भगवान् शंकर का आकाश भैरव (शरभ )अवतार लेकर नृसिंह भगवान् को परास्त करना ।

​लिंगपुराण के १६ वे अध्याय में शरभरूप शिव का नृसिंह रूप विष्णु को परास्त करने की कथा बड़ी विचित्र है। हिरण्यकश्यपु का वध करके विष्णुरूप नरसिंह भयंकर गर्जना करने लगे ।उनकी भयंकर गर्जना के घोर शब्द से ब्रह्मलोक पर्यन्त सब लोक कांप उठे । लिब सिद्ध, साध्य, ब्रह्मा, इन्द्र आदि देवता भी अपने अपने प्राण बचाने के लिये भयभीत हो भागे । वे लोकालोक पर्वत के  शिखरपर से अति विनम्र भाव से नृसिंह जी की स्तुति करने लगे । परंतु नृसिंह जी इसपर भी शान्त न हुए । तब तो सब देवता अपनी रक्षाके लिये भगवान् शिव जी के समीप गये । देबताओ की दीन दशा देखकर शिवजी ने प्रसन्नवदन होकर कहा कि हम शीघ्र ही नृसिंह रूप अग्नि को शान्त करेंगे । 

देवताओ  की स्तुति सुनकर नृसिंहरूप तेज को शान्त करने के लिये महादेवजी ने भैरवरूप अपने अंश वीरभद्र का स्मरण किया । वीरभद्र उसी क्षण उपस्थित हुए । महादेवजी ने वीरभद्रसे कहा- इस समय देवताओ को बडा भय हो रहा है । इस कारण नृसिंहरूप अग्नि को शीघ्र जाकर शान्त करो । पहले तो मीठे वचनों से समझाओ, यदि न समझे तो भैरवरूप दिखलाओ ।

शिव जी की यह आज्ञा पाकर शांतरूप से वीरभद्र नृसिंह के समीप जाकर उनको समझाने लगे । इस समय का वीरभद्र विष्णु संवाद बडा मार्मिक है ।
वीरभद्र ने कहा – हे नृसिंहजी ! आपने जगत् के कल्याण के लिये अवतार लिया है और परमेश्वर ने भी जगत् की रक्षा का अधिकार अपको दे रखा है । मत्स्यरूप धरकर उपने इस जगत् की रक्षा की । कूर्म और वराहरूप से पृथ्वी को धारण किया, इस नृसिंहरूप से हिरण्यकशिपु का संहार किया, वामन रूप धारण कर राजा बलि को बाँधा । इस प्रकार जब जब लोको में दुख उत्पन्न होता है, तब तब आप अवतार लेकर सब दुख दूर करते है । आप सब जीवोंके उत्पन्न  करनेवाले और प्रभु है । आपसे अधिक कोई शिवभक्त नहीं ।

वीरभद्र ने शान्तिमय वचनोंसे नृसिंहजी की क्रोधाग्नि शांत न हुई।उन्होंने उत्तर दिया- वीरभद्र ! तू जहा से आया हैं वहीं चला जा । इसपर नृसिंहजी से वीरभद्र का बहुत विवाद हुआ । अन्त में शिववृपसे बीरभद्रका अति दुर्धर्ष, आकाशतक व्यापक, बडा विस्तृत एवं भयंकर रूप हो गया । उस समय शिवजी के उस भयंकर तेजस्वी स्वरूप में सब तेज विलीन हो गये । इस रूपका आधा शरीर मृगका और आधा शरभ पक्षीका था । शरभरूप शिव अपनी पुच्छ में नृसिंह को लपेटकर छाती में चोंच का प्रहार करते हुए जैसे सर्प को गरुड़ ले उड़े, ऐसे ले उड़े । फिर तो नृसिंहजीने शिवजी से क्षमा याचना की और अति विनम्रभाव से स्तुति की । 

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