सुंदर कथा ३१(श्री भक्तमाल – श्री नारायणदास जी बंगाल वाले) Sri Bhaktamal – Sri Narayan das ji

बंगाल के सुप्रसिद्ध राजा कीर्तिचन्द्र के राज्यमें तटपर श्री नारायणदास जी नाम के श्रीराम भक्त का घर था । वे बड़े ही शुद्धचित्त तथा सरल स्वभाव के मनुष्य थे । वे धनवान् थे और विद्वान् थे ,पर उनकी सादगी और सरलता ऐसी थी कि उन्हें कोई वैभव सम्पन्न समझ ही नहीं सकता था । धनमे उनकी आसक्ति थी भी नहीं । मर्थादापुरुषोत्तम श्रीराम में ही उनका चित सदा लगा रहता था । 

नारायणदासजी की पत्नी मालती भी भक्तिमती, सुशीला एवं पतिव्रता थीं । यद्यपि पत्नीके मनमें कोई सन्तान न होनेका दु:ख था; फिर भी नारायणदास जी को इस अभाव की तनिक भी परचा नहीं थी । अवस्था ढल जाने पर संसार त्यागकर श्री अयोध्याजीमे रहते हुए जीवनके शेष दिन भगवान् के भजन में बिता देनेका उन्होंने निश्चय किया । पत्नीका साथ चलने का दृढ आग्रह देखकर उसे  भी उन्होंने साथ ले लिया । उदार बैलोंपर आवश्यक सामान लादकर घर से वे चल पड़े । साथमें कोई भी सेवक ले चलना उन्हें पसंद नहीं आया, यद्यपि कई नौकर साथ चलने को उत्सुक थे । 

पति पत्नी श्रीराम नामका कीर्तन करते चलते थे । मार्गमे धर्मशालाओं में या किसी ग्राममें निवास करते थे । इस प्रकार वे चित्रकूट पहुंच गये । चित्रकूट की उस पुण्य भूमि को देखकर नारायणदास जी का हृदय प्रेम विहृल हो गया । वे वहाँ कुछ दिनके लिये ठहर गये । सत्सङ्ग, साधु सेवा, भजन कीर्तन, दान पुण्य करते हुए कुछ दिन चित्रकूट रहनेके पश्चात् वे अयोध्या की और चले । 

श्रीराम सीता जी तथा लक्ष्मणजी के साथ वनके बीहड मार्गसे ही आयोध्या से चित्रकूट आये है । हमें भी वन के कष्ठोंका अनुभव करते हुए उसी मार्ग से अयोध्या जाना चाहिये । यह सोचकर नारायणदास ने सीधा मार्ग छोड़ दिया और वे वन पर्वतो के दुर्गम मार्ग से चलने लगे । कौन-सा मार्ग सीधा अयोध्या जाता है और . कौन-सा नहीं, यह वे नहीं जानते थे । जानने का साधन भी नहीं था । 

भगवान का नाम-कीर्तन करते कंकड़-पत्थर और काँटोंसे भरी ऊबड़-खाबड़ पगडंडो से भयंकर पशुओं से भरे जंगल के बीच से वे चले जा रहे थे । वृक्षोंके नीचे किसी झरने के किनारे विश्राम करते और बैल वहीं घास चर लेते, इस प्रकार यात्रा चल रही थी । एक कार वे लुटेरे भीलो के गांव के पास जा पहुंचे । भीलोंने समझ लिया कि इनके पास धन है । उन्होंने इनके पास आकर पूछा- तुमलोग इस बीहड़ वन में है केसे आ गये?  नारायणदास ने सरलतापूर्वक बता दिया हैं कि हम अयोध्या जी जा रहे है । भीलोंने कहा- तुमलोग तो मार्ग भूलकर इस वनमें आ गये। चलो, अच्छा हुआ कि हमलोगो से भेंट को गयी । हमलोग भी अयोध्या जी ही है जा रहे हैं ।

 नारायणदास ने समझा कि हमें ये मार्गदर्शक मिल गये । वे उन दुष्ठोंपर विश्वास करके निश्चिन्त हो गये । वे लोग इनको बातों में भुलाकर दुर्गम वनमें ले गये । घोर वनमें पहुंचकर भैलो ने नारायणदास को पकड़ लिया और इतना पीटा कि वे मूर्छित हो गये । उनके हाथ पैर बाँधकर एक खाइमे फेंक दिया और ऊपरसे पत्थर पटक दिये ।  उनको मरा समझकर वे दुष्ट उनकी पत्नी के पास आये ।  मालती अपने पुण्य पति की दुर्दशा देखकर मूर्छित हो गयी थी । वह पृथ्वीपर पडी थी । वे नरराक्षस उसे घसीट ने लगे और गालियाँ देने लगे । थोडी देरमें मालती को होश आया ।

उसने देखा कि इन दुष्ठो की नीयत बहुत बुरी है । भय और क्रोध से वह कांपने लगी । कोई और उपाय न देखकर उस मालती ने नेत्र बंद करके श्रीराघव जी को पुकारना प्रारम्भ किया– प्रभो ! आप शरणागत रक्षक नहीं हैं क्या ? मैंने तो सुना है कि सेवकों की रक्षाके लिये ही आप धनुष-बाण धारण करते हैं । क्या सचमुच आप शरणमें आये अनाथों को शरण देते हैं? हमारे तो आप ही स्वामी हैं, आप ही रक्षक हैं । हमारी रक्षा क्यों नहीं करते, दयामय? 

मालती नेत्र बंद किये कातर कण्ठसे प्रार्थना कर रही थी । भीलों को लगा कि कहींसे छोड़े की टापोंका शब्द आ रहा है । वे कुछ सोच सकें, इससे पहले ही सफेद छोड़ेपर सवार एक नौजावन आता दिखायी पडा । मस्तकपर सोने का मुकुट, कानोंमें रत्नकुण्डल, सर्वाङ्ग आभरणभूषित, कमरमे तलवार, हाथमें विशाल धनुष, पीठपर तरकस कसा हुआ । उस श्यामवर्ण कमललोचन युवक को देखकर डाकू डर गये । उन्हें वह यमराज से भी भयंकर दीख पडा । प्राण लेकर वे चारों ओर भागे । किसीका भागते समय गिरकर सिर फूटा, किसीका पैर टूटा, किसीके दांत टूटे । सबको चोट लगी । 

उस युवकने पास आकर घोड़ेसे उतरकर कहा- ‘ माता ! तुम कौन हो? इस वनमें अकेली केसे आयीं? तुम्हारे साथ क्या कोई पुरुष नहीं है? ये कौन तुम्हें घेरे हुए थे ? प्राणोंमें अमृत घोलते हुए ये शब्द कानमें पड़े । मालतीने नेत्र खेलकर देखा और एकटक उस रूपराशिको देखती रह गयी । युवक के फिर पूछनेपर उसने किसी प्रकार बड़े कष्टसे अपनी कहानी सुनाकर प्रार्थना करते हुए कहा -मैं नहीं जानती कि तुम कौन हो । कोई भी हो, मेरी दुर्दशा देखकर ही दयामय रघुवीर ने तुम्हें भेजा है । मैं नहीं जानती कि मेरे पतिदेव को ये दुष्ट कहां फेक आये । वे जीवित नहीं होंगे । तुम मुझ दीना अबलापर दया करो । मेरे धर्मके भाई बनो । एक चिता बना दो । मैं उसमें जलकर अपने अंदर की ज्वाला को शान्त करूंगी । 

युवक ने कहा – देवि ! आप चिन्ता न करे । आपके पति जीवित हैं । मैंने आते समय यह शब्द सुना है-  हाय मालती! हमलोग अयोध्या जाकर श्रीरामके दर्शन न कर सके । अवश्य ये शब्द तुम्हारे पति के ही होंग । तुम मेरे साथ चलो । वह स्थान यहां से दूर नहीं है । 

मालती में अब एक पग चलने की भी शक्ति नहीं थी । भवभयहारी भगवान् ने अपना अभय हस्त बढाया और ‘माता’ कहकर मालती को आश्वासन दिया । वह उन सर्वेश्वरका हाथ पकडकर चलने लगी । डाकुओ ने नारायणदास जी को खाईंमें पटक दिया था । उनके हाथ पैर लताओ से बंधे थे । उनका अङ्ग अङ्ग मार पड़नेसे कुचल गया था । यड़े बड़े कई पत्थर उनकी  छातीपर ऊपर से गिरे थे । उन्होंने मन- ही-मन कहा-  प्रभु! तुम्हारे प्रत्येक विधानमें ही जीवका मङ्गल है । मुझें तुम्हारी प्रत्येक व्यवस्था में आनन्द है । मैं तो एकमात्र तुम्हारी शरण हूँ ।  इतना सोचते सोचते वे मूर्छित हो गये । मालती ने वहाँ जाकर पतिकी यह दशा देखी तो वह धड़ाम से भूमिपर गिर पडी । भगवान् ने उसे आश्वासन  दिया । 

प्रभुने खाईमें उतर कर नारायणदास की छातीपर से शिलाएं हटा दीं, उनके सारे बन्धन काट डाले और उन्हें  ऊपर उठा लाये । श्रीराघव जी के हाथोका अमृतस्त्रावी स्पर्श पाकर नारायणदास के शरीरमें चेतना लौट आयी । उनके शरीर, मन, प्राण सब की व्यथा तत्काल दूर हो गयी । नारायणदास ने नेत्र खोलने पर अपने सामने उन धनुषधारी को देखा। कई क्षण वे अपलक देखते रहे । हदयने कहा – इस भीषण विपत्ति से परित्राण भला, श्रीजानकी नाथ को छोड़कर और  कौन दे सकता है ।

ये पीताम्बरधारी, कौस्तुभमणि गलेमे पहनने वाले मेरे श्रीरघुनाथ ही तो हैं । बस, वे प्रभुके चरणोंमें लोट गये । उनके नेत्रोंकी धाराने प्रभुके चरण धो दिये । भगवान अपने ऐसे भक्तो क्या छिपे रह सकते हैं? प्रभुने अपने ज्योतिर्मय चिन्मय स्वरूप का दर्शन देकर दम्पति को कृतार्थ किया, उन्हें भक्ति का वरदान दिया । भगवान् की आज्ञासे नारायणदास पत्नी के साथ वहाँ से चलकर कुछ दिमोंमें अयोध्या पहुंच गये । श्रीसरयूजीके तटपर उन्होंने अपनी पर्णकुटी बना ली । वहीं साधु स्नेचा और भगवान का भजन करते हुए उन्होंने शेष जीवन व्यतीत किया । 

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