श्री परशुराम का कैलाश दर्शन , कैलाश पर श्री गणेश से युद्ध और श्री गणेश का एकदंत होना ।

परशुराम का कैलाश दर्शन

एक दिन की बात है, जमदग्नि नंदन परशुराम ने अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार पृथ्वी को क्षत्रियों से रहित कर दिया, तब वे अपने गुरु भूतनाथ शिव के चरणोंमें प्रणाम करने और गुरुपत्नी अम्बा शिवा तथा उनके नारायणतुल्य दोनों गुरुपुत्र कार्तिकेय और गणनायक को देखने की  लालसा से कैलास पहुँचे । वहाँ उन्होंने अत्यन्त अद्भुत कैलास पुरी का दर्शन किया । उक्त परम रमणीय पुरी की सुविस्तृत सड़के सोने की बनी थीं और उनपर शुद्ध स्कटिकतुल्य मणियां जडी थीं ।

उक्त पुरीमें चतुर्दिक सिन्दूरी रंगकी मणियों की वेदियों निर्मित थीं । वह राशि की राशि मुक्ताओ से संयुक्त और मणियों के मण्डपों से परिपूर्ण थी । सर्वभूतपति नीलकण्ठ के नगर में रत्नों और कांचनो से परिपूर्ण यक्षेन्द्र गणो से परिवेष्टित एक अरब दिव्य भवन थे, जिनके किवाड़, खम्भे और सीढियां मणियोंसे निर्मित थीं । उस शिवपुरी के दिव्य कलश सोने के बने थे । वहां रजत के श्वेत चवँर थे, जो रत्नाभूशणो से विभूषित थे ।

वहां स्वर्ग गंगा के तटपर उगे हुए पारिजात वृक्षो की भरमार थी । वहां की सड़कोंपर अनुपम सुन्दर बालक स्वच्छन्द क्रीडा करते एवं परस्पर हँस हंसकर वार्तालाप कर रहे थे । उस परम रमणीय नगर में सिद्धेन्द्रो की लाखों अट्टालिकाएँ थी , जो मणियों एवं रत्नो से निर्मित थीं । वहां निर्मल जलपूरित सहस्त्रो सरोवर सुगन्धित पुष्पो के सहस्त्रो पुष्पोद्यान एवं सुन्दरतम अविनाशी वटवृक्ष थे,जिनपर विभिन्न प्रकार के मनोहर पक्षी कलरव करते थे । सुगन्धित शीतल पद पवन बह रहा था ।

अपने गुरुदेव की उस दिव्य पुरीके दर्शन कर रेणुका नन्दन आनन्द विभोर हो गये । फिर उन्होंने जगद्धाता शिव का पंद्रह योजन ऊँचा और चार योजन विस्तृत अत्यन्त सुन्दर आश्रम देखा। उसका निर्माण विश्वकर्मा ने बहुमूल्य सुनहली मणियों के द्वारा किया था । आश्रम हीरक जटित था । उसके चतुर्दिक अत्यन्त सुहावना, सुडौल परकोटा बना था । कालनाशन शिव का आश्रम मणिनिर्मित वेदियों एवं मणिस्तम्भो से सुशोभित था । द्वारका किवाड़ रत्न जटित चित्रों से बरबस मनको हर लेता था ।

उन्होंने प्रधान द्वार के दाहिने भागमें वृषेन्द्र को देखा और जब उनकी दृष्टि द्वार के वामभाग की और गयी तो वहां उन्होंने सिंह तथा नन्दीश्वर, महाकाल, भयंकर पिंगलाक्ष, बाण, महाबली विरूपाक्ष, विकटाक्ष, भास्कराक्ष, रक्ताक्ष, विकटोदर, संहारभैरव, भयंकर कालभैरव, रुरुभैरव, ईशकी सी आभाचाले महाभैरव, कृष्णांगभैरव, दृढ़पराक्रमी क्रोधभैरव, कपालभैरव, रुद्रभैरव तथा सिद्धद्धों, रुद्रगणों, विद्याधरों, गुह्यकों, भूतों, प्रेतों, पिशाचों, कुष्माण्डो, ब्रह्मराक्षसों, बेतालों, दानवों, जटाधारी योगेन्द्रो, यक्षों, किम्पुरुषों और किन्नरों को देखा । परशुराम सबसे मिले और उन्होंने सबसे बात की। इसके अनन्तर वे नन्दिकेश्वर से आज्ञा प्राप्तकर प्रसन्नतापूर्वक आश्रम के भीतर प्रविष्ट हुए ।

कुछ ही आगे जानेपर महातपस्वी परशुराम ने बहुत् रत्नोंसे निर्मित सैकडों मन्दिर देखे । उनपर अमूल्य रत्नकलशों की अदभुत छटा थी । उनमें हीरक जटित रत्ननिर्मिंत किवाड़ थे, जिनमें मुक्ता एवं निर्मल शीशे लगे थे । उन मन्दिरों में गोरोचना नामक मणियों के सहस्त्रो स्तंभो की अदभुत शोभा थी । उनकी सीढियाँ भी आभामयी मणियोंसे ही बनी थीं । रेणुका नन्दन ने वहाँ का भीतरी द्वार देखा, जो नाना प्रकार की चित्रकारी से चित्रित तथा हीरे मोतियो की गुँथी हुई मालाओं से अत्यन्त शोभायमान था ।

परशुराम का गजानन से युद्ध

महर्षि जमदग्नि के परम पराक्रमी पुत्र परशुराम ने उक्त द्वारके बायें अपने गुरुपुत्र कार्तिकेय को देखा और दाहिनी और पार्वती नन्दन गणेश तथा शिव सदृश पराक्रमशील विशाल काय वीरभद्र का अवलोकन किया । वे वहां रत्नाभरण भूषित बहुमूल्य रत्नो से बने सिंहासनों पर आसीन थे। सबसे मिलते और प्रेमपूर्ण बात करके परशुराम जी आगे बढे ही थे की गणेश जी ने उन्हें देखकर कहा – भगवान् शंकर इस समय शयन कर रहे है।

मैं उन परमप्रभु की आज्ञा प्राप्तकर तत्काल तुम्हें साथ ले चलूँगा। बस, इतनी देर रुक जाओ । परशुराम बोले – बन्धुवर ! मैं परमानुग्रहमूर्ति, भक्तवत्सल, समदर्शी  अपने गुरु के दर्शन करना चाहता हूं । मै उन जगदीश्वर एवं त्रयताप हारिणी पराम्बा पार्वती के अभयद चरणकमलोंमें प्रणाम कर अभी लौट आऊंगा । इस समय भूतेश्वर शिव एवं माता पार्वती अन्त:पुर में हैं । अमोघसिद्ध गणेश ने उन्हें अनेक प्रकार से समझाते हुए कहा- अतएव अभी अपको वहां नहीं जाना चाहिये ।

परशुराम ने कहा -परम गुरुदेव शिव एवं पुत्रवत्सला माता पार्वती के चरणकमलों के दर्शन का मेरा सहज अधिकार है । परशुराम अपने आग्रहपर दृढ थे, किंतु गणेश उन्हें अत्यन्त विनयपूर्वक समझाते गये । परशुराम बोले – मैं तो परमपिता शिव एवं दयामयी माँ के दर्शनार्थ जाऊँगा ही । बलपूर्वक रेणुका नन्दन आगे बढना ही चाहते थे कि विघ्नराज़ ने उन्हें रोक दिया।

इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रियो से रहित करनेवाले परशुराम कुपित हो गये और उनका गणाधिराज से विवाद ही नहीं हाथापाई होने लगी । कुमार कार्तिकेय ने उन्हें समझाने का प्रयत्न किया किंतु क्रुद्ध परशुराम ने गणेश को धक्का दे दिया, जिससे वे गिर गये ।

शिवपुत्र गणेश ने उठकर परशुराम की उद्दण्डता के लिए भर्त्सना की तो क्रुद्ध परशुराम ने अपना तीक्ष्ण परशु कुटज लिया । तब श्री गणेश में अपनी सूँड परशुराम को उसमे लपेट लिया और उन्हें घुमाने लगे । परशुराम सर्वथा असहाय और निरुपाय थे ।गणेश जी के योगबल से परशुराम स्तंभित हो गए ।

अनन्त शक्तिशाली गणेश ने जमदग्नि नन्दन परम वीर परशुराम को सप्तद्वीप, सप्तपर्वत, सप्तसागर, भूर्लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, जनलोक, तपोलोक, ध्रुवलोक, गौरीलोक और शम्मुलोक दिखाते हुए गम्भीर समुद्र मे फेंक दिया ।

परशुराम तैरने लगे तो निरामय गणनाथ ने उन्हें पुन: अपनी सूँड मे उठा लिया और घुमाते हुए वैकुण्ठ धाम दिखाकर गोलोकधाम का दर्शन करा दिया । वहां परशुराम ने मन्द मन्द मुस्कराते हुए वंशी विभूषित नव नीरद श्री कृष्ण के साथ रासरासेश्वरी श्री राधा का दर्शन किया तो वे बार बार उनके मंगलमय चरण कमलोंमें प्रणाम करने लगे ।

पापजनित यातना कर्मभोग से ही समाप्त होती है, किंतु ओषधिपति गणेशने परशुरामक्रो सम्पूर्ण पापोंका पूर्णतया नाश करनेवाले श्री कृष्ण का दर्शन कराकर उनका भ्रूणहत्याजनित पाप थोड़े में ही नष्ट कर दिया ।

गजमुख एकदंत हुए

कुछ ही देर बाद परशुराम सचेत होकर पृथ्वीपर गिर पडे. । उस समय उनका प्रतिवादिमुखस्तम्भक गणेश जी द्वारा किया हुआ स्तम्भन भी दूर हो गया । तब उन्होंने अपने अभीष्ट देवता श्रीकृष्ण के जगद्गुरु शिवद्वारा प्रदत्त परम दुर्लभ स्तोत्र एवं कवच का स्मरण किया और सम्पूर्ण शक्ति से ग्रीष्म कालीन मध्याह्न सूर्य की प्रभा के तुल्य तीक्ष्णतम अपने परशु से गौरी नन्दन गणेश पर प्रहार कर दिया । गणाधिराज ने अपने परमपूज्य पिताके अमोघ अस्त्र का सम्मान करने के लिये उसे अपने बायें दांत से  पकड़ लिया । शिव शक्ति के प्रभाव से वह तेजस्वी परशु गणेश के बायें दांत को समूल काटकर पुन: रेणुकापुत्र परशुराम के हाथ में लौट आया ।

सिद्धि बुद्धि प्रदायक गणेश का दांत टूटते समय भयानक शब्द हुआ और रक्त का फव्वारा छूट पड़ा । दांत मुँह से निकलकर भूमि पर गिर पड़ा ।उस समय धरित्री काँप उठी ।

यह दृश्य देखकर वीरभद्र ,कार्तिकेय ,क्षेत्रपाल आदि पार्षद तथा शून्यमे देवगण अत्यन्त भयाक्रान्त को हाय हाय करने लगे । कैलासवासी डर से मूर्छित हो गये । भगवान् शिव की निद्रा भंग हो गयी ।

बेटा । यह क्या हुआ ?दौडी हुई परमाद्या भगवती पार्वती आयीं तो उन्होंने अपने प्राणप्रिय पुत्र गणेश के टूटे दाँत तथा रक्तमें डूबे हुए मुंह को देखा और देखा कि उनके ह्रदयखण्ड गणेश क्रोधशून्य, परमशान्त, लज्जा से सिर झुकाये खड़े हैं । अत्यन्त व्याकुल होकर उन्होंने स्कन्द से पूछा- क्या बात है ? यह केसे हुआ ?

स्कन्द के द्वारा सम्पूर्ण वृतान्त सुनकर महामोहशमनी सती पार्वती अत्यन्त क्रुद्ध हुई और अपने प्राणाधिक प्रिय सुकुमार पुत्र गणेश को अंक में लेकर क्रन्दन करने लगीं ।

समदर्शी प्रभो ! दुख और शोक से अभिभूत देवी पार्वती ने डरते डरते अपने पति दयासिन्धु शूलपाणि से कहा- मेरे पुत्र गणेश और आपके शिष्य परशुराम में किसका दोष है, आप ही निर्णय करे । उत्तम कुलमें  पैदा हुई स्त्री अपने निन्दित, पतित, मूर्ख, दरिद्र, रोगी और जड पति को भी सदा विष्णु के समान समझती है । समस्त तेजस्वियों मे श्रेष्ठ अग्नि अथवा सूर्य पतिव्रता के तेज की सोलहवीं कला की समानता भी नहीं कर सकते । महादान, पुण्यप्रद व्रतोपवास और तप- पतिसेवा के सोलहवें अंश की समता करनेयोग्य नहीं हैं । आपके तुल्य मेरे लिए कहीं कोई नहीं है । पर आप कृपापूर्वक इसका निर्णय करें ।

पार्वती माता ने कहा – महाभाग राम ! तुम महर्षि जमदग्नि और लक्ष्मी के अंश से उत्तम कुलोत्पन्न सती साध्वी देवी रेणुका के पुत्र, राजा रेणुक के दौहित्र तथा अत्यन्त साधु शूरवीर राजा विष्णुयशा के भानजे हो और योगियों के गुरु देवाधिदेव महादेव के शिष्य हो । तुम शुद्ध मनवाले हो, तुम्हारी अशुद्धता का कारण मेरी समझ में नहीं आ रहा है ।

तुमने करुणामय गुरु से अमोघ परशु प्राप्त कर पहले तो उसकी क्षत्रिय जातिपर परीक्षा की और अब गुरुपुत्रपर परीक्षा की है । श्रुति गुरुदक्षिणा देने का निर्देश करती है और तुमने अत्यन्त निर्दयतापूर्वक गुरुपुत्र का समूल एक दांत ही नष्ट कर दिया । अब इसका सिर भी काट डालो । चराचरात्मा शिव का अमोघ परशु प्राप्त कर तो क्षुद्र श्रृगाल भी वनराज को मार सकता है । फिर अत्यन्त दुख से व्याकुल पुत्रवत्सला पार्वती ने गणेश की महिमा का बखान करते हुए परशुराम से कहा –

त्वद्विधं लक्षकोटिं च हंतुम् शक्तो गणेश्वरः ।
जितेंद्रियाणां प्रवरो नहि हन्ति च मक्षिकाम् ।।
तेजसी कृष्णतुल्योऽयं कृष्णांशश्च गणेश्वरः ।
देवाश्चान्ये कृष्णकला: पूजास्य पुरतस्ततः ।।
(ब्रह्मवैवर्त्यपुराण, गणपतिखंड ४४ । २६-२७)

जितेन्द्रीय पुरुषों में श्रेष्ठ गणेश तुम्हारे जैसे लाखों करोडों जन्तुओं को मार डालने की शक्ति रखता है; परंतु वह मक्खीपर भी हाथ नहीं उठाता । श्री कृष्ण के अंशसे उत्पन्न हुआ वह गणेश तेज में श्री कृष्ण के ही समान है । अन्य देवता श्री कृष्ण की कलाएँ हैं । इसीसे इसकी अग्रपूजा होती है । (ब्रह्मवैवर्त्यपुराण में जिस कल्प की कथा वर्णित है उसके अनुसार उस कल्प में श्री कृष्ण ही गणेश स्वरुप में शिव शक्ति ले पुत्र रूप में प्रकट हुए है।)

इतना कहकर क्रोधाभिभूत गिरिराजकिशोरी परशुराम को मारने के लिये प्रस्तुत हो गयी । भयवश परशुराम में मन ही मन करुणासागर गुरु को प्रणाम कर अपने इष्टदेव गोलोकनाथ श्री कृष्ण का स्मरण किया ।

तत्क्षण उमा ने अपने सम्मुख भानुकोटिशतप्रभ एक बौने ब्राह्मण बालक को देखा। उसके दांत स्वच्छ थे । उसके वस्त्र, यज्ञोपवीत, दण्ड, छत्र और ललाटपर तिलक भी उज्जवल थे । उसके कण्ठ में तुलसी की माला सुशोभित थी । उसके मस्तकपर परमोज्ज्वल रत्नमुकुट एवं कानों-में रत्नो के कुण्डल थे । वह मन्द मन्द मुस्करा रहा था । उस परम तेजस्वी ब्राह्मण बालक के बायें हाथ में स्थिर मुद्रा और दाहिने हाथ में अभय मुद्रा के दर्शन हो रहे थे ।

उस ब्राह्मण ब्रालक में अपनी और आकृष्ट करने की अदभुत क्षमता थी, इस कारण कैलासवासी बालक और बालिकाओं का समूह हंसता खेलता उसके साथ लग गया था और युवक तथा वृद्ध स्त्री- पुरुष भी बडी ललक से उसकी और देख रहे थे । उस परमतेजस्वी ब्राह्मण बालक को देखकर आतुरता से भृत्योंसहित भगवान् शंकर ने भक्तिपूर्वक मस्तक झुकाकर प्रणाम किया । उसके बाद, माता पार्वती ने भी उसे साष्टांग प्रणाम किया । परम तेजस्वी ब्रह्मण बालक ने भृत्यों ,शिव एवं पार्वती को शुभाशीर्वाद प्रदान किया ।

भगवान् शंकर ने षोडशोपचार से उनका पूजन एवं स्तवन किया । वे वामनभगवान् रत्नसिंहासनपर विराजमान थे । उनका उत्कृष्ट तेज सर्वत्र फैल रहा था ।

आज मेरा परम सौभाग्य है, जो आपने कृपापूर्वक मेरे यहां पधारकर मुझे सेवा का अवसर प्रदान किया है ।  भगवान् शंकर ने मधुर शब्दो में कहा-अतिथि सत्कार करनेवाले के द्वारा स्वत: समस्त देवताओ की पूजा सम्पन्न हो जाती है; क्योंकि अतिथि के संतुष्ट होने से स्वयं श्री हरि संतुष्ट हो जाते हैं ।

आपलोगो की वर्तमान परिस्थिति जानकर मै श्वेतद्वीप से आ रहा हूं । आशुतोष शिव ली मधुर वाणी से प्रसन्न होकर ब्राह्मण बालक स्वयं श्रीहरि ने गम्भीर स्वर में कहा- मेरे भक्तों का कभी अमंगल नहीं होता । मेरा सहस्त्रार उनके रक्षार्थ प्रतिक्षण प्रस्तुत रहता है किंतु गुरुके रुष्ट होनेपर मैं विवश हो जाता है । गुरुकी अवहेलना बलवती होती है । विद्या और मन्त्र प्रदान करनेवाला गुरु अभीष्ट देवसे सौगुना श्रेष्ठ है । गुरुसे बढकर कोई देवता नहीं है और न पार्वतीपरा साध्वीन गणेशात्परो वशी  ( गणपतिखं  ४४ । ७५ ) पार्वती से बढकर कोई पतिव्रता नहीं है तथा गणेश से उत्तम कोई जितेन्द्रिय नहीं है । परशुराम ने गुरु पत्नी एवं गुरुपुत्र की अवहेलना कर दी है, उसीका मार्जन करने के लिये मैं यहां उपस्थित हुआ हूं।

हिमगिरि नंदिनी ! श्रीहरि ने भगवान् शंकर के बाद  भगवती पार्वती से कहा-  तुम जगज्जननी हो । तुम्हारे लिये गणेश, कार्तिकेय और परशुराम भी पुत्र तुल्य हैं ।  इन परशुराम के स्नेह के प्रति शिव और तुम्हारे मनमें भेद नहीं है । अतएव जो उचित समझो, करो । दैव बडा

प्रबल होता है । बालको का यह विवाद तो देव दोषसे ही घटित हुआ है । तुम्हारे इस प्रिय पुत्रका एकदन्त नम वेदोंमें प्रसिद्ध है । सामवेद में तुम्हारे पुत्रके आठ नाम बताये गये हैं -गणेश, एकान्त, हेरम्ब, विघ्ननायक, लम्बोदर, शूर्पकर्ण, गजवक्त्र और गुहाग्रज । पार्वती को समझाते हुए करुणावरुणालय श्रीहरि ने एकदन्त का  नामाष्टकस्तोत्र और उसका अर्थ बतलाया।

इसके बाद बालक भगवान् बोले – राम ! तुमने क्रोधवश शिव पुत्र गणेश का दांत तोड़कर अनुचित किया है ।  फिर श्रीहरि ने जमदग्नि नन्दन परशुराम से कहा -इस कारण तुम निश्चय ही अपराधी हो । सर्वशक्तिस्वरूपा पार्वती प्रकृति से परे और निर्मुण हैं । श्रीकृष्ण भी इन्ही की शक्ति से शक्तिशाली हुए हैं । ये समस्त देवताओ की जननी हैं । तुम इनकी स्तुति कर इन्हें संतुष्ट करों ।

इतना कहकर श्रीहरि वैकुण्ठ चले गए और परशुराम ने स्नानकर शुद्ध वस्त्र धारण किये । फिर वे हाथ छोड़ गुरुदेव के चरणो में प्रणाम कर सिर झुकाये जगज्जननी गौरी का स्तवन करने लगे । भक्तवर परशुराम के सम्पूर्ण अंग पुलकित थे और उनके नेत्रो से आनन्दाश्रु प्रवाहित हो रहे थे । इस प्रकार करुण प्रार्थना करते हुए अन्त में परशुराम ने कहा –

रक्ष रक्ष जगन्मातरपराधं क्षमस्व मे ।
शिशूनामपराधेन कुतो माता हि कृप्यति ।।
(ब्रह्मवैवर्त्यपुराण, गणपतिखंड ४५ । ५७ )

जगज्जननी ! रक्षा करो, रक्षा करो, मेरे अपराध को क्षमा कर दो । भला, कहीं बच्चे के अपराध करने से माता कुपित होती है ? स्तुति करने के बाद परशुराम ने माता पार्वती के चरणों।में प्रणाम किया और अत्यन्त दुखी होकर रोने लगे ।

माता पार्वती ने कहा -हे वत्स ! तुम अमर हो जाओ ! परशुराम की करुण प्रार्थना से करुणामयी भक्तवत्सला जननी पर्वती का हृदय द्रवित हो गया । उन्होंने प्रीतिपूर्वक परशुराम को अभय दान देते हुए कहा- बेटा ! अब शान्त हो जाओ । आशुतोष के अनुग्रह से तुम्हारी सर्वत्र विजय हो । सर्वान्तरात्मा श्री हरि तुमपर सदा प्रसन्न रहें । गुरुदेव शिव मे तुम्हारी भक्ति सुदृढ रहे ।

इस प्रकार सर्वशक्ति समन्विता दयामयी पार्वती ने  परशुराम को आशीर्वाद दिया और फिर वे अपने अन्त:पुर में चली गयीं । उस समय वहाँ श्री भगवान के मंगलमय नामका उच्चघोष होने लगा । परशुराम के हर्षकी सीमा न रही । फिर परशुराम जी ने एकदन्त गणेश का स्तवन किया और गंध, पुष्प, धूप, दीप एवं तुलसीरहित नैवेद्य आदिसे लम्बोदर की प्रीतिपूर्वक पूजा की । परशुराम ने भक्तिभाव से भाई गणेश को संतुष्ट कर जगन्माता पार्वती एवं कृपासिन्धु त्रिलोचन के चरणों में प्रणाम किया ।

तदनन्तर उन्होंने गुरु की आज्ञा प्राप्तकर प्रसन्नता पूर्वक तपश्चरण के लिये प्रस्थान किया ।

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