भगवान् श्री गौरी शंकर एवं श्री लक्ष्मी नारायण एक स्वरुप है -धर्म शास्त्रो में अनेक प्रमाण ।

भगवान् श्री गौरी शंकर और श्री लक्ष्मी नारायण एक ही है इसके बहुत से प्रमाण शास्त्रो में उपलब्ध है। प्रमुख कुछ कथाये और श्लोक यहाँ दीये जा रही है जिस कारण से इनका एक स्वरुप होना स्पष्ट है –

shiv vishnu one form

(१)एक बार भगवान् नारायण अपने वैकुण्ठ लोक में सोये हुए थे । उन्हीने एक स्वप्न देखा , स्वप्न में वे क्या देखते है कि करोडो चन्द्रमाओं की कान्तिवाले, त्रिशूल डमरू धारी, स्वर्णाभरण भूषित, सुरेन्द्र वन्दित, अणिमादि सिद्धिसेवित त्रिलोचन भगवान् शिव प्रेम और आनन्दातिरेक़ से उन्मत्त होकर उनके सामने नृत्य कर रहे है । उन्हें देखकर भगवान् श्री हरि हर्ष गदगद हो सहसा  शय्यापर उठकर बैठ गये और कुछ देर तक ध्यानस्थ बैठे रहे । उन्हें इम प्रकार बैठेे देखकर श्रीलक्ष्मी जी उनसे पूछने लगी कि -भगवन्! अपके इस प्रकार उठ बैठने का क्या कारण है ?

भगवान् ने कुछ देरतक उनके इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं दिया और आनन्द मे निमग्न हुए चुपचाप बैठे रहे । अन्त मे कुछ स्वस्थ होनेपर वे गदगद कंठ से इस प्रकार बोले – देवि ! मैंने अभी स्वप्न में भगवान् श्रीमहेश्वर का दर्शन किया है, उनकी छवि ऐसी अपूर्व आनन्दमय एवं मनोहर थी कि देखते ही बनती थी । मालूम होता है, शंकर ने मुझे स्मरण किया है । अहोभाग्य ! चलो, कैंलास में चलकर हमलोग महादेव के दर्शन करे । यह कहकर दोनों कैलास की ओर चल दिये ।

मुश्किल से आधी दूर गए होंगे कि देखते है भगवान् शंकर स्वयं गिरिजा के साथ उनकी ओर चले आ रहे है । अब भगवान् के आनन्द का क्या ठिकाना ?मानो घर बैठे निधि मिल गयी । पास आते ही दोनों परस्पर बड़े प्रेमसे मिले । मानो प्रेम और आनंद का समुद्र उमड़ पहा । एक दूसरे को देखकर दोनों के नेत्रासे आनन्दाश्रु बहने लगे और शरीर पुलकायमान हो गया । दोनों ही एक दूसरे से लिपटे हुए कुछ देर मूकवत् खड़े रहे ।

प्रश्नोत्तर होनेपर मालूम हुआ कि शंकरजी को भी रात्रिमे इसी प्रकार का स्वप्न हुआ कि मानो विष्णु। भगवान् को वे उसी रूपमें देख रहे हैं जिस रूपमें वे अब उनके सामने खड़े थे । दोनो के स्वप्न का वृत्तान्त अवगत होनेपर दोनों ही लगे एक दूसरे से अपने यहाँ लिवा ले जाने का आग्रह करने । नारायण कहते वैकुण्ठ चलिए और शम्मु कहते कैलास की ओर प्रस्थान कीजिये । दोनों के आग्रहमें इतना अलौकिक प्रेम था कि यह निर्णय करना कठिन हो गया कि कहां चला जाय ? इतने ही में क्या देखते है कि बीणा बजाते, हरिगुण गाते नारदजी कहीं से आ निकले । बस, फिर क्या था लगे दोनों ही उनसे निर्णय कराने कि कहा चला जाय । नारदजी तो स्वयं परेशान थे उस अलौकिक मिलन को देखकर; वे तो स्वयं अपनी सुध बुध भूल गये और लगे मस्त होकर दोनोंका गुणगान करने ।

अब निर्णय कौन करे ? अन्तमें यह तय हुआ कि भगवती उमा जो कह दे वाही ठीक है । भगवती उमा पहले तो कुछ देर चुप रहीं । अन्त में  वे दोनों को लक्ष्य करके बोली- नाथ ! नारायण ! आपलोगो के निश्चल, अनन्य एवं अलौकिक प्रेम को देखकर तो यही समझमे आता है कि आपके निवासस्थान अलग अलग नहीं है, जो कैलास है वही वैकुण्ठ है और जो वैकुण्ठ है वही कैलास है, केवल नाम में ही भेद है । यही नहीं, मुझे तो ऐसा प्रतीत होता है कि आपकी आत्मा भी एक ही है, केवल शरीर देखने में दो है । और तो और, मुझे तो अब यह स्पष्ट दीखने लगा है कि आपकी भार्याएँ भी एक ही है दो नहीं ।

जो मैं हूँ वही श्रीलक्ष्मी है और जो श्रीलक्ष्मी है वही मैं हूँ । केवल इतना भी नहीं, मेरी तो अब यह दृढ़ धारणा हो गयी है कि आपलोगों में से एक के प्रति जो द्वेष करता है, वह मानो दूसरे के प्रति ही करता है, एक की जो पूजा करता है, वह स्वाभाविक ही दूसरे की भी करता है और जो एक को अपूज्य मानता है, वह दूसरे की भी पूजा नहीं करता । मैं तो यह समझती हूँ कि आप  दोनों में जो भेद मानता है, उसका चिरकालतक घोर पतन होता है । मैं देखती हूँ कि आप मुझे इस प्रसंग में अपना मध्यस्थ बनाकर मानो मेरी प्रवञ्चना कर रहे हैं मुझे चक्कर में डाल रहे है, मुझे भुला रहे है । अब मेरी यह प्रार्थना है कि आपलोग दोनों ही अपने अपने लोक को पधारिये । श्रीविष्णु यह समझें कि हम शिवरूप से वैकुण्ठ जा रहे है और महेश्वर यह मानें कि हम विष्णुरूप से कैलास गमन कर रहे है ।

इस उत्तर को सुनकर दोनों परम प्रसन्न हुए और भगवती उमा की प्रशंसा करते हुए दोनों प्रणाम आलिंगन के अनन्तर हर्षित हो अपने अपने लोक को चले गये ।
लौटकर जब श्री विष्णु वैकुपठ पहुंचे तो श्रीलक्ष्मी जी उनसे पूछने लगी कि- प्रभो! उसे अधिक प्रिय अपको कौन है ? इसपर भगवान् बोले- प्रिये । मेरे प्रियतम केवल श्रीशंकर है । देहधारियों को अपने देह की भाँति वे मुझे अकारण ही प्रिय है । एक बर मै और श्री शंकर दोनों ही पृथ्वी पर घूमने निकले । मै अपने प्रियतम की खोज़मे इस आशयसे निकला कि मेरी ही तरह जो अपने प्रियतम की खोजमे देश देशान्तर में भटक रहा होगा, वही मुझे अकारण प्रिय होगा । थोडी देर के बाद मेरी श्रीशंकरजी से भेट हो गयी । ज्यों ही हमलोमों की चार आँखे हुई कि हमलोग पूर्वजन्मार्जित विद्या की भांति एक दूसरे के प्रति आकृष्ट हो गये । वास्तव में मैं ही जनार्दन हूँ और  मैं ही महादेव हूँ । 

अलग -अलग दो घडों में रखे हुए जल की भाँती मुझमें और उनमें कोई अन्तर नहीं है । शंकर जी के अतिरिक्त श्री शिव की अर्चा करनेवाला शिवभक्त भी मुझे अत्यंत प्रिय है । इसके विपरीत जो शिवकी पूजा नहीं करते, वे मुझे कदापि प्रिय नहीं हो सकते ।

शिव द्रोही वैष्णवो को और विष्णु द्रोही शैवों को इस प्रसंगपर अवश्य ध्यान देना चाहिये । (बृहद्धर्मपुराण ,पूर्वखण्ड)

(२)एक बार की बात है देवर्षि नारदजी ने भगवान् शिव जी से  निवेदन किया – प्रभो ! अनेक तत्वज्ञानी लोग बताते हैं कि परात्पर विद्यास्वरूपिणी भगवती काली हैं । उन्होंने ही स्वयं पृथ्वीपर श्रीकृष्णरूप में अवतार ग्रहणकर कंसादि दुष्टो का संहार कर पृथ्वी का भार दूर किया, अत: आप बताने की कृपा करे कि महेश्वरी ने पुरुष रूप में क्यों अवतार धारण किया-

वदन्त्यनेकतत्त्वज्ञा: काली विद्या परात्परा ।
या सैव कृष्णरूपेण क्षिताववातरत्स्वयम्।।
अभवच्छ्रोतुमिच्छामि कस्माद्देवी महेश्वरी।
पुंरूपेणावतीभूत्क्षितौ तन्मे वद प्रभो।।
(महाभागवत पुराण ४९ । १,३) 

इसपर भगवान् महादेव जी ने नारद जी की जिज्ञासा को शान्त करने के लिये उनके द्वारा पूछे गये प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा – वत्स ! एक समय की बात है कौतुकी भगवान् शिव कैलाशशिखर पर मंदिर में पार्वती के साथ एकान्त में विहार कर रहे थे । भगवती पार्वती की अचिन्त्य सुन्दरता देखकर शम्मु सोचने लगे कि नारी जन्म तो अत्यन्त शोभन है

चेतसा चिन्तयामास नारीजन्मातिशोभनम् ।।

तदनन्तर उन्होंने पार्वती जी से अनुरोध किया कि मेरी इच्छा है कि पृथ्वीपर आप पुरुषरूप से एवं मैं आपकी पत्नी के रूपमें अवतीर्ण होऊं –

यदि में त्वं प्रसन्नासि तदा पुंस्त्वमवाप्नुहि।
कुत्रचित्पृथिवीपृष्ठे यास्येहं स्त्रीस्वरूपताम्।।
(महाभागवत पुराण ४९ । १६)

भगवती पार्वती जी ने भगवान् शिवजी से कहा कि हे महादेव ! मैं आपकी प्रसन्नता के लिये पृथ्वीपर वसुदेव के घरमे पुरुषरूप मेंश्रीकृष्ण होकर अवश्य जन्म लूँगी और हे त्रिलोचन ! मेरी प्रसन्नता के लिये आप भी स्त्रीरूप में जन्म ग्रहण करे

भविष्येहं त्वत्प्रियार्थं निश्चितं धरणीतले ।
पुंरूपेण महादेव वसुदेवगृहे प्रभो।
कृष्णोहं मत्प्रियार्थं स्त्री भव त्वं हि त्रिलोचन ।। 

इसपर श्री शिवजी ने कहा- शिवे ! आपके पुरुषरूप से श्री कृष्ण के रूपमें अवतरित होने पर मैं आपकी प्राणसदृश वृषभानु पुत्री राधारूप होकर आपके साथ विहार करूँगा । साथ ही मेरी अष्ट मूर्तियाँ भी रुक्मिणी, सत्यभामा आदि पटरानियों के रूपमें मृत्युलोक में अवतरित होगी-

पुंरुपेण जगद्धात्रि प्राप्तायां कृष्णतां त्वयि।
वृषभानो: सुता राधास्वरूपाहं स्वयं शिवे।।
तव प्राणसमा भूत्वा विहरिष्ये त्वया सह ।
मूर्तयोष्टौ तथा मर्त्ये भविष्यन्त्यु योषित: ।।

देवी ने यह भी कहा कि मेरी दो सखियाँ- विजया एवं जया उस समय श्रीदाम एवं वसुदाम के नाम से पुरुषरूपमें जन्म लेंगी । पूर्ववाल में विष्णुजी के साथ की गयी अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार मेरे कृष्ण होनेपर श्री विष्णु मेरे अग्रज बलराम के रूपमें अवतार ग्रहण करेंगे । पूर्वकाल में भगवती एवं विष्णुजी ने युद्धमें जिन राक्षसो का संहार किया था; वे कंस, दुर्योधन आदि के रूपमें जन्म लेंगे । पुर्वकाल में जो महान् राक्षस मारे गये थे, वे राजाके रूप में जन्म ग्रहण करेंगे। मेरी भद्रकाली की मूर्ति वसुदेव के घरमें पुरुषरूपमें श्याम के नामसे अवतार लेगी-

किंतु मे भद्रकाली या मूर्तिर्नवघनद्युति: ।
वसुदेवगृहे ब्रह्मन् पुंरूपेण भविष्यति ।। 

भगवान् विष्णु भी अपने अंशरूप से पाण्डुपुत्र अर्जुन के रूपमें, धर्मराज अपने अंशरूप से युधिष्ठिर के रूपमें, पवनदेव अपने अंशसे भीमसेन के रूपमें, अश्विनीकुमार अपने अंशसे माद्री पुत्र नकुल-सहदेव के रूपमें जन्म लेंगे एवं मेरे अंशसे कृष्णा-द्रोपदी का जन्म होगा । मैं पाण्डुपुत्र पाण्डवो की विशेष सहायता करके युद्ध के लिये उत्सुक रहूँगी । मै युद्धमें महान् माया फैलाकर समरक्षेत्र में सम्मुख उपस्थित होकर परस्पर मारने की इच्छावाले वीरो का संहार करुँगी । मेरी की माया से मोहित होकर दुष्ट राजा एक-दूसरे को मार डालेंगे । इस युद्धमें धर्मनिष्ठ  पाण्डव, बालक एबं वृद्धमात्र शेष रह जायेगे । में पृथ्वी को भारसे मुक्त करके पुन: यहाँ लौट आऊँगी

निर्भारां वसुधां कृत्वा पुनरेष्यामि चात्र तु ।।
(महाभागवत पुराण ४९ । ६२ ) 

ब्रह्माजी की प्रार्थनापर साक्षात् भगवती ही देवकार्यसिद्धद्यर्थ अपने अंश से वसुदेव-पुत्र श्रीकृष्ण के रूपमें तथा भगवत विष्णु वसुदेव के घर बलराम एवं पाण्डुपुत्र अर्जुन के रूपमें अवतीर्ण हुए

विधिना प्रार्थिता देवी वसुदेवसुुत: स्वयम्।  निजांशेनाभवत्कृष्णो देवानां कार्यसिद्धये ।।
विष्णुश्चापि द्विधा भूत्वा जन्म लेभे महीतले ।
वसुदेवरगृहे रामो महाबलपराक्रम: ।।
तथापर: पाण्डुसुतो धन्विश्रेष्ठो धनञ्जय: ।
(महाभागवत पुराण ५०। १-३)

(३)प्राचीन कालमे सुरमुनिसेवित कैलास शिखरपर महर्षि गौतम का एक आश्रम था । वहाँ एक बर पताल लोक से जगद्विजयी बाणासुर अपने कुलगुरु शुक्राचार्य तथा अपने पूर्वज भगवत शिरोमणि प्रह्वाद,दानवीर बलि एवं दैत्यराज बृषपर्वा के साथ आया और महर्षि गौतम के सम्मान्य अतिथिके रूपये रहने लगा । एक दिन प्रात:काल वृषपर्वा शौच स्नानादि नित्य कर्म से निवृत्त होकर भगवान् शंकर की पूजा कर रहा था । इतनेमें ही महर्षि गौतमका एक प्रिय शिष्य, जिसका अन्वर्थ नाम शंकरात्मा था और जो अवधूत के देशमें उन्मत्त की भाँति विचरता था, विकराल रूप बनाये वहाँ आ पहुंचा और वृषपर्वा तथा उनके सामने रखी हुई शंकर की मूर्तिके बीचमे आकर खड़ा हो गया ।

वृषपर्वा को उसका इस प्रकार का उद्धत सा व्यवहार देखकर बडा क्रोध आया । उसने जब देखा कि वह किसी प्रकार नहीं मानता तो चुपके से तलवार निकालकर उसका सिर धड़से अलग कर दिया । जब महर्षि गौतम को यह संवाद मिला तो उनको बडा दुख हुआ, क्योकि शंकरात्मा उन्हें प्राणों से भी अधिक प्रिय था । उन्होंने उसके बिना जीवन व्यर्थ समझा और देखते-देखते वृषपर्वा की आँखोंके सामने योगबलसे अपने प्राण त्याग दिये ।

महर्षि गौतम को इस प्रकार देहत्याग करते देखकर शुक्राचार्य से भी नहीं रहा गया, उन्होंने भी उसी प्रकार अपने प्राणोंका उत्सर्ग कर दिया और उनकी देखादेखी प्रहृलाद आदि अन्य दैत्योंने भी वैसा ही किया । बात-की-बातमें ऋषिके आश्रममें शिव भक्तो की लाशों का ढेर लग गया । यह करुणापूर्ण दृश्य देखकर ऋषिपत्नी अहल्या हृदयभेदी स्वर से आर्तनाद करने लगी ।

उनकी क्रन्दन ध्वनि भक्तभयहारी भगवान् भूतभावन शिव के कानो तक पहुंची और उनकी समाधि टूट गयी । वे वायुवेगसे महर्षि गौतमके आश्रमपर पहुँचे । इसी प्रकार गज की करुण पुकार सुनकर एक बार भगवान् श्री हरि भी वैकुण्ठ से आतुर होकर दौड़े आये थे । धन्य भक्तवत्सलता ! दैवयोग से ब्रह्माजी तथा विष्णु भगवान् भी उस समय कैलाश में ही उपस्थित थे । उन्हें भी कौतूहलवश शंकरजी अपने साथ लिवा लाये । भगवान् शिव ने आश्रम में पहुँचकर अपने कृपाकटाक्ष से ही सबको बात ही बात में जीवित कर दिया तब वे सब खड़े होकर भगवत् मृत्युञ्जय की स्तुति करने लगे । 

भगवान् शंकर ने महर्षि गौतमसे कहा – हम तुम्हारे इस अलौकिक साहस एवं आदर्श त्याग पर अत्यंत प्रसन्न है वर माँगो । महर्षि बोले – प्रभो ! उपने यहाँ पधारकर मुझे सदाके लिये कृतार्थ कर दिया । इससे बढकर मेरे लिये और कौन सी वस्तु प्रार्थनीय हो सकती है ? मैंने आज़ सब कुछ या लिया । मेरे भाग्यकी आज़ देवतालोग भी सराहना करते है । यदि आप मुझपर प्रसन्न है तो मेरी एक प्रार्थना स्वीकार कीजिये । मै चाहता हूँ आज आप मेरे यहाँ प्रसाद ग्रहण करें ।

भगवान् तो भावके भूखे है । भावके वशीभूत होकर उन्होंने एक दिन श्रीरामरूपमे शबरी के बेर और श्रीकृष्ण रूपमें सुदामाके चावल का भोग लगाया था । उन्होंने महर्षि की अविचल एवं निश्छल प्रीति देखकर उनका निमन्त्रण तुरंत स्वीकार कर लिया और साथ ही ब्रह्मा विष्णु को भी महर्षि का आतिथ्य स्वीकार करने को राजी कर लिया । जबतक इधर भोजन की तैयारी हो रही थी, तबतक शंकर विष्णु को साथ लेकर आश्रम के एक सुन्दर भबनमे गये और वहाँ एक सुकोमल शय्यापर लेटकर बहुत देरतक प्रेमालाप करते रहे । इसके अनन्तर वे आश्रमभूतिमें स्थित एक सुरम्य सरोवर में जाकर वहाँ जलक्रीडा करने लगे ।

रंगीले भोलेबाबा भगवान् श्रीहरिके पद्मदलायत लेचनोपर कमलकिञ्जल्कमिश्रित जल अंजलिके द्वारा फेंको लगे । भगवान ने उनके प्रहार को न सह सकने के कारण अपने दोनों नेत्र मूँद लिये । इतनेमें ही भोलेबाबा अवसर पाकर तत्काल उछलकर भगवान् के  कंधो पर आरूढ हो गये । वृषभारोहणका तो उन्हें प्रवास ही ठहरा, ऊपरसे जौरसे दबाकर उन्हें कभी तो पानीके अंदर ले जाये और कभी फिर ऊपर ले आवे । 

इस प्रकार जब उन्हें बहुत तंग किया तो विष्णु भगवान् ने भी एक चाल खेली । उन्होंने तत्क्षण शिबजी को पानीमें दे मारा । शिवजीने भी नीचेसे ही भगवान् की दोनों टाँगे पकडकर उन्हें गिरा दिया । इस प्रकार कुछ देरतक दोनोंमे पैंतरेबाजी और दाँव पेच चलते रहे । विमानस्थित देवगण अन्तरिक्ष से इस अपूर्व आनन्द को लूटने लगे । धन्य है वे आँखे जिन्होंने उस अन्दुत छटाका निरीक्षण किया ।

दैवयोग से नारदजी उधर आ निकले । वे इस अलौकिक दृश्य को देखकर मस्त हो गये और लगे बीणाके स्वरके साथ गाने । भगवान् शिव उनके सुमधुर संगीत को सुनकर, खेल छोड़कर जलसे बाहर निकल आये और ओदे वस्त्र पहने ही नारदके सुर-मे-सुर मिलाकर स्वयं राग अलापने लगे । अब तो भगवान् विष्णु से भी नहीं रहा गया । वे भी बाहर आकर मृदङ्ग बजाने लगे । उस समय वह समाँ बंधा जो देखते ही बनता था ।

सहस्त्रो शेष और शारदा भी उस समय के आनन्दका वर्णन नहीं कर सकते । बूढे ब्रह्माजी भी उस अनोखी मस्तीमे शामिल हो गये । उस अपूर्व समाज मे यदि किसी बात की कमी थी तो वह प्रसिद्ध संगीत-कोविद पवनसुत हनुमान् जी के आनेसे पूरी हो गयी । उन्होंने जहाँ अपनी हृदयहारिणी तान छेडी वहाँ सबको चुप हो जाना पड़। । अब तो सब के सब निस्तब्ध होकर लगे हनुमान् जी के गयायनको सुनने । सब के सब ऐसे मस्त हुए कि खाने पिने तक की सुधि भूल गये । उन्हें यह भी होश नहीं रहा कि हमलोग महर्षि गौतमके यहाँ निमंत्रित है ।

उधर जब महर्षि ने देखा कि उनका पूज्य अतिथिवर्ग स्नान करके सरोवर से नहीं लौटा और मध्याह्न बीता जा रहा है तो वे बेचारे दौडे आये और किसी प्रकार अनुनय विनय करके बडी मुश्किल से सबको अपने यहॉ लिवा लाये । तुरंत भोजन परोसा गया और लोग लगे आनन्दपूर्वक गौतमजी का आतिथ्य स्वीकार करने । इसके अनन्तर हनुमान्जी का गायन प्रारम्भ हुआ ।

भोलेबाबा उनके मनोहर संगीत को सुनकर ऐसे मस्त हो गये कि उन्हें तन मनकी सुधि न रही । उन्होंने धीरे से एक चरण हनुमान् कीअञ्जलिमे रख दिया और दूसरे चरण को उनके कंधे, मुख,कंठ , वक्षस्थल, हृदयके मध्यभाग, उदरदेश तथा नाभि मण्डलसे स्पर्श कराते हुए मौजसे लेट गये । यह लीला देखकर विष्णु कहने लगे- आज हनुमान के समान सुकृती विश्वमें कोई नहीं है । जो चरण देवताओ को दुर्लभ है तथा वेदो के द्वारा अगम्य हैं उपनिषद भी जिन्हें प्रकाश नहीं कर सकते, जिन्हें योगिज़न चिरकाल तक विविध प्रकार के साधन करके तथा व्रत उपवासादि से शरीर को सुखाकर क्षणभरके लिये भी अपने हृदयदेश में स्थापित नहीं कर सकते, प्रधान प्रधान मुनीश्वर सहस्त्रक्रोटि संवत्सरपर्यन्त तप करके भी जिन्हें प्राप्त नहीं कर सकते, उन चरणों को अपने समस्त अंगोपर धारण करने का अनुपम सौभाग्य आज हनुमान् को अनायास ही प्राप्त हो रहा है । मैंने भी हजार वर्ष तक प्रतिदिन सहस्त्र पद्मो से आपका भक्तिभावपूर्वक अर्चन किया, परंतु यह सौभाग्य आपने मुझे कभी प्रदान नहीं किया ।

मया वर्षसहस्त्रं तु सहस्त्राब्जै स्तथान्वहम् ।
भक्त्या सम्पूजितोsपीश पादो नो दर्शितस्त्वया ।।
लोके वादो हि सुमहान् शम्भुर्नारायणप्रिय: ।
हरि: प्रियस्तथा शम्भोर्न तादृग् भाग्यमस्ति मे ।।
(पद्म .पा.११४ । १९०-१९१) 

लोकमे यह वार्ता प्रसिद्ध है कि नारायण शंकर के परम प्रीतिभाजन हैं परंतु अनाज हनुमान् को देखकर मुझे इस बातपर संदेह सा होने लगा है और हनुमान के प्रति ईर्ष्या भी हो रही है । भगवान् विष्णुके इन प्रेम लपेटे अटपटे वचन सुनकर शंकर मन ही मन मुसकराने लगे और बोले नारायण ! यह आप क्या कह रहे है ?आपसे बढकर क्या मुझे और कोई प्रिय हो सकता है ?औरो की  तो बात ही क्या, पार्वती भी मुझे आपके समान प्रिय नहीं हैं ।

न त्वया सदृशो मह्यं प्रियोsस्ति भगवन् हरे ।
पार्वती वा त्वया तुल्या न चान्यो  विद्यते मम ।।
(पद्म. पा .११४ । १९२)

इतने में ही माता पार्वती भी वहाँ उग पहुँची । शंकर को बहुत देरतक लौटते न देखकर उनके मनमें स्त्रीसुलभ शंका हुईं कि कहीं स्वामी नाराज तो नहीं हो गये । दौडी हुई महर्षि गौतम के आश्रम में पहुंची । गौतम की मेहमानी में जो कमी थी वह उनके आगमन से पूरी हो गयी । उन्होंने भी अपने पति की अनुमति लेकर महर्षि का आतिथ्य स्वीकार किया और फिर शंकरजी के समीप आकर उनकी और विष्णुभगवान की प्रणयगोष्ठी में सम्मिलित हो गयी । बातों हो बातोंमे उन्होंने विनोद तथा प्रणयकोप में शंकर जी के प्रति कुछ अवज्ञात्मक शब्द कहे और उनकी मुण्डमाला, पन्नगभूषण, दिग्वस्त्रधारण, भस्माङ्गलेपन और बृषभारोहण आदिका परिहास किया ।

तब तो विष्णु: भगवान् से नहीं रहा गया । श्रीहरि भगवान् शंकर की अवज्ञा को नहीं सह सके और बोल उठे -देवि ! आप ज़गत्पति शंकर के प्रति यह क्या का रही है ? मुझसे आपके ये शब्द सहे नहीं जाते । जहां शिवनिन्दा होती हो वहां हम प्राण धारण नहीं कर सकते, यह हमारा व्रत है । यह कहकर वे शिव गिरिजा के सम्मुख ही नखके द्वारा अपना शिरच्छेदन करने को नारायण उद्यत हो गये । शंकर जी ने बडी कठिनता से उन्हें इस कार्य से रोका । 

किमर्थं निन्दसे देवि देवदेवं ज़गत्पतिम् । 

(४)एक बार लीलामय भगवान् विष्णु ने लक्ष्मी जी भूलोक में अश्वयोनि में ज़न्म लेनेका शाप दे दिया । भगवान् की प्रत्येक लीलामे जो रहस्य होता है, उसको तो वे ही जानते है । श्रीलक्ष्मी जी को इससे बहुत क्लेश  हुआ, पर उनकी प्रार्थनापर भगवान् विष्णु ने कहा  -देवि ! यद्यपि मेरा वचन अन्यथा तो हो नहीं सकता, तथापि कुछ कालतक तुम अश्वयोनि में रहोगी, पश्चात् मेरे समान ही तुम्हारे एक पुत्र उत्पन्न होगा । उम समय इस शापसे तुम्हारी मुक्ति होगी और फिर तुम मेरे पास आ जाओगी।

भगवान् के शाप से लक्ष्मी जी ने भूलोक में आकर अश्वयोनि में जन्म लिया और वे कालिन्दी तथा तमसा के संगमपर भगवान् शंकर की आराधना करने लगीं । वे भगवान् सदाशिव त्रिलोचन का अनन्य मनसे दिव्य एक हजार वर्षोतक ध्यान करती रहीं । उनकी तपस्या से महादेव जी बहुत प्रसन्न हुए और लक्ष्मी के सामन बृषभपर आरूढ हो, पार्वती समेत दर्शन देकर कहने लगे- देवि ! आप तो जगत् की माता है और भगवान् विष्णु की परम प्रिया है । आप भुक्ति मुक्ति देनेवाले, सम्पूर्ण सचराचर जगत् के स्वामी विष्णु भगवान् की आराधना छोड़कर मेरा भजन क्यों कर रही है ? वेदोंका कथन है कि स्त्रियो को सर्वदा अपने पति की ही उपासना करनी चाहिये । उनके लिये पतिके अतिरिक्त और कोई देवता ही नहीं है । पति जैसा भी हो, वह स्त्री का आराध्य देव होता है।

वेदोक्तं वचनं कार्यं नारीणां देवता पति: । 
नान्यस्मिन् सर्वथा भाव: कर्तव्य: कर्हिचित् क्वचित् ।। पतिशुश्रूषणं स्त्रीणां धर्म एव सनातन: । 
यादृशस्तादृश: सेव्य: सर्वथा शुथकाम्यया ।।
(देवीभागवत ६ । १८ ।२२ २३) 

भगवान् नारायण तो पुरुषोत्तम है, ऐसे देवेश्वर पति की उपासना छोडकर आप मेरी उपासना क्यों करती है ? लख्मीजीने कहा -हे आशुतोष ! मेरे पतिदेव ने मुझे अश्वयोनि में जन्म लेने का शाप दे दिया है । इस शाप का अंत पुत्र होनेपर बताया है, परंतु इम समय मैं पतिदेव के सांनिध्यसे वञ्चित हूँ । वे वैकुण्ठ में निवास कर रहे है । हे देवदेव ! आपकी उपासना मैंने इसलिये की है कि आपमें और श्रीहरि मे किंचिन्मात्र भी भेद-भाव नहीं है । आप और वे एक ही है, केवल रूपका भेद है, यह बात श्रीहरि ने ही मुझे बतायी थी। 

आपका और उनका एकत्व जानकर ही मैने आपकी आराधना की है । हे भगवन् !यदि आप मुझपर प्रसन्न है तो मेरा यह दुख दूर कीजिये।

आशुतोष भगवान् शिव लक्ष्मी जी के इन वचनों को सुनकर बहुत प्रसन्न हुए और विष्णुदेव से इस विषयमें प्रार्थना करने का वचन दिया और श्रीहरि को प्राप्त करने था एक महान् पराक्रमशाली पुत्र प्राप्त करने का वर भी उन्हें प्रदान किया । तदनन्तर भगवान् शिव पार्वती के साथ कैलास चले आये और उन्होंने बुद्धिमान चित्ररूप को दूत बनाकर वैकुण्ठ भेजा । चित्ररूप से भगवान् शिव का संदेश पाकर तथा देवी लक्ष्मी की स्थिति जानकर भगवान् विष्णु अश्व का रूप धारणकर लक्ष्मी जी के पास गये और कालान्तर में देवी लक्ष्मी को एकवीर नामका पुत्र उत्पन्न हुआ । उसीसे हैहय -वंश की उत्पत्ति हुई । अनन्तर लक्ष्मी जी के शाप की निवृति हो गयी और वे दिव्य शरीर धारण कर के वैकुण्ठ पधार गयी । उनकी शिव साधना सफल हो गयी ।

(५)भगवान् श्रीकृष्ण भगवान् शिव से कहते है-

त्वत्परो नास्ति मे प्रेयांस्तवं मदीयात्मन: पर: ।
ये त्वां निन्दन्ति पापिष्ठा ज्ञानहीना विचेतस: ।।
पच्यन्ते कालसूत्रेण यावच्चन्द्रदिवाकरौ ।
कृत्वा लिंगं सकृत्पूज्य वसेत् कल्पायुतं दिवि ।
प्रजावान् भूमिमान् विद्वान् पुत्रबान्धववांस्तथा ।।
ज्ञानवान् मुक्तिमान् साधु: शिवलिंगार्चनाद्भवेत् ।
शिवेति शब्दमुच्चार्य प्राणांस्त्यजति यो नर: । क्रोटिजन्मार्जितात् पापान्मुक्तो मुक्तिं प्रयाति स: ।। (ब्रह्मवैव. प्र. ६ .३१. ३२,४५,४७) 

मुझे आपसे बढकर कोई प्यारा नहीं है, आप मुझे अपनी आत्मा से भी अधिक प्रिय है । जो पापी, अज्ञानी एवं बुद्धिहीन पुरुष आपकी निन्दा करते है वे जबतक चन्द्र और सूर्यका अस्तित्व होगा, तबतक कालसूत्र (नरक) पचते रहेंगे । जो शिवलिंग का निर्माण कर एक बार भी उसकी पूजा कर लेता है, वह दस हजार कल्प तक स्वर्ग में निवास करता है । शिवलिङ्ग के अर्चन से मनुष्य को प्रजा, भूमि, विद्या, पुत्र, बांधव, श्रेष्ठता, ज्ञान एबं मुक्ति सब कुछ प्राप्त हो जाता है । जो मनुष्य ‘शिव’ शब्द का उच्चारण कर शरीर छोडता है, वह करोडों  जन्मों के संचित पापो से छूटकर मुक्ति को प्राप्त हो जाता है ।

(६)स्वयं भगवान् श्री शिव श्री विष्णु भगवान् से कहते है-

मद्दर्शने फलं यद्वै तदेव तव दर्शने ।
ममैव हृदये विष्णुर्विष्णोश्च हृदये ह्यहम्।।
उभयोरन्तरं यो वै न जानाति मतो मम ।
(शिवपु. ज्ञानं. ४ .६१-६२) 

मेरे दर्शन का जो फल है वही आपके दर्शन का है । आप मेरे हृदय मे निवास करते है और मैं आपके हृदय में रहता हूँ । जो हम देनो में भेद नहीं समझता, वही मुझे मान्य है ।

(७)भगवान् श्रीराम भगवान्  श्रीशिव से कहते है-

ममास्ति हृदये शर्वो भवतो हृदये त्वहम् ।
आवयोरन्तरं नास्ति मूढा: पश्यन्ति दुर्धिय: ।।
ये भेदं विदधत्यद्धा आवयोरेकरूपयो: ।
कुम्भीपाकेषु पच्यन्ते नरा: कल्पसहस्त्रकम् ।।
ये त्वद्भक्ता: सदासंस्ते मद्भक्ता धर्मसंयुता: ।
मद्भक्ता अपि भूयस्या भक्त्या तव नतिङ्करा: । । (पद्मपु .पाता. २८ .२१-२३) 

आप (शंकर) मेरे हृदय में रहते है और मैं आपके हृदय मे रहता हूँ । हम दोनों में कोई भेद नहीं है । मूर्ख एवं दुर्बुद्धि मनुष्य ही हमरे अंदर भेद समझते है । हम दोनों एकरूप है ,जो मनुष्य हमरे अंदर भेद भावना करते हैं वे हजार कल्प पर्यन्त कुम्भीपाक नरक में यातना सहते है । जो आपके भक्त है वे धार्मिक पुरुष सदा ही मेरे भक्त रहे हैं और जो मेरे भक्त है वे प्रगाढ़ भक्ति से आपको भी प्रणाम करते है ।

(८)शिवपुराण में कहा गया है –

एते परस्परोत्पन्ना धारयन्ति परस्परम् ।
परस्परेण वर्धन्ते परस्परमनुव्रता: ।।
क्वाचिद्ब्रह्मा क्वचिद्विष्णु: क्वचिद्रुद्र: प्रशस्यते ।
नानेव तेषामाधिक्यमैश्वर्यञ्चातिरिच्याते  ।।
अयं परस्त्वयं नेति संरम्भाभिनिवेशिन: ।
यातुधाना भवन्त्येव पिशाचा वा न संशय: ।। 

ये तीनों (ब्रह्मा, विष्णु और शिव )एक दूसरे से उत्पन्न हुए है एक दूसरे को धारण करते हैं एक दूसरे के द्वारा वृद्विंगत होते हैं और एक दूसरे के अनुकूल आचरण करते है । कहीं ब्रह्मा की प्रशंसा के जाती है, कहीं विष्णु की और कहीं महादेव की । उनका उत्कर्ष एवं ऐश्वर्य एक दूसरे की अपेक्षा इस प्रकार अधिक कहा है मानो वे अनेक हों । जो संशयात्मा मनुष्य यह विचार करते है कि अमुक बडा है और अमुक छोटा है, वे अगले ज़न्म में राक्षस अथवा पिशाच होते है इसमें कोई संदेह नहीं है ।

(९)भगवान् विष्णु श्रीमद्भागवत (४. ७ .५४) में दक्ष प्रजापति के प्रति कहते हैं-

त्रयाणामेकभावानां यो न पश्यति वै भिदाम् ।
सर्वभूतात्मनां ब्रह्मन् स शान्तिमधिगच्छति ।। 

हे विप्र ! हम दोनों एकरूप है और समस्त भूतों की आत्मा है हमारे अंदर जो भेद भावना नहीं करता, नि:संदेह वह शांति (मोक्ष) क्रो प्राप्त होता है ।

(१०)भगवान्  विष्णु के  प्रति भगवान् महेश्वर कहते है-

त्रिधा भिन्नो ह्यहं विष्णो ब्रह्मविष्णुहरारव्यया ।
सर्गरक्षालयगुर्णैर्निष्कलोपि सदा हरे ।।
यथा च ज्योतिष: संगाज्जलादे: स्पर्शता न वै ।
तथा ममागुणस्यापि संयोगाद्बन्धनं न हि।।
यथैकस्या मृदो भेदो नाम्नी पात्रे न वस्तुत: ।
यथैकस्य समुद्रस्य विकारो नैव वस्तुत: ।।
एवं ज्ञात्वा भबद्भ्यां च न दृश्यं भेदकारणम् ।
वस्तुत: सर्वदृश्यं च शिवरूपं मतं मम  ।।
अहं भवानयं चैव  रुद्रोयं यो भविष्यति ।
एकं रूपं न भेदोस्ति भेदे च बन्धरनं भवेत्।।
तथापीह मदीयं वै शिवरूपं सनातनम्।
मूलभूतं सदा प्रोक्तं सत्यं ज्ञानमनन्तकम् ।।
(शिव. ज्ञान. ४ .४१-४४, ४८-५१) 

हे विष्णो ! है हरे ! मैं स्वभाव से निर्गुण होता हुआ भी संसार की रचना, स्थिति एवं प्रलय के लिये क्रमश: ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र -इन तीन रूपो में विभक्त हो रहा हूं । जिस प्रकार जलादि के संसर्ग से अर्थात् उनमें प्रतिबिम्ब पड़नेसे सूर्य अदि ज्योतियो में कोई स्पर्शता नहीं जाती, उसी प्रकार मुझ निर्गुण का भी गुणों के संयोग से बन्धन नहीं होता । मिट्टी के नाना प्रकार के पात्रों में केवल नाम और आकार का ही भेद है, वास्तविक भेद नहीं है-मिट्टी ही है । समुद्र के भी फेन, बुद्बुदे, तरंगादि विकार लक्षित होते है वस्तुत: समुद्र एक ही है । यह समझकर आपलोगों को भेदका कोई कारण न देखना चाहिये । वस्तुत: मात्र दृश्य पदार्थ शिवरूप ही है ऐसा मेरा मत है । मैं, आप, ये ब्रह्माजी और आगे चलकर मेरी जो रुद्रमूर्ति उत्पन्न होगी- सब एकरूप ही है इनमें केई भेद नहीं है । भेद ही बंधन का कारण है । फिर भी यहाँ मेरा यह शिवरूप नित्य, सनातन एवं सबका मूल स्वरूप कहा गया है । यही सत्य, ज्ञान एवं अनन्तरूप गुणातीत परब्रह्म है ।

(११)भगवान् श्रीराम के प्रति भगवान् शंकर के  वाक्य है-

एकस्त्वं पुरुष: साक्षात् प्रकृते: पर ईर्यसे ।
य: स्वांशकलया विश्वं सृजत्यवति हन्ति च ।। अरूपस्त्वमशेषस्य जगत: कारणं परम् ।
एक एव त्रिधा रूपं गृह्णासि कुहकान्वित: ।।
सृष्टौ विधातृरुपस्त्वं पालने स्वप्रभामय: ।
प्रलये जगत: साक्षादहं शर्वारव्यतां गत: ।।
(पद्मपुराण पातालखंड २८ .६-८ ) 

आप प्रकृति से अतीत साक्षात् अद्वितीय पुरुष कहे जाते हैं जो अपनी अंशकलाके द्वारा ब्रह्मा, विष्णु, रुद्ररूप से विश्व की उत्पत्ति, पालन एवं संहार करते है । आप अरूप होते हुए भी अखिल विश्वके परम कारण है । आप एक होते हुए भी माया संवलित होकर त्रिविध रूप धारण करते हैं । संसार की सृष्टि के समय आप ब्रह्मारूप से प्रकट होते है ,पालन के समय आप स्वप्रभामय विष्णुरूप से व्यक्त होते है और प्रलयके समय मुझ शर्व (रुद्र) का रूप धारण कर लेते है ।

(१२)जब शिव तत्त्वैकनिष्ठ पार्वती शिव प्राप्ति के लिये घोर तप करने लगी । माता मेनकाने स्नेहकातरा होकर उ (वत्से! ) मा (ऐसा तप न करो) कहा, इससे उनका नाम ‘उमा’ हो गया । उन्होंने सूखे पत्ते भी खाने छोड़ दिये, तब उनका ‘अपर्णा’ नाम पडा । उनकी कठोर तपस्या को देख सुनकर परम आश्चर्यान्वित हो ऋषिगण भी कहने लगे कि ‘अहो, इसको धन्य है, इसकी तपस्या के सामने दूसरों की तपस्या कुछ भी नहीं है । पार्वती की इस तपस्या को देखने के लिये स्वयं भगवान् शिव जटाधारी वृद्ध ब्राह्मण के वेषमें तपोभूमि में आये और पार्वती से कुछ देर चर्चा की। पार्वती के द्वारा फल पुष्पादिसे पूजित होकर उसके तपका उद्देश्य शिव से विवाह करना है, यह जानकर कहने लगे- हे देवि ! इतनी देर बातचीत करने से तुमसे मेरी मित्रता हो गयी है । मित्रता के नाते मैं तुमसे कहता हूं तुमने बडी भूल की है ।

तुम्हारा शिव के साथ विवाह करने का संकल्प सर्वथा अनुचित है । तुम सोने को छोड़कर कांच चाह रही हो, चन्दन त्याग कर कीचड़ पोतना चाहती हो । हाथी छोडकर बैलपर मन चलाती हो । गंगाजल परित्याग कर कुएँका जल पीने की इच्छा करती तो । सूर्यका प्रकाश छोड़कर खद्योत को और रेशमी वस्त्र  त्याग कर चमडा पहनना चाहती तो । तुम्हारा यह कार्य तो देवताओ की संनिधिका त्याग कर असुरों का खाय करने के जरा सोचो तो सही, कहाँ तुम्हारा कुसुम -सुकुमार शरीर और त्रिभुवनकमनीय सौदर्य और कहाँ जटाधारी, चिलभस्मलेपनकारी, श्मशानविहारी, त्रिनेत्र भूतपति महादेव ।

कहाँ तुम्हारे घरके देवतालोग और कहाँ शिवके पार्षद भूतप्रेत है कहाँ तुम्हरे पिताके घर बजनेवाले सुन्दर बाजो की ध्वनि और कहाँ उस महादेव के डमरू, सिंगी और गाल बजाने की ध्वनि । न मज्ञादेवके माता-पिता का पता है, न जातिका । दरिद्रता इतनी कि पहनने को कपडातक नहीं है । दिगम्बर रहते है बैल की सवारी करते है और बाघका चमडा ओढे रहते है । न उनमें विद्या है और न शौचाचार ही है । सदा अकेले रहनेवाले, उत्कट विरागी, रुण्डमालाधारी महादेव के साथ रहकर चुम क्या सुख पाओगी ?

पार्वती और अधिक शिव-निन्दा न यह सकीं । वे तमककर बोली – बस, बस, रहने दो, मैं और अधिक सुनना नहीं चाहती । मालूम होता है, तुम शिवके सम्बन्धमें कुछ भी नहीं जाते । इसीसे यों मिथ्या प्रलाप कर रहे हो । तुम किसी धूर्त ब्रह्मचारी के रूपमें यहाँ आये हो । शिव वस्तुत: निर्गुण हैं, करुणावश ही वे सगुण होते है । उन सगुण और निर्गुण -उभयात्मक शिवजी जाति कहाँसे होगी होगी?जो सबके आदि है उनके माता-पिता कौन होंगे औंर उनकी उम्रका ही क्या परिमाण बांधा जा सकता है ? सृष्टि उनसे उत्पन्न होती है, अतएव उनकी शक्तिका पता कौन लगा रूकता है ?वही अनादि, अनन्त, नित्य, निर्विकार, अज, अविनाशी, सर्वशक्तिमान सर्वगुणाधार, सर्वज्ञ, सर्वोपरि, सनातनदेव है ।

तुम कहते हो महादेव विद्याहीन है । अरे, ये सारी विद्याएँ आयी कंहाँसे है ? वेद जिनके नि:श्वास है उन्हें तुम विद्याहीन कहते हो ? छी छी ! तुम मुझे शिव को छोडकर किसी अन्य देवताका वरण करने को कहते हो । अरे, इन देवताओं को, जिन्हें तुम बडा समझते हो, देवत्व प्राप्त ही कहाँ से हुआ ?यह उन भोलेनाथ की ही कृपाका तो फल है । इन्द्रादि देवगण तो उनके दरवाजेपर ही स्तुति-प्रार्थना करते रहते है और बिना उनके पालकी गणो की आज्ञा के अंदर घुसने का साहस नहीं कर सकते ।

तुम उन्हें अमङ्गलवेश कहते हो अरे, उनका शिव -यह मङ्गलमय नाम जिनके मुखमें निरन्तर रहता है, उनके दर्शन मात्र से सारी अपवित्र वस्तुएँ भी पवित्र हो जाती है, फिर भला स्वयं उनकी तो बात ही क्या है ? जिस चिता भस्मकी तुम निन्दा करते हो, नृत्यके अन्तमे जब वह उनके श्रीअंगों से उड़ती है उस समय देवतागण उसे अपने मस्तकोंपर धारण करने को लालायित होते है । बस, मैने समझ लिया, तुम उनके तत्व को बिलकुल नहीं जानते । जो मनुष्य इस प्रकार उनके दुर्गम तत्व को बिना जाने उनकी निन्दा करते हैं उनके ज़न्म जन्मान्तरों के संचित किये हुए पुण्य विलीन हो जाते है । तुम जैसे शिव निन्दक का सत्कार करने से पाप लगता है ।

शिव निन्दक को देखकर भी मनुष्य को सचैल स्नान करना चाहिये, तभी वह शुद्ध होता है । बस, अब मैं यहांसे जाती हूं । कहीं ऐसा न हो कि यह दुष्ट फिर से शिव की निन्दा प्रारम्भकर मेरे कानों को अपवित्र करे । शिव की निन्दा करनेवाले को तो पाप लगता ही है, उसे सुननेवाला भी पाप का भागी होता है । यह कहकर उमा वहांसे चल दीं । ज्यों ही वे वहांसे जाने लगी, वटु वेशधारी शंकर ने उन्हें रोक लिया । वे अधिक देरतक पार्वती से छिपे न रह सके, पार्वती जिस रूपका ध्यान करती थी, उसी रूपमें उनके सामने प्रकट हो गये और बोले-  मैं तुमपर प्रसन्न हूं वर मांगो ।

पार्वती की इच्छा पूर्ण हुई, उन्हें साक्षात् शिव के दर्शन हुए । दर्शन ही नहीं, कुछ काल मे भगवान् शिव ने पार्वती का पाणिग्रहण कर लिया ।

पूज्यपाद संतो ने भी शैव और वैष्णवो में एकता बनाने का प्रयास किया है। इक दौर ऐसा भी आया था जब वैष्णवो और शैवों में बहुत अधिक मतभेद और द्वेष तो थे ही परंतु श्री राम ,कृष्ण ,नारायण उपासको में भी द्वेष और मतभेद हो गया था । पूज्य श्री गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में इस शैव और वैष्णव भेद को समाप्त किया और पूज्य श्री नाभादास जी ने भक्तमाल की रचना करके शैव और वैष्णव भेद तो समाप्त किया ही,साथ ही साथ वैष्णवो में जो भेद था वह भी समाप्त कर दिया ।

रामचरित मानस जी में भगवान् श्रीराम कह रहे है की हम स्वप्न में भी शिव द्रोही को पसंद नहीं करते। श्री मानस जी के आरम्भ में ही शिव कथा है। श्री भक्तमालकार पूज्य श्री नाभादास गोस्वामी जी जो की श्री रामानंदी संप्रदाय से थे(श्री सीताराम भक्ति इस सम्प्रदाय में प्रमुख है) उन्होने पुरे भक्तमाल में वैष्णव संतो और आचार्यो के चरित्र जितने आदर के साथ लिखे है उतने ही आदरपूर्वक उन्होने भगवत्पाद श्री शंकराचार्य भगवान् का चरित्र लिखा है।

।।समस्त हरि हर भक्तो की जय।।

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