भगवती मूलप्रकृति का तुलसीरूप में अवतरण और तुलसी माहात्म्य ।

नवनीरद-श्याम, कोटिकंदर्पलावण्य लीलाधाम, वन मालाविभूषित, पीताम्बरधारी भगवान् श्रीकृष्ण परब्रह्म परमात्मा हैं । सृष्टिके अवसरपर परब्रह्म परमात्मा स्वयं दो रूपो में प्रकट हुए – प्रकृति और पुरुष। परब्रह्म परमात्माके सभी गुण उनकी प्रकृतिमे निहित होते हैं । इन प्रकृति देवी के अंश, कला, कलांश और कलांशांश भेदसे अनेक रूप हैं ।

भगवती तुलसी को प्रकृतिदेवी का प्रधान अंश माना जाता है । ये विष्णुप्रिया हैं और विष्णुको विभूषित किये रहना इनका स्वाभाविक गुण है । भारतवर्षमें वृक्षरूपसे पधारनेवाली ये देवी कल्पवृक्ष स्वरूपा हैं । भगवान् श्रीकृष्णके नित्यधाम गोलोकसे मृत्युलोक मे इनका आगमन मनुष्योंके कल्याणके लिये हुआ है । ब्रह्मवैवर्तपुराण और श्रीमद् देवी भागवत के अनुसार इनके अवतरण की दिव्य लीला-कथा इस प्रकार है –
भगवती तुलसी भगवान् श्रीकृष्णके नित्यधाम गोलोकमे तुलसी नामकी ही गोपी थीं । वे भगवान् श्रीकृष्णकी प्रिया, अनुचरी , अर्धांगिनी और प्रेयसी सखी थी । एक दिन वे भगवान् श्रीकृष्णके साथ रासमण्डलमें हास-विलासमे रत थीं कि रासकी अधिष्ठात्री देवी भगवती राधा वहाँ पहुंच गयीं और उन्होंने क्रोधपूर्वक इन्हें मानव योनिमें उत्पन्न होनेका शाप दे दिया । गोलोकमें ही भगवान् श्रीकृष्णके प्रधान पार्षदों में एक सुदामा नामक गोप भी था । एक दिन उससे श्रीराधाजीकी सखियोंका कुछ तिरस्कार हो गया, अत: श्री राधाजीने उसे दानव योनि में उत्पन्न हौनेका शाप दे दिया ।

कालान्तरमें भगवती तुलसीने भारतवर्षमें राजा धर्मध्वज की पुत्रीके रूपमें जन्म लिया । अतुलनीय रूपराशि की स्वामिनी होनेके कारण यहाँ भी उनका नाम ‘तुलसी’ ही  पड़ा । उधर श्रीकृष्णका ही अंशरूप पार्षद सुदामा परम वैष्णव दानव दम्भके पुत्रके रूपमें उत्पन्न हुआ और उसका नाम शंखचूड हुआ । उसे भगवान् श्रीकृष्ण की कृपासे पूर्वजन्म की स्मृति थी । साथ ही वह दानवेन्द्र श्रीकृष्ण मन्त्र और उन्ही के सर्वमङ्गलमय कवचसे सम्पन्न होनेके कारण त्रैलोक्य विजयी था ।

भगवती तुलसीने भगवान नारायण को पतिरूपमें प्राप्त करनेके लिये बदरी वन में अत्यन्त कठोर तपस्या की ।
तुलसी की घोर तपस्या को देखकर लोकपितामह ब्रह्माजीने उसे वर देते हुए कहा – तुलसी ! भगवान् श्रीकृष्णके अंगसे प्रकट सुदामा नामक गोप जो उनका साक्षात् अंश ही है, राधाके शापसे शंखचूड नामसे दनुकुलमे उत्पन्न हुआ है । इस जन्म में वह श्रीकृष्ण अंश तुम्हारा पति होगा । इसके बाद वे शान्तस्वरूप नारायण तुम्हें पतिरूपसे प्राप्त होंगे । यही बातें ब्रह्माजीने शंखचूड़ से भी कहीं और उन दोनोंका गान्धर्व विवाह करा दिया ।

परम सुंदरी तुलसी के साथ आनंदमय यौवन बिताते हुए प्रतापी राजाधिराज शंखचूडने दीर्घकालतक राज्य किया । देवता, दानव, असुर, गन्धर्व, किन्नर और राक्षस सभी उसके वशवर्ती थे । अधिकार छीन जानेके कारण देवताओ की स्थिति भिक्षुकों जैसी हो गयी थी । वे ब्रह्माजीके पास जाकर अत्यन्त विलाप करने लगे । उनकी दयनीय दशा देखकर ब्रह्माजी उन सबको लेकर भगवान् शंकर के पास गये । शिवजी उनकी बातें सुनकर ब्रह्माजी सहित वैकुंठमें श्रीहरिके पास गये । वहाँ पहुँचकर ब्रह्माजीने बडी विनम्रतासे सम्पूर्ण परिस्थिति स्पष्ट की,

जिसे सुनकर भगवान् श्रीहरिने कहा- ब्रह्मन्! शंखचूड पूर्वजन्म में सुदामा नामक गोप था, वह मेरा प्रधान पार्षद था, श्रीराधाजीके शाप से उसे दानवयोनि की प्राप्ति हुई है । वह अपने कंठ में मेरा सर्वमङ्गल नामक कवच धारण किये हुए है, उसके प्रभावसे यह त्रैलोक्य विज़यी है । उसकी पत्नी तुलसी भी पूर्वज़न्ममे गोलोकमें गोपी थी और राधाजीके शाप से मृत्युलोकमें अवतरित हुई है । वह परम पतिव्रता है, अत: उसके पातिव्रत के प्रभावसे भी शंखचूडको कोई मार नहीं सकता। परंतु तुलसी मेरी नित्यप्रिया है, अत: सर्वात्मरूप मैं उसके लौकिक सतीत्व को भंग करूँगा और ब्रह्मणवेश से शंखचूडसे कवच माँग लूँगा, तब भगवान् शंकर मेरे दिये त्रिशूलके प्रहार से उसका वध कर सकेंगे । तदनन्तर वह शंखचूड भी अपनी दानवयोनि को छोडकर मेरे गोलोकधाम मे पुुन: चला जायगा । तुलसी भी शरीर त्यागकर पुन: गोलोेकमें मेरी नित्यप्रियाके रूपमें प्रतिष्टित होगी ।

श्रीहरि का यह कथन सुनकर भगवान् शंकर शूल लेकर ब्रह्माजी और देवताओंसहित श्रीहरिको प्रणाम कर वापस चले आये । तब देवताओं ने शंखचूडको युद्धके लिये ललकारा। श्रीहरिने अपने कथनानुसार वृद्ध ब्राहाणका वेश धारण कर शंखचूड से अपना सर्बमङ्गलकारी कृष्ण कवच माँग लिया और शंखचूड का स्वरूप धारण कर तुलसीसे हास-विलास किया, जिससे उसका सतीत्व भंग हो गया । उसी समय शंकरजीने श्रीहरिके दिये त्रिशूलका प्रहार कर शंखचूडका वध कर दिया ।

इधर जब तुलसी को श्रीहरिद्वारा अपने सतीत्व भंग और शंखचूड के निधन की जानकारी हुई तो उसने श्रीहरि को शाप देते हुए कहा – हे नाथ ! शंखचूड आपका भक्त था, आपने अपने भक्त को मरवा डाला । आप अत्यन्त पाषाणहृदय हैं, अत: आप पाषाण हो जायँ । भगवान् श्रीहरिने उसके शाप को स्वीकार करते हुए कहा-हे देवि ! शंखचूड मेरे नित्यधाम गोलोकमें गया है; अब तुम भी यह शरीर त्यागकर गोलोकको जाओ । तुम्हारा यह शरीर नदीरूपमे परिणत होकर गण्डकी  के नामसे प्रसिद्ध होगा । मैं तुम्हरि शाप को सत्य करनेके लिये भारतवर्षमें पाषाण (शालग्राम) बनकर तुम्हारे (गण्डकी नदीके) तटपर ही वास करूँगा । गण्डकी अत्यन्त पुण्यमयी नदी होगी और मेरे शालग्रामस्वरूप के

जलका पान करनेवाला समस्त पापोंसे निर्मुक्त होकर
विष्णुलोक को चला जायगा । हे देवि! तुम्हारे केशकलाप तुलसी नामक पवित्र वृक्ष होंगे । त्रैलोक्यमें देवपूजामें काम आनेवाले जितने भी पत्र-षुष्प हैं, उनमें तुलसी प्रधान मानी जायगी।

इस प्रकार लीलामय प्रभु भक्तों के हितके लिये पाषाण (शालग्राम) और उनकी नित्यप्रिया तुलसी तुल्सिवृृक्षके रूपमें भारतवर्षमे अवतरित हुई ।

तुलसीके पत्तेसे टपकता हुआ जल जो अपने सिरपर धारण करता है, उसे गंगास्नान और दस गोदानका फल प्राप्त होता है । जिसने तुलसीदलके द्वारा सम्पूर्ण श्नद्धाके साथ प्रतिदिन भगवान् विष्णुका पूजन किया है, उसने दान, होम, यज्ञ और व्रत आदि सब पूर्ण कर लिये । तुलसीदलसे भगवान की पूजा कर लेनेपर कान्ति, सुख, भोग-सामग्री, यश, लक्ष्मी, श्रेष्ठ कुल, सुशीला पत्नी, पुत्र, कन्या, धन, आरोग्य, ज्ञान, विज्ञान, वेद, वेदांग, शास्त्र, पुराण, तन्त्र और संहिता- सब करतलगत हो जाता है । तुलसीके मूल की मृत्तिका जिसके अंग में लगी हो, सैकडों पापोंसे युक्त होनेपर भी उसे यमराज देखने में समर्थ नहीं होते ।

जैसे पुण्यसलिला गंगा मुक्ति प्रदान करनेवाली हैं, उसी प्रकार ये तुलसी भी कल्याण करनेवाली हैं । यदि मंजरीयुक्त तुलसीपत्रों के द्वारा भगवान् श्रीविष्णुकी पूजा की जाय तो उसके पुण्यफलका वर्णन करना असम्भव है। जहाँ तुलसीका वन है, यहीं भगवान् श्रीकृष्ण की समीपता है तथा वहीं ब्रह्मा और लक्ष्मी जी सम्पूर्ण देवताओंके साथ विराजमान हैं । इसलिये अपने निकटवर्ती स्थान में तुलसी देवी को रोपकर उनकी पूजा करनी चाहिये। तुलसी के निकट जो स्तोत्र मन्त्र आदिका जप किया जाता है, वह सब अनंत गुना फ़ल देनेवाला होता है । जो तुलसी की मञ्जरीसे विष्णु तथा शिवका पूजन करते हैं, वे निसंदेह मुक्ति पाते हैं, जो लोग तुलसी काष्ठका चन्दन धारण करते हैं , उनकी देह को पाप स्पर्श नहीं करते ।

प्रेत, पिशाच, कूष्माण्ड, ब्रह्मराक्षस, भूत और दैत्य
आदि सब तुलसी वृक्षसे दूर भागते हैं । ब्रह्महत्यादि पाप और छोटे विचारसे उत्पन्न होनेवाले रोग -ये सब तुलसी वृक्षके समीप नष्ट हो जाते हैं । जिसने भगवान् की पुजाके लिये पृथ्वीपर तुलसीका बगीचा लगा रखा है, उसने सौ यज्ञोंका अनुष्ठान पूर्ण कर लिया । जो भी भगवान् की  प्रतिमाओं तथा शालग्राम शिलाओ पर चढे हुए तुलसीदल को प्रसादके रूपमें ग्रहण करता है, वह विष्णुके सायुज्य को प्राप्त होता है ।

जो श्रीहरिंकी पूजा करके उन्हें निवेदन किये हुए तुलसीदल को अपने मस्तकपर धारण करता है, वह पापसे शुद्ध होकर स्वर्गलोक को प्राप्त होता है । कलियुगमें तुलसीका पूजन, कीर्तन, ध्यान, रोपण और धारण करनेसे वे पाप को जला देती हैं तथा स्वर्ग और मोक्ष प्रदान करती हैं । श्राद्ध हैं और यज्ञ आदि क्रार्योंमें तुलसीका एक पत्ता भी महान् पुण्य प्रदान करनेवाला है । जिसने तुलसी की शाखा तथा कोमल पत्तियों से भगवान् विष्णुकी पूजा की है, उसका पुनर्जन्म नहीं होता । कोमल तुलसीदलो के द्वारा प्रतिदिन श्रीहरि की पूजा करके मनुष्य अपनी सैकडों और हजारों पीढियों को पवित्र कर सकता है । जो तुलसीके पूजन आदी का दूसरों को उपदेश देता है और स्वयं भी आचरण करता है, वह भगवान् श्रीलक्ष्मी पति के परमधाम को प्राप्त होता है । जिसने तुलसी की सेवा की है, उसने गुरु, ब्राह्मण, तीर्थ और देवता- सबकी भलीभाँति सेवा कर ली है । तुलसीका नामोच्चारण करनेपर भगवत् श्री विष्णु प्रसन्न होते हैं । जिसके दर्शनमात्रसे करोडों गोदानका फल प्राप्त होता है, उस तुलसीका पूजन और वन्दन लोगों को अवश्य करना चाहिये । भगवान् विष्णु के नेवेद्यमें तुलसीपत्र अवश्य होना चाहिये ।

भगवान् विष्णु, एकादशीव्रत, गंगा, तुलसी, ब्राह्मण और गो माताये- ये मुक्तिप्रद हैं ।
ब्रह्मवैवर्तपुराण (प्रकृ २२ । ३३-३४) में बताया गया है कि तुलसी पूजनोपरान्त निम्नलिखित नामाष्टकका पाठ करनेसे अश्वमेधयज्ञके फलकी प्राप्ति होती है

वृन्दा वृन्दावनी विश्नपूजिता विश्वपावनी ।
पुष्पसारा नन्दिनी च तुलसी कृष्णजीवनी ।
एतन्नामाष्टकं चैव स्तोत्रं नामार्थसंयुतम्।
य: पठेत्तां च सम्पूज्य सोअश्वमेधफलं लभेत्।।

तुलसी! तुम अमृतसे उत्पन्न हो और केशव को सदा ही प्रिय हो । कल्याणि! मैं भगवान् की पूजाके लिये तुम्हरे पत्तों को चुनता हूँ । तुम मेरे लिये वरदायिनी बनो । तुम्हारे अंगो से उत्पन्न होनेवाले पत्रों और मञ्जरियोंद्वारा मैं सदा ही जिस प्रकार श्री हरिका पूजन कर सकूँ, वैसा उपाय करो । पवित्राङ्गि तुलसी ! तुम कलिमलका नाश करनेवाली हो – इस भावके मंत्रो से जो तुलसीदल को चुनकर उनसे भगवान् वासुदेवका पूजन करता है, उसकी पुजाका करोड़ गुना फल होता है ।

श्री महाभागवत पुराण में श्रीनारद और श्री शंकर संवाद में अध्याय ७९ में नारद मुनि की विनती पर भगवान् शिव ने तुलसी का माहात्म्य कहा है

तुलसी का माहात्म्य संक्षेप में सुनिये, जिसे सुनकर मनुष्य सभी पापो से मुक्त हो जाता है । सभी लेगो के रक्षक, विश्वात्मा, विश्वपालक भगवान् पुरुषोत्तम ही तुलसीवृक्ष के रूपमें प्रतिष्टित हैं । दर्शन, स्पर्श, नाम-संकीर्तन, धारण या प्रदान करने से भी तुलसी मनुष्योंके सभी पापोंका सर्वदा नाश करती हैं । प्रात: उठकर स्नान करके जो व्यक्ति तुलसीवृक्ष का दर्शन करता है हुसे सभी तीर्थो के संसर्ग का फल नि:संदेह प्राप्त हो जाता है । 
श्री पुरुषोत्तम क्षेत्रमें भगवान् गदाधर के दर्शन करने से जो पुण्य प्राप्त होता है, वही तुलसीवृक्ष के दर्शन करने से प्राप्त होता है । मुने! वही दिन शुभ कहा गया है, जिस दिन तुलसीवृक्ष का दर्शन होता है और तुलसी वृक्षका दर्शन करनेवाले व्यक्ति को कहीं से भी विपत्ति नहीं आती । मुनिश्रेष्ठ ! जन्म-जन्मान्तर का किया अत्यन्त निन्दित पाप भी तुलसीवृक्ष के दर्तनमात्र से नष्ट को जाता है । पवित्र अथवा अपवित्र स्थिति में जो व्यक्ति तुलसीपत्र का सेवन कर लेता है, वह सभी पापों से मुक्त होकर उसी क्षण शुद्ध हो जाता है तथा अन्तमें देवो के लिये भी दुर्लभ श्री विृष्णुपद को प्राप्त करता है । तुलसीका स्पर्श करना ही मुक्ति है और वही परम व्रत है ।
मुनिश्रेष्ठ  ! जिस व्यक्ति ने तुलसीवृक्ष की प्रदक्षिणा कर ली उसने साक्षात् भगवान विष्णु की प्रदक्षिणा कर ली, इसमें कोई संदेह नहीं है । जो मानवश्रेष्ठ भक्तिपूर्वक तुलसी को प्रणाम करता है, वह भगवान् विष्णु के सायुज्य को प्राप्त करता है और पुन: पृथ्वीपर उसका जन्म नहीं होता । मुनिश्रेष्ठ ! जहाँ तुलसीकानन है, वहाँ लक्ष्मी और सरस्वती के साथ साक्षात् भगवान् जनार्दन प्रसन्नतापूर्वक विराजमान रहते हैं । जहाँ सर्वदेवमय ज़गन्नाथ भगवान् विष्णु रहते हैं, वहीं रुद्राक्ष के सहित मैं (शिव) तथा पितामह ब्रह्मा सावित्री के साथ रहते हैं ।
मुने ! इसलिये वह उत्तम स्थान देवताओंके लिये भी दुर्लभ है, उस (तुलसीके)श्रेष्ठ स्थान में जो जाता है, वह भगवान् विष्णु के वैकुण्ठधाम को प्राप्त करता है । जो व्यक्ति स्नान करके उस पापनाशक क्षेत्रका मार्जन करता है, वह भी पापसे मुक्त होकर स्वर्गलोक में जाता है ।  मुनिश्रेष्ठ जो व्यक्ति तुलसीवृक्ष के मूल की मिट्टीसे ललाट, कंठ, दोनों कान, दोनों हाथ, स्तन, मस्तक, पीठ, दोनों बगल तथा नाभिपर उत्तम तिलक लगाता है, उस पुण्यात्मा को श्रेष्ठ वैष्णव समझना चाहिये ।जो व्यक्ति तुलसी मञ्जरीसे भगवान् विष्णुका पूजन करता है, उसे भी समी पापोंसे रहित श्रेष्ठ वैष्णव कहा गया है ।
जो व्यक्ति वैशाख, कार्तिक तथा माघमास में प्रात:काल स्नानकर परमात्मा सुरेश्वर भगवान् विष्णुको विधिविधान से तुलसीपत्र अर्पित करता है, उसका पुण्यफल अनन्त कहा गया है ।  दस हजार गाये दान करने तथा सैकडों वाजपेय यज्ञ करने से जो फल प्राप्त होता है, वही फल कार्तिकमासमें तुलसीके पत्तो तथा तुलसीमञ्जरी से भगवान् विष्णु का पूजन करने से प्राप्त होता है ।  जो तुलसी कानन में भगवत् विष्णुकी पूजा करता है, वह महाक्षेत्र [ भगवती कामाख्याके शक्तिपीठ] में की गयी पूजाका फल प्रात करता है । बुद्धिमान व्यक्ति को तुलसी पत्ररहित क्रोईं पुण्यकार्य नहीं करना चाहिये । यदि कोई करता है तो उस कार्य का सम्पूर्ण फल उसे नहीं प्राप्त होता । 
तुलसीपत्र से रहित संध्या वन्दन कालातीत संध्या की रह निष्कल हो जाता है । तुलसी कानन के मध्य में तृणों अथवा वल्कलवृन्दो से भी भगवान विष्णुके मन्दिर का निर्माण कर जो उसमें भगवान् विष्णु को स्थापित करता है तथा उनकी भक्ति में निरन्तर लगा रहता है ,वह भगवान् विष्णुके साम्य (सारूप्यमुक्ति) क्रो प्राप्त करता है । जो व्यक्ति तुलसीवृक्ष को भगवान् विष्णुके रूपमें समझकर तीन प्रकार ( शरीर, मन और वाणी) से उन्हें प्रणाम करता है, वह भगवान्  विष्णुके साम्य (सारूप्यमुक्ति) को प्राप्त करता है । सुरासुरजगदगुरों ! देवदेवेश । आपको नमस्कार है । अनघ !इस भयावह संसार से मेरी रक्षा कीजिये आपको नमस्कार है । 
महामते ! जो व्यक्ति बुद्धिपूर्वक तीन बार अथवा सात बार प्रदक्षिणा करके संसारसे उद्धार करनेवाली भगवती तुलसी को इस मन्त्रसे भक्तिपूर्वक प्रणाम करता है वह घोर संकटसे मुक्त हो जाता है । तीनों लोकोंके उद्धारमें तत्पर शिवे!  जिस तरह साक्षात् गंगा सभी नदियों में श्रेष्ठ हैं उसी तरह लोको को पवित्र करने के लिये वृक्षोंमें तुल्सिस्वरूपिणी  (आप) श्रेष्ठ हैं ।  तुलसी ! आप ब्रह्मा, विष्णु आदि प्रमुख देवताओंके द्वारा पूर्व में पूजित हुई हैं, आप विश्व को पवित्र करनेके हेतु पृथ्वीपर उत्पन्न हुई हैं, विश्व की एकमात्र वन्दनीया आपको मै नमस्कार करता हूँ आप प्रसन्न  हों ।
मुनिश्रेष्ठ ! इस प्रकार जो व्यक्ति तुलसी को प्रतिदिन प्रणाम करता है, वह जहाँ-कहीं भी स्थित है, भगवती तुलसी उसकी सभी कामनाओ को पूर्ण करती हैं । भगवती तुलसी सभी देवताओ की परम प्रसन्नता को बढानेवाली हैं । जहाँ तुलसीवन होता है वहाँ देवताओ का वास होता है और पितृगण परम प्रीतिपूर्वक तुलसीवन में निवास करते है । पितृ- देवार्चन आदि कार्यो में तुलसीपत्र अवश्य प्रदान करना चाहिये । इन कार्योंमें तुलसीपत्र न देनेपर मनुष्य उस कार्य का सम्यक् फल प्राप्त नहीं पाते ।
महामते ! लोकमुक्तिदा भगवती तुलसी को त्रिलोकीनाथ भगवान् विष्णु, सभी देबी-देवताओं और विशेषरूपसे पितृगणों के लिये परम प्रसन्नता देनेवाली समझना चाहिये । इसलिये देव तथा पितृकार्यो में तुलसी-पत्र अवश्य समर्पित करना चाहिये । जहाँ तुलसी वृक्ष स्थित है, वहाँ सभी तीर्थो के  साथ साक्षात् भगवती गंगा सदा निवास करती हैं ।

मुनिश्रेष्ठ ! इसलिये तुलसी वृक्षके निकट देहत्याग करने वाले मनुष्यों को वहीं फल प्राप्त होता है, जो गंगा  में देहत्याग करने का होता है। यदि अत्यन्त भाग्यवशात् आँवले का वृक्ष भी वहाँपर स्थित हो तो वह स्थान वहुत अधिक पुण्य प्रदान करनेवाला समझना चाहिये । महामते ! देहधारियों का यदि उस स्थलपर अज्ञान से भी देहत्याग हो जाता है तो उनकी मुक्ति हो जाती है, यह बात सत्य है, सत्य है, इसमें संशय नहीं है ।

जहॉ इन दोनों (तुलसी और आँवला) -के निकट बिल्ववृक्ष भी है, वहस्थान साक्षात् वाराणसी के समान महातीर्थस्वरूप है । उस स्थानपर भगवान् शंकर, देवी भगवती तथा भगवान् विष्णु का भक्तिभावसे किया गया पूजन महापातकोंका नाश करनेवाला तथा बहुपुण्यप्रदायक जानना चाहिये । जो व्यक्ति वहाँ एक बिल्वपत्र भी भगवान् शंकर को अर्पण कर देता है, वह साक्षात भगवान् शिवके दिव्य लोक को प्राप्त करता है ।

महामते ! उसी प्रकार तुलसीपत्र तथा धात्रीपत्र ( आंवले के पत्ते ) द्वारा भगवान् विष्णु की पूजा करने से वह व्यक्ति भगवान् विष्णु की सायुज्यमुक्ति को प्राप्त कर लेता है, यह सत्य है ।जो व्यक्ति वहाँ भगवान् विष्णु, भगवत शिव अथवा देवी भगवती को एक बिल्वपत्र अर्पण करता है, वह भी पापसे मुक्त हो जाता है ।  मनुष्य वहाँ प्राण त्यागकर उस क्षेत्र के प्रभाव से मोक्ष प्राप्त करता है तथा उसका पुनर्जन्म नहीं होता । मुनिश्रेष्ठ ! इस प्रकार मैंने इनका माहात्म्य संक्षेप में आपसे कहा  । जो मनुष्य इस माहात्म्य को सुनता है, वह भी स्वर्गलोक प्राप्त करता है ।
तुलसीपत्र से रहित संध्या वन्दन कालातीत संध्या की रह निष्कल हो जाता है । तुलसी कानन के मध्य में तृणों अथवा वल्कलवृन्दो से भी भगवान विष्णुके मन्दिर का निर्माण कर जो उसमें भगवान् विष्णु को स्थापित करता है तथा उनकी भक्ति में निरन्तर लगा रहता है ,वह भगवान् विष्णुके साम्य (सारूप्यमुक्ति) क्रो प्राप्त करता है । जो व्यक्ति तुलसीवृक्ष को भगवान् विष्णुके रूपमें समझकर तीन प्रकार ( शरीर, मन और वाणी) से उन्हें प्रणाम करता है, वह भगवान्  विष्णुके साम्य (सारूप्यमुक्ति) को प्राप्त करता है । सुरासुरजगदगुरों ! देवदेवेश । आपको नमस्कार है । अनघ । इस भयावह संसार से मेरी रक्षा कीजिये आपको नमस्कार है । 
महामते ! जो व्यक्ति बुद्धिपूर्वक तीन बार अथवा सात बार प्रदक्षिणा करके संसारसे उद्धार करनेवाली भगवती तुलसी को इस मन्त्रसे भक्तिपूर्वक प्रणाम करता है वह घोर संकटसे मुक्त हो जाता है । तीनों लोकोंके उद्धारमें तत्पर शिवे!  जिस तरह साक्षात् गंगा सभी नदियों में श्रेष्ठ हैं उसी तरह लोको को पवित्र करने के लिये वृक्षो में तुलसी स्वरूपिणी (आप) श्रेष्ठ हैं ।  तुलसी ! आप ब्रह्मा, विष्णु आदि प्रमुख देवताओंके द्वारा पूर्व में पूजित हुई हैं, आप विश्व को पवित्र करनेके हेतु पृथ्वीपर उत्पन्न हुई हैं, विश्व की एकमात्र वन्दनीया आपको मै नमस्कार करता हूँ आप प्रसन्न  हों ।
मुनिश्रेष्ठ ! इस प्रकार जो व्यक्ति तुलसी को प्रतिदिन प्रणाम करता है, वह जहाँ-कहीं भी स्थित है, भगवती तुलसी उसकी सभी कामनाओ को पूर्ण करती हैं । भगवती तुलसी सभी देवताओ की परम प्रसन्नता को बढानेवाली हैं । जहाँ तुलसीवन होता है वहाँ देवताओ का वास होता है और पितृगण परम प्रीतिपूर्वक तुलसीवन में निवास करते है । 
पितृ- देवार्चन आदि कार्यो में तुलसीपत्र अवश्य प्रदान करना चाहिये । इन कार्योंमें तुलसीपत्र न देनेपर मनुष्य उस कार्य का सम्यक् फल प्राप्त नहीं काते । महामते ! लोकमुक्तिदा भगवती तुलसी को त्रिलोकीनाथ भगवान् विष्णु, सभी देबी-देवताओं और विशेषरूपसे पितृगणों के लिये परम प्रसन्नता देनेवाली समझना चाहिये । इसलिये देव तथा पितृकार्यो में तुलसी-पत्र अवश्य समर्पित करना चाहिये । जहाँ तुलसी वृक्ष स्थित है, वहाँ सभी तीर्थो के  साथ साक्षात् भगवती गंगा सदा निवास करती हैं । 
मुनिश्रेष्ठ ! इसलिये तुलसी वृक्षके निकट देहत्याग करने वाले मनुष्यों को वहीं फल प्राप्त होता है, जो गंगा  में देहत्याग करने का होता है। यदि अत्यन्त भाग्यवशात् आँवले का वृक्ष भी वहाँपर स्थित हो तो वह स्थान वहुत अधिक पुण्य प्रदान करनेवाला समझना चाहिये । महामते ! देहधारियों का यदि उस स्थलपर अज्ञान से भी देहत्याग हो जाता है तो उनकी मुक्ति हो जाती है, यह बात सत्य है, सत्य है, इसमें संशय नहीं है । 
जहां इन दोनों (तुलसी और आँवला) -के निकट बिल्ववृक्ष भी है, वहस्थान साक्षात् वाराणसी के समान महातीर्थस्वरूप है । उस स्थानपर भगवान् शंकर, देवी भगवती तथा भगवान् विष्णु का भक्तिभावसे किया गया पूजन महापातकोंका नाश करनेवाला तथा बहुपुण्यप्रदायक जानना चाहिये । जो व्यक्ति वहाँ एक बिल्वपत्र भी भगवान् शंकर को अर्पण कर देता है ,वह साक्षात भगवान् शिवके दिव्य लोक को प्राप्त करता है ।
महामते ! उसी प्रकार तुलसीपत्र तथा धात्रीपत्र ( आंवले के पत्ते ) द्वारा भगवान् विष्णु की पूजा करने से वह व्यक्ति भगवान् विष्णु की सायुज्यमुक्ति को प्राप्त कर लेता है, यह सत्य है ।जो व्यक्ति वहाँ भगवान् विष्णु, भगवत शिव अथवा देवी भगवती को एक बिल्वपत्र अर्पण करता है, वह भी पापसे मुक्त हो जाता है ।  मनुष्य वहाँ प्राण त्यागकर उस क्षेत्र के प्रभाव से मोक्ष प्राप्त करता है तथा उसका पुनर्जन्म नहीं होता । मुनिश्रेष्ठ ! इस प्रकार मैंने इनका माहात्म्य संक्षेप में आपसे कहा  । जो मनुष्य इस माहात्म्य को सुनता है, वह भी स्वर्गलोक प्राप्त करता है ।
श्री गर्ग संहिता कइ १६ वे अध्याय में श्री तुलसी माहात्म्य का वर्णन इस प्रकार है:
श्री कृष्ण को प्राप्त करने की इच्छा से श्री राधा ने धर्म वेत्ताओं में श्रेष्ठ अपनी सखी श्री चंद्रानना सखी से कहा – सखी ! तुम श्रीकृष्ण की प्रसन्नता के लिये किसी देवता की ऐसी पूजा बताओ, जो परम सौभाग्यवर्द्धक, महान पुण्यजनक तथा मनोवांछित वस्तु देने वाली हो। भद्रे ! महामते ! तुमने गर्गाचार्य जी के मुख से शास्त्र चर्चा सुनी है। इसलिये तुम मुझे कोई व्रत या पूजन बताओ।

श्री नारद जी कहते हैं- राजन ! श्रीराधा की बात सुनकर समस्त सखियों में श्रेष्ठ चन्द्रानना ने अपने हृदय में एक क्षण तक कुछ विचार किया फिर इस प्रकार उत्तर दिया। चन्द्रानना बोलीं- राधे ! परम सौभाग्यदायक, महान पुण्यजनक तथा श्रीकृष्ण की भी प्राप्ति के लिये वरदायक व्रत है- तुलसी के सेवा। मेरी राय में तुलसी-सेवन का ही नियम तुम्हें लेना चाहिये; क्योंकि तुलसी का यदि स्पर्श अथवा ध्यान, नाम-कीर्तन, स्तवन, आरोपण, सेचन और तुलसी दल से ही नित्य पूजन किया जाय तो वह महान पुण्यप्रद होता है। 

शुभे ! जो प्रतिदिन तुलसी की नौ प्रकार से भक्ति करते हैं, वे कोटि सहस्त्र युगों तक अपने उस सुकृत्य का उत्तम फल भोगते हैं।  मनुष्यों की लगायी हुई तुलसी जब तक शाखा, प्रशाखा, बीज, पुष्प और सुन्दर दलों के साथ पृथ्वी पर बढ़ती रहती है, तब तक उनके वंश में जो-जो जन्म लेते हैं, वे सब उन आरोपण करने वाले मनुष्यों के साथ दो हजार कल्पों तक श्री हरि के धाम में निवास करते हैं। राधिके ! सम्पूर्ण पत्रों और पुष्पों को भगवान के चरणों में चढ़ाने से जो फल मिलता है, वह सदा एकमात्र तुलसी दलों के अर्पण से प्राप्त हो जाता है। जो मनुष्य तुलसी दलों से श्री हरि की पूजा करता है, वह जल में पद्म पत्र की भाँति पाप से कभी लिप्त नहीं होता। सौ भार सुवर्ण तथा चार सौ भार रजत के दान का जो फल है, वही तुलसी वन के पालन से मनुष्य को प्राप्त हो जाता है।

 राधे! जिसके घर में तुलसी का वन या बगीचा होता है, उसका वह घर तीर्थरूप है। वहाँ यमराज के दूत कभी नहीं जाते। जो श्रेष्ठ मानव सर्वपापहारी, पुण्यजनक तथा मनोवांछित वस्तु देने वाले तुलसी वन का रोपण करते हैं, वे कभी सूर्यपुत्र यम को नहीं देखते। रोपण, पालन, सेचन, दर्शन और स्पर्श करने से तुलसी मनुष्यों के मन, वाणी और शरीर द्वारा संचित समस्त पापों को दग्ध कर देती है। पुष्कर आदि तीर्थ, गंगा आदि नदियाँ तथा वासुदेव आदि देवता तुलसी दल में सदा निवास करते हैं। जो तुलसी की मंजरी सिर पर रखकर प्राण-त्याग करता है, वह सैकड़ों पापों से युक्त क्यों न हो, यमराज उसकी ओर देख भी नहीं सकते। 

जो मनुष्य तुलसी-काष्ठ का घिसा चन्दन लगाता है, उसके शरीर को यहाँ क्रियमाण पाप भी नहीं छूता। शुभे ! जहाँ-जहाँ तुलसीवन की छाया हो, वहाँ-वहाँ पितरों का श्राद्ध करना चाहिये। वहाँ दिया हुआ श्राद्ध-सम्बन्धी दान अक्षय होता है। सखी! आदि देव चतुर्भुज ब्रह्मा जी भी शार्ग्नधंवा श्री हरि के माहात्म्य की भाँति तुलसी के माहात्म्य को भी कहने में समर्थ नहीं हैं। अत: गोप-नन्दिनि ! तुम भी प्रतिदिन तुलसी का सेवन करो, जिससे श्रीकृष्ण सदा ही तुम्हारे वश में रहें। 

श्री नारद जी कहते हैं- नरेश्वर ! इस प्रकार चन्द्रानना की कही हुई बात सुनकर रासेश्वरी श्री राधा ने साक्षात श्री हरि को संतुष्ट करने वाली तुलसी-सेवन का व्रत आरम्भ किया। केतकी वन में सौ हाथ गोलाकार भूमि पर बहुत ऊँचा और अत्यंत मनोहर श्री तुलसी का मन्दिर बनवाया, जिसकी दीवार सोने से जड़ी थी और किनारे-किनारे पद्मरागमणि लगी थी। वह सुन्दर मन्दिर पन्ने, हीरे और मोतियों के परकोटे से अत्यंत सुशोभित था तथा उसके चारों ओर परिक्रमा के लिये गली बनायी गयी थी, जिसकी भूमि चिंतामणि से मण्डित थी। बहुत ऊँचा तोरण (मुख्य द्वार या गोपुर) उस मन्दिर की शोभा बढ़ाता था। वहाँ सुवर्णमय ध्वज दण्‍ड से युक्त पताका फहरा रही थी। चारों ओर ताने हुए सुनहले वितानों (चँदोवों) के कारण वह तुलसी-मन्दिर वैजयंती पताका से युक्त इन्द्र भवन-सा देदीप्यमान था।

ऐसे तुलसी मन्दिर के मध्य भाग में हरे पल्ल्वों से सुशोभित तुलसी की स्थापना करके श्रीराधा ने अभिजित मुहूर्त में उनकी सेवा प्रारम्भ की। श्री गर्ग जी को बुलाकर उनकी बतायी हुई विधि से सती श्रीराधा ने बड़े भक्ति भाव से श्रीकृष्ण को संतुष्ठ करने के लिये आश्विन शुक्ला पूर्णिमा से लेकर चैत्र पूर्णिमा तक तुलसी-सेवन-व्रत का अनुष्ठान किया । व्रत आरम्भ करके उन्होंने प्रतिमास पृथक-पृथक रस से तुलसी को सींचा। कार्तिक में दूध से, मार्गशीर्ष में ईख के रस से, पौष में द्राक्षा रस से, माघ में बारह मासी आम के रस से, फाल्गुन मास में अनेक वस्तुओं से मिश्रित मिश्री के रस से और चैत्र मास में पंचामृत से उसका सेचन किया। नरेश्वर ! इस प्रकार व्रत पूरा करके वृषभानु नन्दिनी श्रीराधा ने गर्ग जी की बतायी हुई विधि से वैशाख कृष्णा प्रतिपदा के दिन उध्यापन का उत्सव किया।

उन्होंने दो लाख ब्राह्मणों को छप्पन भोगों से तृप्त करके वस्त्र और आभूषणों के साथ दक्षिणा दी। विदेहराज ! मोटे-मोटे दिव्य मोतियों का एक लाख भार और सुवर्ण का एक कोटि भार श्री गर्गाचार्य जी को दिया। उस समय आकाश में देवताओं की दुन्दुभियाँ बजने लगीं, अप्सराओं का नृत्य होने लगा और देवता लोग उस तुलसी-मन्दिर के ऊपर दिव्य पुष्पों की वर्षा करने लगे। उसी समय सुवर्णमय सिन्हासन पर विराजमान हरिप्रिया तुलसी देवी प्रकट हुई। उनके चार भुजाएँ थीं। कमल दल के समान विशाल नेत्र थे। सोलह वर्षकी-सी अवस्था एवं श्याम कांति थी। मस्तक पर हेममय किरीट प्रकाशित था और कानों में कांचनमय कुण्‍डल झलमला रहे थे। पीताम्बर से आच्छादित केशों की बँधी हुई नागिन-जैसी वेणी में वैजयंती माला धारण किये, गरूड़ से उतर कर तुलसी देवी ने रंगवल्ली- जैसी श्रीराधा को अपनी भुजाओं से अंक में भर लिया और उनके मुख चन्द्र का चुम्बन किया।

तुलसी बोलीं- कलावती-कुमारी राधे ! मैं तुम्हारे भक्ति-भाव से वशीभूत हो निरंतर प्रसन्न हूँ। भामिनि ! तुमने केवल लोकसंग्रह की भावना से इस सर्वतोमुखी व्रत का अनुष्ठान किया है (वास्तव में तो तुम पूर्णकाम हो)। यहाँ इन्द्रिय, मन, बुद्धि और चित्त द्वारा जो-जो मनोरथ तुमने किया है, वह सब तुम्हारे सम्मुख सफल हो। पति सदा तुम्हारे अनुकूल हों और इसी प्रकार कीर्तिनीय परम सौभाग्य बना रहे। श्री नारद जी कहते हैं- राजन ! यों कहती हुई हरिप्रिया तुलसी को प्रणाम करके वृषभानु नन्दिनी राधा ने उनसे कहा- ‘देवि ! गोविन्द के युगल चरणारविन्दों में मेरी अहैतु की भक्ति बनी रहे।’ 

मैथिलीराज शिरोमणे ! तब हरिप्रिया तुलसी ‘तथास्तु’ कहकर अंतर्धान हो गयीं। तब से वृषभानु नन्दिनी राधा अपने नगर में प्रसन्नचित्त रहने लगीं। राजन ! इस पृथ्वी पर जो मनुष्य भक्तिपरायण हो श्री राधिका के इस विचित्र उपाख्यान को सुनता है, वह मन-ही-मन त्रिवर्ग-सुख का अनुभव करके अंत में भगवान को पाकर कृतकृत्य हो जाता है । 

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