सभी पूज्य सिख गुरु श्रीराम कृष्ण के अनन्य उपासक ,सनातन धर्मी थे एवं गौ ब्राह्मणों को पूज्य मानते थे

® पूज्य संत श्री धर्मसिंह से सुनी और एक भक्त द्वारा बताई गयी जानकारी के आधार पर दिया गया है । कृपया अपने नाम से प्रकाशित ना करे । Copyrights : http://www.bhaktamal.com ® 

एक बडे ही उच्चकोटि के सुप्रसिद्ध संत हुए पूज्य संत श्री धर्मसिंह जी महाराज और बड़े ही विद्वान् महापुरुष माने गये है । एक जिज्ञासु ने उनके श्रीचरणों में बैठकर जो सदुपदेश लिखे थे, वे यहां पर दिये जा रहे है ।

सिख गुरुओं का जीवनाधार श्रीरामनाम

१.प्रश्न -महाराज़ ! हमे क्या करना चाहिये ?
उत्तर- मनुष्य जीवन का उद्देश्य एकमात्र ईश्वर-प्राप्ति करना है, सो तुम्हें भी ईश्वर-प्राप्ति का साधन करना चाहिये ।

२.प्रश्न-ईंश्वर प्राप्तिका साधन क्या है ?
उत्तर -ईंश्वर प्राप्ति का साधन है श्रीरामनाम जपना ,श्रीराम भक्ति करना ।

३.प्रश्न-क्या ईश्वर और राममे कुछ अंतर है ?
उत्तर- उसे ही ईश्वर कहते है और उसे ही श्रीराम कहते है और उसे ही श्रीकृष्ण कहते है इनमें कोई अन्तर नहीं है ।

४.प्रश्न- सिख मत में और गुरुग्रन्थसाहब में कल्याण का साधन क्या बताया गया है ?
उत्तर- हमारे सिख धर्म मे और श्री गुरुग्रन्थ साहब में सनातन धर्मकी सभी बातो को मान्यता दी गयी है । वेद-शास्त्रपुराणों की बात ही श्री गुरुग्रन्थसाहब में भरी पडी है और श्रीगुरुग्रन्थ साहब श्रीराम, कृष्ण, हरि, गोविन्द, नारायण आदि श्रीभगवन्नामो से भरा पडा है ।

५.प्रश्र- आजकल के बहुत से सिख यह कहते है कि हम हिन्दू नहीं है और हमारा हिन्दुओं से कोई संबंध नहीं है और हम दशरथनन्दन श्रीराम को नहीं मानते हम तो निराकार राम को मानते हैं और श्री गुरुग्रन्थसाहब में निराकार रामकी उपासना बतायी गयी है, इस संबंध में आपका बया मत है ?
उत्तर- जो सिख होकर ऐसा कहते है कि हम हिन्दू नहीं है और हम श्रीदशरथनन्दन राम को नहीं मानते और हमारा राम निराकार राम है तो वे महामूर्ख है ,कोरे अज्ञानी है । उन्हें न तो सिखधर्म का ज्ञान है और न उन्हें श्री गुरुग्रन्थसाहब का ज्ञान है । हमरे पूज्य प्रात:स्मरणीय श्री गुरुगोविन्द सिंह जी महप्राजने श्रीभगवती नैना देवी को प्रसन्न कर प्रकट किया तो उन्होंने ,उनसे गौ रक्षा एवं हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए प्रार्थना की

यही देहू आज्ञा तुरक को खपाऊँ ।
गोघात का दुख जगत् से मिटाऊँ ।।
सकल जगत महि खालसा पंथ गाजे ।
जागै धर्म हिन्दू सकल भंडभाजे ।। 

यदि वे हिन्दू धर्म को नहीं मानते होते तो श्री नैनादेवी से गोरक्षा करने की और हिन्दूधर्म की रक्षा करने की याचना क्यों करते ?

६.प्रश्न – तो क्या सिख गुरु साकार-उपासक थे ?
उत्तर- अवश्य ही । श्री गुरुग्रंथसाहब में डंके की चोट श्रीराम-कृष्ण की स्तुति भरी पडी है । तो सुनो, श्रीगुरु ग्रन्थसाहब मे क्या लिखा है-

धन धन मेघा रोमावली । जहँ कृष्ण ओढ़े कामली ।
धन धन वृन्दावना। जहँ खेले श्रीनारायणा ।।

यह साकार भगवान् श्रीकृष्ण का गुणगान नहीं है तो क्या है ?

एक कृष्णं सर्वदेवा देव देवात आत्म:
आत्मं श्रीवासुदेवस्य जे को जानत भेव ।
नानक ताका दास है सोई निरंजन देव ।।
आये गोपी, आये कान्हा, आये गऊ चरावे वाना ।
आप उपावे आप खपावे । तुष लेप नहीं हक तिहा रंगा ।।

और सुनिये-

हरि हरि करत पूतना तरी । बाल घातिनि कपटहि मरी ।। केसी कंस मथन जिन कीया । जीव दान काली को दिया ।। प्रणवे नामा ऐसो हरी । जास जपत भये अपदा टरी ।। (श्री ग्रन्थसाहब) 

अब सुनिये श्रीगुरु नानकदेव जी महाराज की श्रीरामभक्ति के प्रमाण । श्रीगुरु नानक देवजी कहते हैं-

सूरजवंशी रघु भया रघुकुल वंशी राम।
रामचन्द्र के दोए सूत,लऊ कुश ताहि नाम ।।
संग सखा सब तजि गये कोऊ न निबहो साथ ।
कहि नानक इस विपति में टेक एक रघुनाथ। 

इसमें स्पष्ट रूपसे श्रीगुरुनानक देव श्रीरघुनाथ जी का भजन करना और श्रीदशरथ नंदन श्रीराम की उपासना करना बतला रहे हैं इससे बढकर और प्रमाण क्या चाहिये? रघुनाथ क्या निराकार का नाम हो सकता है ?

और सुनो श्रीरामनामकी अद्भुत विलक्षण महिमा की बात-

सबसे ऊंच राम प्रकाश । निस बासर जप नानक दास ।।
न ओ मरे न ढागे जाहिं । जिनके राम बसे मन माहि ।। 

श्रीगुरुनानक देव तो बाल्यावस्थासे ही परम श्रीरामभक्त थे और श्रीरामभक्तिमे हर समय सराबोर रहा करते थे तथा उन्हें बाल्यावस्था से ही श्रीरामभक्ति का नशा सवार हो गया था और वे श्रीरामभक्तिमे चूर रहा करते थे । जब घरचालों ने देखा कि यह दिन-रात श्रीराम भजन में ही संलग्न रहता है और घरका कोई काम नहीं करता, इसलिये इनको खेतपर चिडिया उडाने का काम सौपा गया कि तुम चिडिया उडाकर खेतकी रक्षा किया को । श्री नानक जी खेतपर चले तो गये पर सब जीवमात्रमे अपने परम इष्टदेव भगवान् श्रीराम को देखने वाले संत श्रीगुरुनानकदेवजी महाराज भला  उन चिडियों में अपने परम इष्टदेव श्रीरामजी को कैसे न देखते? वे चिडियों में भी अपने श्रीरघुनाथजी को  देखकर कह उठे

रामजी की चिडिया, रामजी का खेत ।
खाओ चिडिया भर भर पेट ।। 

अब तो घरवालों को बहुत बुरा लगा । इन्हें खेत से हटाकर एक बार अनाज तोलने का काम दे दिया गया । श्री नानक जी से कोई अनाज तोल लेने के लिये आया । जिस समय तोला जाता है तो यह भारतीय प्राचीन परम्परा है कि उस समय एक को एक न कहकर तोलनेवाले एक की जगह राम ही राम कहते है और उसके बाद दूजा, तीजा कहना प्रारम्भ करते है । जिस समय आपने अनाज तोंलनेके लिये तराजू अपने हाथमे ली और तराजूके एक पलड़ेमें अनाज और दूसरे पलड़ेमे बाट रखा और इधर लेनेवाले ने अपना कपड़ फैलाया और आपने पहले पलड़े को ज्यों ही राम ही राम कहना प्रारम्भ किया तो फिर क्या था आप श्रीराम प्रेम के नशेमें सराबोर हो गये और आपको अपने शरीर की सुध बुध जाती रही । अब न तो अपने तराजू-बाटका ध्यान रहा और न अनाज का और न सामने बैठे अनाज लेनेवाले ग्राहक का । बस मुखसे राम ही  राम हो रहा है और नेत्र मुँद गये हैं हदय गद्गद हो रहा है, अब भला श्रीरामनामामृत को छोड़कर इस असार संसारके दूजे-तीजेके चक्कर में कौन फँसे । भला श्रीरामनाम में जो अद्भुत विलक्षण मजा है, श्रीरामनाममें जो अद्भुत स्वाद है और श्रीरामनाम मे जो अद्भुत मिठास है उसे भला ऐसा कौन है कि जिसे यह स्वाद लग जाय और फिर वह उसे छोड़ सके ? श्री नानक जी ने संसार को दुखों की खान माना और श्रीरामनामामृत का पान करना ही सब सुखो का केन्द्र माना

नानक दुखिया सब संसारा ।
सुखिया वही जो नाम अधारा ।। 

श्री नानक देव जी  तंबाकू, सुल्फा, गाँजा आदि सब नशे के घोर विरोधी थे । बस अपने श्रीरामनामके नशे को सर्वोपरि महत्व देते थे और श्रीराम प्रेमके नशेमें ही हर समय झूमते रहते थे ।
श्रीरामभक्तिका क्या उपकार दिखाया ?एक बार श्री नानक देव जी मुसलमानों के देशमें जा निकले और श्रीराम भक्ति का प्रचार करते हुए मक्का- मदीना  जा पहुँचे । रात्रि होनेपर एक मस्जिद की ओर पैर करके सो गये । प्रात:काल होनेपर जब उस मस्जिद का मुल्ला आया तो उसने आपको जो मस्जिद की तरफ पैर करके सोते हुए देखा तो वह बडा नाराज हुआ और आगबबूला हो गया । आपसे पूछा कि बताओ तुम कौन हो ? उत्तर में श्रीगुरुनानक देवने कहा –

हिन्दू कहूं तो मारिये मुसलमान कहूं नाहीं ।
पंचतत्व का पूतला नानक मेरा नांव ।। 

आपने मनमें विचार किया कि मैं वास्तव में हिन्दू हूँ, यदि इसके सामने सही  बात कह दू कि मैं हिन्दू हूँ तो यह मुझे मारेगा और मै मुसलमान हूँ नहीं। मई मुसलमान हु नहीं  यह बात झूठ कैसे कह दूँ? इसलिये इन्होंने अपने को पाँच तत्त्व का पुतला बता दिया । मुल्लाने फिर प्रश्र किया कि तू खुदा की तरफ पैर करके क्यों सोया है ? इसके उत्तर में श्री गुरुनानक देव ने कहा कि खुदा तो सब जगह है, यदि खुदा सब जगह नहीं है तो तुम मुझे उधर को कर दो जिधर खुदा न हो ।  मुल्ला ने जब श्री नानक देव का पैर पकड़कर इधर से उधर को और घुमाया तो सबने क्या देखा कि से गुरुनानक देव के पैरके घूमने के साथ-साथ वह मस्जिद भी उधर को ही घूम रही है, जिधर को पैर घूम रहे है । जड़ मस्जिद भी श्रीरामभक्त संतके इशारे पर इधर से उधर घूमते देखकर अब
तो उन मौलवियों के होश गुम हो गये और यह श्री नानक देव के श्रीचरणोंमे लोट गए, नतमस्तक हो गये और करबद्ध क्षमा माँगने लगे ।
काबुल पहुंचने पर बादशाह ने उनका स्वागत किया और सोने के कटोरे में आपके लिये बाबर बादशाहने भाँग पीने को दी और इनसे करबद्ध प्रार्थना की कि साईजी महाराज इसे पीजिये । भला श्री गुरुनानकदेव जी इस नशीली चीज़ को कैसे पी सकते थे  ? ये तो हर समय श्रीरामप्रेम के नशेमे झूमनेवाले थे । श्री नानक जी ने उससे कहा –

भांग तंबाकू छोतरा उतर जाय परभात ।
नाम खुमारी मानका चढी रहे दिन रात ।। 

अरे बावले बादशाह ! तुम्हारा यह नशा क्या नशा है यह तो तुच्छ है और यह तो सुबहतक उतर जायगा, इसके सेवन से क्या लाभ है हम तो श्रीरामनाम की खुमारी में मस्त रहते है जो दिन-रात चढी रहती है । हमें तुम्हारा यह तुच्छ नशा नहीं चाहिये ।
श्री नानक देव जी ने पूज्या गोमाता के प्रति बहुत भक्ति रखते थे। गौ माता की अद्भुत महिमा के सम्बन्ध में श्री नानक देव जी ने कहा है –

गऊ चौदावाँ रतन है, कामधेन तेह नाम ।
पूजन सब अवतार तिसें करके मात समान ।।
शीर जिन्हा दा पीजिये तिस मारियाँ बहुत गुनाह ।
नानक आखे रूकन दीन बहु भुखियाँ होय निबाह ।। (जन्म-साखी)

७.प्रश्न -महाराज ! क्या श्रीगुरुग्रन्थ साहब मे जिन कबीर, नामदेव, रैदास आदि संतों की वणियां है वह सब संत भी श्रीराम नाम जपते थे और क्या वह भी सब रामभक्त थे और क्या वह भी निराकार राम को नहीं, अपितु श्रीदशरथनन्दन श्रीराघवेन्द्र प्रभु के ही माननेवाले थे ? उत्तर- नि:संदेह सभी गुरु और सभी संतों ने अपनी वाणियों में श्री दशरथनन्दन रघुनन्दन, कौसल्यानन्दन श्रीरामका ही एकमात्र गुणगान किया है ।

८.प्रश्न-संत कबीर जी महाराज के बारे में तो यह कहा जाता है कि वे निराकार के उपासक थे, क्या यह बात सत्य है?
उत्तर-नहीं, कभी नहीं, तीन कालमे नहीं । संत कबीरजी ने जिन्हें अपना गुरु बनाया वे कौन थे ? जातिके ब्राह्मण और परम वैष्णव श्रीरामोपासक श्रीरामानंद जी महाराज थे । भला जो निराकार को माननेवाला होगा वह साकारोपासक को अपना गुरु क्यों बनायेगा ?संत कबीर जी भी हर समय श्रीरामनामामृत का पान किया करते थे और साकार उपसक थे ।श्री राम-कृष्ण अनन्य भक्त थे ।

कबिरा मन निर्मल भैया जैसा गंगा नीर ।
पीछे पीछें हरि फिरे कहत कबीर कबिरा ।। 

यह बात देखिये । क्या निराकार पीछे-पीछे कबीर-कबीर कहते घूम सकता है ? यदि धूम सकता है तो फिर वह निराकार कैसेे हुआ ? यहि नहीं घूमता तो क्या कबीर संत होकर झूठ बोलते है ?और सुनो कबीर के साकारोपासक होनेका प्रबल प्रमाण-

कबिरा कबीरा क्या कहे चल यमुना के तीर ।
एक एक गोपी चरण पर वारौ कोटि कबीर।। 

और सुनिये ध्यान से-

कबिरा धारी अगम की सद्गुरु दयी बताय।
उलट ताहि पढिये सदा स्वामी संग लगाय ।। 

अब इसके अर्थपर ध्यान दीजिये । हमरे सद्गुरु ने उस अगम अगोचर परब्रह्म की धारा को हमे बता दिया है, अत: उसे पलटकर अर्थात् धारा शब्द को उलट कर पढ़ने पर राधा शब्द बन जायगा, उसे पढो पर केवल राधा नहीं अपितु उसके साथ उसके स्वामी (श्रीकृष्ण) को संगमे जोड़कर अर्थात् राधा-कृष्ण ऐसी ही भावना से जाप करो।
क्या अब भी उन्हें निराकार रामका उपासक मानोगे ? संत कबीर जी कहते है-

कबिरा सब जग निरधना धनवत्ता नहि कोय ।
धनवत्ता सोइ जानिये जाके रामनाम धन होय ।।
नाम जपन्ता कुष्टी भला चुइ चुइ पर जो चाम ।
कंचन देह किस काम का जो मुख नाहीं राम।
राम मरे तो हम मरे नातर मरे बलाय ।
अविनाशी की गोद में मरे न मारा जाय। 

संत कबीर जी कलिकाल में कल्याण का एकमात्र उपाय श्रीरामनाम-कीर्तन और श्रीरामकथा का श्रवण करना ही मानते है । निराकार की कथा कैसी हो सकती है?

कथा कीर्तन कालीविषे भवसागर की नाव ।
कहैं कबीर जग तरन को नाहिन और उपाव।
कथा कीर्तन करनकी जाके निश दिन रीत ।
कहैं कबीर ता दाससे कीजै निश्चय प्रीत ।।

और भी संत कबीर जी कहते हैं-

भजो रे भैया राम गोविन्द हरी ।
जप तप साधन कछु नहि लागत खरचत नहीं गठरी ।। 

वही रघुनन्दन राम और वही गाय चराने वाले कन्हैया गोविन्द ।

वाहे गुरु, वाहे गुरु, वाहे गुरुके तत्त्व को समझो । हमरे सभी पूज्य गुरुजान वाह गुरु कहते थे और सारा सिख समाज वाहे गुरु, वाहे गुरु कहता है, पर क्या आपने कभी इसपर ध्यान दिया कि इसका असली रहस्य क्या है ? इसका तात्पर्य यह है कि चार युग होते है…सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग । इन चारो युगोंके इष्टदेवो के चारों नामो को लेकर वाहे गुरु बना है । इसमें भी चार शब्द है जैसे कि व ह ग र । सतयुग से विष्णु से व लिया और त्रेतामे हरि की पूजा होती थी इसलिये हरिसे ह लिया और द्वापरमे गोविन्द की पूजा होती थी,गोविन्द मुख्या नाम था तो गोविन्द से ग लिया और कलियुगमें मुख्य नाम है राम । इस राम-नाम से र लिया । इस प्रकार प्रभुके चारों युगोंके चारों नामके एक-एक अक्षर को लेकर तब यह वाहे गुरु बना है । जब वाहे गुरुमें भगवान् श्रीविष्णु, हरि, गोविन्द, राम ये सब नाम लिये गये है जो यह सब साकारके नाम है या निराकार के ?कलियुगमें एकमात्र जीव के कल्याणका साधन श्रीरामनाम बताया गया है और यही बात वेद-पुराणोंने भी बतायी है । वेद-नुराणों के सम्बन्ध मे हमारे यहाँ स्पष्ट शब्दों में कहा गया है-

वेद पृरान कतहुँ न झूठे ,झूठे जो न विचारे । 
इतना ही नहीं श्री गंगा जी की, श्राद्ध-तर्पण की महिमा श्रीगुरुग्रन्थ साहब में आयी है-

आपन देय जुलू भर पानी ।
ते निन्दे जिन गंगा आनी ।। 

आप तो अपने पितरों के निमित्त चुल्लूभर पानी भी नहीं दे सकते और निन्दा करते है उस भगीरथजी की जो अपने पितरों के तारने के निमित्त साक्षात् श्रीगंगा महारानी को इस भूतलपर ले आये।
हमारे सभी सिख गुरु हाथमें माला लेकर श्रीराम नाम, श्रीकृष्ण नाम जपते थे और गो-ब्रह्मण-प्रतिपालक थे और कट्टर सनातनधर्मी हिन्दू थे । श्रीगुरु तेगबहादुर साहबने तो –

कीनो बड़ो कुलुमे साखा ।
तिलक जज्ज राखा प्रभुताका ।। 

चोटी, तिलक, यज्ञोपवीत की रक्षाके लिये ही उन्होंने अपने प्राण न्यौछावर किये थे । सभी सिखगुरु वर्णाश्रम धर्म को मानते थे और तीर्थयात्रा करते थे, देव मन्दिरों को मानते थे और भगवान् श्रीराम-कृष्ण के गुणगान करते थे और कथा-कीर्तन करते थे । पंजाब-केसरी महाराजा श्रीरणजीतसिंह नें लाखों रुपया ज्वालाजीके मन्दिरमें, विश्वनाथ-मनिदयों तथा स्वामी नारायण के मन्दिर बनवाने मे खर्च किये थे और वे गो-ब्राहाणों के कट्टर परम भक्त थे और गोस्वामी श्रीतुलसीदास जी महाराज की रामायण को एक ब्राह्यण के द्वारा बड़े प्रेमसे सुना करते थे । सबके जीवनका श्रीराम नाम ही आधार रहा है ।

जो भी संप्रदाय अथवा धर्म के लोग कब्र पूजा ,सेवा, नमन करना ,माला,चादर चढ़ाना करते है , अथवा जो ग्रन्थ का पूजन करते है वे भी मूर्ती पूजक ही कहे जाते है। मूर्ती का अर्थ केवल भगवान् के किसी रूप की प्रतिमा का पूजन करना नहीं है । प्रत्येक मनुष्य जो अपने शरीर को भोजन कराता है,स्नान कराता है, वस्त्र और भोग अर्पण कर रहा है वो मूर्ति पूजा ही कर रहा है, शरीर तो मूर्ति ही है मिट्टी से बानी।

हमारे ऋषि महान् थे, उन्होंने तप के द्वारा परमात्मा के स्वरुप को जाना है । परमात्मा साकार एवं निराकार दोनों है । निराकार परमात्मा ने भक्तो और प्रेमियो के कारण ही रूप धारण किया है । मूर्ति पूजा (साकार)से ही आरंभ करते करते निराकार तक पहुँच सकते है, ये भी एक गणित है। जैसे गणित में हमें कोई चीज मालुम नहीं हो तो उसे x मान लेते है और नियम अनुसार सूत्र लगाकर उसका मान निकालते है ।वैसे ही परमात्मा हर जगह है ,कोने कोने में है।

हमने मान लिया की परमात्मा इस मूर्ति में है,उसकी प्रतिष्ठा मंत्रो से की और उस मूर्ति को ही भगवान् मानकर गुरु के बताये मार्ग से सेवा, पूजा ,मन्त्र से उसे सिद्ध कर लिया जाए तो भगवत् प्राप्ति सहज है । भगवान् तो गन्दी से गन्दी जगह में भी विराजमान है पर क्या कूड़े कचरे की जगह पर ह्रदय में पूजा का भाव आएगा ,क्या कूड़े कचरे किं जगह पर माला जप करने में भाव आएगा , नहीं । इसिलए मोटी मोटी भाषा में कहा जाये तो इन्ही सब कारणों से मूर्ति पूजा और सेवा का विधान है । ऐसे हमारे संत महात्माओ में कितने उदहारण है जिन्होंने प्रभु के विविध रूपों में दर्शन प्राप्त किये है ,नाम की गिनती भी न हो सके इतने है। परमात्मा एक है, भक्त को प्रभु का जो भी रूप प्रिय है उसी रूप में प्रभु उसे दर्शन देते है ।

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