भगवान् शिव एवं नारायण का विलक्षण प्रेम

​प्राचीन कालमे सुरमुनिसेवित कैलास शिखरपर महर्षि गौतम का एक आश्रम था । वहाँ एक बर पताल लोक से जगद्विजयी बाणासुर अपने कुलगुरु शुक्राचार्य तथा अपने पूर्वज भगवत शिरोमणि प्रह्वाद,दानवीर बलि एवं दैत्यराज बृषपर्वा के साथ आया और महर्षि गौतम के सम्मान्य अतिथिके रूपये रहने लगा । एक दिन प्रात:काल वृषपर्वा शौच स्नानादि नित्य कर्म से निवृत्त होकर भगवान् शंकर की पूजा कर रहा था । इतनेमें ही महर्षि गौतमका एक प्रिय शिष्य, जिसका अन्वर्थ नाम शंकरात्मा था और जो अवधूत के देशमें उन्मत्त की भाँति विचरता था, विकराल रूप बनाये वहाँ आ पहुंचा और वृषपर्वा तथा उनके सामने रखी हुई शंकर की मूर्तिके बीचमे आकर खड़ा हो गया ।

वृषपर्वा को उसका इस प्रकार का उद्धत सा व्यवहार देखकर बडा क्रोध आया । उसने जब देखा कि वह किसी प्रकार नहीं मानता तो चुपके से तलवार निकालकर उसका सिर धड़से अलग कर दिया । जब महर्षि गौतम को यह संवाद मिला तो उनको बडा दुख हुआ, क्योकि शंकरात्मा उन्हें प्राणों से भी अधिक प्रिय था । उन्होंने उसके बिना जीवन व्यर्थ समझा और देखते-देखते वृषपर्वा की आँखोंके सामने योगबलसे अपने प्राण त्याग दिये ।

महर्षि गौतम को इस प्रकार देहत्याग करते देखकर शुक्राचार्य से भी नहीं रहा गया, उन्होंने भी उसी प्रकार अपने प्राणोंका उत्सर्ग कर दिया और उनकी देखादेखी प्रहृलाद आदि अन्य दैत्योंने भी वैसा ही किया । बात-की-बातमें ऋषिके आश्रममें शिव भक्तो की लाशों का ढेर लग गया । यह करुणापूर्ण दृश्य देखकर ऋषिपत्नी अहल्या हृदयभेदी स्वर से आर्तनाद करने लगी।

उनकी क्रन्दन ध्वनि भक्तभयहारी भगवान् भूतभावन शिव के कानो तक पहुंची और उनकी समाधि टूट गयी । वे वायुवेगसे महर्षि गौतमके आश्रमपर पहुँचे । इसी प्रकार गज की करुण पुकार सुनकर एक बार भगवान् श्री हरि भी वैकुण्ठ से आतुर होकर दौड़े आये थे । धन्य भक्तवत्सलता ! दैवयोग से ब्रह्माजी तथा विष्णु भगवान् भी उस समय कैलाश में ही उपस्थित थे । उन्हें भी कौतूहलवश शंकरजी अपने साथ लिवा लाये ।
भगवान् शिव ने आश्रम में पहुँचकर अपने कृपाकटाक्ष से ही सबको बात ही बात में जीवित कर दिया तब वे सब खड़े होकर भगवत् मृत्युञ्जय की स्तुति करने लगे । भगवान् शंकर ने महर्षि गौतमसे कहा – हम तुम्हारे इस अलौकिक साहस एवं आदर्श त्याग पर अत्यंत प्रसन्न है वर माँगो । महर्षि बोले – प्रभो ! उपने यहाँ पधारकर मुझे सदाके लिये कृतार्थ कर दिया । इससे बढकर मेरे लिये और कौन सी वस्तु प्रार्थनीय हो सकती है ? मैंने आज़ सब कुछ या लिया । मेरे भाग्यकी आज़ देवतालोग भी सराहना करते है । यदि आप मुझपर प्रसन्न है तो मेरी एक प्रार्थना स्वीकार कीजिये । मै चाहता हूँ आज आप मेरे यहाँ प्रसाद ग्रहण करें । 

भगवान् तो भावके भूखे है । भावके वशीभूत होकर उन्होंने एक दिन श्रीरामरूपमे शबरी के बेर और श्रीकृष्ण रूपमें सुदामाके चावल का भोग लगाया था । उन्होंने महर्षि की अविचल एवं निश्छल प्रीति देखकर उनका निमन्त्रण तुरंत स्वीकार कर लिया और साथ ही ब्रह्मा विष्णु को भी महर्षि का आतिथ्य स्वीकार करने को राजी कर लिया । जबतक इधर भोजन की तैयारी हो रही थी, तबतक शंकर विष्णु को साथ लेकर आश्रम के एक सुन्दर भबनमे गये और वहाँ एक सुकोमल शय्यापर लेटकर बहुत देरतक प्रेमालाप करते रहे । इसके अनन्तर वे आश्रमभूतिमें स्थित एक सुरम्य सरोवर में जाकर वहाँ जलक्रीडा करने लगे । 

रंगीले भोलेबाबा भगवान् श्रीहरिके पद्मदलायत लेचनोपर कमलकिञ्जल्कमिश्रित जल अंजलिके द्वारा फेंको लगे । भगवान ने उनके प्रहार को न सह सकने के कारण अपने दोनों नेत्र मूँद लिये । इतनेमें ही भोलेबाबा अवसर पाकर तत्काल उछलकर भगवान् के  कंधो पर आरूढ हो गये । वृषभारोहणका तो उन्हें प्रवास ही ठहरा, ऊपरसे जौरसे दबाकर उन्हें कभी तो पानीके अंदर ले जाये और कभी फिर ऊपर ले आवे । इस प्रकार जब उन्हें बहुत तंग किया तो विष्णुभगवान् ने भी एक चाल खेली । उन्होंने तत्क्षण शिबजी को पानीमें दे मारा । शिवजीने भी नीचेसे ही भगवान् की दोनों टाँगे पकडकर उन्हें गिरा दिया । 
इस प्रकार कुछ देरतक दोनोंमे पैंतरेबाजी और दाँव पेच चलते रहे । विमानस्थित देवगण अन्तरिक्ष से इस अपूर्व आनन्द को लूटने लगे । धन्य है वे आँखे जिन्होंने उस अन्दुत छटाका निरीक्षण किया । 

दैवयोग से नारदजी उधर आ निकले । वे इस अलौकिक दृश्य को देखकर मस्त हो गये और लगे बीणाके स्वरके साथ गाने । भगवान् शिव उनके सुमधुर संगीत को सुनकर, खेल छोड़कर जलसे बाहर निकल आये और ओदे वस्त्र पहने ही नारदके सुर-मे-सुर मिलाकर स्वयं राग अलापने लगे । अब तो भगवान् विष्णु से भी नहीं रहा गया । वे भी बाहर आकर मृदङ्ग बजाने लगे । उस समय वह समाँ बंधा जो देखते ही बनता था ।
सहस्त्रो शेष और शारदा भी उस समय के आनन्दका वर्णन नहीं कर सकते । बूढे ब्रह्माजी भी उस अनोखी मस्तीमे शामिल हो गये । उस अपूर्व समाज मे यदि किसी बात की कमी थी तो वह प्रसिद्ध संगीत-कोविद पवनसुत हनुमान् जी के आनेसे पूरी हो गयी । उन्होंने जहाँ अपनी हृदयहारिणी तान छेडी वहाँ सबको चुप हो जाना पड़। । अब तो सब के सब निस्तब्ध होकर लगे हनुमान् जी के गयायनको सुनने । सब के सब ऐसे मस्त हुए कि खाने पिने तक की सुधि भूल गये । उन्हें यह भी होश नहीं रहा कि हमलोग महर्षि गौतमके यहाँ निमंत्रित है । 

उधर जब महर्षि ने देखा कि उनका पूज्य अतिथिवर्ग स्नान करके सरोवर से नहीं लौटा और मध्याह्न बीता जा रहा है तो वे बेचारे दौडे आये और किसी प्रकार अनुनय विनय करके बडी मुश्किल से सबको अपने यहॉ लिवा लाये । तुरंत भोजन परोसा गया और लोग लगे आनन्दपूर्वक गौतमजी का आतिथ्य स्वीकार करने । इसके अनन्तर हनुमान्जी का गायन प्रारम्भ हुआ ।
भोलेबाबा उनके मनोहर संगीत को सुनकर ऐसे मस्त हो गये कि उन्हें तन मनकी सुधि न रही । उन्होंने धीरे से एक चरण हनुमान् कीअञ्जलिमे रख दिया और दूसरे चरण को उनके कंधे, मुख,कंठ , वक्षस्थल, हृदयके मध्यभाग, उदरदेश तथा नाभि मण्डलसे स्पर्श कराते हुए मौजसे लेट गये । यह लीला देखकर विष्णु कहने लगे- आज हनुमान के समान सुकृती विश्वमें कोई नहीं है । जो चरण देवताओ को दुर्लभ है तथा वेदो के द्वारा अगम्य हैं उपनिषद भी जिन्हें प्रकाश नहीं कर सकते, जिन्हें योगिज़न चिरकाल तक विविध प्रकार के साधन करके तथा व्रत उपवासादि से शरीर को सुखाकर क्षणभरके लिये भी अपने हृदयदेश में स्थापित नहीं कर सकते, प्रधान प्रधान मुनीश्वर सहस्त्रक्रोटि संवत्सरपर्यन्त तप करके भी जिन्हें प्राप्त नहीं कर सकते, उन चरणों को अपने समस्त अंगोपर धारण करने का अनुपम सौभाग्य आज हनुमान् को अनायास ही प्राप्त हो रहा है । मैंने भी हजार वर्ष तक प्रतिदिन सहस्त्र पद्मो से आपका भक्तिभावपूर्वक अर्चन किया, परंतु यह सौभाग्य आपने मुझे कभी प्रदान नहीं किया । 

मया वर्षसहस्त्रं तु सहस्त्राब्जै स्तथान्वहम् ।
भक्त्या सम्पूजितोsपीश पादो नो दर्शितस्त्वया ।
लोके वादो हि सुमहान् शम्भुर्नारायणप्रिय: ।
हरि: प्रियस्तथा शम्भोर्न तादृग् भाग्यमस्ति मे ।।(पद्म .पा.११४ । १९०-१९१)

लोकमे यह वार्ता प्रसिद्ध है कि नारायण शंकर के परम प्रीतिभाजन हैं परंतु अनाज हनुमान् को देखकर मुझे इस बातपर संदेह सा होने लगा है और हनुमान के प्रति ईर्ष्या भी हो रही है । भगवान् विष्णुके इन प्रेम लपेटे अटपटे वचन सुनकर शंकर मन ही मन मुसकराने लगे और बोले नारायण ! यह आप जया कह रहे है ?आपसे बढकर मुझे और क्रोईं प्रिय हो सकता है ?औरो की  तो बात ही क्या, पार्वती भी मुझे आपके समान प्रिय नहीं हैं 
न त्वया सदृशो मह्यं प्रियोsस्ति भगवन् हरे । 

पार्वती वा त्वया तुल्या न चान्यो  विद्यते मम ।।
(पद्म. पा .११४ । १९२)

इतने में ही माता पार्वती भी वहाँ उग पहुँची । शंकर को बहुत देरतक लौटते न देखकर उनके मनमें स्त्रीसुलभ शंका हुईं कि कहीं स्वामी नाराज तो नहीं हो गये । दौडी हुई महर्षि गौतम के आश्रम में पहुंची । गौतम की मेहमानी में जो कमी थी वह उनके आगमन से पूरी हो गयी । उन्होंने भी अपने पति की अनुमति लेकर महर्षि का आतिथ्य स्वीकार किया और फिर शंकरजी के समीप आकर उनकी और विष्णुभगवान की प्रणयगोष्ठी में सम्मिलित हो गयी । बातों हो बातोंमे उन्होंने विनोद तथा प्रणयकोप में शंकर जी के प्रति कुछ अवज्ञात्मक शब्द कहे और उनकी मुण्डमाला, पन्नगभूषण, दिग्वस्त्रधारण, भस्माङ्गलेपन और बृषभारोहण आदिका परिहास किया । तब तो विष्णु: भगवान् से नहीं रहा गया । श्रीहरि भगवान् शंकर की अबज्ञा को नहीं सह सके और बोल उठे -देवि ! आप ज़गत्पति शंकर के प्रति यह क्या का रही है ? मुझसे आपके ये शब्द सहे नहीं जाते । जहां शिवनिन्दा होती हो वहां हम प्राण धारण नहीं कर सकते, यह हमारा व्रत है । यह कहकर वे शिव गिरिजाके सम्मुख ही नखके द्वारा अपना शिरच्छेदन करने को उद्यत हो गये । शंकरजी ने बडी कठिनतासे उन्हें इस कार्यसे रोका । 

किमर्थं निन्दसे देवि देवदेवं ज़गत्पतिम् । 

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