सुंदर कथा ५२ (श्री भक्तमाल – भगवत्प्रसाद निष्ठ राजा ) Sri Bhaktamal – Bhagwat prasad nishth Raja

श्री जगन्नाथपुरी के राजाकी भगवत्प्रसादमें बड़ी ही निष्ठा थी,परंतु एक दिन राजा चौपड़ खेल रहा था,इसी बीच श्रीजगन्नाथ जी के पण्डाजी प्रसाद लेकर आये।राजाके दाहिने हाथमे फासा था।अतः उसने बायें हाथसे प्रसाद को छूकर उसे स्वीकार किया।इस प्रकार प्रसाद का अपमान जानकार पाण्डाजी रुष्ट हो गये।प्रसादको राजमहलमें न पहुँचाकर उसे वापस ले गये।

चौपड़ खेलकर राजा उठे और अपने महलमे गये।वहाँ उन्हीने नयी बात सुनी कि मेरे अपराधके कारण अब मेरे पास प्रसाद कभी नहीं आयेगा।राजाने अपना अपराध स्वीकारकर अन्न-जल त्याग दिया।उसने मन में विचारा कि जिस दाहिने हाथने प्रसादका अपमान किया है,उसे मैं अभी काट डालूँगा,यह मेरी सच्ची प्रतिज्ञा है।

ब्राह्मणों की सम्मति लेना उचित समझकर राजाने उन्हें बुलाकर पूछा कि यदि कोई भगवान् के प्रसाद का अपमान करे तो चाहे वह कोई अपना प्रिय अंग ही क्यों न हो,उसका त्याग करना उचित है या नहीं।ब्राह्मणों ने उत्तर दिया कि राजन्! अपराधीका तो सर्वथा त्याग ही उचित है।

राजाने अपने मन में हाथ कटाना निश्चित कर लिया,परंतु मेरे हाथ को अब कौन काटे?यह सोचकर मौन और खिन्न हो गया।राजाको उदास देखकर मंत्रीने उदासी का कारण पूछा।राजाने कहा-नित्य रातके समय एक प्रेत आता हैं और वह मुझे दिखाई भी देता है।कमरेकि खिड़कीमे हाथ डालकर वह बड़ा शोर करता है।उसीके भयसे मैं दुखी हूँ।मंत्रीने कहा –

आज मैं आपके पलंग के पास सोऊँगा और आप अपनेको दूसरी जगह छिपाकर रखिये,जब वह प्रेत झरोखेमें हाथ डालकर शोर मचायेगा,तभी मैं उसका हाथ काट दूंगा।सुनकर राजाने कहा-बहुत अच्छा! ऐसा ही करो।रात होने पर मंत्रीजीके पहरा देते समय राजाने अपने पलंगसे उठकर झरोखेमें हाथ डालकर शोर मचाया।मंत्रीने उसे प्रेतका हाथ जानकर तलवारसे काट डाला।

राजाका हाथ कटा देखकर मंत्रीजी अति लज्जित हुए और पछताते हुए कहने लगे कि मैं बड़ा मुर्ख हूँ, मैंने यह क्या कर डाला?राजाने कहा-तुम निर्दोष हो,मैं ही प्रेत था;क्योंकि मैंने प्रभुसे बिगाड़ किया था।राजाकी ऐसी प्रसादनिष्ठा देखकर अपने पण्डो से श्रीजगन्नाथ जी ने कहा कि अभी-अभी मेरा प्रसाद ले जाकर राजाको दो और उसके कटे हुए हाथको मेरे बाग़ में लगा दो।भगवान् के आज्ञानुसार पण्डे लोग प्रसादको लेकर दौड़े, उन्हें आते देख राजा आगे आकर मिले।

दोनों हाथोको फैलाकर प्रसाद लेते समय राजाका कटा हुआ हाथ पूरा निकल आया।जैसा था,वैसा ही हो गया।राजाने प्रसादको मस्तक और हृदयसे लगाया।भगवत् कृपा अनुभव करके बड़ा भारी सुख हुआ।पण्डे लोग राजाका कटा हुआ वह हाथ ले आये।उसे बागमें लगा दिया गया।उससे दौनाके वृक्ष हो गये।उसके पत्र-पुष्प नित्य ही श्रीजगन्नाथ जी के श्रीअंग पर    चढ़ते है।उनकी सुगंध भगवान् को बहुत प्रिय लगती है।

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