरको काटकर ही रखा जाय । अत: यह महर्षि विश्वामित्र के चरणोंपर सिर रखकर दण्डवत करे, जिमसे अपके वचनका भी पाला हो जायगा और  राजाकी रक्षा भी होगी ।

देवर्षि नारदजीके सुझावके अनुसार सामन्तने विश्वामित्रके चरणोंपर माथा टेककर साष्टांग प्रणाम किया । महर्षिका क्रोध भी शान्त हुआ ।

धन्य है हनुमान् जी की रामभक्ति ।
धन्य है श्रीराम नाम की महिमा ।

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