सुंदर कथा २६ (श्री भक्तमाल – श्री विदुर जी) Sri Bhaktamal- Sri Vidur ji भाग १

पृथ्वी के नैऋत्य कोणपर धर्मराज की संयमनीपुरी है । उसमें अनेकों योजनों के बहुत से सुन्दर-सुन्दर महल है। उसमें धर्मराज अपने मंत्रियो और धार्मिक सभासदो के साथ निवास करते हैं । उनके सभासदों में ऋषि, महर्षि, देवता सभी प्रकार के लोग हैं । मनुष्यों के पाप-पुण्यका हिसाब रखनेवाले चित्रगुप्तजी महाराज हैं । काल, दिशा, आकाश, वायु ,अग्नि ,सूर्य आदि बहुत से उनके दूत हैं, जो मनुष्योंसे एकान्तमें होनेवाले कर्मोंको भी देखा करते हैं और तुरंत उनके पास समाचार पहुंचा देते हैं । उनकी सभामे चार दरवाजे हैं । जिनमें तीनसे पुण्यात्मा लोगोका प्रवेश होता है और दक्षिण द्वारसे पापी लोग आते हैं । उस मार्गसे आनेमें पापियों को महान् कष्ट उठाना पड़ता है और वैतरणी भी लांघनी पड़ती है । उधरके मार्गसे ले आनेवाले दूत भी बड़े ही भयंकर हैं और कुम्भीपाक, रौरव, असिपत्रवन आदि नाम के  नर्क भी उसी दिशामें पड़ते हैं । उस द्वार की सबसे बडी विशेषता यह है कि जो उस मार्गसे जाता है, उसे धर्मराज का स्वरूप बड़ा ही भयंकर दीखता है और यों तो वे बड़े ही सौम्य हैं ।

यों तो धर्मराज भगवान् के ही एक स्वरूप हैं, परंतु भागवत धर्मको जाननेवाले बारह महात्माओ में वे प्रमुख गिने जाते हैं । अर्थात् वे भगवान् के बहुत ही बड़े भक्त और उनके रहस्य को जाननेवाले ऊँचे ज्ञानी हैं । उन्होंने अपने दूतों को भागवत धर्मका रहस्य समझाया है और बार- बार समझाते रहते हैं कि किनको किस मार्ग से ले आना चाहिये और किनके साथ कैसा व्यवहार करना चाहिये । वे कर्म, मन और वाणी से भगवान् के भक्त हैं तथा अपने दूतों को भी इस  आत की शिक्षा दिया करते हैं । उन्होंने एक खार कहा था कि ‘ मेरे भयंकर दूतो ! जिनकी जीभ भगवान् के पवित्र गुण, लीला और नामोंका गायन नहीं करती, जिनका चित भगवान् के चरण कमलो का स्मरण नहीं करता, जिनका सिर

भगवान् और उनके भक्तो के सामने एक बार भी नहीं झुकता, जिन्होंने अपने कर्तव्य पालन द्वारा उनकी आराधना नहीं की है और जो उनके सत्स्वरूप से विमुख हैं, उन्हें ही तुम भयंकर नरकके रास्ते ले आना ।

धर्मराज केवल वहाँ जानेपर ही पाप- पुण्यका फल नहीं देते, बल्कि इसी लोकमें, इसी जीवनमे, यहींके लोगो को निमित्त बनाकर भी उनके फल दिया करते हैं । प्राचीन कलमें माण्डव्य नामके एक बड़े ही तपस्वी ऋषि रहते थे। वे बड़े ही धर्मज्ञ, प्रभावशाली और मौनी थे । वे अपने हाथों को ऊपर उठाये तपस्या में संलग्न रहते थे । एक दिन कुछ डाकू धन लूटकर ऋषि माण्डव्यके आश्रमके पास से निकले। उसी समय राजा के सिपाहियोंने उनका पीछा किया और वे ऋषिके आश्रमके पास ही धन गाड़कर चलते बने । सिपाहियोंने जाकर ऋषि से पूछा कि ‘ महाराज ! वे डाकू किधर गये ?  परंतु अपने मौनव्रत के कारण ऋषिने क्रोईं उत्तर न दिया । सिपाहियोंने आश्रम के आस पास ही दूंढ़कर डाकुओ को पकड़ लिया । धन भी वहां मिल गया । उन्हें संदेह हुआ कि यह तपस्वी नहीं कोई डाकू है, इसने जान बूझकर हमारे पूछनेपर ज़वाब नहीं दिया । इसलिये इसे भी पकड़ ले चलें । उन्होंने माण्डव्य ऋषि को पकड़ लिया और डाकुओ के साथ ही उन्हें भी राजाके सामने पेश किया । राजाने भी उनके जवाब न देनेपर उन्हें डाकू समझ लिया और डाकुओ के साथ सूलीकी सजा दे दी । ऋषि माण्डव्य सूलीपर चढा दिये गये, परंतु सूली उनके शरीर को छेद न सकी । वे बहुत दिनोंतक सूली पर बैठकर तपस्या करते रहे । जब दूसरे

ऋषियों को यह समाचार मिला तब वे पक्षियो का रूप धारण करके माण्डव्य ऋषि के पास आने लगे और पूछने लगे कि तुम्हें किस पापका यह फल मिला है । माण्डव्य भी सोचने लगे कि मुझे किस पापका यह फल मिला है । थोड़े ही दिनोंके बाद राजाको यह मालूम हुआ कि सूलीपर चढाये जानेपर भी एक डाकू की मृत्यु नहीं हुई, यह अभी जीवित है । उन्होंने जान लिया कि वह तो कोई ऋषि है । राजाने जाकर बडी प्रार्थना की, उन्हें सूलीपर से उतारा, परंतु सूली की छोटी सी अणि उनके शरीरमें लगी ही रह गयी, वह न छूट सकी । इसीसे उनका नाम अणिमाण्डव्य पडा । माण्डव्य ऋषि एक दिन धर्मराज की सभा में उपस्थित हुए । उन्होंने कहा कि मैंने कौन सा ऐसा पाप किया था, जिसके फलस्वरूप मुझें सुली पर चढ़ना पडा ?धर्मराज! यदि तुम इसका ठीक – ठीक उत्तर नहीं दोगेे तो तुम्हें अपने इस कर्मका फल भोगना पडेगा । धर्मराजने कहा- तपोधन ! अपने वचपनमें एक सींकमें कई टिड्डीयों को छेदकर उडाया था, उस पापका फल आपको भोगना पड़ा है । छोटा सा भी पाप छोटा सा नहीं होता । पाप हमेशा बड़ा ही होता है । माण्डव्य ने कहा – धर्मराज ! उस समय मैं नन्हा सा बालक था, मुझे पाप पुण्यका कुछ ज्ञान नहीं था । उस छोटे से यापका इतना बड़ा दण्ड कि ब्राह्मण सूती-पर चढाया जाय ! यह कदापि उचित नहीं हो सकता। इसलिये मैं तुम्हें शाप देता हूं कि तुम मृत्युलोक में सौ वर्षतक शूद्र होकर रहो । धर्मराजने प्रसन्नतापूर्वक ऋषिका शाप स्वीकार किया । उन दिनों पृथ्वीपर दैत्योंकी संख्या बढ गयी थी । क्षत्रियो के रूपमें पैदा होकर उन्होंन पृथ्वी को व्याकुल कर दिया था । उनका दमन करने के लिये प्राय: सभी देवता अपने अपने अंशसे अवतीर्ण हो रहे थे । स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण भी धरातल पर अवतार ग्रहण करनेवाले थे । ऐसे अवसरपर धर्मके अवतार की आवश्यकता तो थी ही,माण्डव्य ऋषि का शाप एक निमित्त बन गया।

देवताओं में शरीर निर्माण की शक्ति होती है । वे एक ही साथ अनेक स्थानोंपर अनेक रूपो में प्रकट हो सकते हैं और अनेक यज्ञों में भाग ले सकते हैं । धर्मने भी अपने को दो रूपोंमें प्रकट किया । एक तो विदुर और दूसरे युधिष्ठिर ।

सत्यवतीने श्री वेदव्यास से प्रार्थना की कि बेटा ! तुम्हारे जैसे तपस्वी महात्माके रहते हुए हमारा कुरुवंश डूबनेपर आ गया है । भीष्म ब्रह्मचारी हैं, विचित्रवीर्य मर गये, अब हमारा वंश कैसे चले ? तुम अपनी तपस्याके प्रभाव से हमारा वंश चला दो । व्यासने अपनी माताका आग्रह स्वीकार किया और कहा कि है अम्बिका तथा अम्बालिका यदि मेरे सामने से वस्त्रहीन होकर निकल जाये तो मेरी दृष्टि शक्ति से उन्हें संतान प्राप्त हो सकती है । सत्यवतीने उन दोनों को बारी बारी से व्यासदेवके सामने भेजा, परंतु वे दोनों बड़े ही संकोच से उनके सामने गयीं । एकने अपनी आंखें बंद कर लीं, दूसरी मारे भयसे पीली पड़ गयी । व्यासने उन्हें देखा और बतलाया कि पहली से जो पुत्र होगा, वह अंधा होगा और दूसरी से जो पुत्र होगा वह पाण्डु वर्णका होगा । वही धृत्तराष्ट्र और पाण्डु हुए । जिनके वंशज दुर्योधन और युधिष्ठिर आदि थे ।

सत्यवती को इतन से संतोष नहीं हुआ । उसने फिर अम्बिका से आग्रह किया कि एक सर्वगुण संपन्न पुत्र पैदा करो । अम्बिकाने उनके सामने  हां कह दिया , परंतु उसकी हिम्मत व्यासके सामने जाने को नहीं पडी । अपनी परम सुन्दरी दासी को उसने व्यासदेव के सामने भेज दिया । वह दासी संकोच रहित होकर व्यासके सामने गयी और उनकी कृपादृष्टि से उसे गर्भ रह पाया । व्यासने उसी दिन से उसका दासीभाव छूट जानेका वर दिया और कहा कि

तुम्हरे गर्भ से एक बडा ही धार्मिक पुत्र उत्पन्न होगा । भगवान् व्यासकी वाणी भला कभी व्यर्थ हो सकती है ? समय आनेपर धर्मराज ने इसी दासीके गर्भसे विदुर के रूपमें जन्म ग्रहण किया ।

धर्मावतार विदुर मनुष्य होनेपर भी अपने देवत्व के ज्ञान को भूले नहीं थे । परंतु वे अपने को कभी देवता के रूपमें प्रकट भी नहीं करने थे । सदा मनुष्यधर्मका ही पालन करते थे । बचपनसे ही वे बड़े गम्भीर थे । व्यासदेव, भीष्मपितामह आदि गुरुजनों की सेवामें ही प्राय: वे लगे रहते थे । इतने चुप रहते थे, मानो कुछ जानते ही न हों । वे निरन्तर भगवद् भजन में लगे रहते थे और अवकाश पाते ही ध्यानस्थ हो जाते थे । उनके जीवनमे कभी बहिर्मुखता आयी ही नहीं । उनकी सेवा सेे, उनके सदाचारसे और उनके भगवद् प्रेमसे सभी प्रसन्न थे । बड़े भाई धृतराष्ट्र की तो वे आँख ही थे । धृतराष्ट्र कोई भी काम बिना विदुरकी सलाहके नहीं करते थे । भीष्मपितामहने पाण्डु और धृतराष्टक्रो बहुत बडी सम्पत्ति दी । जब उन्होंने विदुरसे धन लेने को कहा तब उन्होंने स्पष्ट अस्वीकार कर दिया । उनके मन में धनका कोई मूल्य ही नहीं था । संसार की झूठी वस्तुएं जो इस क्षण हैं और अगले क्षण नहीं रह सकती हैं उन्हें लेकर, उनके चिन्तन में अपना समय कौन बिताये  । इनके लिये भगवान् के चिन्तनसे विमुख कौन हो, यह सब सोचकर वे धनसे अलग ही रहते थे ।

जब भीष्मपितामह ने पाण्डु और धृतराष्ट्र का विवाह कर दिया, तब विदुरके विबाह की भी बारी आयी । उन दिनों मथुरामें देवकका बड़ा प्रभाव था । उनके यहाँ एक पारशवी दासी थी । उसीकी सर्वगुण सम्पन्न कन्या के साथ भीष्मपितामह ने विदुर का विवाह करा दिया । विदुर अपनी धर्मपत्नी के साथ गार्हस्थ्य धर्मका पालन करते हुए भगवान् का भजन करने लगे।

एक प्रकार से वे धृतराष्ट्र के मंत्री ही थे और उनके मंत्रित्वमें तबतक राज काज चलता रहा, जबतक दुर्योधन, दुशासन, कर्ण आदिकी प्रधानता नहीं हो गयी । स्वयं धर्मके मंत्रित्वमें राज काज़का संचालन किस प्रकार होता था, यह कहनेकी अनावश्यकता नहीं । उन दिनों वहाँ बडा सुख था, बडी शान्ति थी, पाण्डु जहाँ रहते, वहीं उनके लिये आवश्यक सामग्री उपस्थित रहती और किसी भी प्रजाको किसी प्रकार का कष्ट नहीं था । क्यों न हो, धर्मके हाथो में जो प्रबन्थ था !

2. धर्मका सरल से सरल और गहन से गहन अर्थ है सबका कल्याणा ऐसा कोई व्यक्ति नहीं, ऐसी कोई वस्तु नहीं, जिसके मूलमें धर्म न रहता हो और अवसर आनेपर जिससे सबका कल्याण हो, ऐसे कामके लिये प्रेरणा न करता हो । पाण्डवोंमें तो युधिष्टिरके रूपमें धर्मराज थे ही, कौरवो में भी विदुरके रूपमें धर्मराज थे । अंतर इतना ही था कि पाण्डवो में धर्म राजा थे । उनके आज्ञानुसार सब कार्य होते थे और कौरवो में वे केवल एक सलाहकार के रूपमें थे । जैसे पाप की प्रवृत्ति होनेके समय अन्तरात्मा कह देती है कि यह पाप है, मत करो, परन्तु पापी लोग उस आवाज को नहीं सुनते या सुनकर भी अनसुनी कर देते हैं, वैसे ही कौरवों की अन्याय की ओर प्रवृत्त देखकर विदुर स्पष्ट कह देते थे कि – यह अन्याय है इसे मत करो । परंतु वे विदुरकी बातपर ध्यान नहीं देते थे, उनकी उपेक्षा कर देते थे । विदुरके सबका कल्याण चाहते हैं ।

विदुर कौरवों को तो सलाह देते ही थे, समय आनेपर पण्डवो को भी उचित सलाह देते थे और उनपर किसी

आपत्तिकी, विपत्तिकी सम्भावना होती तो पहलेसे ही सूचित कर देते, यदि वे व्याकुल हो जाते तो उन्हें समझाते, उन्हें धैर्य बँधाते ।

दुर्योधन पाण्डवो से बड़ा ही बैर रखता था । वह दिन-रात सोचता था कि किस प्रकार इन्हें नष्ट कर दें । इसके लिये उसने बहुत से उपाय किये । एक बार जल विहारके लिये पाण्डवों को बुलाया गया । दुर्योधन ने पहलेसे ही विष की मिठाइयाँ बनवा रखी थीं । उसने बडा प्रेम प्रकट करके भीमसेन को अपने हाथोंरने वह मिठाई खिलायी । उसके बाद भीमसेन के बेहोश होनेपर उन्हें लताओ से बाँधकर गंगा नदी में फेंक दिया । जल विहारके रथान से चलनेपर युधिष्टिरने सोचा कि भीम पहले ही चला गया होगा । इस बात की तो उनके मनमें कल्पना ही नहीं हुई कि दुर्योधन ने भीमसेन का कुछ अनिष्ट किया होगा । जब वे लौटकर कुन्तीके पास आये और उसने भीम को पूछा, तब उन्होंने कहा कि मैं तो समझता था कि भीम तुम्हारे पास आ गये होंगे । क्या उनका कुछ अनिष्ट तो नहीं हो गया ? अनिष्ट की आशंका से कुन्तीका हृदय काँप उठा और क्या करती उसने विदुर को बुलवाना सही समझा ।

कुन्तीने विदुर से कहा – देवर ! पता नहीं भीमसेन कहाँ गया ? सब भाई तो जल-विहार करके लौट आये, परंतु भीम नहीं आया । मुझे डर इस बातका है कि कहीं दुर्योधन उसे धोखा देकर मार न डाले। वह बडा ही क्रूर, दुर्बुद्धि और लोभी है । मेरा कलेजा धड़क रहा है, मुझे कुछ सूझता नहीं, क्या करूँ ?विदुरने बडी दृढ़ता से कहा- रानी ! ऐसी बात मनमें नहीं लानी चाहिये । अपने पुत्रके संबंध में ऐसा सोचना तुम्हारी जैसी वीर रमणी को शोभा नहीं देता । जो पुत्र तुम्हारे पास हैं उनकी रक्षा करो, इस समय दुर्योधन पर लांछन मत लगाओ। कुछ कहने–

सुनने से वह और भी अनिष्ट करनेकी चेष्टा कर सकता है। भीमसेनके संबंध में निश्चिन्त रहो । उसका अनिष्ट तो कोई कर ही नहीं सकता । महामुनि व्यासने तुम्हें जो आशीर्वाद दिया है कि तुम्हरे सब पुत्र चिरंजीवी होंगे, वह कभी झूठा नहीं हो सकता । भीम तुम्हारे पास शीघ्र ही आयेगा और तुम्हें प्रसन्न करेगा।

विदुर की बातोंसे कुन्ती की घबराहट मिट गयी और कुछ ही समय बाद नागलोक से पारे का रस पीकर दस हजार हाथियों के बल से युक्त होकर भीमसेन लौट आये । युधिष्ठिरने भीमसेन को समझा दिया कि यह बात किसीपर प्रकट नहीं होनी चाहिये। विदुर चाचा ऐसा ही कहते हैं और इसीमें हमलीगोंका कल्याण है । विदुर की सत् – शिक्षासे पाण्डव दुर्योधन की  इस दुष्टता को पी गये। उन्होंने कहीं चर्चा ही नहीं की ।

दुर्योधन अपनी कुचाल को विफल हुई देखकर मन-ही-मन जल उठा । द्रोणाचार्यके यहाँ शिक्षा प्राप्त करते समय भी उसने पाण्डवो को नीचा दिखाना चाहा; लेकिन उसके किये कुछ न हो सका । बादमे उसने धृतराष्ट्र के कान भरने शुरू किये और यह बात उसने तय करा ली कि अब पाण्डव चारणावत वारणावत नगरमें रहे । उनके लिये नया महल बनने का प्रबंध हुआ । दुर्योधनने पुरोचन नामके व्यक्ति से एकान्तमें कहा कि – भाई ! अब तो सारी पृथ्वीके राजा हम और तुम दो ही रहेंगे । तुम मेरे बड़े विश्वासपात्र हो, शत्रुओंका नाश करनेमें मेरी सहायता करो । तुम वारणावत में  ऐसा महल बनाओ, जिसमें सन, तेल, घी, लाख, लकडीका व्यवहार अधिक हो और ऊपर से ऐसा लेप लगवा दो कि कोई उसको भाँप न लिके । ऐसी ही वस्तुएं उसमें रथान-स्थान पर रखवा दो और किसीको रत्तीभर भी इसका पता न चले । तुम युधिष्ठिरके जानेपर उनकी खूब सेवा करना और जब वे तुम्हारा खूब विश्वास कर लें तब उस महल के दरवाजे पर आग लगा देना ।

बस, उनके मर जानेपर तो तुम्हारा ही सब अधिकार होगा। पुरोचनने जाकर बैसा ही महल तैयार करा दिया और धुतराष्ट्र ने कुन्ती सहित याण्डवो को वहाँ जाने की आज्ञा दे दी ।

जब पाण्डव कुंती के साथ वारणावत जाने लगे तब उन्होंने सब गुरुजनों को प्रणाम करके आज्ञा ली । प्रजाने बहुत विरोध किया, परंतु युधिष्ठिर ने सबको समझा दिया । जब सब लोग चले गये, तब विदुरने मलेच्छ भाषा (गुप्त अथवा सांकेतिक भाषा )में युधिष्ठिर को समझाया। उन्होंने कहा – युधिष्ठिर ! बुद्धिमान् मनुष्य को शत्रुओ का गुप्त रहस्य समझकर पहलेसे ही उससे बचावका उपाय करना चाहिये । एक प्रकारका अस्त्र है, वह लोहे का बना तो नहीं है, परंतु उससे मृत्यु हो सकती है । उसे जो जान लेता है, वह बच जाता है । (अर्थात् तुमलोगो को जलाने के लिये शत्रुओ ने शीघ्र जलनेवाले पदार्थोंका भवन बनवाया है । ) देखो आग जंगल को जला सकती है, परंतु बिलमें रहनेवाले जीवों को नहीं जला सकती । आपत्ति आनेपर इसी प्रकार अपनेको सुरक्षित रखना चाहिये । (अर्थात् तुमलोग सुरंग सेे निकल जाना) अंधे को रास्ता नहीं मिलता, उसे दिशा भ्रम भी हो सकता है । धर्महीन को सम्पत्ति नहीं मिलती । मेरी बात खूब समझ लो । (अर्थात् तुम पहलेसे ही मार्गो और दिशाओं का ज्ञान प्राप्त कर लेना और इस बातको इतना गुप्त रखना कि किसीको पता न चले ।) दुष्ट पुरुषो के दिये हुए बिना लोहेके शस्त्र को स्वीकार कर लेना ही ठीक है । उनके ही स्थान की शरण लेकर आग की आंच से बच जाना चाहिये । (अर्थात् पुरोचनके बनाये घरमें प्रसन्नता से रहना। मौका पाकर निकल जाना । ) घूमने सेे मार्गोंका ज्ञान हो जाता है । नक्षत्रोंसे दिशाओ का पता चल जाता है । बुद्धिमानी के साथ पांचों इन्द्रियों को अपने वशमें रखने से किसी पक्रार की पीडा नहीं होती । काम क्रोध आदि शत्रु उसकी हानि नहीं कर सकते।

विदुरके उपदेश सुनकर युधिष्ठिरने कहा : मैंने आपका उपदेश समझ लिया । ऐसा ही होगा । विदुर वहां सेै अपने घर लौट आये और पाण्डव वारणावत गये । वहां प्रजाने उनका स्वागत किया । पुरोचन ने उन्हें लाक्षागृहमें रहनेकी व्यवस्था कर दी । वह बड़े प्रेमसे इन लोगों की सेवा करके विश्वासपात्र बनने का दुष्प्रयत्न करने लगा ।

विदुरका एक मित्र बडा चतुर, विश्वासपात्र और सुरंग छोदनेमें निपुण था । विदुरने उसे एकान्तमें बुराकर सब बातें समझा दीं और कहा – तुम जाकर पाण्डवोंकी भलाई करो । उसे पाण्डवोंका विश्वास पानेके लिये कुछ गुप्त बातें भी बता दीं । वह युधिष्टिर के पास गया और उसने विदुरके बताये हुए संकेतो से युधिष्ठिरका विस्वास प्राप्त कर लिया । उसने युधिष्ठिर से कहा – मैं खुदाई का काम करनेवाला कारीगर हूं। आगामी कृष्णपक्ष की चतुर्दशी को रातको पुरोचन इस घरमे आग लगाने वाला है । दुर्योधन ने कुंती के साथ आपलोगो को जला डालनेका निश्चय कर लिया है । मुझे सुरंग खोदने की आज्ञा दीजिये । युधिष्टिरने कहा – विदुर हमारे हितचिन्तक हैं । तुम भी मेरे लिये विदुर जैसे ही हो । जैसे वे हमारा हित करते हैं, वैसे ही तुम भी , हमारा हित करो । दुर्योधनके पास इस समय सम्पत्ति है, उसके सहायक भी बहुत से हैं, यदि उसको पता चल जायगा तो हमारा बहुत अनिष्ट हो सकता है । विदुर की बात सच उतरी । अब तुम हमलोगों को इस आपत्ति से बचाओ । सुरंग खोदी गयी और आग लगनेके समय पाण्डव उसके रास्ते से निकल गये । किसीको इसकी खबर नहीं लगी । विदुर की कृपासे पाण्डव इस महान् विपत्ति से बच गये ।

बहुत दिनों के बाद जब मालूम हुआ कि पाण्डव जीवित हैं और राजा द्रुपद की पुत्री द्रोपदी से उनका विवाह भी हो गया है तब दुर्योधन, कर्ण आदि को बड़ा कष्ट हुआ । वे पुन: पाण्डवों के नाशका उपाय सोचने लगे । विदुरको बडी प्रसन्नता हुई और उन्होंने जाकर

धृतराष्ट्र से कहा – बडा अच्छा हुआ, बड़ा अच्छा हुआ । विदुरने उन्हें समझाया कि अब द्रुपदसे हमारी मित्रता हो जायगी, वे हमारे संबंधी हो गये, अब पाण्डवो को आदरपूर्वक बुला लेना चाहिये । विदुरके चले जानेपर दुर्योधनने धृतराष्ट्र से कहा – उन्हें बुलाना ठीक नहीं है । हमलोग बहुत दिनोंसे उन्हें नष्ट करनेका षडयन्त्र कर रहे हैं, परन्तु सफल नहीं हुए । इस पर ऐसा उपाय करना चाहिये कि हमारा राज्य निष्कणटक हो जाय । कर्णने कहा – मुझे धोखा देने की नीति पसंद नहीं है । इस तरह उनका कोई अनिष्ट कर भी नहीं सकता । उनपर चढाई कर दी जाय । द्रुपद उनके सहायक हैं तो क्या हुआ ? वे सब मिलकर हमारा मुकाबला नहीं कर सकते । मैं अकेले ही सबको जीत लूंगा । दुर्योधनने भी कहा – हां यही ठोक है । कर्णने कहा – पराक्रम करना ही क्षत्रियोंका धर्म है । साम, दान या भेदके द्वारा पाण्डव नहीं जीते जा सकते । उन्हें प्रकटरूप से ही जीता जा सकता है । परन्तु एक बातका ध्यान रहे । यह काम बहुत ही शीघ्र और एकाएक कर डालना चाहिये । नहीं तो यदि श्रीकृष्ण को पता चल जायगा और वे यादवों की रोना लेकर आ धमकेंगे तब उन्हें जीतना कठिन हो जायगा । श्रीकृष्णके नीतिकौशल के सामने हमलोगो का टिकना आसान नहीं है ।

धृतराष्ट्र ने कहा – कर्ण ! तुम्हारी बात वीरोंके योग्य है । तुम्हारी इस स्पष्ट नीति की मैं प्रशंसा करता हूँ । किंतु मेरी यह इच्छा है कि तुम और दुर्योधन दोनों ही भीष्मपितामह, द्रोणाचार्य और विदुर से सलाह करके तब कुछ निश्चय करों । बिना उनकी सम्मति के कोई कम करना मुझे पसंद नहीं । भीष्म, द्रोण और विदुर बुलाये गये । इस विषयमें जब उन लॉगों की सम्मति पूछी गयी तब भीष्म और द्रोणने एक स्वर से पाण्डवों के द्रोहका विरोध किया । उन्होंने कहा – हमारे लिये कौरव और पाण्डव दोनों ही समान हैं । इन दोनों को एक सा ही प्यार करते हैं । ऐसी दशामें

पण्डवो से वैर या युद्ध करनेका अनुमोदन हम नहीं कर सकते । है उन त्गेगो९ने दुर्योधनक्रो भी बहुत समझाया, द्रोणाचार्य और केर्णमें तो कुछ कड्री-केडी बातें भी हो गयी ।

अन्तमें विदुरने कहा – स्वजनों का कर्तव्य है कि बेखटके हित की बात कह दे । आप सुनना नहीं चाहते, इसीसे लोग कहना चाहकर भी नहीं कहते । भीष्म और द्रोण दोनों ही आपके सच्चे हितैषी हैं और जो कुछ वे कह रहे हैं, आपके हितके लिये कह रहे हैं । आप सच समझिये पाण्डवो को परास्त करनेकी शक्ति किसीमें नहीं है । उनके पक्षमें धर्म है, वे सत्य की ओर हैं, संसारमें बड़े-से-बड़ा देवता भी उनका बाल बाँका नहीं कर सकता, क्या आप नहीं जानते कि उनके पक्षमें हैं- श्रीकृष्ण, बलराम और सात्यकि । अनेकों राजा और राजकुमार भी उनके प्रेमी हैं । इस राज्यमें उनका हिस्सा है, यह बात सब जानते हैं । जबसे प्रजाको मलूम हुआ है कि पाण्डव जीवित हैं तबसे उन्हें देखनेके लिये सब लोग व्याकुल हो उठे हैं । उन्हें लाहके घेरमे जलाने की चेष्टा की गयी, यह जात भी अब छिपी नहीं है । उनका सम्मान करके आप अपनी कलंक-कालिमा धो डालिये । पाण्डवो से मेल करने में आपका लाभ ही लाभ है । द्रुपद आपके पक्षमें हो जायेंगे, श्रीकृष्ण आपके सहायक हो जायेंगे और सारे यदुवंशी आपकी आज्ञाका पालन करेंगे । श्रीकृष्ण साधारण पुरुष नहीं, साक्षात् भगवान् हैं । वे जिस पक्षमें रहेंगे, उसीकी जीत होगी । उनसे मेंल करके आप सारे संसार में अपने राज्य का विस्तार कर सकते हैं । राजन्! मैं आपसे स्पष्ट निवेदन करता हूं कि दुर्योधन, कर्ण और शकुनि आदि सब कच्ची बुद्धिके बच्चे हैं । आप इनकी बातो में मत आइये । यदि इनकी बुद्धिके अनुसार काम किया गया तो निश्चय समझिये कि आपके सब पुत्रोंका, क्षत्रियो का और प्रजाका नाश हो जायगा ।

धुतराष्टने बडी प्रसन्नतासे कहा -हां , हां, यही तो मैं भी

कहता हूं । भीष्मपितामह, द्रोणाचार्य ये बड़े ही ऐशर्श्वशाली और ज्ञानी हैं । ये हमारे हितकी बात कहते हैं। तुम्हारी सम्मति भी हमारा कल्याण करनेवाली है । तुम्हारा कहना सच है। जैसे मेरे पुत्र दुर्योधन आदि हैं वैसे ही पाण्डव भी हैं । राज्यका जितना अधिकार इन्हें है, उतना ही उन्हें भी है । विदुर ! तुम जाओ, विशेष सत्कार के साथ कुन्ती और नववधू  द्रौपदी के साथ पाण्डवों को यहां ले आओ । पाण्डव कुशल से हैं, उनका विवाह हो गया, यह वडी प्रसन्नता की बात है । द्रोपदी के लिये अनेकों प्रकारके रत्न और वस्त्राभूषण ले जाओ । विदुरने उपहार की सामग्री लेकर रथपर सवार होकर पंचाल देश की यात्रा की।

पंजाब में जाकर वे पहले राजा द्रुपद से मिले । उनके यहां स्वागत सत्कार होनेके बाद वे श्रीकृष्ण के पास गये और उनके दर्शनसे बहुत ही आनन्दित हुए । विदुर बहुत दिनोंसे श्रीकृष्णका दर्शन चाहते थे, परंतु अबतक उन्हें अवसर नहीं मिला था । रास्ते में आते समय भी वे सोच रहे थे कि शायद वहां श्रीकृष्णके दर्शन हो जायं। अपनी बहुत दिनों की अभीलाषा पूर्ण होते देखकर वे सहसा उनके चरणों पर गिर पड़े । श्रीकृष्णने उन्हें उठाकर हृदयसे लगा लिया । युधिष्ठिर भी अपने भइयो के साथ उनसे मिले और कुन्ती से भी यथायोग्य हुआ ।

सभामें उपस्थित होनेपर विदुरने श्रीकृष्ण और पाण्डवोंके सामने ही महाराज द्रुपद से कहा – राजन्! राजा धृत्तराष्ट्र, वृद्ध भीष्मपितामह, द्रोणाचार्य और सब कौरवों ने आपको यथोचित अभिवादन कहकर कुशल मंगल पूछा है । आपके यहाँ सम्बन्ध होनेसे सभी को बडी प्रसन्नता हुई है । अब वहाँ के लोग पाण्डवोंको देखनेके लिये बहुत ही उत्कण्ठित हो रहे हैं । मेरा अनुमान है कि पाण्डव लोग भी अपना देश देखनेके लिये बहुत ही अत्कण्ठित होंगे , क्योंकि इन्हें अपना देश छोडे बहुत दिन हो गये । कुरुकुल की स्त्रीयाँ भी द्रोपदी को देखनेके लिये

बहुत ही उत्सुक हो रही हैं । इसलिये देर न करके पत्नी-सहित पाण्डवों को विदा कर दीजिये । आपकी अनुमति मिलते ही मैं वहां समाचार भेज दूंगा कि पाण्डव आ रहे हैं । द्रुपदने कहा – विदुरजी ! आपका कहना ठीक है । इस सम्बन्ध से मुझे भी बडी प्रसन्नता हुई है । पाण्डवोंका अपने राज्यमें जाना उचित और आवश्यक है तथापि मैं जाने के लिये कैसे कह सकता हूं? ये जितने दिनोंतक मेरे यहां रहें, अच्छा ही है । कुन्ती, पाण्डव, श्रीकृष्ण और बलराम की सम्मति हो तो मैं जाने में आपत्ति न करूँगा । युधिष्टिरने कहा – महाराज ! हम सब आपके अधीन हैं । आप हृदय से जो आज्ञा देंगे, हम उसीका पालन करेंगे । श्रीकृष्णने कहा – मेरे विचार से तो पाण्डवो को वहां जाना ही चाहिये । फिर भी महाराज द्रुपद की जैसी आज्ञा हो, वैसा ही करना ठीक है । द्रुपदने कहा – परम शक्तिशाली यदुवीर पुरुषोत्तम श्रीकष्ण जो कहते हैं, यही ठोक है । वासुदेव श्रीकृष्ण की पाण्डवो पर जितनी कृपा है, वे पाण्डवों की जितनी मंगलकामना करते हैं, उतनी मैं भी नहीं करता । स्वयं युधिष्ठिर भी नहीं करते । अन्तमें विदाई का ही निश्चय रहा ।

श्रीकृष्ण, कुन्ती, पाण्डव और दौपदी को साथ लेकर विदुर वारणावत नगरके लिये चल पड़े । विकर्ण, चित्रसेन, द्रोणाचार्य आदि ने आकर उनका स्वागत किया और धृतराष्ट्र की आज्ञासे वे लोग अपने महलो में रहने लगे । कुछ दिनों के बाद धुतराष्ट्र ने उन्हें खाण्डवप्रस्थ में राजधानी बनाकर रहनेकी आज्ञा दे दी और आधा राज्य भी दे दिया । पाण्डवोंने अपने बाहुबल से अपने राज्यका विस्तार कर लिया और वे वहां सुखपूर्वक रहने लगे । विदुर धृतराष्ट्र के  पास ही अपनी कुटीमें रहकर अपनी धर्मपत्नी के साथ प्रेमपूर्वक भगवान् का भजन करने लगे ।

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