सुंदर कथा ४१(श्री भक्तमाल – श्री सींवा जी) Sri Bhaktamal – Sri Siwaji ji

श्री सींवा जी भगवद्भक्त सदृगृहस्थ थे । आपकी सन्त सेवा में बडी निष्ठा थी, इससे समाज में आपका सम्मान भी बहुत था । अपकी यह प्रतिष्ठा अनेक लोगोंकी ईर्ष्या का कारण बनी । उन लोगोंने राजा से आपकी शिकायत कर दी और उलटी पुलटी बाते बता दी । अविवे की राजा ने भी बिना कोई विचार किये अपको कैदखाने में डाल दिया । 

आपकी सन्त प्रकृति थी, अत: आपके लिये सुख दुख, मान अपमान सब समान ही थे; परंतु आपको इस बातका विशेष क्लेश था कि अब मेरी सन्त सेवा छूट गयी है । एक दिन एक सन्तमण्डली आपके घरपर आयी, जब आप को इस बातका पता चला तो आपको सन्तसेवा न कर पानेका बहुत दुख हुआ ।

सर्वसमर्थ प्रभु से अपने भक्त की सच्ची तड़पन और उसकी मानसिक पीडा देखी न गयी । उसी समय चमत्कार हुआ और आपकी हथकडी बेडी टूट कर जमीनपर गिर पडी, जेल के फाटक भी अपने आप खुल गये । आप सन्तो के पास पहुंच गये और भावपूर्वक उनकी सेवा को । 

राजा को जब यह वृत्तांत मालूम हुआ तो वह नंगे पैर भागकर आया और आपके चरणों में गिरकर क्षमा प्रार्थना करने लगा । आपके मनमें कोई विकार भाव तो था ही नहीं, अत: तुरंत ही क्षमा कर दिया । इस प्रकार श्री सींवाजी गृहस्थ में रहते हुए भी आदर्श सन्त थे ।

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