श्री भक्तमाल – नामाचार्य श्री हरिदास ठाकुर जी भाग २ Shri Bhaktamal – Namacharya Sri Haridas ji Part 2

यह चरित्र पूज्य श्री प्रभुदत्त ब्रह्मचारी जी की चैतन्य चरितावली ,त्रिदंडी पूज्य श्री नारायण गोस्वामी महाराज द्वारा लिखी पुस्तके और श्री  चैतन्य चरितामृत के आधार पर दिया गया है । कृपया अपने नाम से प्रकाशित ना करे ।www.bhaktamal.com ® 
विषधर सर्प का उपाख्यान

महात्मा हरिदास जी फुलिया के पास ही पुण्य सलिला माँ जाहन्वी के किनारे पर एक गुफा बनाकर उसमें रहते थे। उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैल गयी थी। नित्य प्रति वहाँ सैकड़ों आदमी इनके दर्शन करने के लिये तथा गंगा स्नान के निमित्त इनके आश्रम के निकट आया करते थे। जो भी मनुष्य इनकी गुफा के समीप जाता, उसके शरीर में एक प्रकार की खुजली होने लगती। लोगों को इसका कुछ भी कारण मालूम न हो सका। उस स्थान में पहुंचने पर चित्त में शांति तो सभी के होती, किंतु वे खुजली से घबड़ा जाते।

लोग इस विषय में भाँति-भाँति के अनुमान लगाने लगे। होते-होते बात सर्वत्र फैल गयी। बहुत से चिकित्सकों ने वहां की जलवायु का निदान किया, अन्त में सभी ने कहा, यहाँ कोई जरूर महाविषधर सर्प रहता है। न जाने कैसे हरिदास जी अभी तक बचे हुए हैं,श्वास से ही मनुष्य की मृत्यु हो सकती है। वह कहीं बहुत भीतर रहकर श्वास लेता है, उसी का इतना असर है कि लोगों के शरीर में जलन होने लगती है, यदि वह बाहर निकलकर जोरों से फुकांर करे, तो इसकी फुंकार से मनुष्य बच नहीं सकता।

हरिदास जी इस स्थान को शीघ्र ही छोड़कर कहीं अन्यत्र रहने लगें, नहीं तो प्राणों का भय है। चिकित्सकों की सम्मति सुनकर सभी ने हरिदास जी से आग्रह पूर्वक प्रार्थना की कि आप इस स्थान को अवश्य ही छोड़ दें। आप तो महात्मा हैं, आपको चाहे कष्ट न भी न हो किन्तु और लोगों को आपके यहाँ रहने से बड़ा भारी कष्ट होगा। दर्शनार्थी बिना आये रहेंगे नहीं और यहाँ आने पर सभी को शारिरिक कष्ट होता है। इसलिए आप हम लोगों का ही ख्याल करके इस स्थान को त्याग दीजिए।

हरिदास जी ने सबके आग्रह करने पर उस स्थान को छोड़ना मंजूर कर लिया और उन लोगों को आश्वासन देते हुए कहा, आप लोगों को कष्ट हो ये मैं नहीं चाहता यदि कल तक सर्प यहाँ से चला नहीं गया तो मैं कल शाम को ही इस स्थान का परित्याग कर दूँगा। कल या तो यहाँ सर्प ही रहेगा या मैं ही रहूंगा, अब दोनों साथ ही साथ यहाँ नहीं रह सकते।

इनके ऐसे निश्चय को सुनकर लोगों को बड़ा भारी आनंद हुआ। और सभी अपने-अपने स्थानों को चले गये। दूसरे दिन बहुत से भक्त एकत्रित होकर हरिदास जी के समीप श्री कृष्ण कीर्तन कर रहे थे कि उसी समय सब लोगों को उस अँधेरे स्थान में बड़ा भारी प्रकाश सा मालूम पडा। सभी भक्त आश्चर्य के साथ उस प्रकाश की ओर देखने लगे। सभी ने देखा कि एक चित्र – विचित्र रंगो का बड़ा भारी सर्प वहाँ से निकलकर गंगा जी की ओर जा रहा है।

उसके मस्तक पर एक बडी सी मणि जडी हुई है उसी का इतना तेज प्रकाश है। सभी ने उस भयंकर सर्प को देखकर आश्चर्य प्रकट किया। सर्प धीरे-धीरे गंगा जी के किनारे बहुत दूर चला गया। उस दिन से आश्रम में आने वाले किसी भी दर्शनार्थी के शरीर में खुजली नहीं हुई। संतो की तो दृष्टीमात्र से अविद्या का बंधन खुल जाता है तथा भगवान् भी कभी उनके वचनो का उल्लंघन नहीं करते।

सपेेरे मे अथिष्ठित नागराज वासुकी का उपाखयान 

एक दिन एक विशिष्ट व्यक्ति घर में एक सपेरा आया। सपेरे मे विष दन्त रहित सर्प के दंशन के साथ साथ मन्त्र के प्रभाव से सर्पो के अधिष्ठात देवता नागराज वासुकी का आवेश हो गया । मृदंग तथा मंजीरे की ध्वनि के साथ गाये जानेवाले गीत तथा सपेरे के द्वारा जपे जा रहे मन्त्र की शक्ति के प्रभाव को देखकर सभी मन्त्र मुग्ध हो रहे थे।

दैवयोग से श्री हरिदास ठाकुर भी वहाँ आ पहुंचे । वे भी एक और खडे होकर उस दृश्य को देखने लगे। देखते ही देखते मन्त्र के प्रभाव से उस सपेरे के शरीर में अधिष्ठित्त नागराज वासुकी (विष्णुभक्त शेष -अनन्त) स्वयं उसके माध्यम से उद्दण्ड नृत्य करने लगे । कालियद में कालिया के ऊपर चढकर अखिल क्लाओंके गुरु भगवान श्रीकृष्ण ने जिस प्रकार ताण्डव नृत्य किया था, उसी प्रकार की भाव भंगी को अवलम्बन करके सपेरा भी नृत्य करने लगा तथा कालिया नागके प्रति श्रीकृष्ण ने दण्ड देने के बहाने से जो अत्यधिक दया की थी, उस लीला से सम्बन्धित एक गीत गाने लगा।

सपेरे के मुख से श्रीकृष्ण की करुणा को सूचित करनेवाले गीत को सुनकर एक ओर खडे श्री हरिदास ठाकुर मुग्ध हो गये और भगवान् की लीलाओ का स्मरण करते करते मूर्छित हो गये ।  जब कुछ क्षण के पश्चात जब उन्हे होश अत्या, तो वे हुंकार करते हुए आनन्दपूर्वक नृत्य करने लगे । महाभागवत  श्री हरिदास को कृष्ण प्रेम के आवेश में नृत्य करते देखकर अनन्तदेव आविष्ट सपेरा संभ्रमपूर्वक थोडी दूरीपर खडा हो गया तथा श्रद्धापूर्वक श्री हरिदास जी का नृत्य देखने लगा ।

श्रीकृष्ण के प्रेमावेश में श्रीकृष्ण के अतुलनीय कारुण्य गुण को श्रवण और स्मरण करते करते भूमि पर लोट पोट खाने लगते ,कभी उठ कर पुनः नाचने लगते तथा क्रन्दन करने लगते । श्री हरिदास जी के नृत्य एवं उनके भावो का दर्शन करके वहाँ खडे सभी लोग बहुत आनन्दित हुए । जहाँ जहाँपर श्री हरिदास ठाकुर की चरणधूलि पड़ी थी, सभी लोग वहाँ की रज को उठा उठाकर श्रद्धापूर्वक अपने शरीरपर मलने लगे ।

वहीं पर एक मानलोलुप ब्राह्मण भी बैठा था, जब उसने देखा कि मूर्छित होकर गिरने से ही लोग इतना आदर करते हैं, तब मैं इस अवसर को क्यों हाथ से जाने दूँ। यह सोचकर जब वह सपेरा फिर नाचने लगा, तब ब्राह्मण भी झूठ मूठ बहाना बनाकर पृथ्वी पर अचेत होकर गिर पड़ा। सपेरा तो सब जानता था। इसके गिरते ही वह इसे जोरों से पीटने लगा। मार के सामने तो भूत भी भागते हैं, फिर यह तो दम्भी था, जल्दी ही मार न सह सकने के कारण वहां से भाग गया । उस धनी पुरूष ने तथा अन्य उपस्थित लोगों ने इसका कारण पूछा कि हरिदास की तुमने स्तुति क्यों की और वैसा ही भाव आने पर इस ब्राह्मण को तुमने क्यों मारा ?

अनन्तदेव सपेरे के मुख के माध्यम से सभीको कहने लगे – तुमलोगो ने जो प्रश्न किया है, उसका उत्तर अति रहस्यपूर्ण है । वह कहने योग्य न होनेपर भी मैं तुमलोगो से कह रहा हूँ। श्री हरिदास जी प्रेम में आविष्ट होकर नृत्य करते देखकर तुमलोगो ने श्रद्धापूर्वक उनकी चरणधूलि ली । यह देखकर वह ढोंगी ब्राह्मण भी प्रतिष्ठा की आशा से मूर्छित होने का नाटक कर रहा था । श्री हरिदास जी निष्कपट अप्राकृत सहज प्रेमिक शुद्ध भगवद्भक्त हैं और यह अधम विप्र घृणित प्राकृत सहजिया है ।

जो महाभागवत वैष्णवो की अलौकिक क्रिया मुद्रा का कृत्रिम रूप से अनुकरण करके ‘भक्त’ के रूप में जडप्रतिष्ठा प्राप्त करने की इच्छा करते हैं, वास्तव में भागवान के श्री चरणकमलो के प्रति उनकी किसी भी प्रकार की सेवा प्रवृत्ति नहीं होती । वे अपनी जड ई इंद्रियों की तृप्ति के लिए ही कृष्णभक्त सजकर लोगो को ठगते है। जहांपर इस प्रक्रार के धर्मध्वजी, बकधर्मी नही है, वहीं पर अकैतव कृष्णभक्ति है तथा जहांपर यह सब दोष विद्यमान है, वहाँ दम्भ, कैतव और कृष्णसेवा के अतिरिक्त अन्यान्य उद्देश्य लक्षित होते है ।

वैष्णवो के कृष्ण प्रेममय नृत्य के दर्शन से दर्शको का भव बंधन  नष्ट होता है ओर प्राकृत सहजियाकी कृत्रिम किया मुद्रा के दर्शन से दर्शको के भवबन्धन का क्लेश और अधिक वर्धित होता है । श्री  हरिदास जी जब अप्राकृत नृत्य लीला प्रदशित करतेहैं, तब उनके निष्कपट प्रेम के वशीभूत होकर उनके साथ श्रीकृष्ण सपरिकर नृत्य करते हैं । ऐसे भक्तो के नृत्य से ब्रह्माण्ड भी पवित्र हो जाता हैं ।

नागराज के द्वारा महात्मा श्री हरिदास जी वास्तविक स्वरूप का उदघाटन 

सत्य ही वे श्रीहरिके दास हैं, इसलिए उनका नाम श्रीत्न हरिदास है । सदैव श्रीकृष्णचन्द्र उनके हृदय मे निवास करते है ।श्री हरिदास जी सभी प्राणियो के प्रति स्नेहदृष्टि सम्पन्न तथा स्थावर और जंगम -सभी के उपकारी  हैं । भगवान जब जब इस प्रपंच में अवतरित होते हैं, तब तब श्री हरिदास ठाकुर भी अवतरित होते हैं। अतएव वे साक्षात भगवान के नित्य परिकर है । साक्षात भगवत् पार्षद होने के कारण श्री हरिदास जी विष्णु एवं वैष्णवो के प्रति कभी कोई अपराध नहीं किया I साधारण प्राकृत मनृष्यों की भांति उनकी कृष्णसेवनमयी चेष्टा किसी भी अवस्था में यहाँ तक कि स्वप्न में भी भी विषय की ओर नहीं जाती |

क्षणमात्र से भी कम समय के लिए यदि किसी जीव को जन्म जन्मान्तरों के पुंज पुंज महासौभाग्य के फल श्री हरिदास जी का सङ्ग प्राप्त होता है, तब उसे अवश्य ही भगवान के चरणकमलो की प्राप्ति होती है । श्री हरिदास जी जैसे महाभागवत भक्तों का सङ्गप्राप्त करके धन्य होने के लिए ब्रह्मा और शिव आदि देवता भी सदैव लालायित रहते है ।

प्राकृत सत् – असत् कर्मो के फल से बद्धजीव उच्च -नीच योनियो में जन्म ग्रहण करते है । उच्च अथवा नीच कुलमे जन्म ग्रहण करना केवल जीवो के कर्मफल भोगका निदर्शनमात्र है । पारमार्थिक विचार से जाति अथवा प्राकृत वंश, मर्यादा का कोई मूल्य नहीं हैं । इस परम सत्य को जगत में सभी को अवगत कराने के लिए मंगलमय भगवान् की इच्छा से श्री हरिदास जी यवनकुल में आविर्भूत हुए थे। अधम कुल में जन्म लेनेपर भी यदि कोई भगवान् विष्णुका भजन लरत है, तो वह पूज्य है सभी सात्त्वत शास्त्रो का ऐसा ही कहना है ।

सत् कर्म करने के फलस्वरूप उत्तम कुल में जन्म ग्रहण करनेपर भी श्रीकृष्ण का भजन नही करनेवालो के लिए नरक की प्राप्ति होना अवश्यम्भावी है । उसका उच्च कुल उसे नरक जाने से नहीं बचा सकता ।

उपरोक्त वेद वाक्यो की सत्यता को प्रर्दशित करने के लिए ही श्री हरिदास ठाकुर ने अधम कुल में जन्म ग्रहण किया ।
जिस प्रकार विष्णु विद्वेषी दैत्यकुल में श्री प्रह्लाद तथा वानर कुल में श्रीहनुमान जी ने जन्म ग्रहण किया था, उसी प्रकार निम्न यवन कुल में श्री हरिदास प्रमु की इच्छा से आविर्भूत हुए थे । साधारणत: मनुष्य देवताओंका स्पर्श करके तथा गंगा में स्नान करके पवित्र होने की इच्छा करते हैं । किन्तु ब्रह्मा आदि देवता, यहाँ तक कि भगवान विष्णु के चरणकमलो से निकली परम पवित्र भगवती गंगा भी महाभागवत श्री हरिदास जी का स्पर्श करके धन्य होने की इच्छा करती हैं।

श्री हरिदास जी को स्पर्श करना तो दूर रहे, उनके दर्शन करने से ही जीवो की अनादि अविद्या का बन्धन तत्क्षणात् खुल जाता है । नामाचार्य श्री हरिदास के प्रति जो अप्राकृत गुरुबुद्धि रखकर उनका आश्रय ग्रहण करते हैं, श्री हरिदास के वैसे भक्तोंको देखने से भी बद्धजीवो का संसार बंधन खुल जाता है ।

तुम लोग बहुत ही सौभप्नयशाली हो, तुम्हारे द्वारा की गयी जिज्ञासा के फलस्वरूप ही आज मेरे मुख से भगवद्भक्त का किञ्चित गुणगान कीर्तित और प्रकाशित हुआ है । यदि मै सैकड़ो वर्षो तक सैकड़ो मुखोंसे ठाकुर हरिदास के अप्राकृत गुणो का गान करूँ, तब भी उनके गुणो का अन्त नहीं पा पाऊंगा ।  मै सत्य कह रहा हूँ कि यदि एक बार भी कोई वैष्णव ठाकुर श्री हरिदास जी का नाम उच्चारण करेगा, उसे अवश्य ही श्रीकृष्ण के धाम की प्राप्ति होगी । ऐसा कहकर नागराज मौन हो गये । श्री हरिदास जी की महिमा श्रवण करके सभी लोग बहुत आनन्दित हुए ।

दुर्जन नामापराधी नास्तिक विप्र का उपाखयान 

जिस तरह पहले गोपाल चक्रवर्ती ने श्री हरिदास जी से तर्क किया और उसकी नाक काट गयी । इसी प्रकार की दूसरी घटना हरि नदी नामक ग्राम में हुई। हरि नदी नामक ग्राम के एक पंडित मानी, अहंकारी ब्राह्मण को अपने शास्त्रज्ञान का बडा गर्व था।
हरिदास जी चलते-फिरते, उठते-बैठते उच्च स्वर से-

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।

इस महामंत्र का सदा जप करते रहते थे। इन्हें मुसलमान और महामंत्र का अनधिकारी समझकर उसने इनसे पूछा, मुसलमान के लिए इस उपनिषद के मन्त्र है का जप करना कहां लिखा है ? यह तुम्हारी अनधिकार चेष्टा है और जो तुम्हें भगवदभक्त कहकर तुम्हारी पूजा करते हैं, वे भी पाप करते हैं। शास्त्र में लिखा है जहाँ अपूज्य लोगों की पूजा होती है और पूज्य लोगों की उपेक्षा की जाती है वहाँ दुर्भिक्ष, मरण, भय और दारिद्रय् ये बाते होती हैं। इसलिए तुम इस अशास्त्रीय कार्य को छोड़ दो, तुम्हारे ऐसे आचरणों से देश में दुर्भिक्ष पड़ जायेगा।

हरिदास जी ने बडी नम्रता से कहा, विप्रवर ! मैं नीच पुरूष भला शास्त्रों का मर्म क्या जानूं ? किन्तु आप जैसे विद्वानों के ही मुख से सुना है कि चाहे वेद शास्त्रों के अध्ययन का द्विजातियों के अतिरिक्त किसी को अधिकार न हो, किन्तु भगवन्नाम तो किरात, हूण, आन्ध्र, पुलिंदा, पुल्कस, आभीर, कँक, यवन तथा खस आदि जितनी भी पापयोनि और जंगली जाति हैं, सभी को पावन बनाने वाला है। भगवन्नाम का अधिकार तो सभी को समान रूप से है।

हरिदास जी के इस शास्त्र सम्मत उत्तर को सुनकर ब्राह्मण ने पूछा, खैर भगवन्नाम का अधिकार सबको भले ही हो, किन्तु मन्त्र का जप इस प्रकार जोर-जोर से करने से क्या लाभ ? शास्त्रों में मानसिक, उपांशु, ओैर वाचिक ये तीन प्रकार के जप बताये हैं। जिनसे मानसिक जप से सहस्रगुणा उपांशु जप श्रेष्ठ हैं, उपांशु जप से लक्ष गुणा मानसिक जप श्रेष्ठ है। तुम मन में जप करो, तुम्हारे इस जप को तो मानसिक, उपांशु अथवा वाचिक किसी प्रकार का भी जप नहीं कह सकते। यह तो वैखरी जप है जो अत्यंत ही नीच बताया गया है।

हरिदास जी ने उसी प्रकार नम्रता पूर्वक कहा, महाराज ! मैं स्वयं तो कुछ जानता नहीं, किन्तु मैंने अपने गुरूदेव श्री अद्वैताचार्य के मुख से थोड़ा-थोड़ा शास्त्र का रहस्य सुना है। आपने जो तीन प्रकार के जप बतायें हैं और जिनमें मानसिक जप को सर्वश्रेष्ठता दी है, वह तो उन मन्त्रों के जप के लिए है। जिनकी विधिवत् गुरु के द्वारा दीक्षा लेकर शास्त्र की विधि के अनुसार केवल पवित्रावस्था में ही सांगोंपाँग जप किया जाता है। ऐसे मन्त्र गोप्य कहे जाते हैं। वे दूसरों के सामने प्रकट नहीं होते। किन्तु भगवन्नाम के लिए तो शास्त्रों में कोई विधि नहीं बताई गयी है।

इसका जप तो सर्वकाल में, सर्वस्थानों में, सबके सामने और सब परिस्थितियों में किया जाता है। अन्य मन्त्रों का चाहे धीरे-धीरे जप का अधिक माहात्म्य भले ही हो, किंतु भगवन्नाम का माहात्म्य तो जोरों से ही उच्चारण करने में बताया है। भगवन्नाम जितने जोरों से उच्चारण किया जायेगा उसका उतना ही अधिक महात्म्य होगा, क्योंकि धीरे-धीरे नाम जप करने वाला तो अकेला अपने आपको ही पावन बना सकता है किन्तु उच्च स्वर से संकीर्तन करने वाला तो सुनने वाले जड़ चेतन सभी को पावन बनाता है।

जपती हरिनामानि स्थाने शतगुणाधिक: ।
आत्मानञ्च पुनात्युचैर्जपन् श्रोतृन पुनाति च ।।
(नारदीय पुराण के अंतर्गत प्रह्लाद वाक्य) 

मन ही मन हरिनाम जपकी अपेक्षा उच्चस्वर से हरिनाम कीर्तन का फल सौ गुणा अधिक है । इसका कारण है कि मन ही मन जप करने वाला व्यक्ति केवल स्वयं को ही पवित्र करता है, परंतु उच्चस्वर से कीर्तन करनेवाला तो अपने साथ साथ सुननेवालो को भी पवित्र करता है ।

तात्पर्य यह है कि अपने उद्धार के लिए मन ही मन तो सभी जप करते हैं, परन्तु जो अपने साथ साथ दूसरों के उद्धार के लिए भी हरिनामरूपी गोविन्द संकीर्तन को उच्चस्वर से करता है, भगवान् उससे अधिक सन्तुष्ट होते है ।

कलियुगे राक्षस सकल विप्र घरे ।
जन्मिबेक सुजनेर हिंसा करिबारे।।
(चै. भा.आ. १६/३००)

विष्णु और वैष्णवो से हिंसा करनेवाले राक्षस स्वभाव के व्यक्ति कलिकाल मे ब्राह्मणों।के कुल।में जन्म ग्रहण करके भी वैष्णवो के प्रति हिंसा करते हैं ।

राक्षसा: कलिमाश्रित्य जायन्ते ब्रह्मयोनिषु।
उत्पन्ना ब्राह्मणकुले बाधन्ते श्रोत्रियान कृशान। (वराहपुराणे महेश वाक्यम) 

राक्षस कलियुगका आश्रय लेकर ब्राह्मण कुल में उत्पत्र होते हैं तथा अति विरल श्रौतपथका अवलम्बन करनेवाले सज्जनो को उत्पीडित करते हैं ।

ए सब बिप्रेर स्पर्श, कथा, नमस्कार ।
धर्मशास्त्रे सर्वथा निषेध करिवार ।।
(चै.भा. आ १६/३०२) 

ऐसे सब ब्राह्मणों का स्पर्श करना, उनसे वार्तालाप करना तथा उनको प्रणाम आदि करना धर्मशास्त्रो में सम्पूर्ण रूप से निषिद्ध है ।  गौड़ीय संतो ने अपनी वाणी में लिखा है – ब्राह्मण कुल मे उत्पत्र बिष्णु वैष्णव विद्वेषी अभिमानी विप्रो का स्पर्श तक भी नहीं करना चाहिये । यदि दैववश उनका स्पर्श हो जाये, तो वस्त्रो सहित गंगा स्नान ही कर्त्तव्य है । ऐसे ब्राह्मणों के साथ आलाप (बातचीत) करने से अध:पतन अवश्यम्भावी है । उन्हे  प्रणाम आदि के द्वारा सम्मान करने से भी विष्णुभक्ति से निश्चय ही च्युत होना पडता है । इसलिए श्रीमद्भागवत और धर्मशास्त्र आदि वेद – प्रतिपाद्य ग्रन्थो में वैष्णव सदाचार के पालन से विमुख व्यक्तियो को वंश सहित पतित कहकर सम्बोधित किया गया है ।

किमत्र बहुनोक्तेन ब्राह्मणा ये ह्यवैष्णवा: ।
तेषां सम्भाषणं स्पर्षम् प्रभोदनापि वर्जयेत ।। (पद्मपुराण के अंतर्गत महेश वाक्य) 

इस विषय में अधिक कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है परंतु एक बात अवश्य ही गांठ बांधकर रखनी चाहिये कि जो ब्राह्मण होनेपर भी अवैष्णव हैं, भ्रम से भी उनके साथ न तो सम्भाषण करना चाहिये और न ही उनका स्पर्श करना चाहिये।

श्वपाकमिव नैक्षेत लोके विप्रमवैष्णवम्।
वैष्णवो वर्णबाह्योऽपि पुनाति भुवनत्रयम ।। (पद्मपुराण)

जिस प्रकार कुत्ते का मांस खानेवाले व्यतिक्यों का दर्शन अवैध अथवा निषिद्ध होता है, उसी प्रकार अवैष्णव ब्राह्मण का दर्शन करना भी कदापि उचित नहीं है I दूसरी और वैष्णव जिस किसी भी वर्णका होनेपर भी त्रिभुवन को पवित्र करता है ।

इनकी इस बात को सुनकर ब्राह्मण ने झुंझलाकर कहा, ये सब शास्त्रों के वाक्य अर्थवाद के नाम से पुकारे जाते हैं। लोगों की नाम जप और संकीर्तन में श्रद्धा हो, इसलिए ऐसे-ऐसे वाक्य कहीं-कहीं कह दिये गये हैं। यथार्थ बात तो ये है कि बिना दैवी संपत्ति का आश्रय ग्रहण किये नाम जप से कुछ भी नहीं होने का। यदि नाम जप से ही मनुष्य का उद्धार हो जाता तो फिर इतने शास्त्रों की रचना क्यों होती ?

हरिदास जी ने नम्रता के साथ कहा, पंडित जी ! श्रद्धा होना ही तो कठिन है। यदि सचमुच में केवल भगवन्नाम पर ही पूर्ण रूप से श्रद्धा जम जाये तो फिर शास्त्रों की आवश्यकता ही नहीं रहती। शास्त्रों में भी और क्या है, सर्वत्र भगवान् पर श्रद्धा करो ये ही वाक्य मिलते हैं। श्रद्धा विश्वास की पुष्टि करने के ही निमित्त शास्त्र हैं।

आवेश में आकर ब्राह्मण नें कहा, यदि केवल भगवन्नाम जप से ही सब कुछ हो जाय तो मैं अपने नाक कान दोनों कटवा लूँगा। हरिदास जी यह कहते हुए चले गए कि यदि आपको विश्वास नहीं है तो न सही। मैंने तो अपने विश्वास की बात आपसे कही है। सुनते हैं, उस ब्राह्मण की पीनस रोग से नाक सड़ गयी और वह गल-गल कर गिर पड़ी भगवन्नाम विरोधी की जो भी दशा हो वही थोडी है। सम्पूर्ण दुखों का एकमात्र मूलकारण भगवन्नाम से विमुख होना ही तो है।

इस प्रकार महात्मा हरिदास जी भगवन्नाम का माहात्म्य स्थापित करते हुए गंगाजी के किनारे निवास करने लगे। जब उन्होंने सुना कि नवद्वीप में उदय होकर गौरचन्द्र अपनी शीतल और सुखमयी कृपा किरणों से भक्तों के हृदयो को भक्ति रसामृत से सिंचन कर रहे है, तो ये भी उस निष्कलंक पूर्ण चंद्र की छाया में आकर नवद्वीप में रहने लगे। ये अद्वैताचार्य के कृपा पात्र तो पहले से ही थे, इसलिए इन्हें प्रभु के अंतरंग भक्त बनने में अधिक समय न लगा। थोडे ही दिनों में ये प्रभु के प्रधान कृपा पात्र भक्तों में गिने जाने लगे। इनकी भगवन्नाम निष्ठा का सभी भक्त बड़ा आदर करते थे। प्रभु इन्हें बहुत अधिक चाहते थे।

इन्होंने भी अपना सर्वस्व प्रभु के पाद पद्मों में समर्पित कर दिया था। इनकी प्रत्येक चेष्टा प्रभु की इच्छानुसार ही होती थी। ये भक्तों के साथ संकीर्तन में रात्रि भर नृत्य करते रहते थे और नृत्य में बेसुध होकर गिर पड़ते थे। इस प्रकार श्री वास पंडित का घर श्री कृष्ण संकीर्तन का प्रधान अड्डा बन गया। शाम होते ही सब भक्त एकत्रित हो जाते। भक्तों के एकत्रित हो जाने पर किवाड़ (दरवाजे) बन्द कर दिये जाते और फिर संकीर्तन आरंभ होता। फिर चाहे कोई भी क्यों न आये, किसी के लिए किवाड़ नहीं खुलते थे। इससे बहुत से आदमी निराश होकर लौट जाते और वे संकीर्तन के सम्बन्ध में भाँति-भाँति के अपवाद फैलाते। इस प्रकार एक ओर तो सज्जन भक्त संकीर्तन के आन्नद में परमानन्द का रसास्वादन करने लगे और दूसरी ओर निन्दक लोग संकीर्तन के प्रति बुरे भावों का प्रचार करते हुए अपनी आत्मा को कलुषित बनाने लगे।

श्रीमन् महाप्रभु एवं श्री हरिदास ठाकुर 

अपनी दिव्य लीला की प्रारम्भिक अवस्था में भगवान् श्रीचैतन्य महाप्रभु निमाई  पंडित के रूपमें श्रीनवद्वीप धाम में गुप्त रूप से अत्यन्त मनोहर लीलाएँ कर रहे थे। जब वे गया में अपने पिताके श्राद्ध के निमित्त गये तथा वहाँ उन्होंने श्री ईश्वरपुरी से दीक्षा मन्त्र ग्रहण किया, तो वे पंडित निमाई से भक्त निमाई बन गये। इससे पहले वे अत्यन्त चञ्चल लीलाएँ का रहे थे। उस समय सभी वैष्णव वृन्द उनको माया के प्रभाव से उनको महिमा को न जानकर उन्हे भजन करने का उपदेश प्रदान करते थे। कुछ वैष्णव लोग उनसे मिलने में कतराते भी थे।

वे सोचते थे कि इसे तो भजन करना नहीं है, यह हमारा समय भी व्यर्थ के तर्क वितर्क सेे नष्ट का देगा। परन्तु जब प्रभु गया से लौटे, तो उनका स्वरूप पूर्ण रूप से बदल चुका था। उनके मुखसे निरन्तर कृष्ण कृष्ण निकल रहा था। आंखो से गंगा यमुना की भांति अश्रुधारा प्रवाहित हो रही थी तथा कभी कभी वे अत्यन्त विरहकातर होकर हैं कृष्ण ! हे प्राणनाथ ! आप मुझे छोडकर कहाँ चले गये ,ऐसा कहकर जोर जोर से विलाप करते हुए मूर्छित होकर गिर पडते ।उनकी ऐसी दशा देखकर श्रीवास पंडित, श्री अद्वैताचार्य तथा श्री हरिदास ठाकुर आदि जितने भी वैष्णव वृन्द थे, वे सभी उनकी शरण में आ गये । अब प्रभुने युगधर्म हरिनाम संकीर्तन को
जगत में प्रकाशित करना आरम्भ का दिया। प्रारम्भ में श्रीवास पण्डित के घरमे द्वार बन्दकर केवल भक्तों के साथ ही प्रभु ‘हरिनामसंकीर्तन’ का आस्वादन करते थे।

एक दिन श्रीचैतन्य महाप्रभु ने श्रीनित्यानंद प्रभु के नवद्वीप आने की बात को भक्तोंके समक्ष व्यक्त करते हुए कहा -आज मैने एक विलक्षण स्वप्न देखा है। उस स्वप्न मे मैने किसी एक ऐसे महापुरुष को देखा है, जो मुझे कह रहा था -मै आपका भाई हुँ, मेरा और आपका परिचय कल होगा।
श्रीमन् महाप्रभु ने पुन: कहा- मैंनै तुमलोगो से पहले भी कहा है कि शीघ्र ही हमें किसी-न-किसी महाजन के दर्शन प्राप्त होंगे। अतएव हरिदास जाओ, श्रीवास पंडित तुम भी जाओ, जाकर पता लगाओ कि कौन महापुरुष कहाँ पर आया है?

श्रीमन महाप्रभु के आदेश से दोनों महाभागवत बहुत आनन्दपूर्वक उन महापुरूष को ढूँढते हुए सारे नवद्वीप में घूमने लगे। दूँढते हुए वे दोनो परस्पर से कहने लगे -ऐसा लगता है कि संकर्षण प्रभु आये है । वे दोनो आनन्द में मतवाले  होकर सर्वत्र ढूंढते रहे, किंतु उन्हे किसी नये व्यक्ति के आनेका लेशमात्र भी इंगित प्राप्त नहीं हूआ।

तीन प्रहर तक सारे नवद्वीप में  ढूंढ लेनेपर भी जब श्रीवास पंडित और श्री हरिदास जी को कोई नहीं मिला, तब वे लौटकर प्रभु के पास आ गये । दोनो ने आकर प्रभुके श्रीचरणो में निवेदन किया – हमें आपके द्वारा बताये हुए लक्षणोंवाले किसी भी महापुरुष के दर्शन प्राप्त नहीं हुए । हमने वैष्णवोंके घरोमे, सन्यासियों के आश्रमो में साधारण गृहस्थी के घरोमे, यहाँ तक कि वैष्णव विद्वेषी लोगो के घरोमें भी उन्है ढूंढा, किन्तु हमे कोई सफलता नहीं मिली ।

श्री वास पंडित तथा श्री हरिदास जी के वचनो को सुनकर श्रीगौरचन्द्र हंसने लगे। उन्होंने अपने इन दो नित्य परिकरोंके माध्यम से समस्त जगत वासियो को यह शिक्षा दो कि श्रीनित्यानन्द प्रभु का तत्त्व बहुत गूढ है । श्रीवास पंडित और श्री हरिदास जी की बात सुनकर श्रीमन महाप्रभु अपने सारे परिकरोंको साथ लेकर श्री नन्दनाचार्य के घरपर गये और वहीं उनकी श्रीनित्यानन्द प्रभु से भेट हुई ।

इस लीला का गूढ तात्पर्य यह है कि भगवान श्रीचैतन्य प्रभु जिसपर कृपा करते है उन्हें ही अखण्ड गुरुतत्व श्रीनित्यानंद प्रभु के दर्शन प्राप्त होते हैं। श्री चैतन्य महाप्रभु के प्रिय सेवक ही उनको कृपासे श्रीनित्यानंद प्रभु के स्वरूप को जान सकते है । मायाबद्ध जीवो के लिए श्रीनित्यानन्द प्रभु का चरणाश्रय सम्भवपर नहीं है। श्रीचैतन्य महाप्रभु की कृपाके स्वरूप चैत्य-गुरुकी अनुकम्पा से नित्यानन्द तत्व की उपब्धि होती है।

वास्तव मे श्री वास पंडित और श्री हरिदास ठाकुर श्रीनित्यानन्द प्रभु के तत्व को भलीभांति जानते है, तथापि उन्हे भी जो श्रीनित्यानन्द प्रभु के दर्शन प्राप्त नहीं हुए इसे केवल(श्रीमन् महाप्रभु द्वारा किया गया) कोई कौतुक विशेष ही समझना चाहिये ।

कोतवाल के रूप में श्री हरिदास ठाकुर 

एकबार श्रीमन् महाप्रभु ने अपने भक्तोंके समक्ष कहा -मैं आज दस प्रकार के दृश्यकाव्यो में से  एक अंक काव्य की विधि के अनुसार मैं स्त्री के स्वरूप में नृत्य करूंगा। जो जितेंद्रिय है केवल उन्हे ही मेरे इस नृत्य को देखने का अधिकार होगा । जो इंद्रियोंपर संयम रखने में समर्थ हैं, वे ही आज भवन के भीतर प्रवेश करें।

श्री महाप्रभुने सदाशिव और बुद्धिमन्त खान को बुलाकर कहा – वेश भूषा की तैयारियां करो। सबके लिए शंख चोली, पट्ट साडी और अलंकार आदि एकत्रित करो एवं सभी के लिए यथायोग्य वेश भूषा का प्रबन्ध करो।

श्रीमन् महाप्रभु ने सभी भक्तोंको अपने समक्ष बुलाकर कहा -गदाधर रुक्मिणी का वेश धारण करेंगे और ब्रह्मानन्द उनकी वृद्धा सखी सुप्रभात बनेंगे । नित्यानंद प्रभु एक बडी बूढी का रूप धारण करेगे, श्रीवास पंडित नारद बनेंगे तथा हरिदास ठाकुर कोतवाल का वेश धारणकर सभी को जगाते रहेंगे ।

इस प्रकार श्रीमन् महाप्रभु की आज्ञानुसार श्री हरिदास ठाकुर ने कोतवाल का वेश धारण करके सबसे पहले बडी बडी दो मूंछे लगाकर हँसते हँसते मंच पर प्रवेश किया । उस समय उनके सिरपर एक बडी पगडी शोभा या रही थी और उन्होने सुन्दर धोती पहनी हूई थी । हाथ मे दण्ड लिये हुए वे सबको सावधान करते हुए कह रहे थे –

अरे भाइयो ! सावधान हो जाओ । आज जगत के प्राणस्वरूप प्रभु लक्ष्मी के वेश में नृत्य करेंगे। हाथ मे छडी लिये हरिदास ठाकुर चारो ओर दौड रहे थे। उनका सारा शरीर पुलकित हो रहा था और वे ‘कृष्ण’ नाम से सभीको जगा रहे थे। श्री हरिदास जी सभी को दम्भपूर्वक आह्वान करते हुए कह रहे थे, कृष्ण का भजन करो, कृष्ण की सेवा करो और कृष्ण का नाम लो।

श्री हरिदास जी को देखकर सभी हंसने लगे और उनसे पूछने लगे तुम कौन हो, यहाँ क्यो आये हो? श्री हरिदास जी में कहा -मै वैकुण्ठ का कोतवाल हूँ। मैं सभी को जगाते हुए सब समय घूमता रहता हूँ। वैकुण्ठ को छोडकर प्रभु यहाँ आ गये है तथा वे सभोमे अपनी प्रेमभक्ति का वितरण करेंगे। आज वे लक्ष्मी के वेष में नृत्य करेगे, तुम सभी लोग आज सावधानी पूर्वक प्रेमभक्ति को लूट लो । इतना कहकर श्री हरिदास की दोनों हाथो से अपनी मूँछो पर ताव देते हुए मुरारि गुप्त के साथ दौडने लगे I उस समय दोनो की दिव्य देह प्रेम से पुलकित हो रही थी तथा दोनो के शरीर से श्रीगेरचन्द्र के विलास का उन्मेष था। इस प्रकार सात दिन तक होनेवाले श्रीमन् महाप्रभु की लीला श्री हरिदास जी ने कोतवाल की भूमिका निभाकर श्रीमन महाप्रभु तथा सभी भक्तों को आनन्द प्रदान किया।

एकदिन श्रीवास पंडित के घर महाप्रभु के नृत्य संकीर्तन के अंत मे एक ब्राह्मणी ने आकर श्रीमन महाप्रभु के चरण पकड लिये तथा उनके चरणों की।धूलि को चार बार मस्तकपर धारण करने लगी। श्रीमन महाप्रभु को यह देखकर बहूत दुख हुआ । उसी समय महाप्रभु वहाँ से भागकर गंगा जी में जा कूदे । श्रीनित्यानन्द प्रभु तथा श्री हरिदास जी ने जाकर उन्हें बाहर निकाला।

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श्री हरिदास जी भाग ३

2 thoughts on “श्री भक्तमाल – नामाचार्य श्री हरिदास ठाकुर जी भाग २ Shri Bhaktamal – Namacharya Sri Haridas ji Part 2

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