भगवान् विष्णु का १८ पुराणों के रूप में प्राकट्य

​ब्राह्मं मूर्धा हररेवे हृदयं पद्मसंज्ञकम्।। 
वैष्णवं दक्षिणो बाहु: शैव वामो महेशितु: ।
ऊरू भागवतं प्रोक्तं नाभि: स्यान्नारदीयकम्।। 
मार्कण्डेयं च दक्षांघ्रिर्वामो ह्याग्नेयमुच्यते । 
भविप्यं दक्षिणो जानुर्विष्णोेरेव महात्मन: ।।
ब्रह्मवैवर्तसंज्ञं तु वामाजानुरुदाहृतः । 
लैङ्गं तु गुल्फकं दक्षं वाराहं वामगुल्फकम्।। 
स्कान्दं पुराणं लोमानि त्वगस्य वामनं स्मृतम् । 
कौर्मं पृष्ठं समाख्यातं मात्स्यं मेद: प्रकीर्त्यते ।।
मज्जा तु गारुडं प्रोक्तं ब्रह्माण्डमस्थि गीयते । 
एवमेवाभवद्विष्णु: पुराणावयवो हरि: ।।

 (पद्मपुराण .स्व.ख.६२ । २-७) 

ब्रह्मपुराण भगवान् विष्णु का सिर, पद्मपुराण हृदय, विष्णुपुराण दक्षिणबाहु, शिवपुराण वामबाहु, भागवत पुराण जंघायुगल, नारदपुराण नाभि, मार्कण्डेयपुराण दक्षिण चरण और अग्निपुराण वाम चरण है । भविष्य उनका दक्षिण जानु ,ब्रह्मवैवर्त वाम जानु ,लिङ्गपुराण दक्षिण गुल्फ (टाँखना) , वराहपुराण वाम गुल्फ, स्कन्दपुराण रोम, वामनपुराण त्वचा, कूर्मंपुराण पीठ, मत्स्यपुराण मेद, गरुडपुराण मज्जा और ब्रह्माण्डपुराण अस्थि है । इस प्रकार भगवान् विष्णु पुराण विग्रह के रूपमें प्रकट हुए हैं । 

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