विविध पुराणों में श्री गणेश भगवान् की प्राकट्य कथाएं 

विभिन्न युगों में भगवान् के सगुण – साकार रूप में विभिन्न अवतारों का दिव्य दर्शन हमें प्राप्त होता है । भगवान् नारायण (विष्णु ) ,श्री शंकर , श्री महाशक्ति दुर्गा ,श्री गणेश और सूर्यदेव – ये पंचतत्व एक ही परमतत्व के पांच स्वरुप है  । अवतार इन पांच देवों में से ही किसी का होता है अथवा इनके माध्यम से होता है ।वैसे दिव्य धामो में इनके पृथक पृथक दिव्य धाम है ,किंतु साकार विग्रह पृथक पृथक होते हुए भी ये एक ही परमतत्व के अनेक रूप है । इनमे न समर्थ्यका कोई अंतर है और न अनुग्रह का ।

भगवान् साकार भी है और निराकार भी , भक्त जिस स्वरुप में उनको पूजता है उसी स्वरुप में वो दर्शन देते है । भक्तो के प्रेम में बांध कर ही निसाकार प्रभु साकार बनकर आते है । बहुत से निराकार उपासक कहते है की भगवान् साकार कैसे हो सकते है ? वे तो केवल निराकार है । ध्यान देने योग्य बात है की जब भगवान् मनुष्य के शरीर को आकार दे सकते है , पेड़ पौधो , पर्वतो, संसार की वस्तुओ को आकार दे सकते है तब क्या वे स्वयं साकार रूप धारण नहीं कर सकते ।

कोई कहता है की नारायण परम तत्व है ,कोई कहता है शिव और कोई कुछ । भागवत आदि वैष्णव पुराणो के अनुसार नारायण ही तत्व है और विश्व की उत्पत्ति उन्ही से हुई है । शिवपुराण के अनुसार शिव परम तत्व है और देवी पुराण के अनुसार देवी परम तत्त्व है । इसीलिए कहा जाता है की किसी एक सम्प्रदाय और उससे जुड़े ग्रंथो से ही जुड़े रहना चाहिए । उदहारण : यदि कोई व्यक्ति वैष्णव संप्रदाय से जुड़ जाए तो वो भागवत पुराण और वैष्णवो द्वारा लिखित ग्रंथो का अध्ययन करेगा जिसमे लिखा होगा की नारायण ही वरं तत्त्व है ,वे ही सर्वशतिमान है । वो यदि दूसरे ग्रन्थ पढ़ लेगा तो भ्रम में पड़ जायेगा । बात इनती ही याद रखनी है की भगवान् एक है और ऐनी इष्ट से अतिरिक्त अन्य किसी भी अवतार ,स्वरुप की निंदा नहीं करनी ।

घर की छत पर पहुँचने के बहुत से रास्ते है । सीढ़ी से चढ़ क्र , रस्सी से चढ़कर ,दीवार चढ़कर , पेड़ो के टहनियों से जाकर आदि आदि  परंतु अंततः पहुंचना तो छत पर ही है । भगवान् तक पहुँचने के मार्ग भी अलग अलग है पर सब उसी परमतत्व तक ले जाते है । अवतारों में अंतर केवल और केवल एक ही है । वह ये की जब श्रीकृष्ण शंकर रूप में होते है तब उनकी लीलाओं में इतना माधुर्य नहीं होता की वह जीव को आकर्षित कर सके ।श्री कृष्ण रूप में माधुर्य प्रेम रस भरा हुआ है ।

प्रायः वैष्णव पुराण श्रीमद् भागवत का प्रचार अधिक होने से और समर्थ आचार्यो की समाज में कमी से लोग भगवान् शंकर आदि को कम बताते फिरते है । कई चित्रो और प्रवचनों में दर्शाया जाता है की गोलोक धाम अन्य कैलाश, साकेत धाम से ऊपर है । कृष्ण से जुड़े ग्रंथो में गोलोक धाम श्रेष्ठ है, श्रीराम से जुड़े ग्रंथो अनुसार साकेत धाम ,शैव ग्रंथो के अनुसार कैलाश धाम । सत्य बात यही है की भक्त जिस रूप में भगवान् को पूजता है ,उसे वही रूप,धाम आदि की प्राप्ति होती ही ।

वेदों और पुराणों के अनुसार श्री गणेश का प्राकट्य
श्री गणेश जी आदि देवता हैं । उनकी अनादि काल से उपासना एवं महिमा के कई प्रमाण वेदों, पुराणों तथा अन्य ग्रंथो में उपलब्ध हैं, यथा-

गणानां त्वा गणपति ्ँ हवामहे प्रियाणां त्वा प्रियपति ्ँ
हवामहे निधीनां त्वा निधिपति ्ँ हवामहे वसो मम । आहमजानि गर्भधमा त्वमजासि गर्भधम्। 

(शुक्लयजुर्वेद २३ । १९ ) 

अर्थात् हे गणों के बीच रहनेवाले सर्वश्रेष्ठ गणपति ! हम आपका आवाहन करते हैं । हे प्रियोंके बीच रहनेवाले प्रियपति ! हम आपका आवाहन करते हैं । हे निधियों के बीच सर्वश्रेष्ठ निधिपति ! इम आपका आवाहन करते हैं । हे ज़गत को बसानेवाले ! आप हमरे हों । आप समस्त जगत को गर्भमें धारण करते हैं, पैदा (प्रकट) करते हैं । आपकी इस क्षमता को हम भली प्रकार जाने ।

इसी प्रकारका उल्लेख ऋरवेद (२ । २३ । १) में भी मिलता है, जिसमें श्रीगणेश का आवाहन किया गया है ।

गणपति अथर्वशीर्षोपनिषद ( ६ ) -में वर्णित है कि श्रीगणेश सर्वदेवमय हैं । यथा-

त्वं ब्रह्मा त्वं विष्णुस्त्वं रूद्रस्त्वमिन्द्रस्त्वमग्निस्त्वं वायुस्त्वं सूर्यंस्त्वं चन्द्रस्त्वं ब्रह्म भूर्भुवः स्वरोम् ।।

अर्थात् तुम ब्रह्मा हो, तुम विष्णु हो, तुम रुद्र हो, तुम इन्द्र हो, तुम अग्नि हो, तुम वायु हो, तुम सूर्य हो, तुम चन्द्रमा हो, सगुण ब्रहा हो, तुम निर्मुण त्रिपाद भू:, भुवः, स्व: एवं प्रणव हो । 

मङ्गलदाता, उमा -महेशसुत, कुमार कार्तिकेय के भ्राता, देवी सिद्धि एवं बुद्धि के स्वामी, क्षेम और लाभ के पिता, बुद्धिविधाता श्रीगणेश की प्राकट्य कथाएँ तथा लीलाएँ भी अद्भुत एवं अलौकिक हैं । विभिन्न कल्पो में उनका प्राकट्य एक विलक्षणता लिये हुए है । विभिन्नता लिये हुए इन कथाओ में शंका नहीं करनी चाहिये वरन् “हरि अनंत हरि कथा अनंता “  का भाव रखकर उसका लाभ लेना चाहिये । सदा यह भावना रहे कि श्रीगणेश, श्रीकृष्ण, श्रीमहादेव आदि एक ही तत्व हैं ।

यहां विभिन्न पुराणों में उपलब्ध भगवान श्रीगणेश की प्राकट्यकथाएँ नियमानुसार संक्षेप में उल्लिखित की जा रही हैं-
पद्मपुराण में वर्णित प्राकट्य कथा -इस पुराण के सृष्टिखण्ड में श्रीगणेश को देवी पार्वती एवं त्रैलोक्यतारिणी भगवती गंगा का पुत्र बताया गया है । शिव -पार्वती विवाह के उपरान्त एक दिन देवी पार्वती गंगा जी के निकट तटपर बैठकर स्नानपूर्व अपनी सखियो से सुगन्धित औषधियों से निर्मित उबटन लगवा रही थीं । बैठे-बैठे देवीने अपने शरीर से पृथ्वीपर गिरे अनुलेप को एकत्रकर एक पुरुष आकृति बनाकर उसे हस्तिमुख प्रदान कर दिया ।

इस विचित्र गजमुख आकृति को देवी पार्वती ने गंगा जी में डाल दिया । पुण्यसलिला गंगा ने उसे सजीव (प्राणवान्) बनाकर एक स्वस्थ सुन्दर बालक का रूप दे दिया । यह देख स्नेहवश माता पार्वतीने उसे जलसे निकाल पुत्र सम्बोधित किया एवं गोदमें लेकर वे उसे पुत्रवत् दुलार करने लगों । इसी समय भगवती गंगा जो पार्वती जी की सहेली हैं, प्रकट हुई और वे भी सुन्दर बालक को पुत्र है कहकर दुलारने लगी । इस विलक्षण दृश्य को निहारने आकाश में देवसमूह एकत्र हो गया ।

स्वयं ब्रह्माजी ने बालक को आशिन् प्रदान कर गणोंका अधिपति घोषित कर दिया । देवगण भी वहाँ उपस्थित हो देवी पार्वती और गंगा पुत्र की वन्दना करने लगे और  श्रीगणेश तथा गांगेय नामसे बालक को विभूषित कर आशिन् प्रदान किया और वे देवलोक को प्रस्थान कर गये । इस प्रकार पद्मपुराण में वर्णित है कि स्वयं माता पार्वती ने गणेशजी को गजमुरव्र बनाया एवं पुण्यसलिला गंगा ने उन्हें सजीव किया ।

शिवपुराण में वर्णित कथा -शिवपुरपमें वर्णित कथा का सार इस प्रकार है -भगवती पार्वती ने एक बार शिवजी के गण नन्दीके द्वारा उनकी आज्ञा पालन मे त्रुटि से खिन्न होकर अपनी प्रिय सखियो जया और विजया के सुझावपर स्वय-के मङ्गलमय पावनतम शरीर के उबटन से एक चेतन पुरुष निर्मित कर उसे सम्पूर्ण शुभ गुणों से संयुक्त कर दिया ।

विचार्येति च सा देवी वपुषो मलसम्भवम्।
पुरुषं निर्ममौ सा तु सर्वलक्षणसंयुतम् ।।
सर्वावयवनिर्दोषं सर्वावयवसुन्दरम्।
विशालं सर्वशोभाढ्यं महाबलपराक्रमम्।।
(शिवपुराण, रुद्रसंहिता, कुमारखण्ड १३ ।२०-२१ ) 

अर्थात् वह बालक शुभ लक्षणों से संयुक्त था । उसके अङ्ग प्रत्यङ्ग दोषरहित एवं सुन्दर थे । उसका शरीर विशाल, परम शोभायमान एवं महान् बल पराक्रम से सम्पन्न था । ऐसी सुन्दर रचना कर देवी ने बालक की सुन्दर वस्त्रो एवं अलंकारों से सुशोभित कर आशीर्वाद दिया एवं कहा -तुम मेरे परम प्रिय पुत्र हो, तुम्हें केवल मेरे ही आदेश का पालन करना है, अन्य किसीका नहीं । तुम मेरे द्वारपाल होकर मेरी आज्ञाके विना किसी को भीतर महल में प्रवेश मत करने देना ।

प्यार दुलार कर माता पुत्र को एक छडी देकर सखियों के साथ महल में स्नानार्थ चली गयी । उसी समय भगवान् शिव वहां उपस्थित हुए और भवनमें जाने लगे । बालक ने उन्हें विनय-पूर्वक रोका, पर महारुद्र भी हठ कर गये । परिणामतः शक्तिपुत्र के साथ भयंकर युद्ध कर शिव ने पिनाक नामक धनुष से भी विजय नहीं पानेपर अपने तीक्ष्णतम शस्त्र त्रिशूल के प्रहार से उस बालक का शीश भंग कर दिया । यह समाचार  सुन भगवती अत्यन्त कुपित हो गयी । सभी लोकों में हाहाकार मच गया । समस्त देवताओ द्वारा  परमेश्वरी शिवप्रिया गिरिजा की स्तुति की जाने लगी । भगवती ने केवल पुत्रके जीवित होनेपर विनाश रोकने की बात कही ।

पशुपतिनाथ शिवकी आज्ञा से एक दांत वाले गज़बालक का शीश लाकर मृत बालक के शरीर से जोडा गया एवं उसे प्राणवान् बनाया गया । श्रीनारायण एवं रुद्रसहित सभी देवताओं ने गजमुख बालक का पूजन अर्चन कर उसे आशिष प्रदान किया । जगदीश्वरी बालक को गोद मे लेकर दुलार करने लगीं। श्रीनारायण ने बालक को गणेश, गजानन, गणपति, एकदन्त जैसे नामोंसे सम्बोधितकर अग्रपूजा का आशीर्वाद दिया । देवाधिदेव महादेव ने बालक को पुत्रवत् स्वीकार कर अपने गणों का अध्यक्ष नियुक्त कर कहा

चतुर्थ्याम् तवं समुत्पन्नो भाद्रे मासि गणेश्वर ।
आसिते च तथा पक्षे चन्द्रस्योदयने शुभे ।।
प्रथमे च तथा यामे गिरिजायाः सुचेतस: ।
आविर्बभूव ते रूपं यास्मात्ते व्रतमुत्तमम्।।
(शिवपुराण, रुद्रसंहिता, कुंमारखण्ड १८ ।३५-३६ )

हे गणेश्वर ! तू भाद्रपद मास के कृष्णपक्ष की चतुर्थी शुभ तिथि को शुभ चंद्रोदय होनेपर उत्पन्न हुआ है । जिस समय गिरिजा के सुन्दर चित्तसे तेरा रूप प्रकट हुआ, उस समय रात्रिका प्रथम पहर बीत रहा था, इसलिये उसी
तिथि में तेरा उत्तम व्रत करना चाहिये ।
यह व्रत सर्वसिद्धिप्रद होगा । सभी वर्णोद्वारा विशेषकर स्त्रियो को यह चतुर्थीव्रत अवश्य करना चाहिये । इससे  सभी वांछित अभिलाषा पूर्ण होंगी । यह आशिष रुद्रने श्री गणेश को देकर पुत्रवत् दुलार किया । यह शिवपुराण के कुमारखण्ड में वर्णित कथाका सारांशमात्र है ।

ब्रह्मवैवर्तपुराण में वर्णित प्राकट्य कथा – इस पुराणके गणपति खण्ड के तेरह अध्यायों में श्रीगणेश की मङ्गलमयी प्राकट्यकथा वर्णित है । शंक्षेप में कथासार निर्दिष्ट है –

एक समय देवी पार्वती ने सदाशिव से एक उत्तम पुत्र पाने की अभिलाषा व्यक्त की । देवाधिदेव महादेव ने देवी को पुण्यकव्रत का अनुष्ठान करने का परामर्श दिया एवं कहा कि इस पुण्यकव्रत के प्रभाव से तुम्हें स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण पुत्ररूप में प्राप्त होंगे । देवी पार्वती को व्रतका विधि-विधान बताकर गणों को सम्पूर्ण व्यवस्था का भार सौंप सदाशिवने समस्त देवताओं, ऋषि मुनियों आदि को कैंलासपर आमंत्रित कर दिया । देवी पार्वती ने इस परमोत्तम होके सम्पूर्ण कर्तव्यों की वर्षपर्यन्त प्रतिदिन विधि विधान से पूर्णकर व्रत का उद्यापन किया ।

इसके फलस्वरूप गोलोकनाथ साक्षात् परब्रह्म श्रीकृष्ण उन्हें सर्वाङ्ग-मनोहर शिशुरूप में प्राप्त हुए । कैंलासपर इस अवसरपर विलक्षण उत्सव मनाया गया, जिसमें श्रीनारायण, श्रीब्रह्मा आदि देवता सपरिवार सम्मिलित हुए एवं उन्होंने शिशु को अनेक उपहार तथा शुभ आशिष प्रदान किये । इस अवश्य शनिदेव भी वहां उपस्थित थे, पर उन्होंने न तो शिशु को निहारा, न आशिष दिया । भगवती पार्वती के पूछनेपर उन्होंने पत्नीद्वारा शाप दिये जाने का वृत्तान्त बताकर कहा -देवि ! मेरे देखने मात्र से इस सुन्दर शिशुका अनिष्ट हो सकता है । माता पार्वती ने स्नेहपूर्वक शनिदेव को आश्वस्त करते हुए कहा कि कर्मभोगफल तो ईश्वरेच्छा के अधीन होते हैं, अत: तुम नि:संकोच मेरे पुत्र को देखो एवं आशिष प्रदान करो ।

परिणामत: शनि की दृष्टिमात्र पड़ते ही शिशुका मस्तक धड़से पृथक होकर आकाश में विलीन हो गया और गोलोक में जाकर अपने अभीष्ट परात्पर श्रीकृष्णमें प्रविष्ट हो गया । यह देख माता पार्वती घोर विलाप करने लगी । सम्पूर्ण कैलास में हाहाकार मच गया । तभी यहाँ उपस्थित श्री विष्णु गरुडपर सवार हो पुष्पभद्रा नदी के तट से उत्तर की और सिर किये एक गज़का मस्तक ले आये और पार्वतीसुत के धड़पर सुंदरता से जोड़कर उसे प्राणवान् कर दिया । तदुपरान्त अचेत माता पार्वती को सचेतकर शिशु उनकी गोदमें दे दिया एवं कहा -हे देवि! महर्षि कश्यप के शाप से शिवपुत्रका शीश संग होना एक प्रारब्ध था, इसमें शनिका कोई दोष नहीं है ।

**महर्षि कश्यप द्वारा शिव को शाप क्यों दिया गया इसकी कथा – देवदेव गणेश सर्वाधार शिव के पुत्र और विघ्नों का नाश करनेवाले हैं । ब्रह्मवैवर्त्यपुराण में जिस कल्प की कथा वर्णित है उसके अनुसार अनुसारस्वयं परब्रह्म परमेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण अपने अंशसे पार्वती नन्दन के रूपमें अवतरित हुए थे, फिर उन ग्रहाधिराज भगवान् श्रीकृष्ण का ग्रह (शनि) की दृष्टि से मस्तक कैसे कट गया ? इस सम्बन्ध में ब्रह्मवैवर्त पुराण में एक कथा इस प्रकार है-

एक बार की बात है । भक्तों को प्राणाधिक प्यार करनेवाले भगवान् शिव माली और सुमाली को मारनेवाले सूर्यपर अत्यन्त कुपित हुए । उन्होंने अपने ही समान अपने परम तेजस्वी तीक्ष्णतम त्रिशूल से सूर्यपर प्रहार कर दिया । उस अमोघ त्रिशूल का आघात सूर्यके लिये असह्य था । वे तुरंत मूच्छित होकर रथसे नीचे गिर पड़े ।
लोक पितामह के पौत्र परम तपस्वी महर्षि कश्यप ने जब अपने चेतना शून्य पुत्र सूर्य की ऊपर चढी आंखों को देखा तो उन्होंने उसे अपने वक्षसे लगा लिया और करुण क्रन्दन करने लगे । उस समय समस्त सुरसमुदाय भी शोकविह्वल होकर रुदन करने लगा और सूर्य बिना सम्पूर्ण जगत् में अंधकार हो गया । सर्वत्र हाहाकार मच गया । ब्रह्मतेज से प्रज्वलित महर्षि कश्यप ने अपने पुत्र को म्लान देखकर दुख के आवेगइ पार्वती वल्लभ की शाप दे दिया-आज जिस प्रकार तुम्हारे तीक्ष्णतम अक्षय  त्रिशूल से मेरे पुत्रका वक्ष विदीर्ण हुआ है, उसी प्रकार तुम्हारे प्राणप्रिय पुत्र का शिरच्छेद हो जायगा ।

सहज करुणामय आशुतोष का रोष कुछ ही देरमें शान्त हो गया । बस, उन्होंने उसी क्षण ब्रह्मज्ञान के द्वारा सूर्य को जीवित कर दिया ।  त्रिगुणात्मक भक्तवत्सल सूर्य के पूर्ववत् स्वस्थ हो जाने के कारण देवगण एवं समस्त प्राणी सुखी हो गये; किंतु महर्षि कश्यप के अमोघ वचनसे सूर्यपुत्र शनि की दृष्टि पड़ते ही शिवपुत्र गणेश का मस्तक कट गया । आगे भगवान् विष्णु द्वारा एक हाथी का मस्तक जोड़ कर बालक को प्राणवान बनाया गया।
कैलास में पुन: उल्लास का वातावरण बन गया । श्रीविष्णुने बालक के विघ्नेश, गणेश, हेरम्ब, गजानन आदि नाम रखे ।
वहां उपस्थित त्रिदेवोसहित सभी देवी देवताओं, ऋषि मुनियों आदि ने गजानन का निम्न ३२ अक्षरो के मन्त्र से पूजन किया

ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं गणेश्वराय ब्रह्मरूपाय चारवे ।
सर्वसिद्धिप्रदेशाय विघ्नेशाय नमो नम: ।।
(ब्रह्मवैवर्तपुराण, गणपतिखण्ड १३ । ३२) 

यह मन्त्र सम्पूर्ण मनोकामनाओ को पूर्णकर अन्तमें मोक्ष प्रदान करनेवाला है ।
इसके उपरान्त श्री विष्णुजी ने  गणेशस्तोत्रम् द्वारा श्री गजानन गणेश की सुंदर स्तुति की, जिसका कुछ अंश यहाँ प्रस्तुत है –

प्रवरं सर्वदेवानां सिद्धानां योगिनां गुरुम्।
सर्वस्वरूपं सर्वेशं ज्ञानराशिस्वरूपिणम्।।
अव्यक्तमक्षरं नित्यं सत्यमात्मस्वरूपिणम्।
वायुतुल्यातिनिर्लिप्तं चाक्षतं सर्वसाक्षिणम्।।
संसारार्णवपारे च मायापोते सुदुर्लभे ।
कर्णधारस्वस्वपं च भक्तानुग्रहकारकम्।।
वरं वरेण्यं वरदं वरदानामपीश्वरम्।
सिद्धं सिद्धिस्वरूपं च सिद्धिदं सिद्धिसाधनम्।।
(ब्रह्मवैवर्तपुराण गणपतिखंड १३ । ४२ -४५)

अर्थात् आप सभी देवों में श्रेष्ठ, सिद्धों और योगियो के गुरु,  सर्वस्वरूप, सर्वेश्वर, ज्ञानराशिस्वरूप, अव्यक्त, अविनाशी, नित्य, सत्य, आत्मस्वरूप , वायु के समान अत्यन्त निर्लेप, क्षतरहित और सबके साक्षी हैं । आप संसारसागर से पार होनेके लिये परम दुर्लभ मायारूपी नौकाके कर्णधारस्वरूप और भक्तोंपर अनुग्रह करनेवाले हैं । आप श्रेष्ठ, वरणीय, वरदाता एवं वरदानियोंके भी ईश्वर हैं । आप सिद्ध, सिद्धिस्वरूप, सिद्धिदाता एवं सिद्धिके साधन हैं । इसके उपरान्त श्री विष्णु ने देवी पार्वती को बताया कि आज आपके इस पुत्र की हम त्रिदेवों ने प्रथम पूजा की है ।

अत: आज़से यह प्रथम पूजा का अधिकारी रहेगा। आज भाद्रपदमास के शुक्लपक्ष की चतुर्थी है, यह आपके पुत्रके नामसे गणेशचतुर्थी कही जायगी । आज जो आपके पुत्र की पूजा अर्चना करेगा उसके समस्त संकट एवं कष्टो का निवारण हो जायगा और उसे समस्त कार्यकलापो में सिद्धि प्राप्त होगी ।

लिङ्गपुराण में प्राकट्य कथा -आशुतोष भगवान् शिव एवं श्रीब्रह्माजी से वरदान प्राप्तकर राक्षस हमेशा देवलोकपर चढाई कर देवताओं को वहांसे खदेड़ दिया करते थे, इसीसे व्यथित देवगण देवर्षि नारद के साथ  कैलासपर भगवान् शंकर के पास गये और उनकी स्तुति  करने लगे । अन्तर्यामी कैलासपति ने प्रसन्न होकर देवताओ से इच्छित वर मांगने को कहा । कातरभावसे देवताओ ने राक्षसों से रक्षा की याचना की और कहा -प्रभो ! असुरों के कार्यं में जैसे विघ्न पडे, वैसा आप करें ।

पार्वतीवल्लभ ने तथास्तु कहकर देवताओ को सम्मानसहित विदा किया । इसके बाद एक दिन परम तेजस्वी, सुन्दर शरीर वाले गजमुख शिशुरूप में एक हाथमें त्रिशूल तथा दूसरे में पाश लेकर भगवती पार्वती के सम्मुख प्रकट हुए और उन्हें माता कहकर दण्डवत प्रणाम किया । भगवती माता पार्वती ने आश्चर्यपूर्ण भावके साथ तेजस्वी मनोहर बालक को गोदमें उठा लिया । उसी समय वहॉ भगवान शिव ने उपस्थित होकर देवी पार्वती तसे कहा – यह तुम्हारा पुत्र है, जो देवताओ की रक्षा हेतु प्रकट हुआ है । भगवती प्रसन्न हो बालक का श्रृंगार करने लगी और पुत्रवत् दुलार करने लगीं । देवगण प्रसन्न हो आकाश में नृत्य- गान के साथ पुष्पवर्षा करने लगे ।

तब कल्याणकारी शिवने अपने पुत्र से कहा –

तवावतारो दैत्यानां विनाशाय ममात्मज ।
देवानामुपकार्यार्थम् द्विजानां ब्रह्मवादिनाम्।।
ब्राह्मणै: क्षत्रियैर्वैश्यै: शुद्रैश्चैव गजानन
सम्पूज्य: सर्वसिध्यर्थम् भक्ष्यभोज्यादिभि: शुभै: ।।
त्वां गंधपुष्पधूपाद्यैरनभ्यचर्य जगत्त्रये ।
देवैरपि तथान्यैश्च लब्धव्यं नास्ति कुत्रचित्।।
(लिंगपुराण १०५ । १५, २४-२५) 

अर्थात् हे मेरे पुत्र ! तुम्हारा यह अवतार राक्षसों का नाश करने तथा देवता, बलिया और ब्रह्मवादियोंपर उपकार करने के निमित्त हुआ है । ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्रोद्वाराभी तुम सभी कार्यों की सिद्धि के लिये भक्ष्यभोज्य एवं शुभ पदार्थो से पूजित होओगे । तीनों लोकोंमें जो चन्दन, पुष्प, धुप दीप आदि के द्वारा तुम्हारी पूजा किये बिना कुछ पाने की चेष्टा करेंगे वे देवता हों अथवा अन्य, उन्हें कुछ भी प्राप्त नहीं होगा ।
इस प्रकार श्रीगणेश, गजानन आदि नामोंसे श्रृंगारित कर शिवजी ने अपने अवतार हस्तिमुख को प्रथमपूज्य होनेका आशिष् दिया । यह लिङ्गपुराण में वर्णित कथा का सार है ।

स्कन्दपुराण में वर्णित प्राकट्य कथा-इस पुराण में वर्णित प्राकट्य कथा शिवपुराणमें वर्णित कथाके समान ही है । केवल शिवजीद्वारा शीशभंग किये जाने के बादवाले
प्रसंगमें अन्तर है । शिवजीद्वारा द्वाररक्षक शिशुका मस्तक काटा ही गया था कि गणोंसे गजासुर नामके राक्षस के कैलास पर आक्रमणकी सुचना प्राप्त होते ही वे उससे युद्ध करने जा पहुंचे । शिवने गजासुर को भी शीशविहीन कर दिया । इसी समय नंदीने देवी पार्वती द्वारा उनके पुत्रके
धड को लेकर विलाप करनेका समाचार शिवजी को बताया । उन्होंने गजासुरका कटा शीश अपने हाथोंमें उठा लिया और उसे लाकर बालक के धड़से छोड़कर उसे

प्राणवान् कर दिया तथा बालक को पुत्रवत् स्वीकार कर ‘गजानन’ नामकरण किया एवं देवी पार्वती की प्रसन्नताहेतु स्वयं गजानन की पूजा कर अग्रपूजा का वर प्रदान किया । इस पुराण में भी श्रीगणेश का प्राकट्य भाद्रपदमास शुक्लपक्ष की चतुर्थी को होना बताया गया है । इस दिन की गयी इनकी आराधना को बहुत महत्त्वपूर्ण बताया गया है ।

उपर्युक्त पुराणों के अतिरिक्त निम्न पुराणों में भी श्रीगणेश की प्राकट्यकथाएं वर्णित हैं, किंतु उनमें उपर्युक्त कथाएं ही वर्णित हैं, अत: उन्हें यहां केवल अति संक्षेप में उल्लिखित किया जा रहा है –

मत्स्यपुराण– इसमें प्राकट्यकथा पद्मपुराण में वर्णित कथा के समान ही है । देवी पार्वती और गंगा जी के पुत्र
गणेश एवं गांगेय नाम से विख्यात हो प्रथमपूज्य होंगे, यही आशय दर्शाया गया है ।

वायुपुराण, सौरपुराण एवं ब्रह्मपुराण में –  लिङ्गपुराणमें वर्णित कथा के अनुसार श्रीगणेश को साक्षात् शिव ही दर्शाया गया है ।

श्री गणेशपुराण में – श्रीगणेश को श्री विष्णु का अवतार बताया गया है, जैसा कि ब्रह्मवैवर्तपुराण में वर्णित है ।

महाभारत में -उन्हें वेदव्यासद्वारा महाभारत महाकाव्य लिखने हेतु स्मरण करनेमात्र से प्रकट होना प्रतिपादित किया गया है ।

इस प्रकार विभिन्न पुराणों में श्रीगणेश की प्राकट्य कथाओ में विविधता होते हुए भी प्रत्येक कल्प में उन्हें शंकरसुवन, भवानीनन्दन ही बताया गया है । श्रीगणेश सभी की आस्था के केन्द्र हैं । विश्वभर में उनके कईं मन्दिर हैं, उनकी मूर्ति भी भव्य आकार की अतिमनोहर होती है । भाद्रपदमास के शुक्लपक्ष की चतुर्थी को श्री गजानन के प्राकट्य के विषय में निम्न श्लोक प्रसिद्ध है –

सर्वदेवमय: साक्षात् सर्वमङ्गलदायक: ।
भाद्रशुक्लचतुर्थ्याम् तु प्रदुर्भूतो गणाधिप: ।।
सीध्यन्ति सर्वकार्याणि मनसा चिन्तितान्यपि ।
तेन ख्यातिं गतो लोके नाम्ना सिद्धिविनायक: ।। 

इस दिन की आराधना से भगवान्  श्रीगणेश अपने भक्तों (आराधकों) को समस्त कार्य कलापों में सिद्धि प्रदान करते हैं ।  कलियुगमें श्रीगणेश साधारण रीति से शीघ्र प्रसन्न होते है दूर्वा, सिन्दूर, चन्दन, पुष्प एवं गुड़ बताशेमात्र से प्रसन्न  होकर अपने भक्त की सभी कामनाएं पूर्ण कर देते हैं । उनकी आराधना मात्र से-

विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थी लभते धनम्।
पुत्रार्थी लभते पुत्रान्मोक्षार्थी लभते गतिम्।। 

विद्यार्थी को विद्या, धन की इच्छावाले को धन, पुत्रकी कामनावाले को पुत्र एवं मोक्ष चाहनेवाले को परमगति प्राप्त होती है ।

श्री गणेश भगवान् की जय 

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