भगवान् श्री राम जानकी के श्री चरणों के चिन्ह । Symbols on Lotus feet of Sri Sita Ram

भगवान् के चरणारविन्द की महिमा उनके चिन्हों की
कल्याणकारी विशिष्ट गरिमा से समन्वित है । ये चरण चिह्न संत महात्माओं तथा भक्तों के सदा सहायक हैं रक्षक है । भक्तमाल ग्रन्थ में महात्मा नाभादास जी की स्वीकृति है –

सीतापति पद नित बसत, एते मंगलदायका ।
चरण चिन्ह रघुबीर के संतन सदा सहायका ।।

भगवान् श्रीराम के चरण चिन्हों का वर्णन महारामायण के ४८ वें अध्यायमें महर्षि अगस्त्यकृत श्री रघुनाथचरण चिन्ह स्तोत्र मे आचार्य यामुनकृत आलवन्दार स्तोंत्र में, नाभाजी कृत भक्तमाल में, श्री गोस्वामी जी के रामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में , गीतावली के उत्तरकाण्ड के पंद्रहवें पद में और रामचरण चिन्हावली नामक पुस्तक में मिलता है ।

महारामायण में श्री राम के चरणचिन्हों की संख्या ४८ बतायी गयी है – २४ चिह्न दक्षिणपद में और २४ चिह्न वामपद मे है ।

**जो चिन्ह श्रीराम के दक्षिणपद में है वे भगवती सीता के वमपद में है और जो उनके वामपदमें हैं, वे ही श्रीजानकी के दक्षिणपद में है ।

श्रीशंकर जी पार्वती जी से कहते हैं –

यानि चिन्हानि रामस्य चरणे दक्षिणे प्रिये।
तानि सर्वाणि जानक्या: पादे तिष्ठन्ति वामके ।।
यानि चिन्हानि जानक्या दक्षिणे चरणे शिवे ।
तानि सर्वाणि रामस्य पादे तिष्ठन्ति वामके ।।
(महारामायण ४८ । १३-१४)

महर्षि अगस्त्य के श्रीरधुनाथचरण चिन्ह स्तोत्र में-  १८ चिन्हो का वर्णन मिलता है। वे अम्बुज, अंकुश, यव, ध्वजा, चक्र, ऊर्ध्व रेखा, स्वस्तिक, ,अष्टकोण, बज्र, बिन्दु, त्रिकोण, धनुष, अंशुक – वस्त्र, मत्स्य, शंख, अर्धचन्द्र, गोपद और घट है ।

श्री यामुनाचार्य जी के आलवंदारस्तोत्र में – शंख, चक्र, कल्पवृक्ष, ध्वजा, कमल, अंकुश और वज्र-इन सात चरण चिन्हों का ही वर्णन किया है-

कदा पुन: शंखरथांग कल्पक ध्वजरविंदाङ्कुुशवज्र लाञ्छनम् । त्रिविक्रम त्वच्चरणाम्बुजद्वयं मदीयमूर्द्धानमलंकरिष्यति।। (आलवन्दारस्तोत्र ३४)

गोस्वामी तुलसीदासजी की रामचरितमानस मे –
चार चरण चिन्हों का उल्लेख किया है । वे ध्वजा, कुलिश, अंकुश और कंज हैं-

जे चरन सिव अज पूज्य रज सुभ परसि मुनि पतिनी तरी । नख निर्गता मुनि अंहिसा त्रैलोक पावनि सुरसरी ।। ध्वज कुलिस अंकुस कंज जुत बन फिरत कंटक किन लहे । पद कंज द्वंद मुकुंद राम रमेंस नित्य भजामहे ।।(उत्तरकाण्ड १२ । छं ४)

श्री गोस्वामी जी की गीतावली में – उत्तरकाण्ड के पंद्रहवें पदमें गोस्वामी तुलसीदास ने श्रीराम के चरण और उनके उपर्युक्त चार चिन्ह – अंकुश, कुलिश, कमल और ध्वजा का मौलिक तथा अमित भक्तिपूर्ण वर्णन किया है

रामचरन अभिराम कामप्रद तीरथ राज बिराजै ।
संकर हृदय भगति भूतलपर प्रेम अछयबट भ्राजै ।। स्यामबरन पद पीठ अरुन तल, लसति बिसद नखस्त्रेनी । जनु रबि सुता सारदा सुरसरि मिलि चली ललित त्रिबेनी।। अंकुस कुलिस कमल धुज सुंदर भँवर तरंग बिलासा । मज्जहि सुर सज्जन मुनिजन मन मुदित मनोहर बासा।। बिनुबिराग जप जाग जोग ब्रत, बिनुतप, बिनु तनु त्यागे । सब सुख सुलभ सद्य तुलसी प्रभु पद प्रयाग अनुरागे ।।

आशय यह है कि सम्पूर्ण कामनाओ को पूर्ण करने वाले भगवान् राम के मनोहर चरण कमल मानो साक्षात् तीर्थराज होकर विराजमान है । श्रीशंकर के हृदय की भक्तिरूप भूमिपर प्रेममय अक्षयवट सुशोभित है । चरणोंका पृष्ठभाग श्यामवर्ण है, तलवे अरुण है तथा उनमें शुक्लवर्ण नखावली शोभित है, मानो यमुना, सरस्वती और गंगा जी ,तीनों मिलकर सुन्दर त्रिवेणी के रूपमें बह चली हों ।

तालाबों में अंकुश, वज्र, कमल और ध्वजा के चिह्न ही सुन्दर भँवर और तरंगे है उनमें देवता और साधु संत स्नान करते है तथा वे मुनियोंके प्रसन्न मनके मनोहर निवास स्थान है । तुलसीदास जी का कथन है कि प्रभुके चरणरूप प्रयाग में प्रेम करने से वैराग्य, जप, यज्ञ, रोग, व्रत, तप और शरीर त्याग के बिना ही समस्त सुख तत्काल सुलभ हो जाते है ।

महात्मा नाभादास जी के भक्तमाल ग्रन्थ मे – श्री भक्तमाल में भगवान् श्रीरामचंद्र के २२ बाईस पदचिन्हों का उल्लेख किया है –

अंकुस अंबर कुलिस कमल जव धुजा धेनुपद।
संख चक्र स्वस्तिक जंबूफल कलस सुधाहृद ।।
अर्धचंद्र षटकोन मीन बिंदु ऊरधरेखा।
अष्टकोन त्रयकोन इंद्रधनु पुरुषविशेषा ।।
सीतापति पद नित बसत एते मंगलदायका ।
चरन चिह्न रघुबीर के संतन सदा सहायका ।।
(भक्तमाल)

रामचरणचिन्हावली एवं महारामायण में –
४८ चिहोंका उल्लेख है । महारामायण में तथा भक्तमाल की वार्तिकप्रकाश टीका में इन चिन्हो के रूप, रंग, कार्य तर्था महत्त्व का विशद विवेचन मिलता है । अपनी अपनी उपासना पद्धति के अनुसार लोग भगवान् के चरणारविंदो के चिन्हो का ध्यान कर श्रीराम की भक्ति का रसास्वादन करते है । इन चिन्हो केे ध्यान से मन और हृदय पवित्र होते है तथा संसारजनित क्लेश, पीडा और भय का नाश होता है । भगवच्चरणारविंद के समस्त चिन्ह मङ्गलदायक है ।

श्रीरामके दक्षिणपदकमल के चौबीस चिह्न और श्री जानकी के वामपदकमल के चौबीस चिह्न:

(१)ऊर्ध्व रेखा (दक्षिण चरण) – इसका रंग अरुण-गुलाबी है । इसके अवतार सनक, सनन्दन, सनत्कुमार और सनातन है । इस चिह्न के ध्यान से महायोगकी सिद्धि होती है । ध्यान करने वाले भवसागर से पार हो जाते है ।

(२)स्वस्तिक – इसका रंग पीला है । इसके न अवतार श्री नारद मुनि है । यह मङ्गलकारक है, कल्याणप्रद है । श्रीशंकस्का पार्वतीजी से कथन है –

स्वस्तिकादेव संजातं कल्याणं सर्वत: प्रिये ।
(महारामायण ४८ । ४०)

(३)अष्टकोण है- यह लाल और सफ़ेद रंग का है । यह यन्त्र है । इसके अवतार श्री कपिल मुनि है । इसके ध्यान से अष्टसिद्धि की प्राप्ति होती है ।

(४)श्री लक्ष्मी जी – इनका रंग अरुणोदयकाल की लालिमा के सदृश है । बडी ही मनोहर है । अवतार साक्षात् लक्ष्मी जी ही है । इनके ध्यान से ऐश्वर्य और समृद्धि मिलती है ।

(५)हल -इसका रंग श्वेत है । इसका अवतार श्री बलराम जी का हल है । यह विजयप्रद है । इससे विमल विज्ञान की उपलब्धि होती है।

(६)मूसल – यह धुम्र रंगका है । अवतार मूसल है । इसके ध्यान से शत्रुका नाश होता है ।

(७) सर्प( शेष )- इसका रंग श्वेत है । अवतार शेषनाग है । इस चिन्ह का ध्यान करनेवाले को भगवद्भक्ति और शान्ति की प्राप्ति होती है ।

(८)शर(बाण) -इसका रंग श्वेत, पीत, अरूण-गुलाबी और हरा है । इसका अवतार बाण है । इसका ध्यान करनेवाले के शत्रु नष्ट होते है ।

(९)अम्बर-वस्त्र –  इसका रंग आसमानी अथवा नीला और बिजली के रंगके समान है । अवतार श्रीवराह भगवान् है। हस चिन्ह के ध्यान से भयका नाश होता है । यह भक्तों को दुख देनेवाली जडतारूपी शीतका हरण करता है ।

(१०)कमल – यह लाल- गुलाबी रंगका है । इसका अवतार विष्णु कमल है । इसका ध्यान करने से ध्यानी भगवद्भक्ति पाता है, उसका यश बढता है और मन प्रसन्न रहता है ।

(११)रथ – यह चार घोडो का है । अवतार पुष्पक विमान है । इसका रंग विचित्र -अनेक तरह का है तथा घोड़े सफ़ेद रंग के है । इसका ध्यान करनेवाला विशेष पराक्रम से सम्पन्न होता है ।

(१२)वज्र -इसका रंग बिजली के  रंग के समान है । इसका अवतार इन्द्र का वज्र है । यह पापो का नाशक तथा बलदायक है ।

(१३)यव – इसके अवतार कुबेर हैं । इससे समस्त यज्ञों की उत्पत्ति होती है । इसका रंग श्वेत है । यव के ध्यानसे मोक्ष मिलता है, पापका नाश होता है । यह सिद्धि, विद्या, सुमति, सुगति और संपत्ति का निवासस्थान है ।

(१४)कल्पवृक्ष -अवतार कल्पवृक्ष है । इसका रंग हरा है । इससे अर्थ ,धर्म, काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है, समस्त मनोरथ पुरे होते है ।

(१५)अंकुश- इसका रंग श्याम है । इससे समस्त लोको के मल का नाश करनेवाला ज्ञान उत्पन्न होता है । इसके ध्यान का फल मनोनिग्रह है ।

(१६)ध्वजा – इसका रंग लाल है । यह विचित्र वर्णका भी कहा जाता है । इससे विजय – कीर्ति की प्राप्ति होती है ।

(१७)मुकुट – इसका अवतार दिव्यभूषण है । इसका रंग सुनहला है । इस चिन्ह के ध्यान से परमपद मिलता है ।

(१८)चक्र -अवतार सुदर्शन चक्र है । इसका रंग तपाये हुए सोने की तरह है । यह शत्रु नाश करता है ।

(१९)सिंहासन -अवतार श्रीरामका सिंहासन है । रंग सुनहला है ।यह विजयप्रद है, सम्मान प्रदान करता है । सिंहासनेन सम्भूतं रामसिंहासनं परम् ।।
(महारामायण ४८ । ४९)

(२०)यमदण्ड – इसके अवतार धर्मराज है । यह काँसे के रंगका है । इसके ध्यान से यमयातना का नाश होता है, ध्यानी निर्भयता प्राप्त करता है ।

(२१)चामर – इसका रंग सफ़ेद है । अवतार श्रीहयग्रीव हैं । यह राज्य एवं ऐश्वर्य प्रदान करता है । इसके ध्यान से हृदय में निर्मलता आती है, विकार नष्ट होते हैं चन्द्रमा की चंद्रिका के समान प्रकाश उदय होता है ।

(२२) छत्र -अवतार कल्कि है । इसका रंग शुक्ल है । इसका ध्यान करनेवाला राज्य तथा ऐश्वर्य पाता है । यह तीनों (दैहिक ,दैविक, भौतिक) तापोंसे रक्षा करता है। मनमे दयाभाव लाता है ।

(२३)नर- पुरुष – अवतार दत्तात्रेय है । पुरुष परमेश्वर अथवा ब्रह्म का वाचक है । रंग उज्जवल (गौर) है । इसके ध्यानसे भक्ति, शन्ति और सत्वगुण की प्राप्ति होती है । इस चिह्न का रंग सित लोहित भी कहा जाता है ।

(२४)जयमाला – यह बिजली के रंग का है अथवा इसका चित्र विचित्र रंग भी कहा जाता है । इसके चिन्ह के ध्यान से भगवद्विग्रह के शृंगार तथा उत्सव आदि मे प्रिति बढती है ।

श्रीरामके वामपदकमल के चौबीस चिह्न और श्री जानकी के दक्षिणपदकमल के चौबीस चिह्न:

(१)सरयू -अवतार विरजा- गंगा आदि है । इसका रंग श्वेत है इसके ध्यान से भगवान् रामको भक्ति मिलती है, कलिमूल का नाश होता है ।

(२)गोपद -अवतार कामधेनु है । इसका रंग सफेद और लाल है । इसके ध्यान से प्राणी भवसागर के पार हो जाता है । यह पुण्यप्रद है । इससे भगवद्भक्ति मिलती है ।

(३)भूमि( पृथ्वी)- अवतार कमठ है । इसका रंग पीला और लाल है, इसका ध्यान करने से मनमें क्षमाभाव बढता है ।

(४)कलश -यह सुनहरा और श्याम है, श्वेत भी कहा जाता है । अवतार अमृत है । इसका ध्यान भक्ति, जीवन्मुक्ति तथा अमरता प्रदान करता है ।

(५)पताका – इसका रंग विचित्र है । इसके ध्यान से मन पवित्र होता है । इस ध्वजा चिन्ह से कलिका भय नष्ट होता है ।

(६)जम्बूफल – इसके अवतार गरुड है । इसका रंग श्याम है । यह मङ्गलकारक है । अर्थ, धर्म, वाम और मोक्ष इसके ध्यान के फल है । इससे मन:कामना पूरी होती है ।

(७)अर्धचन्द्र -इसका रंग उज्जवल है । इसके अवतार वामन भगवान् है । इसके ध्यानसे भक्ति, शान्ति और प्रकाश की प्राप्ति होती है । मनके दोष नष्ट होते है । तापत्रय का नाश होता है और प्रेमभक्ति बढती है।

(८)शंख -इसके अवतार वेद, हंस, शंख आदि है । इसका रंग अरुण और श्वेत है । इसका ध्यान करनेवाला दम्भ-कपट के मायाजाल से छूट जाता है । उसे विजय प्राप्त होती है तथा उसकी बुद्धि बढ़ती है । यह अनाहत -अनहद नादका कारण है ।

(९)षट्कोण -अवतार श्री कार्तिकेय है । इसका रंग श्वेत है, लाल भी कहा जाता है । इसका ध्यान करने से षड्विकार- काम, क्रोध, लेभ, मोह, मद और मत्सर का नाश होता है । यह यन्त्ररूप है । इसके ध्यानसे षट्सम्पत्ति- शम, दम, उपरति, तितिक्षा, श्रद्धा और समाधान की प्राप्ति होती है ।

(१०)त्रिकोण- इसके अवतार परशुरामजी और श्रीहयग्रीव हैं । इसका रंग लाल होता है । यह यन्त्ररूप है । इसके ध्यानसे योग की प्राप्ति होती है ।

(११)गदा -अवतार महाकाली और गदा है । इसका रंग श्याम है । यह दुष्टो का नाश करके ध्यान करनेवाले को जय देता है ।

(१२)जीवात्मा -अवतार जीव है । इसका रंग प्रकाशमय है । इसके ध्यान से शुद्धता बढती है ।

(१३)बिन्दु -अवतार सूर्य और माया है । इसका रंग पीला है । यह वशिकरण तिलकरूप है । इसके ध्यान से भगवान् भक्तके वश में हो जाते है । उसके समस्त पुरुषार्थो की सिद्धि होती है । इसका स्थान अंगूठा है । इससे पाप नष्ट होता है ।

(१४)शक्ति -अवतार मूलप्रकृति, शारदा, महामाया है । इस चिह्न का रंग लाल गुलाबी और पीला है । रक्त -श्याम -सित वर्णका भी कहा जाता है । इससे श्री शोभा और संपत्ति की उपलब्धि होती है ।

(१५)सुधाकुण्ड -यह सफेद और लाल है । इसके ध्यानसे अमृत -अमरता की प्राप्ति होती है ।

(१६)त्रिवली -इसके अवतार श्रीवामन है। इसका रंग हरा, लाल और धवल है -त्रिवेणी का रंग है । इसका यह चिह्न वेदरूप है ।

ध्यान करनेवाला कर्म, उपासना और ज्ञान से संपन्न होता है । उसे भक्ति रस का आस्वादन सुलभ हो जाता है ।

(१७)मीन -इसका रंग रुपहला है, उज्जवल है । यह ज़गत् को वशमे करनेवाले कामदेव की ध्वजा है । यह वशीकरण है । इसके ध्यान का फल श्रीभगवान् के प्रेमकी प्राप्ति है ।

(१८)पूर्णचन्द्र -अवतार चन्द्रमा है । इसका रंग पूर्ण धवल है । यह मोहरूपी तम को हरकर तीनों तापोंका नाश करता है । ध्यान करनेवाले के मनमें सरलता, शान्ति और प्रकाश की वृद्धि होती है ।

(१९)वीणा – इसके अवतार श्रीनारदजी है । इसका रंग पीला, लाल और उज्जवल है । ध्यान करनेवाले को राग -रागिनीमें निपुणता मिलती है । वह भगवत् यशोगान करता है ।

(२०)वंशी (वेणु)- अवतार महानाद है । इसका रंग चित्र-विचित्र है । इसके ध्यान से मधुर शब्द से मन मोहित हो जाता है । मुनियोंका मन भी वशमे नहीं रहता ।

(२१)धनुष -अवतार पिनाक और शारंग हैं । इसका रंग हरा, पीला और लाल है । इसके ध्यान से शत्रुका नाश होता है, मृत्युभय का निवारण होता है ।

(२२) तूणीर है – अवतार परशुराम जी हैं । इसका रंग चित्र विचित्र है । इसके ध्यान से भगवान् के प्रति सख्यरस बढता है । ध्यानका फल सप्तभूमि ज्ञान है ।

(२३) हंस -अवतार हंसावतार है । रंग सफ़ेद और गुलाबी है । इसके ध्यान का फल विवेक और ज्ञान की प्राप्ति है। हंस का ध्यान संत महात्माओ के लिये सुखद है ।

(२४)चंद्रिका – इसका रंग सफेद, पीला और लाल है । यह सर्वरंगमय कहा जाता है । इसक चिन्ह के ध्यान से कीर्ति मिलती है ।

भगवान् श्रीराम के चरण-चिह्न चिन्तन से यह स्पष्ट हो जाता है कि उनके चरण समस्त विभूतियो, ऐश्वर्यो तथा भक्ति मुक्ति और भुक्ति की अक्षय निधि है । भगवद्भक्ति में मग्न भक्त जन्म जन्मतक श्रीरामपद की ही रति-भक्ति चाहते है । जिन प्राणियों को श्रीराम के चरण पंकज चिन्हो का ध्यान और चिन्तन प्रिय है, उनका जीवन सफल और पुण्यमय है ।

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