सुंदर कथा २६ (श्री भक्तमाल – श्री विदुर जी) Sri Bhaktamal- Sri Vidur ji भाग ३

5. विदुरने धुतराष्ट्र को, दुर्योधन को बहुत समझाया,परंतु उनकी कोई बात उन लोगो ने नहीं सुनी । अन्तमें पाण्डवो का सन्धि सन्देश लेकर श्री कृष्ण के आनेकी बात सुनी गयी । धृतराष्ट्र ने विदुरसे कहा – श्रीकृष्ण आनेवाले हैं, उनके स्वागत के लिये मै बहुत से रथ, घोड़े, हाथी, रत्न, सोनेके रथ आदि दूंगा। सब लोग उनका स्वागत करेंगेऔर नगर की सब प्रजा उनका सम्मान करेगी। उनके ठहरनेके लिये सबसे सुन्दर स्थान दिया जायगा और हमारे पास जो सर्वोत्तम सामग्री है वही उन्हें भेट की जायगी । विदुरने कहा – महाराज ! आप बड़े बुद्धिमान् हैं । आप सभी बाते जानते हैं । आपसे क्या कहूँ? अब आप चालाकी छोड़ दीजिये । सरल हो जाइये । आप श्रीकृष्ण का सम्मान करना चाहते हैं यह बडा सुन्दर है । इन सामयियो की तो बात क्या, श्रीकृष्ण समग्र पृथ्वी के स्वामी हैं और वास्तवमें वही उसके पात्र हैं । परंतु मैं शपथपूर्वक कहता हूं कि आप धर्मकी दृष्टिसे अथवा प्रेमकी दृष्टि से यह सब उन्हें नहीं देना चाहते हैं । आप उन पर अपना मायाजाल फैलाना चाहते हैं और उन्हें इन बाहरी सामग्रियो से ठगना चाहते हैं । आप पाण्डवों को पांच गांव नहीं दे सकते, आप धन के बलपर श्रीकृष्ण को अपने वशमें करना चाहते हैं ।

छल, कपट अथवा माया करके श्रीकृष्ण को पाण्डवो से अलग नहीं कर सकते । मैं श्रीकृष्ण की महिमा जानता हूं। मैं उनका प्रेम जानता हूं और वे धनंजय अर्जुन से कितना प्रेम करते हैं, यह भी जानता हूं । वे जलके घड़े, पाद- प्रक्षालन और कुशल प्रश्नके अतिरिक्त आपकी कोई बात स्वीकार नहीं करेंगे । यदि आप श्रीकृष्ण को प्रसन्न करना चाहते हैं तो वह काम कर दीजिये, जिसके लिये वे आते हैं । वे कौरव और पाण्डवो का कल्याण करना चाहते हैं । आप उनका यह आतिथ्य कीजिये । आप पिता हैं पाण्डव और कौरव आपके पुत्र हैं । श्रीकृष्ण की प्रसन्नता और प्रेमके लिये पाण्डवो के साथ अपने पुत्रो का सा व्यवहार करे।

दुर्योधन ने श्रीकृष्ण के सवागत का विरोध किया और धृत्तराष्ट्र जैसा स्वागत चाहते थे, नहीं हो सका ।

श्रीकृष्ण आये, दुर्योधन के अतिरिक्त सबने उनकी अगवानी की । सबसे मिल-जुल लेने के बाद श्रीकृष्ण विदुरके घर गये । विदुरने मांगलिक सामग्रियो के साथ श्रीकृष्णका स्वागत किया और जो कुछ सामग्री उनके घर उपस्थित थी, उससे श्रीकृष्ण की पूजा की । उस समय विदुर को कितनी प्रसन्नता हुई थी, इसका वर्णन नहीं किया जा सकता । उन्होंने स्वयं श्रीकृष्णसे कहा है –  कमलनयन ! तुम्हारे दर्शन से मुझे जो प्रसन्नता प्राप्त हुई है, उसका वर्णन तुमसे क्या करूं है तुम तो सब प्राणियोंके अन्तर्यामी ही हो । तुमसे कुछ छिपा नहीं, तुम धर्म, अर्थ, काम और मोक्षके आश्रय हो, संत तुम्हारी ही उपासना करते हैं । श्रीकृष्णने विस्तार के साथ पाण्डवों का कुशल मंगल विदुर को सुनाया और फिर कुंती के पास गये । कुन्ती को समझाने के बद वे दुर्योधन

के महलमें गये । वहाँ सामान्य स्वागत-सत्कार होनेके पश्चात् दुर्योधन ने भोजन के लिये श्रीकृष्ण को निमंत्रित किया ।

श्रीकृष्णने स्पष्ट शब्दों में कह दिया कि – कोई प्रेमसे खिलावे तो उसके यहाँ खाना चाहिये और नहीं तो जब वहीं भोजन न मिलता हो, आपत्तिका समय हो तब किसीके यहां खाना चाहिये । न तुम प्रेम से खिला रहे हो और न मैं आपत्ति में हूँ , फिर तुम्हारे यहाँ मैं केसे भोजन कर सकता हूँ ।पांडव धार्मिक हैं, धार्मिक पुरुष मेरी आत्मा ही हैं, जो उनसे द्वेष करता है, वह मुझसे ही देष करता है । दुर्योधन से श्रीकृष्ण ने साफ – साफ कह दिया कि तुमलोग दुष्ट हो, तुम्हारा अन्न मैँ नहीं खा सकता। मेरे विचारमें तो यहां केवल विदुर का ही अन्न पवित्र है । मैं उन्ही के यहाँ भोजन करूंगा । इतना कहकर श्रीकृष्ण विदुर के घर चले गये ।

भक्तमाल में ऐसी कथा आती है कि जब श्रीकृष्ण विदुरजी के घर पहुँचे, उस समय विदुरजी घरपर नहीं थे । विदुरजी की पत्नी वस्त्र उतारकर स्नान कर रही थीं । जब श्रीकृष्ण की आवाज उनके कानोंमें पडी, तब वे प्रेमविहृल हो गयी और जिस अवस्थामे थीं उसी अवस्थामे दौड़ आयीं । वे श्रीकृष्ण को एक पीड़ेपर बैठाकर उन्हें केला छील -छील उनके छिलके खिलाने लगी । प्रेममे ऐसी बेसुध हो गयी कि उन्हें यह ध्यान ही न रहा कि मैं श्रीकृष्ण को केलेके छिलके खिला रही हूँ। श्रीकृष्ण भी उनका प्रेम देखकर बेसुध से हो रहे थे । उन्हें उन छिलको में बडा रस आ रहा था । जब विदुर ने कहीं बाहर से आकर यह देखा और अपनी धर्मपत्नी को डाँटकर भगवान् को

केला खिलाना शुरू किया और फिर उत्तम भोजन बनवाकर उन्हें परोसा, तब भगवान् ने स्पष्ट कह दिया कि ‘छिलकेमें जितना रस था, जो स्वाद था, वह इनमें नहीं है ।’ भगवान् तो प्रेमके भूखे हैं उनके सामने वस्तुका कोई महत्त्व नहीं है । इसी प्रकार कई स्थानोंपर विदुरके शाक की, विदुर के कणकी भी बात आती है ।

महाभारत्तमें लिखा है कि श्रीकृष्ण जब विदुरके घर जाने लगे, तब भीष्मपितामह, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य आदि उनके पीछे आये और उन्हें अपने घर चलने की प्रार्थना करने लगे । परन्तु भगवान् ने यह कहकर कि मेरा सम्मान हो गया, उन लोगो को वापस कर दिया । उन लोगोंके चले जानेपर विदुर ने प्रेम और उत्साहके साथ विविध सामग्रियों से श्रीकृष्णका सत्कार किया । उन्होंने अपवित्र और गुणयुक्त अनेकों प्रकार की खाने पीनेकी सामग्री श्रीकृष्णक्रो निवेदित की । भगवान् श्रीकृष्णने उन सामग्रियो से पहले वेदवेत्ता ब्राह्मणोंक्रो भोजन कराया और उन्हें दक्षिणा दी । उनके भोजनके पश्चात् देवताओंके साथ इन्द्रक्री भांति अपने अनुयायियों-सहित श्रीकृष्णने विदुर की पवित्र और गुणयुक्त भोजन सामग्री ग्रहण की ।

रातमें श्रीकृष्ण विदुरके ही घर रहे । विदुर ने श्रीकृष्णसे कहा – भगवन् ! दुर्योधन बड़ा अभिमानी और अधर्मी है । उसकी लालच और झुठाईं बहुत बढ़ गयी है । वह भीष्म, द्रोण, कृप, कर्ण, अश्वत्थामा, जयद्रथ की सेवा में लगा रहता है । उन्हें खूब धन देता है और सोचता है कि मैं इन्हीं के भरोसे पाण्डवो को जीत लूंगा । उसके मनमें यह बात बैठ गयी है कि अकेला कर्ण ही सारे संसार को जीत सकता है । उसके मनमें सन्धि करने की तनिक भी इच्छा नहीं है । उसने पाण्डवों को कुछ न देनेका निश्चय कर लिया है । मुझे इस बातकी बडी चिन्ता है कि

आपका आना व्यर्थ हुआ । उनसे कहना, न कहना बराबर है । बहरो के सामने गायन करने के समान उन्हें उपदेश देना व्यर्थ है । वे सब बहुत से पापी इकट्ठे रहेंगे, उनके बीचमें आपका जाना मुझे अच्छा नहीं लगता । उन्होंने वृद्धों की उपासना नहीं की है । बल और लक्ष्मी के घमण्ड से वे पागल हो गये हैं । मेरे विचार से उनके बीचमें आपका अकेले जाना अच्छा नहीं है । यह मैं प्रेम के वश होकर कह रहा हूं। यों तो मैं जानता हूं कि आपके भ्रूभंगमात्र से त्रिलोकी का संहार हो सकता है । मेरा पाण्डवो पर जितना प्रेम है, उससे भी अधिक आप पर है । प्रेम बहुमान और सौहार्द की दृष्टिसे ही मैं यह कह रहा हूं । और क्या कहूं आप तो अंतरात्मा ही हैं ।

भगवान् श्रीकृष्णने कहा – तुम्हारे जैसे प्रेमी मित्र को मुझ से जैसी बात कहनी चाहिये, वैसी ही तुमने कही है । मैं दुर्योधन को जानता हूं । परन्तु यह जो समस्त क्षत्रियोंका संहार होनेवाला है, उसमें अपनी ओरसे, सच्चे हृदय से यही चेष्टा होनी चाहिये कि यह महासंहार किसी प्रकार रुक जाय । इस विपत्तिका सबसे बुरा परिणाम कौरवों को ही भोगना पड़ेगा । वे इस बात को जानकर भी अभिमानसे नहीं मानते । उन्हें समझाने के लिये मैं आया हूँ । नीतिशास्त्र का ऐसा सिद्धान्त है कि यदि अपना मित्र कोई अकार्य करने जा रहा हो तो जहांतक हो सके, उसकी चोटी पकड़ कर भी अकार्यसे लौटाना चाहिये । मैं सच्चे हृदयसे कहता हूं विदुर ! मेरी हार्दिक अभिलाषा यही है कि कौरव और पाण्डव दोनोंका ही कल्याण हो । मैं समान रूप दोनोंका ही हित चाहता हूं। दुर्योधन के हित की बात कहते समय यदि वह मुझपर अविश्वास करेगा, मुझपर आशंका करवग तो क्या करे। मै अपना कर्तव्य पूरा करने के कारण पसन्न होऊंगा और उऋण भी हो जाऊंगा।

कोई भी मुझपर लांछन नहीं लगा सकेगा कि कृष्ण ने सन्धि की चेष्टा नहीं की । यदि वे मेरा अनिष्ट करना चाहेंगे तो तुम निश्चय समझो कि संसार की कोई भी शक्ति मेरे सामने ठहर नहीं सकती । बात करते करते ही वह रात बीत गयी । नित्यकृत्य के पश्चात् दुर्योधन आदि सब भगवान् श्रीकृष्ण के पास विदुरके घर आये । उन्होंने श्रीकृष्ण से आग्रह किया कि सभामें चलिये । भगवान्  श्रीकृष्ण सभामें गये । वहां उन्होंने सन्धिका प्रस्ताव किया । परशुराम, नारद, भीष्मपितामह सबने उसका समर्थन, अनुमोदन किया । सबने अलग अलग दुर्योधन को समझाया भी, पर उसने किसीको बात नहीं सुनी । उलटे श्रीकृष्ण को कैद करने का विचार किया । जब वह धृतराष्ट्र के समझानेपर भी न माना तब विदुरने बड़े जोर से दुर्योधन को डांटा । विदुरने कहा – दुर्योधन ! तुम श्रीकृष्ण की महिमा नहीं जानते । तुम्हारी ही भाँती वानरेंद्र द्विविद भी श्रीकृष्ण को पकड़ना चाहता था, वह तुमसे कम बली भी नहीं था, परंतु उसके किये कुछ न हो सका । वह मारा गया । नरकासुर अपनी सम्पूर्ण सेनाके साथ श्रीकृष्ण को पकड़ नहीं सका, बल्कि श्रीकृष्ण के हाथों मारा गया और उसे मारकर श्रीकृष्णने हजारों कन्याओ का उद्धार किया । निर्मोचन नामके नगर में श्रीकृष्णने छ: हजार दैत्यों को कैद कर लिया । वे इन्हें नहीं पकड़ सके । बचपन में ही इन्होंने पूतना, बकासुर, अरिष्टासुर, धेनुकासुर को मार डाला और गौओं की रक्षाके लिये सात दिनोंतक गोवर्धन पर्वत को अपनी अँगुलीपर उठा रखा । केशी, चाणूर, कंस, जरासंध, दन्तवक्त्र, शिशुपाल और बाण इनके सामने ठहर न सके । वरुण, अग्नि और इन्द्र इनसे पराजित हो गये । ये साक्षात् विष्णु हैं । जब ये समुद्र में शयन कर रहे थे, तब इन्हों ने मधु और कैटभ देंत्यो को मारा था; दुष्टो को मारने के लिये अवतार लेकर इन्होंने कई बार

हयग्रीव अगदिका वध किया है । ये कारण, करण और कार्यसे परे हैं । कर्ता और अकर्ता दोनों ही इनके रूप हैं । ये सत्य-संकल्प हैं । ये जो चाहेंगे वही होगा । दुर्योधना तुम श्रीकृष्ण का अपमान करना चाहते हो, जैसे फतिंगा आगमें कूदकर अपनी जान दे देता है, वैसे ही तुम अपने सलाहकारों के साथ भस्म हो जाओगे ।

जब विदुर ने इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण की महिमा गयी, तब सब लोग थर्रा गये । श्रीकृष्ण ने भी हंसकर अपना विराट रूप दिखा दिया । सब ऋषि महर्षि वहाँ से चले आये और भगवान् भी अपने रथपर सवार होकर पाण्डवो के पास पहुंच गये ।

विदुर ने कुन्ती के पास जाकर बडी चिन्ता प्रकट की और कहा कि अब युद्ध हुए बिना नहीं रह सकता। इन अधर्मियों ने धर्मराज युधिष्ठिर को युद्धमें लगा ही दिया । धर्मके साथ लड़कर ये अधर्मी कभी भी विजय नहीं पा सकेंगे । अब कुरुवंशियों का विनाश हो जायगा। इस चिन्ता से न तो मुझे रात में नींद आती है और न दिनमें चैन मिलता है । भगवान् की यही लीला है, जो होगा अच्छा ही होगा । कुन्ती ने युद्ध होनेका निश्चय जानकर कर्ण को अपने पक्षमे लाने की चेष्टा की; परंतु सफलता नहीं मिली । अन्तमें युद्ध हुआ । युद्धमें विदुर सर्वथा तटस्थ रहे, उन्होंने कभी किसी के पक्ष से कोई काम नहीं किया ।

6.श्रीमद्भागवत के अनुसार महाभारत युद्धके समय विदुर वहां उपस्थित नहीं थे । जब युद्ध होनेका निश्चय हो गया, सन्धिकी सब चर्चाएं विफल हो गयी और श्रीकृष्ण लौट गये, तब विदुर ने सोचा कि अब अपनी आंखोंसे कुरुकुल का संहार देखना उचित नहीं है । वे सर्वस्व का त्याग करके घर सेे निकल पड़े और अनेक तीर्थो में भ्रमण करते रहे । उन्होंने किसी आश्रमका चिह्न धारण नहीं किया था । कभी किसी वेषमें रहते; तो कभी किसी वेषमें । नदियो में त्रिकाल स्नान करते, निरन्तर भगवान् का स्मरण करते
और भगवान् को प्रसन्न करनेवाले व्रत करते । इस प्रकार तीर्थों में भ्रमण करते करते उन्हें बहुत दिन बीत गये और वे प्रभासक्षेत्रमें पहुंचे । वहां उन्हें भारतीय युद्धका परिणाम मालूम हुआ । उन्होंने उसी ओर यात्रा प्रारम्भ कर दी ।

जब वे यमुनाके किनारे पहुंचे, तब उन्हें वहां महाभागवत उद्धवके दर्शन हुए । उद्धव से उन्होंने बहुत से प्रश्न किये और उद्धव ने प्रेमगद्गद होकर भगवान् श्रीकृष्ण की लीला सुनायी । जन्म से लेकर मथुरायात्रा , द्वारका गमन, भारतीय युद्ध, युधिष्टिरका राज्य और उनके अश्वमेध यज्ञतक का वृत्तान्त सुनाया । जब उद्धवने भगवान् के स्वधाम गमन की बात कही, तब विदुर व्याकुल हो गये । उन्होंने सोचा, हमारे बीच में श्रीकृष्ण आये, हमसे मिले,

हमसे मित्रता की और हम उनकी सन्निधि, उनके आलाप और उनकी कृपा से उतना लाभ नहीं उठा लिके, जितना उठाना चाहिये था और वे चले भी गये, यह कितने दुख की बात है ।

उद्धवने भगवान् के ज्ञानोपदेश की चर्चा की । विदुरने वह ज्ञान श्रवण करने की इच्छा प्रकट की । तब उद्धवने कहा- भगवान् ने उपदेश के समय आपका स्मरण किया था । उस समय मैत्रेय ऋषि भी वहाँ उपस्थित थे । भगवान् ने कहा – जिस गुह्यतम ज्ञानका उपदेश मैं तुम्हें कर रहा हूं वह मैत्रेय विदुर को सुनायेंगे। इसलिये जाप भगवान के उपदेश किये हुए ज्ञान को मैत्रेय ऋषि के द्वारा ही सुनें । विदुर भगवान् के स्मरण और उपदेश के लिये मैत्रेय को आज्ञा देनेकी बात सुनकर बहुत ही प्रसन्न हुए ,उनका हृदय प्रेम, श्रद्धा और आनन्द से भर गया । वहांसेे उन्होंने मैत्रेय ऋषिक्रे पास जानेके लिये हरिद्वार की यात्रा कर दी।

हरिद्वार पहुंचकर विदुर मैत्रेय ऋषि के पास गये और प्रणाम, सेवा करते हुए वे मैत्रेय से भगवद् तत्त्व के सम्बन्ध में भगवान् के बताये हुए ज्ञान की शिक्षा ग्रहण करने लगे । भागवत के तीसरे और चौथे स्कन्ध की कथा मैत्रेयने विदुर से कही है । देवहूति और कपिल का संवाद भी विदुरसे ही कहा गया है ।

जब मैत्रेय ऋषिने विदुरके बहुत से प्रश्नो का समाधान किया तब विदुर ने यह सोचा कि इन प्रश्नोंमें क्या रखा है । इनका अन्त कभी नहीं हो सकता, सबका सार है भगवान् का भजन ।

भजन में लग गये और मैत्रेय से अनुमति लेकर उन्होंने हस्तिनापुर की यात्रा की । वे तो धर्मके, ज्ञानके स्वरूप ही थे । उन्हें जिज्ञासा की क्या आवश्यकता थी, फिर भी उन्होंने मैत्रेय से जो आत्माका ज्ञान प्राप्त किया, प्रश्नोंका समाधान कराया, वह लोक संग्रह के लिये एक लीलामात्र थी । हस्तिनापुर में विदुर के पहुंचनेपर पाण्डवों को और प्रजा को बडी ही प्रसन्नता हुई । उन्होंने विदुर से तीर्थयात्रा का समाचार पूछा । विदुर ने बहुत सी बातें बतायी भी, परन्तु श्री कृष्ण के स्वधाम यधारनेकी बात उनसे नहीं कही । अभी अर्जुन द्वारकासे लोटे नहीं थे, युधिष्ठिर को द्वारका का समाचार अभी कुछ भी मालूम नहीं था । विदुर ने देखा श्रीकृष्ण चले गये । समाचार पाते ही पाण्डव भी चले जायंगे । अब घृतराष्ट्र की रक्षा करनी चाहिये । इन्होंने अपना सारा जीवन सांसारिकतामें ही बिताया । अब अन्त समयमे तो इनके द्वारा कुछ तपस्या, कुछ भगवान् का भजन होना चाहिये। विदुर ने धृत्तराष्ट्र को सब बाते समझायी । घृतराष्ट्र ने उनकी बात मान ली और वे विदुर के साथ घर से निकल पड़े । गांधारी ने भी उनका अनुसरण किया । जेठ जेठानी की सेवा करनेके लिये धर्मशीला कुन्ती भी पुत्रों को छोड़कर उनके साथ गयी । वे सप्तसरोवर ( हिमालय) पर जाकर भगवान् का भजन करने लगे और हस्तिनापुर में युधिष्ठिर उनकी खीज करवाने लगे । महाभारत में लिखा है कि युधिष्ठिरने अपने भाइयों के साथ धृतराष्ट्र के पास वनमें जाकर विदुर का कुशल पूछा, तब धृतराष्ट्र ने कहा –  बेटा ! परम ज्ञानी विदुर इसी तपोवन में कहीं रहते हैं । वे अन्न नहीं खाते, केवल हवा पीकर रहते हैं । घोर तपसे वे दुर्बल हो गये हैं । बड़े बड़े विद्वान् उनका दर्शन पाने के लिये इस जंगल में आते हैं । ये बातें हो रही थीं कि उस

आश्रम से थोडी दूरपर विदुर के दर्शन हुए । उनके शरीरमें धुल लगी हुई थी । आश्रम देखकर विदुर एकाएक पीछे की ओर लौट पड़े । विदुर को जति देखकर धर्मराज युधिष्ठिर ने उनका अनुसरण किया । विदुरजी कभी युधिष्ठिर को दीखते थे, कभी अदृश्य हो जाते थे । युधिष्ठिर पुकारते जाते थे – महात्मन्! मैं आपका प्यारा युधिष्ठिर हूं। आप मुझे दर्शन दीजिये ! परंतु विदुर बढते ही चले जा रहे थे।

निर्जन वनमें जाकर विदुर जी एक पेड़के सहारे खड़े हो गये । युधिष्टिर ने उनके पास जाकर कहा – महाराज ! मैं आपका प्रेमपात्र युधिष्ठिर हूं। आपके दर्शन के लिये यहाँ आया हूं । विदुर कुछ बोले नहीं । उन्होंने धर्मंराज की दृष्टि मे अपनी दृष्टि, इंद्रियों में इंद्रियां , प्राणोंमें प्राण और आत्मामें आत्मा मिलाकर उनसे एकता प्राप्त कर ली । वे अपने स्वरूपमें लीन हो गये । केवल धर्म ही धर्म युधिष्ठिर ही युधिष्ठिर रह गये । विदुरका शरीर वृक्ष के सहारे खड़ा रह गया और धर्मराज युधिष्टिर को अपनेमें विशेष शक्तिका अनुभव हुआ । वे विदुरका शरीर दाह करने जा रहे थे, उसी समय आकाशवाणी हुई- विदुर जी यति धर्मको प्राप्त हो गये थे, उनका शरीर मत जलाइये और उनके लिये शोक मत कीजिये । युधिष्ठिर आश्रमपर चले आये । विदुर तो धर्म थे ही, वे धर्मके रूप में (धर्मराज युधिष्ठिर में)ही लय हो गये । इस प्रकार उन्होंने अपनी लीला संवरण कर ली ।

धर्म भगवान् की जय।

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