श्री रामचंद्र भगवान् की आदर्श दिनचर्या और आदर्श रामराज्य

भगवान् श्रीराम अनन्त क्रोटि ब्रह्माण्ड नायक परम पिता परमेश्वर के अवतार थे और उन्होंने धर्मकी मर्यादा रखने के लिये भारत भूमि अयोध्या में राजा दशरथ के यहाँ पुत्ररूप में अवतार लिया था । उस समय राक्षसो का नग्न बीभत्स रूप इतना प्रचण्ड हो गया कि ऋषि मुनियो एवं गौ ब्राह्मणों का जीवन खतरे में पड़ गया था । जहां जहां कोई शास्त्र विहित यज्ञ कर्म आदि किये जाते थे, राक्षस गण उन्हें विध्वंस करने के लिये सदा तत्पर रहते थे ।

राक्षसों का राजा रावण भारत भूमिपर अपना एकछत्र राज्य स्थापित करने के लिये चारों ओर जाल फैला रहा था ,ऐसी स्थिति में देवताओ के आग्रह एवं अनुनय विनय के फल स्वरूप भगवान् स्वयं अपने अंशोंसहित राम, लक्ष्मण, भरत एवं शत्रुघ्न के रूपमें अवतीर्ण हुए ।

भगवान् श्रीराम के आदर्श चरित्र का विवरण हम भिन्न भिन्न रामायणों में पाते हैं जिनमें वाल्मीकीय रामायण, अध्यात्मरामायण तथा पूज्य श्री गोस्वामी जी का रामचरितमानस प्रमुख है ।

साधारण बालकों की तरह बालकपन में अपने छोटे  भाइयों एवं बाल सखाओ के साथ भगवान् श्रीराम सरयूके तटपर कंदुक क्रीडा एवं अन्य खेलो में ऐसे मस्त हो जाते थे कि उन्हें अपने खाने पीने की भी सुध नहीं रहती थी ।

प्रजापालन के लिये भगवान् विशेष सचेष्ट एवं सतर्क रहते है । राज़सभा में सनकादि तथा नारद अष्ट ऋषि प्रतिदिन जाते है और उनसे वेद पुराण तथा इतिहास की चर्चा करते है । प्रजा को मर्यादापुरुषोत्तम भगवान् श्रीरामका यह पहला आदेश था कि यदि भूल से मैं कुछ अनीतिपूर्ण वचन कहूँ जो शासन विरुद्ध, न्याय विरुद्ध या द्वेषयुक्त हो तो भय छोड़कर मुझे यह कहकर तुरंत रोक देना कि – राम ! तुम्हारा यह कार्य अनुचित है ।

भगवान् श्रीराम जी की दिनचर्या का आनन्दरामायण के राज्यकाण्ड के १९ वें सर्ग में बड़े विस्तार से वर्णन है । श्रीरामदास के द्वारा महर्षि वाल्मीकि जी अपने शिष्य को उपदेश करते हैं –

श्रृणु शिष्य वदाम्यद्य रामराज्ञ: शुभावहा ।
दिनचर्या राज्यकाले कृता लोकान् हि शिक्षितुम् ।।
प्रभाते गायकैर्गीतैर्बोधितो रघुनन्दन: ।
नववाद्यनिनादांश्च सुखं शुश्राव सीतया ।।
ततो ध्यात्वा शिवं देवीं गुरुं दृशरथं सुरान् ।
पुण्यतीर्थानि  मातृश्च देवतायतनानि च ।।
(आनन्द रामायण, राज्यकाण्ड १९ । १-३ ) 

भगवत् श्रीरामजी नित्य प्रत:काल चार घडी रात्रि शेष रहते मंगलगीत आदि को श्रवणकर जागते थे । फिर शिव, देवी, गुरु, देवता, पिता, तीर्थ, माता, देव मंदिर तथा पुण्यक्षेत्रों एवं नदियों का स्मरण करते थे, फिर शौचादि के पश्चात् दंत शुद्धि करते थे । इसके अनन्तर कभी घरपर और कभी सरयू में जाकर स्नान करते थे ।

स्नात्वा यथाविधानेन ब्रह्मघोषपुर:सरम् ।।
प्रात:संध्यां तत: कृत्वा ब्रह्मयज्ञं विधाय च ।
(आनन्द रामायण, राज्यकाण्ड १९ । १० -११) 

ब्राह्यणों के वेदघोष के साथ विधिवत् स्नान करते थे । तदनन्तर प्रात:संध्या तथा ब्रह्मयज्ञ कर के ब्राह्मणों को दान देकर महल में आकर हवन करके शिवपूजन करते थे और इसके बाद कौसल्या आदि तीनों माताओ का पूजन करते थे । फिर गौ, तुलसी, पीपल आदि एवं सूर्यनारायण का पूजन करते थे । इसके पश्चात् सद्ग्रंथो तथा गुरुदेव का पूजन करके उनके मुख से पुराण कथा श्रवण करते थे और तब भ्राता एवं ब्राह्मणों के साथ कामधेनु प्रदत्त दुग्ध से अग्निपर बना हुआ उपहार ग्रहण करते थे ।

तदनन्तर बस्त्रादि तथा अस्त्र शस्त्र धारणकर वैद्य तथा ज्योतिषियो का स्वागत कर वैद्य से नाडी परीक्षण कराते तथा ज्योतिषियो से नित्य पंचांग श्रवण करते थे, क्योंकि-

लक्ष्मी: स्यादचला तिथिश्रवणतो वरात् तदायुश्चिरम्

-के अनुसार तिथि के श्रवणसे लश्मी, वारसे आयु वृद्धि, नक्षत्र से पापनाश, योगसे प्रियजन विगोगनाश तथा करण श्रवण से सब प्रकारकी मनोकामना पूर्ण होती है ।
पंचांग श्रवण के अनन्तर श्रीरामजी पुष्पमाला धारणकर तथा दर्पण देखकर महलसे बाहर आकर अपनी प्रजा के लोगोंसे, मित्रोंसे तथा आगन्तुकोसे भेट करते थे ।

इसके अनन्तर उद्यान में से निकलकर सेना का निरीक्षण करते थे, फिर राज़सभा में जाकर राज्य कार्यो पर अपने भाइयों, पुत्रों तथा अधिकारियो से विचार कर के आवश्यक व्यवस्था करते थे । तब श्रीरामजी पुन: महल में पधारते थे ।
यहाँ जाकर मध्याह्न में स्नान करके पितरो का तर्पण, देवताओं को नैवेद्य तथा बलिवैश्वदेव, काक बलि आदि देकर भूत बलि देते थे । फिर अतिथियों को भोजन कराकर ब्राह्मणों तथा यतियों के भोजन कर लेने के पश्चात् भोजन करते थे । भोजन के अनन्तर ब्राह्मणों को दक्षिणा देकर सौ पद चलकर विश्राम करते थे । विश्राम के पश्चात् क्षणिक मनोरञ्जन करके पिंजरों में पाले गये महल के पक्षियों का निरीक्षण करके महल की छतपर चढ़कर अयोध्या नगरीका निरीक्षण करते । फिर गोशाला में जाकर गायों की देख रेख करते ।

इसके पश्चात् अश्वशाला, गजशाला, उष्ट्रशाला तथा अस्त्रशाला आदि का निरीक्षण करते । इन सब कार्यो के बाद वे दूतावास एवं तृण काष्ठागारों का निरीक्षण करते हुए दुर्गके रक्षार्थ बनी खाई की देख भाल करते और रथारूढ़ हो अवधपुरी के राजमार्ग से दुर्गके द्वारा तथा द्वाररक्षको का निरीक्षण करते थे । फिर बंधुओ के साथ सरयू के तटपर भ्रमण कर सैनिक शिविरों का निरीक्षण कर महलों में लौटकर राज्य कार्यकी व्यवस्था करके सायंकाल के समय सायंसंध्या तथा पूजनादि के पश्चात् भोजन करते थे । फिर देव मन्दिरों में जाकर देवदर्शन तथा कीर्तन श्रवण कर के महल में लौट आते थे ।

यहां बन्धुओ से पारिवारिक विषयो पर चर्चा करके भगवान्  (सार्धयामां निशां नीत्वा) डेढ पहर रात्रि के व्यतीत हो जानेपर शयनकक्ष में प्रवेश करके विश्वम करते थे । भगवान् की यह नियमित दिनचर्या हम सभी के लिये एक आदर्श दिनचर्या है । यदि हम इसके अनुरूप व्यवहार की तो हमारा इहलोक तथा परलोक दोनों में ही कल्याण हो सकता है । यह दिनचर्या जहाँ एक सद् – नागरिक के लिये आदर्श दिनचर्या है, वहाँ यह शासक को भी कुशल प्रशासक बनानेवाली है ।

रामचरितमानस मे एक आदर्श राज्य का दिग्दर्शन होता है । रामराज्य एक आदर्श प्रजातन्त्रवादी व्यवस्था है, जिसमे किमी प्रकार का शोषण और अत्याचार नहीं है । सभी लोग एक दूसरे से स्नेह रखते है । रामराज्य में कोई किसीका शत्रु नहीं है । रामचन्द्र जी के राज्य सिंहासनपर बैठते ही तीनों लोकों में हर्ष छा गया और सारे शोक समाप्त हो गये-

राम राज बैठें त्रैलोका । हरषित भए गए सब सोका ।।
बयरु न कर काहू सन कोई । राम प्रताप बिषमता खोई ।। (मानस ७ । २० । ७-८) 

राम प्रतापरूपी सूर्य के उदित होने से तीनों लोको में आनन्द का प्रकाश भर गया । इनके साथ ही अविद्या, पाप, काम, क्रोध आदि का भी नाश हो गया

जब ते राम प्रताप खगेसा । उदित भयउ अति प्रबल दिनेसा ।। पूरि प्रकास रहेउ तिहुँ लोका । बहुतेन्ह सुख बहुतन मन सोका ।। 

श्री रामचन्द्र जी निष्काम और अनासक्त भावसे राज्य करते थे । उनमें कर्तव्यपरायणता थी और वे मर्यादा के अनुरुप आचरण करते थे । जहाँ स्वयं रामचन्द्र जी शमन करते थे, उस नगरके वैभव का वर्णन नहीं किया जा सकता है।

रमानाथ जहँ राजा सो पुर बरनि कि जाइ ।
अनिमादिक सुख संपदा रहीं अवध सब छाइ ।।
(मानस ७ । २९) 

अयोध्या में सर्वत्र प्रसन्नता थी । वहाँ दुख और दरिद्रता का नाम तक नहीं था । न कोई अकाल मृत्यु को प्राप्त  होता था और न किसी को क्रोई पीडा थी । कोई मूर्ख और लक्ष्मीहीन नहीं था । सभी के शरीर सुन्दर और नीरोग थे-

अल्पमृत्यु नहि कवनिउ पीरा । सब सुंदर सब बिरुज सरीरा ।। नहि दरिद्र कोउ दुखी न दीना । नहि कोउ अबुध न लच्छन हीना ।। (मानस ७। २१ । ५-६) 

सभी लोग अपने वर्ण और अश्रम के अनुरूप धर्ममे तत्पर होकर वेदमार्गपर चलते थे और आनन्द प्राप्त करते थे । वे निर्भय, शोकमुक्त और रोगरहित थे-

बरनाश्रम निज निज धरम निरत बेद पथ लोग ।
चलहि सदा पावहि सुखहि नहि भय सोक न रोग ।।
(मानस ७ । २०) 

रामराज्य में दैहिक, दैविक और भौतिक ताप किसीको नहीं सताते थे । सभी लोग वेदोंमे वर्णित अपनी मर्यादा के अनुसार धर्मका अनुसरण करते थे-

दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहि काहुहि व्यापा ।। सब नर करहि परस्पर प्रीती । चलहि स्वधर्म निरत श्रुति नीती ।। (मानस ७। २१ । १-२) 

धर्म अपने चारों चरणों (सत्य, शौच, दया और दान) से जगाते में व्याप्त था, स्वप्र में भी पापका नाम नहीं था। समी नर-नारी रामभक्तिमें पगे हुए थे और सभी परमगति (मोक्ष) के अधिकारी थे-

चारिउ चरन धर्म जग माहीं । पूरी रहा सपनेहुँ अघ नाहीं ।। राम भगति रत नर अरु नारी । सकल परम गति के अधिकारी ।। (मानस ७ । २१ । ३-४)

राम-राज्य में सभी लोग सरल स्वभाबवाले, धर्मपरायण और पुण्यात्मा थे । सभी चतुर और गुणी थे । सभी गुणोंका सम्मान करनेवाले, पण्डित तथा ज्ञानी थे । सभी एक-दूसरे के उपकार को माननेवाले थे, धूर्तता या कपट किसी में नहीं था –

सब निर्भय धर्मरत पुनी । नर अरु नारि चतुर सब गुनी ।। सब गुनग्य पंडित सब ग्यानी । सब कृतग्य नहि कपट सयानी ।। (मानस ७ । २१ । ७-८)

सभी पुरुष एकपत्नीव्रती थे तथा स्त्रियां भी मन, वचन हैं और कर्मसे पतिका हित करनेवाली थी-

एक नारि ब्रत रत सब झारी । से मन बच क्रम पति हितकारी ।। (मानस ७ । २२ । ८)

अयोध्या में श्रीरामचन्द्र जी सात समुद्रों की मेखला (करधनी) वाली पृथ्वी के एकमात्र शासक थे । उनके प्रत्येक रोममें अनेकों ब्रह्माण्ड थे, उनके लिये सात द्वीपोंकी यह प्रभुता कुछ अधिक नहीं थी-

भूमि सप्त सागर मेखला । एक भूप रघुपति कोसला ।।
भुअन अनेक रोम प्रति जासू । यह प्रभुता कछु बहुत न तासू (मानस ७ । २२ । १-२) 

नगर के स्त्री पुरुष श्रीरामचन्द्रजी का गुणगान करते थे और श्रीरामचन्द्रजी सदा सबपर अत्यन्त प्रसन्न रहते थे ।
रामके राज्य में राजनीति स्वार्थसे प्रेरित न होकर प्रजा की भलाई के लिये थी । इसमें अधिनायकवाद की छायामात्र भी नहीं थी । रामका राज्य मानव कल्याण के आदर्शो से युक्त एक ऐसा राज्य था, जिसमें निस्वार्थ प्रजा की सेवा, निष्पक्ष आदर्श न्याय व्यवस्था, सुखी तथा समृद्धिशाली समाज व्यवस्था पायी जाती थी । श्री रामचन्द्र जी ने नगर वासियों की सभामें यह स्पष्ट घोषणा की है कि भाइयों  यदी मैं कोई अनीति की बात कहूँ तो तुमलोग नि:संकोच मुझें रोक देना –

जौ अनीति कछु भाषों भाषौ । तौ मोहि बरजहु भय बिसराई ।। (मानस ७ । ४३ । ६) 

वनगमन से पूर्व भी राम भरत जी को अदिश देते है कि वे उनकी अनुपस्थिति में प्रजा को हर प्रकार से सुखी रखे-

सो बिचारि सहि संकटु भारी । करहु प्रजा परिवारु सुखारी ।। (मानस २ । ३०६ । ५) 

श्रीराम सत्य, प्रेम और दया की मूर्ति थे । वे अपनी प्रजा को अपने माता पिता और भाइयों के समान प्यार करते थे । वे अपनी पत्नी से बहुत स्नेह करते थे, लेकिन प्रजाके हितके लिये उसका परित्याग करने में भी उन्होंने संकोच नहीं किया है । श्री राम के राज्य मे प्रकृति की छटा भी देखने योग्य थी । वनोंमें वृक्ष सदैव फूल और फलो से लदे रहते थे । हाथी और सिंह वैर भाव भूलकर एक साथ रहते थे । पशु पक्षी अपनी स्वाभाविक शत्रुता को त्यागकर आपस में प्रेमसे रहते थे-

फूलहिं फरहि सदा तरु कानन । रहहि एक सँग गज पंचानन ।। खग मृग सहज बयरु बिसराई । सबन्हि परस्पर प्रीति बढाई ।। (मानस ७। २३ । १-२) 

पक्षी मधुर बोली बोलते थे । भांति भांति के पशुओ के समूह वन में निर्भय विचरण करते थे और आनन्दित होते थे । शीतल मन्द सुगन्ध पवन प्रवाहित होता रहता था तथा भौंरे पुष्पो का रस चूस कर गुंजार करते थे-

कूजहि खग मृग नाना बृंदा । अभय चरहि बन करहि अनंदा।। सीतल सुरभि पवन बह मंदा । गुंजत अलि लै चलि मकरंदा ।। (मानस ७ । २३। ३-४ ) 

मांगने से ही बेले और वृक्ष मकरंद को टपका देते थे । गौएँ मनचाहा दूध दे देती थीं । पृथिवी सदैव खेती से सम्पन्न रहती थी । उस समय त्रेता में ही सत्ययुग की स्थिति उत्पन्न हो गयी थी

लता बिटप माँगे मधु चवहीं । मनभाबतो धेनु पय स्त्रवहीं ।। ससि संपन्न सदा रह धरनी । त्रेताँ भइ कृतजुग कै करनी ।। (मानस ७ । २३ । ५-६) 

सम्पूर्ण जगत के स्वामी को राजा जानकर पर्वतो ने अनेक प्रकार की मणियो की खानें प्रकट कर दी थीं । समस्त नदीयों में श्रेष्ठ, शीतल, निर्मल और सुख देनेवाला स्वादिष्ट जल प्रवाहित होता था ।

प्रगटी गिरिन्ह बिबिधि मनि खानी । जगदातमा भूप जग जानी ।। सरिता सकल बहहि बर बारी । सीतल अमल स्वाद सुखकारी ।। (मानस ७ । २३ ।७-८)

श्री रामचन्द्र जी के राज्य में चन्द्रमा अपनी अमृतमयी किरणों से पृथ्वी को भर देते थे । सूर्य उतना ही ताप देते थे, जितनी आवश्यकता हो । मेघ भी आवश्यकतानुसार जल प्रदान करते थे-

बिधु महि पूर मयूखन्हि रबि तप जेतनेहि काज । मागें बारिद देहि जल रामचंद्र के राज़ ।। (मानस ७ । २३ ) 

सभी लोगो ने नाना प्रकार की षुष्पवाटिकाएँ यत्न करके लगा रखी थीं, जिनमें विभिन्न जातियो की सुन्दर लताएँ सदैव वसन्त की तरह फूलती रहती थीं –

सुमन बाटिका सबहिं लगाई । बिबिध भाँति करि जतन बनाई ।। लता ललित बहु जाति सुहाई । फूलहि सदा बसंत कि नाई ।। (मानस ७ । २८ । १)

भौंरे मनोहर स्वरसे गुंजार करते थे । सदा तीनों प्रकार की सुन्दर वायु प्रवाहित होती रहती है । बालकोंने अनेक प्रकार के पक्षी पाल रखे थे जो मधुर वाणी बोलते और उड़ने में सुन्दर लगते थे –

गुंजत मधुकर मुखर मनोहर । मारुत त्रिबिधि सदा बह सुंदर ।। नाना खग बालकन्हि जिआए । बोलत मधुर उडात सुहाए ।। 

मोर, हंस, सारस और कबूतर भवनोंपर अत्यन्त शोभा पाते थे । ये पक्षी मणियो की दीवारों और छतों में जहाँ तहाँ अपनी परछाई देखकर (दूसरा पक्षी समझकर) अनेक प्रकार से मधुर बोली बोलते और नृत्य करते थे –

मोर हंस सारस पारावत । भवननि पर सोभा अति पावत ।। जहँ तहँ देखहि निज परिछाहीं । बहु बिधि कूजहि नृत्य कराहीं ।। (मानस ७ । २८ । ५-६) 

बाजार इतने सुन्दर थे कि उनका वर्णन नहीं किया जा सकता । वहां वस्तुएँ बिना मूल्य के मिलती थीं । जहाँ स्वयं लक्ष्मपति राजा हों वहाँ की सम्पत्ति का वर्णन कैसे किया जा सकता है । वस्त्र विक्रेता (बजाज), धनका लेन देन करनेवाले (सराफ) तथा व्यापार करनेवाले (वणिक) बैठे हुए स्वयं कुबेर के समान लगते थे । सभी लोग सुखी- सदाचारी और सुन्दर थे

बाजार रुचिर न बनइ बरनत बस्तु बिनु गध पाइए ।
जहँ भूप रमानिवास तहँ की संपदा किमि गाइए ।।
बैठे बजाज सराफ बनिक अनेक मनहुँ कुबेर ते ।
सब सुखी सब सच्चरित सुंदर नारि नर सिसु जरठ जे ।।
(मानस ७ । २८ । छं) 

उत्तर दिशमें बहनेवाली सुन्दर सरयू का जल निर्मल और गहरा था । मनोहर घाट थे तथा किनारेपर जरा भी कीचड़ नहीं था । कुछ दूरपर वह सुन्दर घाट था जहाँ घोड़े और हाथियोंके समूह जल पिया करते थे । पानी भरने के लिये बहुत से मनोहर घाट (केवल स्रियों के लिये) बने हुए थे । उन घाटोंपर पुरुष स्नान नहीं करते थे –

दूरि फराक रुचिर सो घाटा । जहँ जल पिअहि बाजी गज ठाटा ।। पनिघट परम मनोहर नाना । तहाँ न पुरुष करहिं अस्नाना ।। (मानस ७। २९ । १-२)

चारों वर्णकि पुरुषों के स्नान करने के लिये राजघाट बना हुआ था, जो अत्यन्त सुन्दर और श्रेष्ट था । सरयू के किनारे किनारे देवताओ के मंदीर थे, जिनके चारो ओर सुन्दर उपवन (बगीचे) थे –

राजघाट सब विधि सुंदर बर । मज्जहि जहाँ बरन चारिउ नर ।। तीर तीर देवन्ह के मंदिर । चहुँ दिसि तिन्ह के उपबन सुंदर ।। (मानस ७ ।२९ ।३-४)

नगर की शोभा अवर्णनीय थी । नगर के बाहर भी परम सुन्दरता थी । अयोध्यापुरी के दर्शनमात्र से सम्पूर्ण पापो का नाश हो जाता था । वहाँ वन, उपवन, बावलियाँ और तालाब सुशोभित थे । सुन्दर बावलियों, तालाबों तथा मनोहर विशाल कुँओ की शोभा अनुपम थी, उनकी रत्नजटित सीढियों और निर्मल जल को देखकर देवता और मुनितक मोहित हो जाते थे । तालाबो में अनेक रंगके कमल खिले रहते थे, अनेकों पक्षी कलरव करते रहते थे और भौंरे प्यार करते रहते थे । ऐसा प्रतीत होता था कि सुंदर बगीचे, कोयल आदि पक्षी चादर बोलीसे राहगीरो को वहाँ आराम करनेके लिये बुला रहे हों-

बापी तड़ाग अनूप कूप मनोहरायत सोहहीं ।
सोपान सुंदर नीर निर्मल देखि सुर मुनि मोहहीं ।।
बहु रंग कंज अनेक खग कूजहिं मधुप गुंजारहीं ।
आराम रम्य पिकादि खग रव जनु पथिक हंकारहीं ।।
(मानस ७। २९ । छं) 

सुन्दर घर ऊपर आकाश को चूमते थे । घरोंके ऊपर जो कलश रखे थे उनका प्रकाश इतना दिव्य था कि ऐसा लगता था मानो वे सूर्य, चन्द्रमा के प्रकाश की भी निन्दा कर रहे हो । घरोंमें अनेक मणियोंसे युक्त झरोखे शोभायमान थे तथा प्रत्येक घरमें मणियोंके दीपक प्रकाशमान थे-

धवल धाम ऊपर नभ चुंबत । कलस मनहुँ रबि ससि दुति निंदत ।। बहु मनि रचित झंरोखा भ्राजहिं । गृह गृह प्रति मनि दीप बिराजहिं ।। (मानस ७ । २७ । ७-८) 

घरों में मणियोंके दीपक और मूंगोंकी देहलियां चमकती थीं । मणियों (रत्नो) के खंभे और मस्कतमणियों (पन्नों) से जटित स्वर्णकी दीवारे इतनी आकर्षक थीं मानो उन्हें स्वयं ब्रह्मा ने विशेष रूपसे बनाया हो । घर भव्य, मनोहर और विशाल थे, उनमें स्फटिक के आँगन बने थे । प्रत्येक द्वापर बहुत से खरादे हुए हीरोंसे जड़े सोनेके किवाड़ थे-

मनि दीप राजहिं भबन भ्राजहिं देहरी विद्रुम रची ।
मनि खंभ भीति बिरंचि बिरची कनक मनि मरकत खची । । सुंदर मनोहर मंदिरायत अजिर रुचिर फटिक रचे । प्रति द्वार द्वार कपाट पुरट बनाइ बहु बज्रन्हि खचे ।।
(मानस ७ । २७ । छं) 

इस प्रकार मानस में वर्णित रामराज्य में चारों ओर समता, शान्ति और सम्पन्नता है । इस राज्य में राजा प्रजाका सेवक है, उसका सम्पूर्ण जीवन प्रजाके कल्याणके लिये समर्पित है । प्रजा भी राजा से इतना प्यार करती है कि राजाके आदेशो का उलंघन नहीं करती । वह राजा के लिये अपना सर्वस्व अर्पित कर देने में तनिक भी संकोच नहीं करती ।

सभी प्रजाजन एक दूसरे से नि:स्वार्थ प्रेम करते है । वे एक दूसरे का उपकार करके अपने जीवान को सार्थक बनाते है । सभी लोग अपने अधिकारों की अपेक्षा अपने कर्तव्यों को अधिक महत्त्वपूर्ण मानते है । इस समाज व्यवस्था में कपटकी छायामात्र भी नहीं है । इसमें किसी प्रकार का अहंकार, क्रोध, लेभ, शोषण, अत्याचार, अनाचार आदि नहीं है ।

श्री रामचंद्र का  सम्पूर्ण जीवन प्राणिमात्र के कल्याण के लिये समर्पित रहा, वे अनासक्त भावसे शासन करते थे तथा सभी को दैहिक, दैविक और भौतिक तापोंसे मुक्त करते थे । आज़ भी वे सभी के कल्याण के लिये अपनी कृपादृष्टि बिखेर रहे हैं । भक्तों, साधकों तथा संत महात्माओं आदिपर तो उनका विशेष अनुग्रह रहता ही आया है ।

इसीलिए कहा गया है जैसा राजा (शासक) का चरित्र होगा वैसी ही प्रजा भी होगी। जय जय श्री सीताराम।

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