सुंदर कथा ५१(श्री भक्तमाल – नामचार्य श्री हरिदास ठाकुर जी) भाग १ Sri Bhaktamal -Namacharya Sri Haridas ji Part 1

नामाचार्य श्री हरिदास जी का स्वरुप

यह चरित्र पूज्य श्री प्रभुदत्त ब्रह्मचारी जी की चैतन्य चरितावली ,त्रिदंडी पूज्य श्री नारायण गोस्वामी महाराज द्वारा लिखी पुस्तके और श्री  चैतन्य चरितामृत के आधार पर दिया गया है । कृपया अपने नाम से प्रकाशित ना करे ।www.bhaktamal.com ®  

महाप्रभु के परिकर श्रीशिवानंद सेन के आत्मज श्री कविकर्णपूर ने स्वरचित श्री गौरगणोद्देश दीपिका नामक ग्रंथ में लिखा है –

ऋचीकस्य मुने: पुत्रो नाम्ना ब्रह्मा महातपा: ।
प्रह्लादेन समं जातो हरिदासाख्यकोऽपि सन् ।।
(श्री गौरगणोद्देश दीपिका ९३)

ऋचीक मुनि के पुत्र महातपा ब्रह्मा श्री प्रह्लाद के साथ मिलकर अब श्रीहरिदास ठाकुर कहलाते हैं।

मुरारिगुप्तचरणैश्चैतन्यचरितामृते।
उक्तो मुनिसुत: प्रातस्तुलसीपत्रमाहरण्।
अधौतमभिशप्तस्तं पित्रा यवनतां गत: ।
स एव हरिदास: सन् जात: परमभक्तिमान्।
(श्री गौरगणोद्देश दीपिका ९४-९५)

श्री मुरारिगुप्त द्वारा रचित श्रीचैतन्यचरितामृत ग्रन्थ (जो वर्तमान समय में श्रीचैतन्यचरित के नाम से प्रसिद्ध है) मे कहा क्या है कि किसी एक मुनिकुमार ने एक दिन प्रात:काल तुलसी पत्र चयन करके, उन्हें धोये बिना ही अपने पिता को भगवान् की सेवा के उद्देश्य से अर्पित कर दिये ये । इसी कारण उनके पिता ने उन्हें होने का अभिशाप दिया था ।

अपने पिता द्वारा अभिशप्त उन्ही मुनिकुमार ने ही यवन कुल में उत्पन्न परम भक्त श्रीहरिदास ठाकुर के रूप में ज़न्म ग्रहण किया है ।

सच्चिदानन्द श्री भक्तिविनोद ठाकुर ने स्वरचित श्रीनव द्वीप धाम माहातम्य के पंचम अध्याय ( १२५ – १५७ तक) में वर्णन किया है-जिस समय श्री नित्यानंद प्रभु श्री जीव गोस्वामी को श्रीनवद्वीपधाम की परिक्रमा कराते हुए श्रीअन्तद्वीप में पहुंचे, तब एक स्थान की और इंगित करते हुए उन्होंने कहा – इस स्थानपर द्वापरयुग के अन्त में ब्रह्मा ने श्रीगौराङ्ग महाप्रभु की कृपा प्राप्त करने की आशा से तपस्या की थी ।

ब्रह्मा जी के पूर्व वृत्तांत को बतलाते हुए श्री नित्यानंद प्रभु ने कहा -श्रीकृष्प लीला में बछड़े तथा ग्वालबालो को चुराकर ब्रह्मा ने अपनी माया द्वारा गोविन्द से छलना की थी। अपनी माया को पराजित होता देखकर चतुर्मुख ब्रह्मा अपने द्वारा किये गये  अपराध के कारण बहुत दुखी हुए । अनेक स्तव- स्तुति करने के उपरान्त ब्रह्मा ने श्रीकृष्ण के चरणो में क्षमा प्रार्थना की और वृन्दावन पति श्रीकृष्ण ने उम्हें क्षमा कर दिया ।

तब ब्रह्मा जी ने मन ही मन विचार किया कि मेरी बुद्धि (मैं बहूत घृणित है ,मै यही समझ  बैठा की मै जगत की सृष्टि करने वाला हूं । इसी बुद्धि दोष के कारण मैं कृष्णप्रेम से रहित ओर ब्रज लीला के रसो का आस्वादन करने से वञ्चित हूँ। यदि मैं गोपाल (ग्वालबाल) के रूपमें जन्म प्राप्त करता, तो अनायास ही गोपियो के स्वामी  श्री कृष्ण की सेवा कर पाता । उस लीला को देखने का सौभाग्य तो मुझे नही मिला, परंतु अब श्रीगौराङ्ग महाप्रभु के प्रति मेरी कुबुद्धि न हो । ऐसा सोचकर बहूत समय तक ब्रह्मा ने ध्यान लगाकर इसी अन्तद्वीप मे तपस्या की थी ।

कुछ समय के बाद श्री गौरचंद्र ने कृपा करके चतुर्मुख ब्रह्मा के सामने प्रकट होकर कहा  – ब्रह्मा ! तुम्हारी तपस्या से प्नसत्र होकर मैं तुम्हें वही वर देने आया हूँ जिसकी तुम आशा कर रहे हो । जब ब्रह्मा ने नेत्र खोलकर श्री गौराङ्ग महाप्रभु के दर्शन किये, तो वह मूर्छित होकर वही भूपिपर गिर पडे । तब महाप्रभु ने ब्रह्मा के मस्तकपर अपने चरण रख दिये । दिव्यज्ञान प्राप्त करके ब्रह्मा स्तव करते हूए कहने लगे -मैं बहूत दीन हीन हूँ।

अभिमान के वशीभूत होकर आपके चरणों में अपराध करने के फल स्वरूप जड़रस में निमग्न हो रहा हूँ। हमारे भाग्यमे आपका शुद्ध दास बनना नहीं लिखा है, इसलिए माया हमारे लिए अपना मोहरूपी जाल बिछाती है । मेरे जीवन का प्रथम परार्द्ध (आधा जीवन) तो बीत गया है, किन्तु अब मुझे बहूत चिन्ता हो रही है कि मेरा दूसरा परार्द्ध कैेसे व्यतीत होगा? बहिर्मुख होनेपर मनमे बहूत कष्ट होता है।

एइमात्र तव पदे प्रार्थना आमार
प्रकट लीलाय जेन हई परिवारा।
(श्रीनवद्वीपधाम माहात्म्य ५/१४३)

आपके श्रीचरणो में मेरी एकमात्र यही प्रार्थना है कि मैं आपकी प्रकट लीला में आपका परिकर बनकर आऊँ ।

ब्रह्मबुद्धि दूरे जाय, हेन जन्म पाइ।
तोमर संगते थाकि तव गुण गाइ।।
(श्रीनवद्वीपधाम माहात्म्य ५/१४४)

मुझे ऐसा जन्म प्राप्त हो, जिससे मेरी ब्रह्म बुद्धि दूर हो जाये, मैं सब समय आपके साथ रहूँ और आपका ही गुणगान करूँ । ब्रह्मा की प्रार्थना सूनकर भगवान् श्री गौरहरि ने तथास्तु कहकर वर प्रदान किया ।

जे समये मम लीला प्रकट हइबे ।
यवनेर गृहे तुमि जनम लभिबे ।।
आपनाके हीन बलि हइबे गेयान ।
हरिदास ह’बे तुमि शून्य अभिमाना ।।
तिनलक्ष हरिनाम जिह्वाग्रे नाचिबे ।
निर्याण समय तुमि आमाके देखिबे ।।
(श्रीनवद्वीपधाम माहात्म्य ५/१४६ -१४८)

श्रीमन महाप्रभु ने कहा कि जिस समय मेरी लीला प्रकट होगी, उस समय तुम एक यवन के घर में जन्म लोगे। तुम सब समय अपने को दोन हीन समझोगे। तुम्हारा नाम हरिदास होगा तथा तुम्हें किसी प्रकार का कोई अभिमान नहीं होगा। तुम्हारी जिव्हा पर प्रतिदिन तीन लाख हरिनाम नृत्य करेगा । देहत्याग के समय तुम्हें मेरे दर्शन प्राप्त होंगे । इस साधन के बलपर तुम द्विपरार्द्धके अन्तमे इस नवद्वीपधाम को प्राप्त करोगे तथा नित्य रास में निमज्जित होओगे। हे ब्रह्मा! तुम मेरे ह्रदय की बात सुनो । मेरी इन बातो को कभी भी इधर उधर शास्त्रो में व्यक्त मत करना ।

मैं भक्त का भाव लेकर भक्तिरस का आस्वादन करूँगा तथा परम दुर्लभ संकीर्तन को प्रकाशित करूँगा । अन्य अन्य अवतारोंके समय जितने भक्त थे, उन सभो को व्रजरस में निमज्जित कर दूंगा। मेरा हृदय श्रीराधिका के प्रेम से वशीभूत है, मैं उन्हीके भाव तथा अंगकांति को लेकर प्रकट होऊंगा । मेरी सेवा करके श्रीराधा को किस सुख की प्राप्ति होती है, मैं राधाभाव लेकर उस सुख का आस्वादन करूंगा । आज से ही तुम मेरे शिष्यत्व को प्राप्त करोगे तथा हरिदास के रूप में निरन्तर मेरी सेवा करोगे । इतना कहकर श्रीमन महाप्रभु अन्तर्धान हो गये तथा ब्रह्मा मूच्छित होकर गिर पडे ।

पुनः चेतनता प्राप्त करके विह्फल होकर कहने लगे हा गौराङ्ग ! हे दीनबन्धों ! हे भक्तवत्सल !मुझे कब आपके श्रीचरणकमलो की प्राप्ति होगी? अतएव उपरोक्त उपाख्यान से यह स्पष्ट हो जाता है कि
श्रीमन महाप्रभु के परिकर नामाचार्य श्री हरिदास ठाकुर ब्रह्मा ही है ।

इस प्रसंग के उपसंहार में श्री वृन्दावनदास ठाकुर तथा श्री कृष्णदास कविराज गोस्वामी के वचनो को उद्धृत किया जा रहा है, यथा-

कह बले, – ‘चतुर्मुख जेन हरिदास ।
कह बले, – ‘प्रह्लादेर जेन परकाश।।
सर्वमते महाभागवत हरिदास ।
चैतन्य गोष्ठीर संगे जाहार विलासा।
(चै.भा. म.१०/६-७)

यद्यपि कोई कोई कहते हैं कि हरिदास चतुर्मुख ब्रह्मा हैं, तो कोई मानते है कि वे प्रह्लाद के प्रकाश है ,तथापि सभीका एक मत यही है कि श्रीमन् महाप्रभु के पार्षदों के साथ विहार करनेवाले श्री हरिदास जी महाभागवत है।

सत्य सत्य हरिदास जगत ईश्वर ।
चैतन्यचन्द्रेर महा मुख्य अनुचर ।।
(चै.च.आ.१६/१४२)

यह सत्य है, सत्य है कि श्री हरिदास जी जगत के ईश्वर श्रीचैतन्य चन्द्र के एक महान् एवं मुख्य अनुचर हैं ।

श्री हरिदास जी का आविर्भाव और नित्य नियम

जिनकी तनिक सी कृपा की कोर के ही कारण यह नाम-रूपात्मक सम्पूर्ण संसार स्थित है, जिनके भ्रूभंगमात्रसे ही त्रिगुणात्मिका प्रकृति अपना सभी कार्य बन्द कर देती है, उन अखिलकोटि-ब्रह्माण्डनायक भगवान् के नाम-माहात्म्य का वर्णन बेचारी अपूर्ण भाषा कर ही क्या सकती है ?हरि- नाम -स्मरण से क्या नहीं हो सकता ? भगवन्नाम जप से कौनसा कार्य सिद्ध नहीं हो सकता? जिसकी जिह्वा को सुमधुर श्रीहरिके नामरूपी रस का चस्का लग गया , उसके लिये फिर संसार मे प्राप्य वस्तु ही क्या रह जाती ?

यज्ञ, याग, जप, तप, ध्यान, पूजा, निष्ठा, योग, समाधि सभीका फल भगवन्नाम में प्रीति होना ही है, यदि इन कर्मोके  करने सेे भगवन्नाम में प्रीति नहीं हुईं, तो इन कर्मो को व्यर्थ ही समझना चाहिये । इन सभी क्रियाओ का अन्तिम और सर्वश्रेष्ठ फल यही है कि भगवन्नाम में निष्ठा हो । साध्य तो भगवन्माम ही है, और सभी कर्म तो उसके साधनमात्र हैं । नाम-जपमें देश, काल, पात्र, जाति, वर्ण, समय-असमय, शुचि-अशुचि इन सभी बातो का विचार नहीं होता ।

तुम जैसी हालतमें हो, जहां हो, जैसै हो, जिस-किसी भी वर्णके हो, जैसी भी स्थितिमें हो, हर समय और हर कालमे श्रीहरिके सुमधुर नामो का संकीर्तन कर सकते हो । नाम-जप से पापी से पापी मनुष्य भी परमपावन बन जाता है, अत्यन्त नीच -से-नीच भी सर्वपूज्य समझा जाता है, छोटे-से-छोटा भी सर्वश्रेष्ठ हो जाता है और बुरे-से-बुरा भी महान् भगवद्भक्त बन जाता  है । कबीरदास जी कहते हैं

नाम जपत कुष्ठी भलो, चुइ-चुइ गिरै जो चाम ।
कंचन देह किस कामकी, जिहि मुख नाहीं राम ।।

श्री हरिदास जी १३७२ शकाब्द (१४४१ ई.) में खुलना जिले के अन्तर्गत बूढन  नामक गाँव में यवन कुल में आविर्भूत हुए थे, जो कि वर्तमान में बांगलादेश है । श्रीमन महाप्रभु १४०७ शकाब्द (१४७६ ई.) में आविर्भूत हुए । अतएव श्री हरिदास ठाकुर आयु में श्रीभन महाप्रभु से ३५ बर्ष बडे थे ।

श्रीईश्वर पुरी जी महाराज से दीक्षाग्रहणरुपी लीलाभिनय के उपरान्त ही श्रीमन महाप्रभु ने कैशोर अवस्था (१० से १५ बर्षकी आयु) में नाम संकीर्तन आरम्भ किया था तथा उसी समय ही श्री हरिदास ठाकुर उनके संगी बने थे । अतएव इससे यही अनुमान लगता है कि श्री हरिदास ठाकुर लगभग ५० वर्ष की आयु में श्रीमन महाप्रभु के संगी बने थे ।

कलियुग पावनाबतारी श्रीमन महाप्रभु के संगी होने से पहले ही श्री हरिदास जी नाम महिमा प्रकाशक अनेक लीलाएँ की थी । वासतव मे श्रीमन महाप्रभुने ही श्री हरिदास जी के माध्यम से जगत मे नामकी महिमा का प्रचार करवाया था ।

बाल्यकाल में ही श्री हरिदास जी के माता पिता इन्हें मातृ पितृ हीन बनाकर परलोक गामी बन गये थे, इसलिये ये छोटेपन से ही घर द्वार छोड़कर निरन्तर हरिनाम का संकीर्तन करते हुये विचरने लगे और यशोहर जिले के एक गाँव बेनपोल में एक निर्जन स्थान पर कुटी बनाकर भजन करने लगे । पूर्व जन्म के कोई शुभ संस्कार ही थे, भगवान की अनन्य कृपा थी,श्री कृष्ण का वरदान था  इसलिए मुसलमान वंश में उत्पन्न होकर भी इनकी भगवन्नाम में स्वाभाविक ही निष्ठा जम गयी।

भगवान् ने अनेकों बार कहा है – यस्याहमनुगृह्णामि हरिष्ये  तद्धनं शनै: । अर्थात जिसे मैं कृपा करके अपनी शरण में लेता हूँ सबसे पहले धीरे से उसका सर्वस्व अपहरण कर लेता हूँ ।उसके पास अपना कहने के लिये किसी भी प्रकार का धन नहीं रहने देता ।

सबसे पहले भगवान् की इनके ऊपर यही एक बडी भारी कृपा हुई । अपना कहने के लिये इनके पास एक काठका कमण्डलु भी नहीं था । भूख लगनेपर ये गाँवो से भिक्षा मांग लाते और भिक्षा में जो थी कुछ मिल जाता, उसे चौबीस घंटे में एक ही बार खाकर निरन्तर भगवन्नाम् का जप करटे रहते ।

घर छोड़कर ये वनग्राम के समीप बेनापोल नाम के घोर निर्जन वनमें फूसकी कुटी बनाकर अकेले ही रहते थे । इनके तेज़ और प्रभाव् से वहाँ केसभी प्राणी एक प्रकार की अलौकिक शान्ति का अनुभव करते । जो भी जीव इनके सम्मुख आता वही इनके प्रभाव से प्रभावान्वित हो जाता । ये दिन -रात्रि मिलकर तीन लाख भगवन्नाम का जप करते थे, यह इनका नियम था । भगवान् के नाम का जप भी धीरे – धीरे नहीं, किंतु खूब उच्च स्वर से करते थे । भगवन्नाम का ये उच्च स्वर से जप इसलिये करते थे कि सभी चर -अचर प्राणी प्रभुके पवित्र नामो के श्रवण से पावन हो जायें । प्राणिमात्र की निष्कृतिका ये भगवन्नाम को ही एकमात्र साधन समझते थे ।

महात्मा हरिदास जी के द्वारा वेश्या का उद्धार

थोड़े ही दिनो में महात्मा हरिदास जी का यश: सौरभ दूर-दूर तक फैल गया । बडी-बडी दूरसे लोग इनके दर्शन को आने लगे । दुष्ट बुद्धि के ईर्ष्यालु लोगो को इनका इतना यश असह्य हो गया । वे इनसे अकारण ही द्वेष मानने लगे । उन ईर्ष्यालुओ में वहाँ का एक रामचन्द्र खाँ नाम का बडा जमींदार भी था । वह इन्हे किसी प्रकार नीचा दिखाना चाहता था । इनके बढे हुए यशको धूलिमे मिलाने की बात वह सोचने लगा । साधको को पतित करने मे कामिनी और कांचन – ये ही दो भारी प्रलोभन है, इनमें कामिनी का प्रलोभन तो सर्वश्रेष्ठ ही समझा जाता है ।

रामचन्द्र खाँ ने उसी प्रलोभन के द्वारा हरिदास को नीचा दिखाने का निश्चय किया । किंतु उनकी रक्षा तो उनके प्रभु ही सदा करते थे । फिर चाहे सम्पूर्ण संसार ही उनका बैरी क्यो न हो जाता, उनका कभी बाल बाँका कैसे हो सकता था ? किंतु नीच पुरुष अपनी नीचता से बाज थोड़े ही आते हैं । रामचन्द्र खाँ ने एक अत्यन्त ही सुन्दरी षोडशवर्षीया वेश्या को इनके भजन में भंग करने के लिये भेजा । वह रूपगर्विता वेश्या भी हन्हें पतित करने की प्रतिज्ञा करके खूब सज-धज के साथ हरिदासजी के आश्रमपर पहुची । उसे अपने रूपका अभिमान था, उसकी समझ थी कि कोई भी पुरुष मेरे रूप-लावण्य को देखकर बिना रीझे नहीं रह सकता । किंतु जो हरिनाम पर रीझे हुए हैं, उनके लिये यह बाहरी सांसारिक रूप-लावण्य परम तुच्छ है, ऐसे हरिजन इस रूप-लावण्य की ओर आंख उठाकर भी नहीं देखते ।

अहो ! कितना भारी महान त्याग है, कैसा अपूर्व वैराग्य है, कितना अद्भुत इन्द्रियनिग्रह है ! पाठक अपनेअपने हृदयोपर हाथ रखकर अनुमान तो करें । सुनसान जंगल, हरिदास की युवावस्था, एकान्त शान्त स्थान, परम रूप लावण्ययुक्त सुन्दरी और वह भी हरिदास से स्वयं ही प्रणयकी भीख मांगे और उस विरक्त महापुरुष के हृदय में किंचिन्मात्र भी विकार उत्पन न हो, वे अविचल भावसे उसी प्रकार बराबर श्रीकृष्ण कीर्तन में ही निमग्न बने रहे । मनुष्य की बुद्धि के परे की बात है । वेश्या वही जाकर चुपचाप बैठो रही । हरिदासजी धाराप्रवाहरूप से  इस महामन्त्र का जप करते रहे –

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।।

दिन बीता, शाम हुईं । रात्रि बीती, प्रात:काल हुआ । इसी प्रकार चार दिन व्यतीत हो गये । वारांगना रोज आती और रोज ज्यों-की-त्यों ही लौट जाती । कभी-कभी बीचमे साहस करके हरिदासजी से कुछ बातें करने की इच्छा प्रकट करती, तो हरिदासजी बडी ही नम्रता के साथ उत्तर देते- आप बैठें, मेंरे नाम जपकी संख्या पूरी हो जाने दीजिये, तब मैं आपकी बातें सुन सकूँगा । किंतु नाम-जपकी संख्या दस-बीस या हजार-दो हजार तो थी ही नहीं, पूरे तीन लाख नामों का जप काना था, सो भी उच्च स्वर से गायन के साथ । इसलिये चारों दिन उसे निराश ही होना पडा । सुबह से आती, दोपहर तक बैठती, हरिदास जी लय से गायन करते रहते  –

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।।

बेचारी बैठे – बैठे स्वयं भी इसी मन्त्र को कहती रहती । शाम को आती तो आधी रात्रि तक बैठी रहती । हरिदास जी का जप अखंडरूप से चलता रहता –

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।।

चार दिन निरन्तर हरिनामस्मरण से उसके सभी पापो का क्षय हो गया । पापो के क्षय हो जाने से उसकी बुद्धि एकदम बदल गयी, अब तो उसका हृदय उसे बार-बार धिक्कार देने लगा । ऐसे महापुरुष के निकट मैं किस बुरे भावसे आयी थी, इसका स्मरण करके वह मन-ही-मन अत्यन्त दुखी होने लगी । अन्त में उससे नही रहा गया । वह अत्यन्त ही दीन भाव से हरिदासजी के चरणोमें गिर पडी और आखों से आँसू बहाते हुए गद्गदकंठ से कहने लगी – महाभाग ! सचमुच ही आप पतितपावन हैं । आप जीवोपर अहैतुकी कृपा ही करते हैं । आप परम दयालु हैं, अपनी कृपाके लिये आप पात्र-अपात्र का विचार न करके प्राणिमात्र के प्रति समान भाव से दया करते है ।

मुझ-जैसी पतिता, लोकनिन्दिता और खोटी वुद्धिवाली अधम नारीके ऊपर भी आपने अपनी असीम अनुकम्पा प्रदर्शित की। भगवन् ! मैं खोटी बुद्धि से आपके पास आयी थी, किंतु आपके सत्संग के प्रभाव से मेरे वे भाव एकदम बदल गये I श्रीहरि के सुमधुर नामो के श्रवणमात्र से ही मेरे कलुषित विचार भस्मीभूत हो गये । अब मै आपके चरणो की शरण हूँ, मुझ पतिता अबला का उद्धार कीजिये । मेरे घोर पापोका प्रायश्चित्त बताइये, क्या मेरी भी निष्कृतिका कोई उपाय हो सकता है, इतना कहते-कहते वह हरिदास के चरणो में लोटने लगीं । हरिदासजी ने उसे आश्वासन देते हुए कहा – देवि ! उठो, घबडाने की कोई बात नहीं ।

श्रीहरि बड़े दयालु हैं, वे नीच,पामर, पतित-सभी प्रकार के प्राणियो का उद्धार करते हैं । उनके दरबार में भेद-भाव नहीं । भगवान् के सम्मुख भारी-से-भारी पाप नहीं रह सकते । भगवन्नाम में पापो को क्षय करने की इतनी भारी शक्ति है कि चाहे कोई कितना भी घोर पापी-से-पापी क्यों न हो, उतने पाप वह कर ही नहीं सकता, जितने पापो को मिटाने की हरिनाम में शक्ति है । तुमने पापकर्म से जो पैसा पैदा किया है, उसे अभ्यागतों को बाँट दो और निरंतर हरिनाम का कीर्तन करो । इसीसे तुम्हारे सब पाप दूर हो जायेंगे और श्री भगवान् के चरणो मे तुम्हारी प्रगाढ़ प्रीति हो जायगी। बस

हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।।

इस महामन्त्र में ही सब सामर्थ्य विराजमान है । इसीका निरंतर जप करती रहो I अब इस कुटिया में हम नहीं  रहेंगे , तुम्ही इसमें रहो । उस वेश्या को ऐसा उपदेश करके महाभागवत हरिदासजी सीधे शान्तिपुर चले गये और वहाँ जाकर अद्वैताचार्यजीके समीप अध्ययन और श्रीकृष्ण संकीर्तन में सदा सदा रहने लगे ।

इस वेश्या ने भी हरिदासजी के आदेशानुसार अपना सर्वस्व दान करके अकिंचनोका – सा वेश धारण कर लिया । वह फटे-पुराने चिथडों को शरीरपर लपेटकर और भिक्षान्न से उदरनिर्वाह करके अपने गुरुदेव के चरण चिह्नो का अनुसरण करने लगीं । थोड़े ही समय मे उसकी भक्ति की ख्याति दूर दूर तक फैल गयी । बहुत से लोग उसके दर्शन के लिये आने लगे । वह हरिदासी के नाम से सर्वत्र प्रसिद्ध हो गयी । लोग उसका बहुत अधिक आदर करने लगे । महापुरुषो ने सत्य ही क्या है कि महात्माओ का खोटी बुद्धि से किया हुआ सत्संग भी व्यर्थ नहीं जाता । सत्संग की महिमा ही ऐसी है ।

इधर राभचन्द्र खाँ ने अपने कुकृत्य का फल यहीपर प्रत्यक्ष पा लिया । नियत समयपर बादशाह को पूरा लगान न देने के अपराध में उसे भारी दण्ड दिया क्या । बादशाह के आदमियो ने उसके घरमें आकर अखाद्य पदार्थो को खाया और उसे स्त्री-बच्चेसहित बांधकर वे राजा के पास ले गये, उसे और भी भांति – भांति की यस्तनाएँ सहनी पडी । सच है, जो जैसा क्या है उसे उसका फल अवश्य ही मिलता है ।

श्री हरिदास ठाकुर के द्वारा नामतत्त्व का विचार

बेनापोल से श्री हरिदास ठाकुर हुगली जिले मे सप्तग्राम त्रिवेणी के निकट चांदपुर नामक एक गाँव मे आ गये। हिरण्य और गोवर्धन मजूमदार नामक दो भाई उस गाँव के जमींदार थे । उनके पुरोहित का नाम बलराम आचार्य थे । ये बलराम आचार्य श्री हरिदास जी के कृपापात्र थे । उन्होने यत्नपूर्वक श्री हरिदास जी को उस गाँव में रखा। श्री हरिदास ठाकुर निर्जन में एक पर्णकृटी में रहकर निरन्तर हरिनाम करते :

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ।
हरे राम हरे राय राम राम हरे हरे ।।

और बलराम आचार्य के घरमें भिक्षा ग्रहण करते थे ।

गोवर्धन मजूमदार के एकमात्र पुत्र का नाम रघुनाथ था । जिस समय श्री हरिदास ठाकुर वहाँ वास कर रहे थे, उस समय यही रघुनाथ, जो बादमे श्री गौरांग महाप्रभु के अति प्रिय परिकर श्रीरघुनाथ दास गोस्वामी के नाम से प्रसिद्ध हुए, बहूत छोटे थे और विद्याध्ययन कर रहे थे। बालक रघुनाथ समय समयपर श्री हरिदास ठाकुर के दर्शन करने जाते थे । श्री हरिदास ठाकुर भी उनपर बहुत अधिक कृपा करते थे । श्री हरिदास जी की वही कृपा ही बादमे श्रीरघुनाथ के श्रीचैतन्य महाप्रभु को प्राप्त करने का कारण बनी ।

हिरण्य और गोवर्धन मजूमदार के घर में नित्यप्रति पंडितो की सभा लगती थी, जिसमे भागवत आदि शास्त्रो की चर्चा होती थी । एक दिन बलराम आचार्यने श्री हरिदास ठाकृर से उस सभा में उपस्थित होने के लिए प्रार्थना की, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। जब बलराम आचार्य श्री हरिदास ठाकृर को साथ लेकर सभामें पहुंचे, तो श्री हरिदास जी का दर्शन करते ही हिरण्य तथा गोवर्धन नामक दोनो भाई खडे हो गये ।

तत्पश्चात दोनोंने श्री हरिदास ठाकृर के चरणो में गिरकर प्रणाम किया तथा अत्यधिक सम्मानपूर्वक उन्है बैठने के लिए आसन प्रदान किया । उस सभामें बडे बडे पंडित, अनेक ब्राह्मण तथा सज्जन (साधु) लोग बैठे हुए थे । हिरण्य और गोवर्धन स्वयं भी बहूत बडे पंडित थे । वहाँ बैठे हूए अधिकांश व्यक्ति श्री हरिदास जी की महिमा जानते थे । जब उन सबने पञ्चमुख होकर अर्थात अत्यन्त आनन्दपूर्वक बहूत प्रकार से श्री हरिदास जी की महिमा उन दोनो भाइयो को सुनायी, तब वे दोनो सुनकर बहूत आनन्दित हुए ।

वहाँ उपस्थित प्राय: सभी व्यक्ति जानते थे कि श्री हरिदास ठाकुर नित्यप्रति तीन लाख हरिनाम करते है । अत: आज उनका दर्शन करते ही  पंडितो ने नामकी महिमापर विचार करना आरम्भ का दिया। कुछ पंडित कहने लगे- हरिनाम से समस्त पाप नष्ट हो जाते है तथा कुछ पंडित कहने लगे -हरिनाम से मुक्ति प्राप्ति होती है। वास्तव मे वे सभी नामाभास को ही शुद्धनाम समझते थे।

उन दोनो पक्षो के विचार को सुनकर श्री हरिदास ठाकुर बोले – ये दोनो अर्थात पापक्षय और मुक्ति हरिनाम के फल नहीं है । हरिनाम के फलस्वरूप तो श्रीकृष्ण के चाणकमलो के प्रति प्रेम उत्पन्न होता है । श्रीमद्भागवत (११.२.४०) मै  वर्णित है

एवं व्रत: स्वप्रियनामकीर्त्या जातानुरागो द्रुतचित्त उच्चै: । हसत्यथो रोदिति रौति गायत्युन्मादवन्नृत्यति ।।

अर्थात प्रेम लक्षण भक्तियोग से भगवत सेवाव्रतधारी साघुपुरुषो के हृदय मे एकान्तप्रिय श्री भगवान् के  नाम संकीर्तन से अनुराग और प्रेभ का अंकुर उदित हो आता है । उनका चित्त द्रवित हो जाता है । वे साधारण लोगो की स्थिति से ऊपर उठ जाते हैं । लोक लज्जा छोडकर कभी हंसने लगते हैं, तो कभी फूट फूंटकर रोने लगते हैं । कभी ऊंचे स्वर से भगवान् को पुकार ने लगते है, तो कभी मधुर स्वर से उनके गुणो का गान करने लगते हैं और कभी उन्हे रिझाने के लिए नृत्य भी करने लगते हैं।

शारत्रोंके प्रमाणों से यह भी स्पष्ट हो जाता है कि मुक्ति और पापनाश हरिनाम के आनुषंगिक फलमात्र हैं, मुख्य फल नहीं । जो बिना किसी चेष्टा के प्राथमिक उद्देश्य के साथ ही साथ अपने आप ही हो जाते हैं, उन्हे आनुषंगिक कहते है । इसे ठीक से समझाने के लिए श्री हरिदास ठाकुर ने एक श्लोक उच्चारण किया

अहं संहरदखिल सकृदुदयादेव सकल लोकस्य ।
तरणिरिव तिमिर जलधिं जयतिजगन्मंगलहरेर्नामा (पद्यावली शलोक संख्या १६)

इस श्लोक का उच्चारण कर श्रील हरिदास ठाकृर ने  वहांपर उपस्थित पंडितो से इस श्लोक का अर्थ करनेके लिए कहा । किन्तु सभी पंडित बोले – आप ही इसका अर्थ सुनाइये। यह सुनकर श्री हरिदास जी कहने लगे – जिस प्रकार सूर्य के उदित होनेके आरम्भ में ही अर्थात सूर्य निकलने से पहले ही उसके आभास से अन्धकार दूर हो जाता है और भूत प्रेत चोर आदिसे होनेवाला भय भी दूर हो जाता है तथा उदित होनेपर धर्म कर्म आदि सबकुछ प्रकाशित हो जाता है, उसी प्रकार शुद्धनाम के उदित होमेके आरम्भ में ही पाप आदिका क्षय हो जाता है तथा शुद्धनाम के उदित होनेपर श्रीकृष्ण के चरणकमलों में प्रेम उदित होता है ।

नामाभास से ही पापनाश होता हैं, इसका प्रमाण श्रीमद्भागवत में अजामिल है। मुक्ति तो हरिनाम का एक तुच्छ फल है जो नामाभास से ही प्राप्त हो जाता है । श्रीभगवान् के द्वारा दिये जानेपर भी शुद्ध भक्त मुक्ति स्वीकार नहीं करते ।

नाम मे अर्थवाद करनेवाले गोपाल चक्रवर्ती के द्वारा क्रोधपूर्वक श्री हरिदास ठाकुर के वचनो की अवज्ञा

गोपाल चक्रवर्ती नामक एक पण्डित हिरण्य और गोवर्धन मजूमदार का कर्मचारी था और अत्यन्त सुन्दर नवयुवक था- “नामके आभास से ही मुक्ति प्राप्त हो जाती है तथा समस्त पाप नष्ट हो जाते है ” ,बिना किसी आनुगत्य के बहूत से शास्त्र अध्ययन करनेवाला गोपाल श्री हरिदास ठाकुर के इस वचन को सहन नही कर पाया तथा क्रोधित होकर नाम मे अर्थवाद करते हुए अवज्ञापूर्वक श्री हरिदास जी की और इंगित हुए कहने लगा  – हे पंडितो ! इस भावुक का सिद्धांत अर्थात शास्त्र की मीमांसा तो सुनो !

करोडों जन्मो तक ब्रह्मज्ञान के अनुशीलन से भी जो मुक्ति सहज ही नहीं मिलती, जिसकी अपनी कोई विचार शक्ति नहीं है, दूसरे की बात सुनकर बहूत आसानी से विचलित हो जानेवाला यह भावुक कह रहा है कि ऐसी दुर्लभ मुक्ति नामके आभास से अनायास ही मिल जाती है ।

श्री हरिदास ठाकुर उसे समझाते हुए बोले- मेरी बातो में तुम संशय क्यो का रहे हो? ये वचन मेरे नहीं, बल्कि शास्त्र के है । यदि तुम कहो कि जब नामाभास से ही मुक्ति की प्राप्ति होती है, तब फिर भक्त उसे ग्रहण क्यो नही करते ? और क्यो इतना कष्ट करके भक्ति साधन भजन करते हैं? तो सुनो भक्ति के सुखके सामने मुक्ति का सुख अत्यन्त तुच्छ और हेय है, इसीलिए भगवान के देनेपर भी भक्त मुक्ति को ग्रहण नहीं  करते ।

भक्ति के साथ मुक्ति की तुलना सम्मवपर नहीं –
त्वत्साक्षात्करणाह्लादाविशुद्धा स्थितस्य मे ।
सुखानि गोष्पदायन्ते ब्राह्मण्यपि जगत्गुरो ।। (हरिभक्तिसुधोदय १४/७६)

श्री प्रह्लाद महाराज ने प्रार्थना कारते हुए भगवान श्री नृसिंह से कहा -हे जगद्गुरो (भगवान) ! साक्षात् रूपमें आपका दर्शनकर मैं विशुद्ध आनन्द के जिस समुद्र में डूब रहा हूँ उसके समक्ष सभी प्रकार के सुख यहाँ तक कि मुक्ति का सुख भी ऐसा प्रतीत हो रहा है, जैसे गाय के खुर से बने हुए गड्ढे में भरा हुआ जला अर्थात जिस प्रकार उस खुर से बनेे हुए गड्ढे में भरे हुए पानी की समुद्र से तुलना सम्भव नहीं है, उसी प्रकार भक्ति के सुख के साथ किसी भी प्रकार के सूख की तुलना सम्भव नही है ।

श्री हरिदास जी की बात सुनकर वह अभिमानी ब्राह्मण क्रोधपूर्वक बोला- यदि तुम्हारे कहे अनुसार नाम के आभास से ही मुक्ति न होती हो, तो ऐसा निश्चित जानो कि मैं तुम्हारी नाक काट दूंगा ।

श्री हरिदास ठाकुर दृढतापूर्वक बोले – ठीक है, यदि नामाभास से मुक्ति न होती हो, तो यह निश्चित जानो कि मैं अवश्य ही स्वयं अपनी नाक काट दूंगा ।

परम भागवत श्री हरिदास ठाकुर की अवज्ञा से अनिष्ट की आशंका करके सभी लोग हाहाकार करने लगे। हिरण्य और गोवर्धन मजूमदार उस  ब्राह्मण को धिक्कार देने लगे। बलराम आचार्य भी क्रोधित होकर उससे कहने लगे – अरे ! इधर उधर की  बात लेकर अपना पांडित्य दिखानेवाले मूर्ख तार्किक ,तू भक्ति की महिमा क्या जानता है? तूने श्री हरिदास जी जैसे सिद्ध महापुरुष का अपमान किया है । इसके फलस्वरूप अवश्य ही तेरा सर्वनाश होगा। तेरा कल्याण कभी भी सम्भव नहीं है I उसी क्षण मजूमदार ने उस अभिमानी ब्राह्मण को अपने घर से निकाल दिया ।

इस घटना से कुछ दुखी होकर श्रीहरिदास ठाकुर जाने के लिए उठ खडे हुए। यह देखकर हिरण्य, गोवर्धन तथा उपस्थित सभी पंडित उनके श्री चरणकमलों में गिर पडे । तब श्रील हरिदास ठाकुर हास्यपूर्वक मधुर वचनो से सांत्वना देते हुए कहने लगे – जो कुछ हुआ उसमे आप लोगो का कोई दोष नही है । वास्तव में वह ब्राह्मण अज्ञ है, अत: इसमें उसका भी कोई दोष नही है ।

उसका हृदय तर्कनिष्ठ है । परन्तु भगवान का नाम तर्क से अतीत है, अर्थात् तर्क द्वारा नामकी महिमा को नहीं जाना जा सकता । अत: वह नामकी महिमा को कैसे जान सकता है? आप लोग शान्त होकर प्रसतन्न मन से अपने अपने घर जायें । श्रीकृष्ण सबका काल्याण करें । मेरे विषय में आप लोग लेशमात्र भी दुखी न हो । ऐसा कहकर अदोषदर्शी श्री हरिदास जी वहाँ से चले गये ।

हिरण्य और गोवर्धन ने उस अभिमानी ब्राह्मण को  सर्वदा के लिए अपने घर आने से मना का दिया । इस घटना के ठीक तीसरे दिन ही उस ब्राहाण को कुष्ठ रोग हो क्या । उसको बहूत ऊँची और अत्यधिक सुन्दर नाक कृष्ठरोग से गलकर गिर गयी । उसके हाथ और पैरो की अंगुलियां जो चम्पकपुष्प की कलि जैसी बहूत ही सुन्दर थी, वह भी कुष्ठ से गल गयीं। यह देखकर लोगो को बहुत आश्चर्य हूआ । सभी लोग श्री हरिदास ठाकृर का गुणगान करते हुए उन्हें प्रणाम करने लगे।

यद्यपि परम दयालु श्री हरिदास ठाकृर ने उस ब्राह्मण का अपराध नहीं लिया, तथापि भगवान ने उसे उसके अपराध का फल भोग कराया। भक्तों का स्वभाव ही है कि वे अज्ञ व्यक्तियो के दोषोको क्षमा का देते है और उनके कल्याण की ही चिन्ता करते है , परन्तु भगवान् कस स्वभाव है कि वे कभी लेशमात्र भी अपने भक्त की निन्दा सहन नहीं कर सकते ।

ब्राह्मण के दुखके विषय में सुनकर श्री हरिदास ठाकुर के मनमे भी बहुत दुख हुआ। वे बलराम पृरोहित को अपने हृदय की सारी बाते कहकर वहाँ से शान्तिपुर चले आये ।

श्री हरिदास ठाकुर और श्री अद्वैताचार्य

श्री हरिदास ठाकुर नित्यसिद्ध भगवत पार्षद हैं । वे यशोहर जिले के बूढन ग्राम में यवनकुल में आविर्भूत हुए । उनकी कृपासे यशोहर जिले में अनेक व्यक्ति सुकृति प्राप्त करके श्रीकृष्ण कीर्तन में श्रद्धा युक्त हुए थे । उनके आविर्भाव से पूर्व यशोहर में  श्रीकृष्ण कीर्तनकारियों का अकाल पडा हुआ था, किन्तु उन्होंने आविर्भूत होकर उस कीर्तन के अकाल को दूर का दिया था ।

कुछ वर्षो तक वहांपर वास करने के बाद श्री हरिदास ठाकुर गंगातट पर आकर वास करने लगे । कुछ समय तक उन्होने शान्तिपुर में तथा कुछ समय तक शान्तिपुर में निकट स्थित फुलिया नामक गाँव में वास किया । शान्तिपुर में श्री अद्वैताचार्य प्रभु भी रहते थे । जब श्री हरिदास ठाकुर को श्रीअदैता चार्य का साक्षात्कार हुआ, तब उन्होंने श्री अद्वैताचार्य प्रभु को अत्यधिक श्रद्धापूर्वक दण्डवत प्रणाम किया । श्रीअद्वैताचार्य ने भी उन्हे प्रेम से गले लगाकर उनका सम्मान किया ।

श्रीअद्वैताचार्य ने श्रीहरिदास ठाकुर भजन के अनुकूल गंगातट पर निर्जन में वास करने के लिए उन्हें एक गुफा तैयार करवा कर दी तथा वे श्री हरिदास ठाकुर को श्रीमद् भागवत और श्री गीता जी के भक्तिपूर्ण अर्थो का श्रवण करवाने लगे। श्री हरिदास ठाकुर आनन्द से उस गुफा में रहकर हरिनाम करने लगे

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ।।

नित्यप्रति श्री अद्वैताचार्य उन्हें अपने घस्पर ही बुलाकर भोजन कवाते थे तथा दोनों मिलकर श्री कृष्ण कथाओं का आस्वादन करते थे ।

एक दिन श्री हरिदास जी ने श्री अद्वैताचार्य से कहा – हे  आचार्य  ! मैं आपसे कुछ निवदेन करना चाहता हूँ। आप मुझे प्रतिदिन किस उद्देश्य से भोजन कराते हैं? यद्यपि इस शान्तिपुर में बहूत बडे बडे कुलीन ब्राह्मण है, किन्तु तब भी आप उन्हें भोजन न देकर मेरा इतना आदर क्यों करते हैं? ऐसा करते समय क्या आपको किसी प्रकार का कोई संकोच नहीं होता? क्या आपको अपने इस व्यवहार के कारण लोक समाज का भय भी नहीं है? यद्यपि आपके आलौकिक आचरण के विषय में बुच्छ कहते हूए मुझें भय भी लगता है, तथापि मैं कहे बिना रह भी नहीं पा रहा हूँ। अतएव मेरी यह प्रार्थना है कि आप कृपा करके वैसा ही कीजियेगा, जिससे लोक समाज मे आपका असम्मान, अनादर न हो ।

यह सुनकर हँसते हुए श्रीअद्वैताचार्य प्रभु ने कहा -आप भयभीत न होवे । मैं वैसा ही आचरण करूँगा जैसा शास्त्रो का मत है । आपके भोजन करने से  करोडों. ब्रम्हाणो का भोजन कारना हो जाता है । इतना कहकर श्री अद्वैताचार्य ने उन्हे श्राद्ध पात्र प्रदान किया ।

अपने समान भाव और रुचियुक्त स्निग्ध शुद्धभक्त श्री हरिदास ठाकुर का सङ्ग प्राप्त करके श्री अद्वैताचार्य प्रभुके आनन्द की सीमा न रही ।  श्री अद्वैताचार्य प्रभु और श्री हरिदास जी का मणि कांचन जैसा संयोग हूआ। दोनो का  उहेश्य एक ही था कि हरिविमुख जगत मे त्रिताप से जर्जरित जीवो की रक्षा के लिए व्रजेन्द्र नन्दन श्रीगौर सुन्दर को जगत में किस प्रकार प्रकटित किया जाए । श्री अद्वैताचार्य प्रभु गंगाजल तथा तुलसी द्वारा भगवान श्रीविष्णु की आराधना में मग्न थे तथा श्री हरिदास ठाकुर निर्जन गुफा में उच्चस्वर से श्री हरिनाम संकीर्तन में तन्मय थे ।

श्री अद्वैताचार्य प्रभु तथा श्री हरिदास ठाकुर की भक्ति के प्रभाव अर्थात् इन दोनो के आह्वान से ही श्री कृष्णचैतन्य महाप्रभु ने अवतरित होकर नाम प्रेम प्रचार करके  जगतका उद्धार किया ।

श्री हरिदास ठाकुर गंगा के तटपर निरन्तर आनन्दपूर्वक उच्चस्वर से

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ।।

कहते हुए विचरण करते थे । श्री हरिदास ठाकुर विषय सृखों के प्रति सम्पूर्ण रूपसे विरक्त थे तथा उनका श्रीमुख कृष्णनाम से परिपूर्ण होने के कारण धन्य था । वे क्षण भरके लिए भी कृष्णनाम नहीं छोड़ते थे। प्रत्येक क्षणमें अनेकानेक भाव मूर्तियो को धारण करते थे । कभी तो अपने आपसे नृत्य करने लगते ,कभी हुँकार भरते हुए गर्जन करने लगते ,कभी उच्चस्वर से  क्रंदन करते तो कभी हंसने लगते तथा कभी ।मूर्छित होकर गिर पड़ते । एक क्षणमें अलौकिक शब्द कहकर किसीको पुकारने लगते तथा अगले ही क्षण उस अलौकिक शब्द की सुंदर रूप से व्याख्या करने लगते ।

प्रेमसे कीर्तन करते समय श्रीहरिदास जी के नेत्रों से आनंदाश्रुओ की ऐसी धारा बहती थीं, जिससे उनका श्रीअङ्ग पूरी तरह से भीग जाता था । अत्यधिक नास्तिक भक्तिहीन व्यक्ति भी उनको ऐसी अवस्था को देखकर आनंद से भर जाते थे।

जीव मोहिनी मायादेवी द्वारा श्री हरिदास जी की परीक्षा और मायादेवी का हार कर शरण में आना :

श्री कृष्णदास कविराज जी स्वरचित श्री चैतन्य चरितामृत (अ० ३/२२५ – २२६) में वर्णन में कहते है की – अब मै श्री हरिदास ठाकुर के एक अत्यन्त अलौकिक चरित्र का वर्णन करने जा रहा हूँ जिसे सुनकर सभी आश्चर्य चकित हो जाते  है । इस चरित्र के श्रवणर्म कोई भी किसी प्रकार का तर्क वितर्क नहीं करें, क्योकि श्री  हरिदास ठाकुर की भक्ति की महिमा तर्कातीत है ।

एक दिन श्री हरिदास ठाकुर अपनी गुफा में बैठकर भावविह्फल होकर उच्चस्वर से हरिनाम कर रहे थे। अपूर्व शोभामयी चांदनी रात थी , गुफा के द्वारपर लीपे हुए चबूतरे के ऊपर तुलसी विराजमान थीं । उसी समय मन मोहनी अति सुन्दर एक स्त्री आंगन में उपस्थित हुई । उसके अंग कान्ति के द्वारा वह स्थान और भी अधिक शोभायमान हो गया, दसों दिशाएँ सुगंधित हो गयी। वह अनेक प्रकार के मणिमय आभूषणों से सुसज्जित थी । उसने आगे बढकर पहले तुलसी को प्रणाम किया । तुलसी की परिक्रमा कर के वह गुफा के द्वारपर पहुंची ।

मायादेवी ने हाथ जोडकर श्री हरिदास ठाकुर के चरणो की वंदना की  तथा द्वारपर ही बैठकर मधुर वाणीसे कहने लगी -हे हरिदास  ! तुम तो समस्त जगत के बन्धु हो तथा बहूत ही रूपवान और परम गुणवान हो । तुम्हारें रूप और गुणो से मुग्ध होकर ही मैं तुम्हारे संग की प्राप्ति की आशा से तुम्हारी शरण मे आयी हूँ। अत: मुझपर दयाकर मुझे स्वीकार करों ।

दीनोपर दया करना तो साधुओं का स्वभाव ही होता  है । ऐसा कहकर वह श्री हरिदास ठाकुर के मन मे काम  जगाने के लिए अनेको प्रकार से ऐसे हाव भाव दिखाने लगी कि जिन्हे  देखकर बडे बडे ऋषि मृनियो का मन भी विचलित हो जाये । परन्तु उसके हाव भाव से अचल, अटल, गम्भीर चित्तवाले हरिदास ठाकुर के मन में लेशमात्र भी विकार नही हुआ, बल्कि उन्हे उसपर दया ही आ गयी ।

श्री हरिदास ठाकुर मघुर वचनो से कहने लगे- जब तक मेरी नाम संख्या पूर्ण न हो, तब तक मैं कोई भी कार्य नहीं करता- यही मेरा नियम है । आज अभी तक मेरी नाम संख्या पूर्ण नहीं हुई है, अत: तुम द्वारपर बैठकर प्रतीक्षा करो और हरिनाम सुनो । नाम संख्या पूर्ण होते ही मै तुम्हारी इच्छा अवश्य ही पूरी करूँगा।  ऐसा कहकर श्री हरिदास ठाकुर उच्च स्वर से हरिनाम करने लगे तथा वह स्त्री भी द्वारपर बैठकर नाम सुनने लगी।

इस प्रकार श्रील हरिदास ठाकुर द्वारा हरिनाम करते करते सारी रात बीत गयी । जब प्रात:काल हूआ, तो वह स्त्री उठकर चली गयी। इस प्रकार वह लगातार तीन दिन तक आती रही और ऐसे ऐसे हाव भाव दिखाती रही जिससे श्री ब्रह्मा का मन भी मोहित हो जाये । परन्तु श्रीकृष्णनाम में आविष्ट श्री हरिदास जी के आगे उसकी एक न चली ।

जिस प्रकार निर्जन जंगल में रोने पर कोई भी नहीं सुनता उसी प्रकार उस रमणी के हाव भाव देखकर श्री हरिदास जी के चित्त मे कोई विकार नहीं हुआ । तीसरे दिन जब रात बीतने वाली थी, तब वह स्त्री श्री हरिदास जी से  बोली हे महाशय ! आप तीन दिनसे लगातार मुझे झूठा आश्वासन दे रहे है कि नाम समाप्त होते ही आप मेरी इच्छा पूर्ण करेंगे । परन्तु रात-दिन नाम करनेपर भी अभी तक आपकी निर्धारित नाम-संख्या पूर्ण नहीं हुई है ।

श्री हरिदास जी बोले -मैं क्या करूँ? मैने जो नियम बना रखा है, उसे केसे तोड़ दूँ?  यह सूनकर उस रूपवती स्त्री ने श्री हरिदास जी को दण्डवत-प्रणाम किया और बोली- प्रभु ! मैं मायादेवी  हूँ और मै यहांपर आपकी परीक्षा लेने ही आथी थी । ब्रह्मा आदि सभी जीवो को मोहित कर देनेवाली मैं आज आप से पराजित हो गयी ।

मायादेवी ने आगे कहा – मैं आपके मनमे लेशमात्र भी विकार नही उत्पत्र कर सकी । आप महाभागवत है , आपके दर्शन से तथा आपके श्रीमुख से कृष्णनाम श्रवण करके मेरा चित्त निर्मल हो गया है । अब तो मेरी भी हरिनाम करने की इच्छा हो रही है । अत: कृपापूर्वक आप मुझे हरिनाम प्रदान करके कृतार्थ कीजिये । उसने कहा श्रीचैतन्य महाप्रभु के अवतार लेने से संसार में प्रेमामृत की बाढ बहने लगी है, जिससे सब जीव इसमे निमज्जित होकर प्रेम प्राप्त कर रहे हैं और समस्त पृथ्वी धन्य-धन्य हो गयी है । इस कृष्ण प्रेमामृत की बाढ़ में जो जीव सराबोर नहीं होते हैं, उनका जीवन वृथा है, करोडो कल्पो तक भी उन जीवोंका उद्धार नहीं हो सकता ।

बहुत समय पहले मैंने महाकाल भगवान् श्री शंकर से रामनाम ग्रहण किया था, परन्तु आज आप के संग के प्रभाव से मेरे मन मे कृष्णनाम के प्रति लोभ उत्पन्न हो गया है । राम नाम का रस मै चखती हूं परंतु अब कृष्ण नाम का रस चखने भी इच्छा मन में हो गयी है अतः आप कृपापूर्वक मुझें कृष्ण नाम प्रदान कर धन्य करें, जिस से कि मैं भी प्रेमामृत की बाढ़ में बह जाऊँ I ऐसा कहकर वह श्री हरिदास जी की वन्दना करने लगी ।

कृपासिन्धु श्री हरिदास जी नेे मायादेवी को श्रीकृष्णनाम का उपदेश दिया । मायादेवी ने साधू संग के प्रभाव से भोग लालसा को त्याग कर निःश्रेयस प्रदानकारी कृष्ण नाम का कीर्तन करते करते अत्यधिक आनंदपूर्वक प्रस्थान किया ।

शुद्धभक्त नित्य कृष्ण भोग्य हैं। वे कभी भी माया के
द्वारा मोहित नहीं होते । जो व्यक्ति एकान्तिक रूपमें भगवान् की शरण ग्रहण करता है वह माया से पार पा जाता है, विष्णु और वैष्णव-मायातीत हैं ।

इस लीला पर संदेह नहीं करना चाहिए क्योंकि श्रीचैतन्य महाप्रभु के अवतार के समय श्रीकृष्ण प्रेम मे लुब्ध होकर श्रीब्रह्मा, श्रीशिव तथा सनकादि भी पृथ्वीपर अवतीर्ण हुए थे तथा वे सब कृष्णनाम प्राप्त नृत्य करते थे और प्रेम की बाढ मे सराबोर होते थे । स्वयं श्रीकृष्ण  भी तो इसी प्रेमका आस्वादन करने के लिए श्रीकृष्णचैतन्य के रूप में अवतीर्ण हुए थे । उनको शक्ति की छाया मायादेवी यदि प्रेम की भिक्षा कर रही है, तो इसपे आश्चर्य ही क्या है?

श्री हरिदास ठाकुर की नाम के प्रति निष्ठा

रामनाम जपतां कुतो भयं सर्वतापशमनैकभेषजम् ।
पश्य तात मम गात्रसन्निधौ पवकोऽपि सलिलायतेऽधुना ।।(अनर्घराघव ना. )

अग्नि में जलाये जानेपर भी जब प्रह्लाद जी न जले तब वे अपने पिता हिरण्यकश्यपु से निर्भीक भावसे कहने लगे  -श्रीरामनाम के जपनेवाले को भला भय कहाँ हो सकता है; क्योकि सभी प्रकार के आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक तापो को शमन कारनेवाली रामनामरूपी महारसायन है, उसके पान कारनेवालेके पास भला ताप आ ही कैेसे सकते है ? हे पिताजी ! प्रत्यक्षके लिये प्रमाण क्या, आप देखते नहीं, मेरे शरीर के अंगो के समीप आते ही उष्ण स्वभाव की अग्नि भी जलके समान शीतल हो गयी अर्थात् वह मेरे शरीर को जल ही न सकी । राम नामका ऐसा ही माहात्म्य हैं ।

जप, तप, भजन, पूजन तथा लौकिक, पारलौकिक सभी प्रकार के कार्यो मे विश्वास ही प्रधान है । जिसे जिसपर जैसा विश्वास जम गया उसे उसके द्वारा वैसा ही फल प्राप्त हो सकेगा । फल का प्रधान हेतु विश्वास ही है । विश्वास के सम्मुख कोई बात असम्भव नहीं ।

फुलिया ग्राम में एकान्त में महात्मा हरिदास जी भगवन्नाम का अहर्निश कीर्तन करते हुए निवास करते थे ।  उस समय सम्पूर्ण देश में मुगलो का प्राबल्य था । विशेषकर बंगाल मे तो मुसलमानी सत्ता  और मुसलमानी धर्म का अत्यधिक जोर था । इस्लामधर्म के विरुद्ध कोई चूँ तक नहीं कर सकता था । स्थान स्थानपर इस्लाम धर्म के प्रचार के निमित्त काजी नियुक्त थे, वे जिसे भी इस्लाम धर्म के प्रचारमें विघ्न समझते, उसे ही बादशाह से भारी दण्ड दिलाते, जिससे फिर किसी दूसरे को इस्लाम धर्म के प्रचार में रोडा अटकाने का साहस न हो ।

एक प्रकार से उस समय के कर्ता धर्ता तथा विधाता धर्म के ठेकेदार काजी ही थे । शासन सत्तापर पूरा प्रभाव होनेके कारण काजी उस समय के बादशाह ही समझे जाते थे । फुलिया के आसपास मे गोराई नामका एक काजी भी इसी कामके लिये नियुक्त था । उसने जब हरिदासजी का इतना प्रभाव देखा तब तो उसकी ईर्ष्या का ठिकाना नहीं रहा । वह सोचने लगा- हरिदास के इतने बडे प्रभाब को यदि रोका न जायगा तो इस्लामधर्म को बडा भारी धक्का पहुंचेगा । हरिदास जातिका मुसलमान है । मुसलमान होकर वह हिन्दुओं के धर्मका प्रचार करता है ।दूसरे लोग भी इसको देखा देखी ऐसा ही काम करेंगे । इसलिये इसे दरबार से सजा दिलानी चाहिये । यह सोचकर गोराई काजी ने इनके विरुद्ध राजदरबार में अभियोग चलाया। राजाज्ञा से हरिदास जी गिरफ्तार कर लिये गये और मुलुकपति के यहाँ इनका मुकद्दमा पेश हुआ ।

श्री हरिदास ठाकुर की प्रेम और भक्ति के विषय में पहले से ही श्रवण विल्या था, इसलिए आज श्री हरिदास ठाकुर के दर्शन प्राप्ति की सम्भावना से उन सबका हदय आनंदसे भर गया परंतु साथ ही साथ श्री हरिदास को यवन बादशाह सजा देने के लिए पकड़ लाया  है, ऐसा जानकर बे अत्याधिक दुखी भी हुए। वे जानते थे कि मुसलमान बादशाह क्रूर ओर भक्ति विद्वेषी है, अत: वह अवश्य ही श्री हरिदास जी जैसे परम भक्त को भीषण यातनाएँ देगा ।

कैदियों ने कारागृह के रक्षको से हाथ जोडकर विनती की -अरे भाईयो !जब श्री हरिदास जी को सिपाही लोग बादशाह के पास ले जायेंगे तो कृपापूर्वक हमें भी उनका दर्शन करने की अनुमति दे देना I रक्षको ने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली । अत: वे सभी लोग श्री हरिदास जी की उत्कण्ठापूर्वक प्रतीक्षा करने लगे ।

कुछ क्षण पश्चात श्री हरिदास जी सिपाहियो के साथ
वही आ पहुंचे । कैंदियो को देखकर श्री हरिदास जी को उनपर कृपा करने की इच्छा हो गयी । अत: वे उन कैंदियो के सामने खडे हो गथे ।

कैदियों ने श्रद्धापूर्वक उन्हें प्रणाम किया । प्रणाम करते ही सभी कैदियों के हृदय में कृष्णभक्ति के विकार उत्पन्न हो आये । वे लोग आनंद से  क्रंदन करने लगे । उनकी अवस्था देखकर कृपालु श्री हरिदास जी ने मुस्कुराकर गुप्त आशीर्वाद देते हूए कहा -अभी जैसी अब अवस्था में हो, वैसी अवस्था में ही रहो ।उनके आशीर्वाद का अर्थ न समझकर कैदिलोग दुखी हो गये तथा मन ही मन चिंतन करने लगे – ये तो बहूत ही निर्दयी व्यक्ति है ।

उन्हें दुखी देखकर तथा उनके मनकी अवस्था समझकर श्री हरिदास जी उन्हे अपने गुप्त आशीर्वाद का अर्थ समझाते हुए कहा -मैने तुमलोगो को जो आशीर्वाद दिया है, उसका वास्तविक अर्थ नहीं जानने के कारण ही तुमलोग दुखी हो रहे हो, मैं कभी भी किसी को ऐसा आशीर्वाद नहीं देता, जिससे किसी का अमंगल हो । मैने कहा- अभी जैसी अवस्था मे हो, वैसी ही अवस्था में रहो ।इसका अर्थ यह है कि इस समय जैसै तुम सभी का मन श्रीकृष्ण में है, सब समय वैसे ही रहे। इस समय तुमलोगो में किसी के प्रति हिंसा करने की और किसी को कष्ट पहुंचाने की वृत्ति नही है । अतएव लुम सभी कातर स्वस्से कृष्ण कृष्ण कहकर उनका चिन्तन करो ।

 श्री हरिदास जी ने सभी को सतर्क करते हुए कहा – कही ऐसा न हो कि कारागृह से छुटकर दुष्टो के संग से तुमलोगो का मन पुन: मलिन हो जाये । ध्यान रखना कि जब तक जीवो की विषय-भोग की चेष्टा प्रबल रहती है, तब तक उसको कृष्ण-भजन करने की सम्भावना नहीं रहती ।

यह निरिचत जानो कि श्रीकृष्ण विषयी व्यक्तिसे बहूत दूर हैं । सौभाग्य से ही किसी सुकृतिशालौ व्यतिन्को साधुसङ्ग प्राप्त होता है, जिससे उसके उपदेशो को श्रवणकर तथा उसकी कृपा प्राप्तकर विषयी का मन विषयो से हट जाता है तथा वह श्रीकृष्ण भजन करना आरम्भ कर देता है । अत: मेरे आशीर्वाद का उद्देश्य यह नहीं था कि तुम सदाके लिए कारागृह में ही पड़े रही । मेरे कहने का उद्देश्य था कि तुमलोग सदैव विषयो को भूलकर “हरि-हरि” बोलो । तुम्हें सदैव ऐसे साघुओं का सङ्ग प्राप्त हो, जिनके संग से तुम सदैव कृष्णाऩुशीलन मे निमग्न रहो। तुमलोग चिन्ता मत करो, दो तीन दिन में ही लुम सभी कारागृह से छूट जाओगे।

कैंदियो पर कृपा करने के बाद श्री हरिदास ठाकुर बादशाह अथवा उस समय के मुलुकपति के पास आ गये । मुलूकपति इनके प्रभाव और तेज को देखकर चकित रह गया। उसने इन्हें बैठने के लिये आसन दिया। हरिदास जी के बैठ जाने पर मुलूकपति ने दया का भाव दर्शाते हुये अपने स्वाभाविक धार्मिक विश्वास के अनुसार कहा भाई तुम्हारा जन्म मुसलमान के घर हुआ है।

यह भगवान् की तुम्हारे ऊपर अत्यंत ही कृपा है। मुसलमान के घर जन्म लेकर भी तुम काफिरों के से आचरण क्यों करते हो ? इससे तुमको मुक्ति नहीं मिलेगी। मुक्ति का साधन तो वही है जो इस्लाम धर्म की पुस्तक कुरान में बताया गया है। हमें तुम्हारे ऊपर बड़ी दया आ रही है, हम तुम्हें दण्ड देना नहीं चाहते। अब भी तोबा (अपने पाप का प्रायश्चित) कर और कलमा पढकर मुहम्मद साहब की शरण में आ जाओ ! भगवान् तुम्हारे सभी अपराधों को क्षमा कर देंगे और तुम भी मोक्ष के अधिकारी बन जाओगे।

मुलुकपति की ऐसी सरल और सुन्दर बातें सुन कर हरिदास जी ने कहा, महाशय आपने जो भी कुछ कहा है, हरेक मनुष्य का विश्वास अलग-अलग तरह का होता है। जिसे जिस तरह का दृढ विश्वास होता है उसके लिए उसी तरह का विश्वास फलदायी होता है। दूसरों के धमकाने से अथवा लोभ से जो अपने स्वाभाविक विश्वास को छोड़ देते हैं, वे भीरू होते हैं। ऐसे पुरूषों को परमात्मा की प्राप्ति कभी भी नहीं होती। आप अपने विश्वास के अनुसार उचित ही कह रहे हैं, किन्तु मैं दण्ड के भय से यदि भगवन्नाम कीर्तन को छोड़ दूँ, तो इससे मुझे पुण्य के स्थान पर पाप ही होगा। ऐसा करने से मैं नरक का भागी बनूँगा। मेरी भगवन्नाम में स्वाभाविक ही निष्ठा है, इसे मैं छोड़ नहीं सकता। फिर इसके पीछे मेरे प्राण ही क्यों न लें लिये जायँ।

हरिदास जी की ऐसी युक्तियुक्त बातें सुनकर मुलुकपति का हृदय भी पसीज उठा। इनकी सरल और मीठी वाणी में आकर्षण था। उसी से आकर्षित होकर मुलुकपति ने कहा, तुम्हारी बातें तो कुछ-कुछ मेरी समझ में आती हैं, किंतु ये बातें तो हिन्दुओं के लिए ठीक हो सकती हैं। तुम तो मुस्लिम हो, तुम्हें तो उसी तरह विश्वास रखना चाहिए।

हरिदास ने कहा, महाशय ! आपका यह कहना ठीक है, किन्तु विश्वास तो अपने अधीन की बात नहीं है। जैसे पूर्व के संस्कार होंगे, वैसा ही विश्वास होगा। मेरा भगवन्नाम पर ही विश्वास है। कोई हिन्दू जब अपना विश्वास छोडीकर मुस्लिम हो जाता है, तब आप उसे दण्ड क्यों नहीं देते ? क्यों नहीं उसे हिन्दू ही बना रहने को मजबूर करते ? जब हिन्दुओं को अपना धर्म छोड़कर मुसलमान होने में आप स्वतंत्र मानते हैं तब यह स्वतंत्रता मुसलमानों को भी मिलनी चाहिए।

फिर आप मुझे कलमा पढने को मजबूर क्यों करते हैं ? इनकी इस बात से समझदार न्यायाधीश चुप हो गया। जब गोराई काजी ने देखा कि यहाँ तो मामला ही बिलकुल उल्टा हुआ जाता है तब उसने जोरों के साथ कहा, हम ये सब बातें नहीं सुनना चाहते। इस्लाम धर्म में लिखा है, जो इस्लाम धर्म के अनुसार आचरण करता है उसे ही मोक्ष की प्राप्ति होती है, उसके विरुद्ध करने वालों को नहीं। तुम कुफ्र (अधर्म) करते हो। अधर्म करने वालों को दण्ड देना हमारा काम है, इसलिए तुम कलमा पढना स्वीकार करते हो या दण्ड भोगना ? दोनों में से एक को पसंद कर लो।

बेचारा मुलुकपति मजबूर था। इस्लाम धर्म के विरूद्ध वह भी कुछ नहीं कह सकता था। काजियों के विरुद्ध न्याय करने की उसकी हिम्मत नहीं थी। उसने भी गोराई काजी की बात का समर्थन करते हुये कहा, हाँ बताओ तुम कलमा पढ़ने को राजी हो ?

हरिदास जी ने निर्भीक भाव से कहा, महाशय ! मुझे जो कहना था सो एक बार कह चुका। भारी से भारी दण्ड भी मुझे विचलित नहीं कर सकता। चाहे आप मेरी देह के टुकड़े टुकड़े करके फेंकवा दें तो भी जब तक मेरे शरीर में प्राण है, तब तक मैं हरिनाम को नहीं छोड़ सकता। आप जैसा चाहे, वैसा दण्ड मुझे दें।

हरिदास जी के ऐसे उत्तर को सुनकर मुलुकपति किंकर्तव्यविमूढ हो गया। वह कुछ सोच ही न सका कि हरिदास को क्या दण्ड दें ? वह जिज्ञासा के भाव से गोराई काजी के मुख की ओर देखने लगा। मुलुकपति के भाव को समझकर गोराई काजी ने कहा, हुजूर ! जरूर दण्ड देना चाहिए। यदि इसे दण्ड न दिया गया तो सभी मनमानी करने लगेंगे। मुलुकपति ने कहा, मुझे तो कुछ सूझता नहीं, तुम्हीं बताओ इसे क्या दण्ड दिया जाये ?

गोराई काजी ने जोर देकर कहा, हुजूर ! यह पहला ही मामला है। इसे ऐसा दण्ड देना चाहिए कि सबके कान खडे हो जायें। आगे किसी को ऐसा काम करने की हिम्मत ही न पडे। इस्लाम धर्म के अनुसार तो इसकी सजा प्राण दण्ड ही है। किन्तु सीधे – सादे प्राण दण्ड देना ठीक नहीं। इसकी पीठ पर बेंत मारते हुए इसे बाईस बाजारों में होकर घुमाया जाये और बेंत मारते मारते ही इसके प्राण लिये जायें। तभी सब लोगों को आगे ऐसा करने की हिम्मत न होगी।
मुलुकपति ने विवश होकर यही आज्ञा लिख दी। बेंत मारने वाले नौकरों ने महात्मा हरिदास जी को बाँध लिया और उनकी पीठ पर बेंत मारते हुए उन्हें बाजारों में घुमाने लगे। निरंतर बेंतो के आघात से हरिदास जी के सुकुमार शरीर की खाल उधड गयी। पीठ में रक्त की धारा बहने लगी।

निर्दयी जल्लाद उन घावों पर ही और भी बेंत मारते जाते थे, किन्तु हरिदास जी के मुख से वही पूर्ववत् हरि ध्वनि ही हो रही थी। उन्हें बेंतों की वेदना प्रतीत ही नहीं होती थी। बाजार में देखने वाले उनके दुख को न सह सकने के कारण आँखे बंद कर लेते थे, कोई कोई रोने भी लगते थे, किन्तु हरिदास जी के मुख से उफ भी नहीं निकलती थी। वे आनन्द के साथ श्री कृष्ण कीर्तन करते हुए नौकरों के साथ चले जा रहे थे।

वह प्रहार करने वाले सेवक कहने लगे -हमें मालूम पड़ता है, आप जिस नाम का उच्चारण कर रहे है, उसी का ऐसा प्रभाव है कि इतने भारी दुःख से आपको तनिक सी भी वेदना पप्रतीत नहीं होती । इससे पहले भी हमने बहूत लोगो को ऐसा दण्ड दिया है । हमारे भयंकर प्रहारों से कोई एक बाजार में, तो कोई दो बाजारों मे मर गया । आज इसे मारते मारते हमने बाईस बाजारो मे घुमाया, परन्तु इतनी मार खाकर भी यह मरा नहीं, बल्कि आनन्दित हो रहा है I इसके मुखपर दुखका किच्चिन्मात्र भी चिन्ह नहीं, बल्कि मुस्कराहट है।

अत: अवश्य ही यह कोई जिन्दा पीर अर्थात अलौकिक शक्तिसम्पत्र सिद्धपूरुष है । ऐसा विचारकर वे श्री हरिदास जी से कहने लगे -हे हरिदास ! तुम्हारे कारण आज हम सबका सर्वनाश होगा। हमारे इतना मारनेपर भी तुम्हारे प्राण नही निकले, अत: ऐसा सुनकर काजी क्रोध के वशीभूत हो हम सब के प्राण ले लेगा ।

अपने ऊपर प्रहार करने वाले सैनिको की काजी के भावी कोप से रक्षा करने के लिए श्री हरिदास जी ने उन्हे अभय दान करते हुए हंसकर कहा – यदि मेरे मर जाने से ही तुम लोगो का कल्याण हो सकता है , तो देखो ! मैं अभी मर जाता हूँ। ऐसा कहकर वे श्रीकृष्ण के ध्यान में ऐसे निमग्न हो गये कि उनका शरीर निश्चेष्ट हो गया, और तो और उनका श्वास प्रश्वास भी बन्द हो क्या । यह देखकर प्रहारी लोग आश्चर्य में पड गये ।

प्रहारीयो ने उन्हें सचमुच में मुर्दा समझ लिया और उसी दशा में उन्हें मुलुकपति के यहां ले गये। गोराई काजी की सम्मति से मुलुकपति ने उन्हें गंगा जी में फेंक देने की आज्ञा दी। गोराई काजी ने कहा, कब्र में गड़वा देने से तो इसे मुसलमानी धर्म के अनुसार बहिश्त (स्वर्ग) की प्राप्ति हो जायेगी। इसने तो मुस्लिम धर्म छोड़ दिया था।

इसलिए इसे वैसे ही गंगा में फेंक देना ठीक है। सेवकों ने मुलुकपति की आज्ञा से हरिदास जी के शरीर को पतित पावनी श्री भागीरथी के प्रवाह में प्रवाहित कर दिया। माता के सुखद, शीतल जल स्पर्श से हरिदास जी को चेतना हुई और वे प्रवाह में बहते-बहते फुलिया के समीप घाट पर आ लगे। इनके दर्शन से फुलिया निवासी सभी लोगों को परम प्रसन्नता हुई।

चारों ओर यह समाचार फैल गया की गंगा जी में इनका शरीर फेंका गया था परंतु फिर भी यह वापस आ गए , शरीर पर एक भी घाव का निशान भी नहीं है। लोग हरिदास के दर्शन के लिए बड़ी उत्सुकता से आने लगे। जो भी जहां सुनता वहीं से इनके पास दौड़ा आता। दूर-दूर से बहुत से लोग आने लगे। मुलुकपति तथा गोराई काजी ने भी भी यह बात सुनी। उनका भी हृदय पसीज उठा और इस दृढ प्रतिज्ञ महापुरुष के प्रति उनके ह्रदय में भी श्रद्धा के भाव उत्पन्न हुए।

वे भी हरिदास जी के दर्शन के लिए फुलिया आये। मुलुकपति ने नम्रता के साथ इनसे प्रार्थना की, महाशय ! मैं आपको दण्ड देने के लिए मजबूर था। इसलिए मैंने आपको दण्ड दिया। मैं आपके प्रभाव को जानता नहीं था, मेरे अपराध को क्षमा कीजिए। अब आप प्रसन्नता पूर्वक हरिनाम संकीर्तन करें। आपके काम में कोई विघ्न न करेगा।

हरिदास ने नम्रतापूर्वक कहा, महाशय ! इसमें आपका अपराध ही क्या है ? मनुष्य अपने कर्मो के अनुसार ही सुख-दुःख भोगता है। दूसरे मनुष्य तो इसके निमित्त बन जाते हैं। मेरे कर्म ही ऐसे होंगे। आप किसी बात की चिन्ता न करें, मेरे मन में तनिक भी आपके प्रति रोष नहीं है। हरिदास जी की ऐसी सरल और निष्कपट बात सुनकर मुलुकपति को बड़ा आनंद हुआ। वह इनके चरणों में प्रणाम करके चला गया। फुलिया ग्राम के और भी वैष्णव ब्राह्मण आ-आ कर हरिदास जी की ऐसी अवस्था देखकर दुःख प्रकाशित करने लगे।

कोई-कोई तो उनके घावों को देखकर फूट-फूट कर रोने लगे। इस पर हरिदास जी ने उन ब्राह्मणों को समझाते हुए कहा, विप्रगण आप लोग सभी धर्मात्मा हैं। शास्त्रों के मर्म को भली-भांति जानते हैं बिना पूर्व कर्मो के सुख-दुःख की प्राप्ति नहीं होती। मैने इन कानों से भगवन्नाम की निन्दा सुनी थी, उसी का भगवान् ने मुझे फल दिया है।

आप लोग किसी प्रकार की चिन्ता न करें। यह दुख तो शरीर को हुआ है, मुझे तो इसका तनिक भी क्लेश प्रतीत नही होता। बस, भगवन्नाम का स्मरण बना रहे यही सब सुखों का सुख है। जिस क्षण भगवन्नाम का स्मरण न हो, वही सबसे बडा दुख है और भगवन्नाम का स्मरण होता रहे तो शरीर को चाहे कितना भी क्लेश हो उसे परम सुख ही समझना चाहिए। इनके ऐसे उत्तर से सभी ब्राह्मण परम संतुष्ट हुए और इनकी आज्ञा लेकर अपने-अपने घर को चले गए।

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श्री हरिदास जी भाग २

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