सुंदर कथा ५३ (श्री भक्तमाल – श्री रासिकमुरारी जी ) Sri Bhaktamal – Sri Rasik murari ji

http://www.bhaktamal.com ® पूज्यपाद श्री गणेशदास भक्तमाली जी की टीका गीत प्रेस अंक ,श्री मन् मध्वगौड़ेश्वर जगद्गुरु श्यामानंद द्वार पीठ का साहित्य , श्री रासिकानंद प्रभु के वंशज गोपिवल्लभपुर के आशीर्वचन और कृपाप्रसाद  से प्रस्तुत चरित्र । कृपया अपने नाम से प्रकाशित ना करे ।

जन्म और बाल्यकाल :

श्री रासिकमुरारि जी का जन्म उडीसा मल्लभूमि में रोहिणीनगर में शक सं १५१२ में कार्तिकशुक्ल प्रतिपदा को प्रातःकाल की मंगल वेला में हुआ था । इनके पिता श्री अच्युत पट्टनायक जमींदार  होते हुए भी बड़े भगवद्भक्त थे तथा माता भवानीदेवी पतिव्रता सद्गृहिणी थीं । इनका जी का नामकरण करते समय पण्डितो ने ज्योतिष गणना के आधारपर इनका नाम रसिक रखा और महापुरूष के लक्षण बताते हुए कहा की यह बालक महान संत होगा । इनके पिताजी बालक का नाम मुरारी रखना चाहते थे और पंडितो ने नाम रखवाया रसिक अत: दोनों नाम मिलाकर इनका नाम  रासिकमुरारी रखा गया ।

अन्नप्राशन के अवसरपर प्रवृत्ति-परीक्षण हेतु हमारे संस्कृति में कुछ चीज़े रखी जाती है और बालक को उन चीजो में से एक को चुनने के लिए छोड़ दिया जाता है ।श्री रासिकमुरारी जी ने अपना हाथ ग्रन्थरत्न श्रीमद्भागवत पर रख दिया । उसी समय उपस्थित जनों और कुटुम्बियों को यह दृढ निश्चय हो गया कि यह बालक परमभागवत और महान् भगवद्भक्त होगा । बाल्यकाल से ही इनका सन्तो के प्रति सहज आकर्षण था ।

संत विचरण करते हुए गाँव में आते थे और जय जगदीश की ध्वनि करते थे , यह ध्वनि सुनते ही श्री रासिकमुरारि जी अपने नन्हें नन्हें हाथोमे जो कुछ मिलता भरकर लाते और संतो को भिक्षा देते । एक बार श्री रासिकमुरारि जी के यहां श्रीमद् भागवत का सप्ताह पाठ चल रहा था, जब उसमें गोपीगीत का प्रसंग अया तो श्री रासिकमुरारी जी मूर्छित हो गये । श्रीमद्भागवत ग्रन्थपर इनका विशेष अनुराग था ।

श्री गुरुदेव भगवान् की कृपा:

गौड़ीय संप्रदाय में प्रकट हुए महान संत श्री श्यामानंद प्रभु ,श्री रासिकमुरारि जी के गुरुदेव थे ।श्री रसिक मुरारी जी सद्गुरुदेव की प्राप्ति के लिए व्याकुल रहा करते थे जो उन्हें आध्यात्मिक मार्ग में निर्देश दे सके । एक दिन वे घंटाशीला में एक निर्जन स्थान में बैठकर ध्यान में मग्न थे उसी समय उन्हें आकाशवाणी सुनाई दी – हे मुरारी, तुम चिंता मत करो, तुम्हे श्री श्यामानंद जी के चरणों की प्राप्ति होगी , वे ही तुम्हारे श्री गुरुदेव है । तुम शीघ्र ही उनके दर्शन पाओगे । उनके श्री चरणों में आश्रित होकर तुम कृतार्थ हो जाओगे ।

आकाशवाणी सुनने के बाद श्री रसिक मुरारी जी परम उत्साह और आनंद के साथ ‘श्री श्यामानंद’ प्रभु के नाम का जप करते रहते । श्री श्यामानंद प्रभु के दर्शनों के लिए व्याकुल श्री मुरारी दिन रात क्रंदन करते तड़पते रहते थे। कुछ दिनों बाद उनकी हृदय की तड़प देखकर रात्रि के अंतिम प्रहर में श्री श्यामानंद प्रभु ने स्वप्न में उन्हें दर्शन देते हुए कहा – अब और लम्बे समय तक चिंता मत करो, प्रात:काल ही तुम्हे मेरे दर्शन होंगे |

प्रात:काल के समय श्री रसिकमुरारी प्रभु कातरता से देख रहे थे, उसी समय उन्हें श्री श्यामानंद प्रभु मुस्कराते हुए श्री किशोर दास आदि भक्तों से घिरे हुए श्री नित्यानंद और श्री चैतन्य प्रभु के नामों का उच्चारण करते हुए उनकी और आते दिखे  ।  बहुत दिनों से जिन गुरूजी के लिए श्री रसिकमुरारी तड़प रहे थे, आज उन गुरूदेव के साक्षात् दर्शन प्राप्त कर वे उनके चरणों में गिर पड़े ।

श्री श्यामानंद प्रभु जी ने उन्हें उठाया और आलिंगन कर उन्हें श्री महामंत्र दीक्षा प्रदान की । श्री श्यामानंद जी से ही रासिकमुरारी जी कोे व्रजतत्व और सम्प्रदाय रहस्य का ज्ञान हुआ । श्रीगुरुदेव जी के साथ आपने व्रजके तीर्थो की यात्राकर उनके तात्विक दर्शन किये । तत्पश्चात उन्ही के साथ आप उत्कल देश चले गये, वहाँ अनेक विमुखो को भक्त बनाया और अन्तिम समयतक भगवान् श्री जगन्नाथ जी की सेवा में रत रहे ।

विलक्षण संत सेवा :

श्री रसिकमुुरारी जी बड़े बृहद् रूप से सन्त सेवा करते थे ।इनकी सेवा की पद्धति कुछ विलक्षण ही थी, वह यह की सन्तो के चरणोदक से भरे हुए मटके घरपर धरे रहते थे ।श्री रासिकमुरारि जी उसीको प्रणाम करते, उसीकी पूजा  करते और उसी का हृदय में ध्यान धरते थे । इनके यहां जो भी सन्त वैष्णव आते, उन्हें अपार सुख देते थे ।यह बड़े समारोह से श्री गुरुउत्सव मनाया करते थे । उसमें पूँरे दिन कीर्तन सत्संग, भोज भण्डारे होते रहते थे, जिससे सब लोग बहुत सुख पाते थे । यह उत्सव बारह दिन तक लगातार चलता रहता था । बारहों दिनतक भक्तो की भीड़ लगी रहती थी, जो देखने में अत्यन्त ही प्रिय लगती थी ।

एकदिन श्रीरसिकमुरारी जी के यहाँ भण्डारे में बहुत से सन्त प्रसाद पा रहे थे । इन्होंने एक शिष्य का संतो के प्रति हृदय का भाव जानने के लिये उसे आज्ञा देकर कहा कि जाकर संतो के चरणामृत अच्छी प्रकार से ले आओ । उसने शिष्य ने कुछ देर बाद आकर कहा कि सब संतो का चरणामृत वह ले आया है । श्रीरसिकमुसरी जी ने चरणामृत पान किया और कहा – क्या कारण है कि चरणामृत में पहले जैसा स्वाद नहीं आ रहा है?

श्री रासिकमुरारि जी ने निश्चय करके जान लिया कि यह शिष्य किसी सन्त का चरणामृत लेने से छोड आया है, अत्त: जोर देकर पूछा कि -सही कहो तुमने किसी संत को छोडा तो नहीं है ?  तब शिष्य ने कहा कि एक कोढ़ी सन्त थे, मैने उनका चरणामृत नहीं लिया । श्री रासिकमुरारि जी स्वयं उन संत को ढूंढने निकले और कुछ ही दूर वृक्ष की छाया में एक कोढ़ी संत को बैठे देखा । कोढ़ी होने पर भी उनके मुख पर अद्भुत तेज था  । श्री रासिकमुरारी जी ने संत के चरणों में दण्डवत् प्रणाम् किया और क्षमा याचना करने लगे । बार बार दण्डवत् करते ,क्षमा याचना करते और कहते – हे संत भगवान् ! आप कृपा करे ,मै आपकी शरण में हूँ ।

जिन कोढ़ी संत के समीप जाने से भी लोग कतराते उनके प्रति ऐसा भाव देखकर वे संत बहुत प्रसन्न हुए और संत ने श्री रासिकमुरारी जी के मस्तक पर हाथ रखते हुए कहा – बेटा ! संतो के चरणों में तुम्हारी अद्भुत भक्ति है , तुम पर भगवान् की महान कृपा है । संत ने प्रसन्न होकर श्री रासिकमुरारी जी को  बहुत शुभ आशीर्वाद दिए । इसके बाद श्री रासिकमुरारी जी ने संत का चरणामृत उतारकर उसे स्वयं पान किया और दूसरो को भी पान करवाया । श्री रासिकमुरारी जी को वह चरणामृत पाने से अपार सुख मिला । श्री रासिकमुरारि जी के नेत्रो से प्रेमाश्रु बह चले ।

संतो के प्रति अपार श्रद्धा और प्रेम:

एक बार भक्तराज श्री रासिकमुरारि जी राजाओंके समाज में विराजमान होकर ज्ञाणोपदेश कर रहे थे । सभी लोग बड़े ही मनोयोगपूर्व इनका उपदेश श्रवण कर रहे थे, वही पासमें ही एक स्थलपर सब सन्त बैठे भोजन कर रहे थे। उन्हीं सन्तों मे एक सन्त अपने अतिरिक्त अपने सोंटेका भी दूसरा पारस मांग रहे थे । (*सोंटे का अर्थ है मोटी छड़ि अथवा लठ , पारस अर्थात खाना डिब्बे में बाँध कर अथवा कमंडल में ले जाना । )संत कहते है हम यहाँ पंगत में बैठ कर प्रसाद नहीं खाएंगे हम तो अपनी कुटीया में ले जाकर अपने ठाकुर जी को भोग लगाकर पाएंगे । ऊपर से हमें शाम में अपनी मोटी लठ (सोंटे )से भांग घोटने की आदत है , भांग खाने के बाद भूख अधिक लगती है अतः हमें एक अधिक पारस बाँध कर दे दो, हमारा शाम का भोजन भी अच्छा हो जायेगा । परंतु रसोइया उन्हें सोंटे का पारस नहीं दे रहा था । पारस न देनेपर वह संत शोरगुल मचा रहे थे ।

अन्ततोगत्वा उन संत ने अपनी परोसी हुई पत्तल उठायी और गोस्वामी श्री रसिकमुरारि जी के ऊपर डाल दी और साथ ही साथ बहुतेरी गालियां भी दीं । प्रवचन करते समय मुँह खुला होने के कारण एक लड्डू श्री रासिकमुरारि जी के मुखमें चला गया । श्री रासिकमुरारि जी शान्तिपूर्वक गालियां सुनते रहे । फिर उन्होने अवसर देखकर कहा – अहो ! मैं सन्तो की सीथ-प्रसादी से विमुख था तो संत ने कृपा करके स्वयं लाकर मेरे मुख मे ही डाल दिया । तत्पश्चात् आपने उस सेवक रसोईया को कहा कि तुम्हारा सन्त सेवा में भाव नहीं है, सेवा से अलग कर दिया और सोंटे का पारस दिलाया ।

संत और हुक्का :

एक दिनकी बात है श्री रसिकमुरारि जी के बाग में सन्तो की जमात टिकी हुई थी । श्री रासिकमुरारि जी सन्तो का दर्शन करने चले । उस समय एक सन्त हुक्का पी रहे थे । उन्होने रासिकमुरारि जी को आते हुए देखा तो हुक्के को  कहीं छिपा दिया । अपने आनेसे सन्तो को संकोच हुआ यह जानकर इसके प्रायश्चित्त के लिये रासिकमुरारि जी ने उन साधुका सम्मान करना चाहा । फिर तो उसी क्षण चक्कर खाकर पेट पकडकर बैठ गये और बोले – मेरे पेटमें बड़े जोर का दर्द हो रहा है, देखो तो किसी संत के पास हुक्का रखा है क्या ?

श्री रासिकमुरारि जी के एक सेवक ने सन्तो की जमात में घूमकर सबको पूछा कि किसी के पास हुक्का तम्बाकू है ? यह सुनकर हुक्का पीनेवाले सन्त को बडा उल्लास  हुआ और उन्होने तत्काल ही हुक्का लाकर सामने कर दिया । रासिकमुरारि जी ने झूठ- मूठ की लम्बी श्वास खींचकर हुक्का पीने का स्वांग किया और तुरंत स्वस्थ हो गये । इस प्रकार इन्होंने झूठे स्वांग से सन्त की शंका और दुख को दूर कर दिया और संत का अपमान भी नहीं किया । बाद में उन  संत को समझाया की तम्बाखू शास्त्रो में वर्जित है इसको कृपा कर के त्याग दे तो कृपा होगी । इस तरह संत ने तम्बाखू हुक्का त्याग दिया ।

श्री रसिक जी की गुरु भक्ति और गुरुआज्ञा का अक्षरशः पालन :

श्री रसिकमुरारि जी के गुरूदेव श्री श्यामानंद प्रभु ‘धारेन्दा’ नामक स्थान मे रहते थे । उनके स्थान से सम्बन्धित कुछ जमीन बानपुर नामक ग्राम मे थी । वहां खेती होती थी । जो अन्न उत्पन्न होता, वह साधुुसेवा निमित्त धारेन्दा स्थानपर आता । श्यामानंद जी के सत्संग से प्रभावित होकर यह जमीन श्यामानंद जी को एक बुढ़े जमींदार ने दान में दी थी ।

श्यामानंद जी विरक्त महात्मा थे, वे किसीसे कुछ नही लेते थे इसलिये उस जमींदार भक्त ने श्यामानंद प्रभु के चरणों में हाथ जोड़कर प्रार्थना की- भगवन! आप जैसे सच्चे सन्तों का सत्संग बड़े भाग्य से ही प्राप्त होता है। मेरे अति सौभाग्य हैं जो आपके पवित्र सत्संग का अमृत अन्तिम अवस्था में प्राप्त हो गया। अब मैं यह चाहता हूँ कि आप यहां सदैव के लिये निवास स्थान बनाकर अपने पारमार्थिक सत्संग से जीवों का कल्याण करें। मैं यह जानता हूँ कि आप जैसे सच्चे सन्तों को किसी बात की परवाह नहीं होती, न ही किसी वस्तु की इच्छा अथवा चाह होती है।

मेरे पास काफी भूमि है, इस पर आप एक स्थान स्थापित कर दें तो यह भूमि भी आपके पवित्र चरणों से सफल हो जायेगी और मैं भी शेष समय आपके चरणों की सेवा में व्यतीत करके सच्चा लाभ प्राप्त कर लूंगा, जिससे मेरा जीवन गुरु-कृपा से धन्य हो जायेगा। स्वामी श्यामानन्द जी ने ज़मींदार भक्त की यह प्रार्थना स्वीकार कर ली। रसिक मुरारी जी के गांव से यह स्थान आठ-नौ मील की दूरी पर था। रसिक मुरारी जी भी प्रायः वहां जाया करते और कुछ दिनों तक गुरु-चरणों में रहकर पारमार्थिक लाभ प्राप्त करते।

एक बार बानपुर में नया नवाब आया  जो स्वभाव से बड़ा ही दुष्ट था ,शिकार खेलता हुआ उसी वन की ओर आ निकला जहां श्यामानंद जी का आश्रम था ।वहां से उसे आश्रम दिखाई पड़ गया और पास में ही खेती वाली उपजाऊ जमीन भी दिखाई पड़ी । नवाब ने अपने मन में सोचा कि साधुओं के पास ऐसे सुन्दर स्थान की क्या आवश्यकता है? वे तो वन में रहकर भजन कर सकते हैं, यह स्थान तो हमारे अधिकार में होना चाहिये।

यह सोचकर नवाब ने अपने मंत्री से परामर्श करके आदेश जारी कर दिया कि इस स्थान को शासन के अधिकार में ले लिया जाये। साधुओं को स्थान खाली कर देने के लिये तीन दिन का समय दिया गया। राजा यह आदेश जारी करके अपनी राजधानी को लौट गया।

श्री श्यामानंद जी तो विरक्त महात्मा थे, जमीन और आश्रम का लोभ था नहीं परंतु संतो को कष्ट होता देख कर उनको दुःख होने लगा ।श्री श्यामानंद जी ने विचार किया की सन्तसेवा की इस जमीन को कैसे छुडाया जाय ? फिर विचारकर उन्होने श्री रसिकमुरारि जी को पत्र लिख दिया कि तुम जिस स्थिति मे हो, उसी स्थिति में यहाँ चले आओ । श्रीरसिकमुरारिजी उस समय भोजन कर रहे थे । पत्र पाते ही बिना आचमन किये ही हाथ जोड़े हुए चले आये ।

श्री रसिकमुरारि जी ने हाथ और मुंह जूठा होने से पीछे से ही गुरुदेव भगवान् को साष्टाग दण्डवत प्रणाम् किया । श्री श्यामानंद प्रभु ने जब देखा की रसिक पीछे से प्रणाम् कर रहा है । गुरुदेव द्वारा पिछे से प्रणाम् करने का कारण पूछने पर श्री रासिकमुरारि जी ने निवेदन किया कि मैं भोजन कर रहा था और उसी समय आपका पत्र मिला, अत: बिना आचमन किये ज्यों-का-त्यों चला आया । इनकी यह गुरुभक्ति देखकर श्री श्यामानंद प्रभु का हृदय प्रेम से भीग गया ।

हाथी को मन्त्र दीक्षा देकर वैष्णव बनाना :

श्रीगुरुदेव श्री श्यामानंद जी की आज्ञा पाकर श्री रसिकमुरारि जी ने आचमन किया । तत्पश्चात् श्री श्यामानन्द जी ने इन्हें उसी स्थानपर भेजा, जहाँ दुष्टो में शिरोमणि नवाब रहता था । श्री रासिकमुरारि जी वहाँ गये तो वहांपर इनको अपनेे कुछ शिष्यगण मिले, जो नवाब के यहाँ मुन्शी, मुनीम आदि पदों पर नौकरी करते थे ।

उन सबने गुरुदेव का नवाब के पास आने का कारण जानकार कहा की नवाब बड़ा नीच है अत्त: आप तो यहाँ से प्रात:काल ही चले जाये । हम सब उसको समझा बुझाकर काम करा लेंगे। श्री रासिकमुरारि जी बोले -चिन्ता मत करो । हृदय मे निश्चिन्तता को धारण करो ।  तीन दिनतक नवाब के कर्मचारी लोग अपने गुरुदेव श्री रसिकमुरारि जी की ही सेवा में रहे  । तीसरे दिन नवाब का  ध्यान इस ओर गया तो उसने उन लीगो को दरबार में  बुलाया और पूछा कि तीन दिनतक कहाँ रहे ?

जब नवाब ने कर्मचारियों के मुखसे यह सुना कि उनके गुरुवर्य आये हैं तो नवाब ने कहा कि उन्हें मेरे पास लिवा लाओ, मैं उनकी करामात देखूंगा ।  नवाब ने जब यह बात कही तो कर्मचारियो ने आकर श्री रसिकमुरारि जी से प्रार्थना की कि अब भी आप यहसि चले जाइये । श्री रासिकमुरारि ने कहा – चलो, जरा उसको देखें तो क्या कहता – करता है । उसकी कितनी सामर्थ्य है ? यह कहकर श्री रासिकमुरारि जी नवाब के द्वारा भेजी हुई पालकीपर बैठकर चले ।

मार्ग मे आये तो देखा कि चारों ओर एक मत्तवाले हाथी की धूम छायी हुईं है । असल में नवाब को किसी ने यह बात पहले ही बता दी थी की श्री श्यामानंद जी के शिष्य रासिकमुरारी जी आश्रम की जमीन छुड़ाने आये है अतः उसने रास्ते में एक मत्तवाला हाथी छुड़वा रखा था ताकि हाथी उन्हें कुचलकर मार डाले।

सभी शिष्यो ने मार्ग छोड़ने की प्रार्थना की परंतु श्री रसिक जी ने कहा -कई जन्मों में कई बार यह शरीर मर चुका, फिर भी जन्म-मरण का अंत नहीं आया। इस बार यह नाशवान शरीर यदि गुरुदेव के काम आ रहा है तो मेरा अहोभाग्य है ! जैसे ही श्री रसिक जी हाथी के और निकट जाने लगे सभी शिष्य घबराये और रसिकजी से मार्ग छोड़ देने का पुनः आग्रह करने लगे। रसिकजी ने कहा -आप लोगों ने निष्ठापूर्वक उपदेश नहीं लिया है। अगर तुम्हें शरीर का मोह है तो गले में व्यर्थ ही यह माला क्यों पहन रखी है ?

संत कहते है की रसिक जी की बात सुनकर कुछ शिष्य जिन्हें जान प्यारी थी माला उतारकर आसपास छुप गये और निष्ठावान शिष्य रसिकजी के साथ ही डटे रहे। इधर से विशालकाय मतवाला हाथी बढ़ता चला आ रहा था तो इधर रसिकमुरारी जी गुरुदेव का नाम -‘ श्री श्यामानंद प्रभु ‘ का उच्चारण करते करते निर्भयता से बढ़े चले जा रहे थे।

हाथी के डर से कहार इनकी पालकी छोडकर भाग गए थे और कुछ शिष्य भी ,परंतु रासिकमुरारी जी थोड़े भी विचलित नहीं हुए । बल्कि शास्त्रो में जैसी वाणी बोलने को कहा गया है, हाथी से वैसी ही परामरसमयी वाणी बोले – हे गज ! हरे कृष्ण हरे कृष्ण कहो, अपने तामसी शरीर के तमोगुणी स्वभाव को छोडो। श्री रासिकमुरारी जी के वचन सुनते ही हाथी के हृदय मे प्रेम भाव भर गया । उसने श्री रसिक जी के चरणों में अपने शरीर को झुकाकर प्रणाम किया ।

श्री रसिक मुरारी जी का दर्शन करके और अमृतमय वचनो को श्रवण करके  हाथी के नेत्रो से प्रेमाश्रु बहने लगे । श्री रसिक जी ने कृपा करके उसे धैर्य बंधाया और भक्ति भाव प्रदान किया । उसके कान मे श्रीकृष्णनाम सुनाया, गले मे तुलसी की कंठी बनाकार पहिनायी और उसका नाम गोपालदास रखा । इस प्रकार ऐसे मतवाले हाथी को शिष्य बनाने से श्री रसिक जी का महान् प्रभाव प्रकटित हुआ, जिसे देखकर दुष्टशिरोमणि नवाब दौडकर उसी रथानपर आया और इनके श्रीचरणो मे लिपट गया । जो जभीन जब्त की थी, वह तो लौटा ही दी और भी कितने नवीन गाँव भेट में दिया एवं वह हाथी भी रसिक जी को भेट कर दिया । पुन: हाथ जोडकर बोला कि आज मेरे किसी बड़े भाग्य का उदय हुआ, जो आपका दर्शन हुआ ।

हाथी गोपालदास जी की संतो के प्रति श्रद्धा और भक्ति:

श्री रसिकमुरारी जी की कृपा से वह गजराज गोपालदास भक्तराज हो गया । उसको श्री रासिक जी ने संतो की सेवा में लगा दिया था । वह खूब संत सेवा करता था । सन्त समाज को जहां देखता वही झुक कर प्रणाम करता था । वह हाथी बनजारों के यहां से बोरे के बोरे चावल  दाल आदि अनाज और खाद्य वस्तुएं लाकर सन्तो की जमात मे पटक देता था । एक बार सभी बनजारे मिलकर गजराज गोपालदास जी के गुरुदेव श्री रसिकमुरारी जी के स्थानपर शिकायत करने पहुंचे और कहने लगे- आपके शिष्य गोपालदास हाथी हमलोगो का सब माल जबरदस्ती बिना रूपए दिए उठा लाते हैं ,हमारा बहुत नुक्सान होता है।

श्री रसिकमुरारी जी ने समझाया कि जोर जबरदस्ती बल का उपयोग करके बनजारो का सामान मत उठा लाया करो । यह काम निंद्य है । तबसे गोपालदास जी आश्रम से कुछ रूपया ले जाते और बाजार से सामान ले आते । श्री गजगोपालदास जी का नियम था कि जब कभी स्थान में कोई विशेष महोत्सव, भोज भण्डारा होता तो जब सन्तो की पंक्ति भोजन करके उठ जाती,तब वे आते और सन्तो की सीथ-प्रसादी पाते । अन्य समय भी गोपालदास जी संतो की सीथ प्रासदि पाते अथवा गुरुदेव के भोजनप्रसाद पाने के बाद उनके पत्तल में की सीथ प्रसादी पाते । संत वैष्णव वेश (तिलक, तुलसी कंठी )मात्र में भी गोपालदास जी बड़ी निष्ठा रखते थे ।

सन्तो से उऩका ऐसा प्रेम बढा कि उनके साथ संतो का समूह था । इससे गोपालदास जी की बडी ख्याति फैली।  इनका चमत्कार सुनकर बंगाल के नवाब शाहशुजा को चाह हुई कि ऐसे अद्भुत हाथी को हम अपने पास रखें । अत्त: पकडवाने के लिये उसने बहुत से आदमी नियुक्त किये, परंतु यह किसी के भी हाथ नहीं आये, तब नवाब के सूबेदार ने यह घोषणा की कि जो भी गोपालदास हाथी को पकड कर लायेगा, उसे बहूत रूपया दिया जायगा । वही पास में एक व्यक्ति जो था तो नकली साधु , परंतु समाज को ठगने के लिए साधु का वेश धारण किये रहता था । वह नकली साधु जानता था की गोपालदास जी वैष्णव वेष में बहुत श्रद्धा रखते है । लालच में भरकर वह साधुवेषधारी गोपालदास जी को पकड़ने के लिए गया। गोपालदास जी जान गए की यह नकली साधु है, केवल साधु का वेष धारण करके आया है परंतु वैष्णव वेष में निष्ठा के कारण उसके साथ चुपचाप चलने लगे ।

श्री गजगोपाल दास जी का नियम था कि बिना सन्तो की सीथ-प्रसादी लिये जल भी नहीं पीते थे । सूबेदार के यहां संतो की सीथ प्रसादी न मिलने से तीन चार दिनतक इन्होने कुछ भी खाया पिया नहीं । सुबेदार ने सोचा की इसने तो यहाँ का पानी भी नहीं पिया, हो सकता है यह गंगाजल अवश्य ग्रहण करे ।  तब सूबेदार के कहनेसे नौकर चाकर इन्हें जल पिलाने के लिये श्री गंगाजी की धारामें ले गये । श्री गंगा जी का दर्शन करके इन्होने सोचा की इस भगवाद्विमुख सुबेदार के यहाँ रहने से और बिना संत सेवा के शरीर धारण करने का क्या लाभ? गंगा जी की धारामें प्रवेश करके गुरुदेव भगवान् का स्मरण करके इन्होंने अपना शरीर छोड़ दिया ।

वैकुण्ठ गमन लीला :

अपने जीवन काल में श्री रसिक जी ने बहुतो का उद्धार किया । बहुत से यवनों को भी श्री रसिक जी ने वैष्णव बनाया और उन्हें संत सेवा में लगा दिया ।श्री रसिक जी एक श्रेष्ठ शिष्य एवं समर्थ आचार्य के रूप में प्रसिद्ध हो गए। श्री श्यामानंद प्रभु जी ने अपने आराध्य देव गोपीवल्लभपुर के श्रीगोविंद जी की सेवा श्रीलरसिकानंद देव गोस्वामी जी को प्रदान की थी । श्री रसिक जी ने श्री श्यामानंद-अष्टक, भक्त-भागवत अष्टक और कुंज्केली-द्वादशक आदि ग्रंथों की रचना की ।

अपना कार्य पूर्ण होने पर श्री रसिक जी को जगत से जाने की इच्छा हुई । ऐसा कहा जाता है की १६५२ शकाब्द में तिरोभाव से पूर्व श्री रसिक जी अपने सात सेवक लेकर जलेश्वर के निकट वांशदह ग्राम में गये थे जिस गाँव से श्री चैतन्य महाप्रभु ,श्री नित्यानंद प्रभु के साथ पुरी जाते समय  निकले थे ।

संकीर्तन करते हुए श्री रसिक जी अपने सेवकों के साथ रेमुणा पहुंचे जहां प्रसिद्ध खीरचोरा गोपीनाथ जी का मंदिर है । देखते ही देखते श्री रसिक जी गोपीनाथ जी के विग्रह में प्रविष्ट हो गये, उनके शिष्यों ने भी गुरुदेव के विरह में वही पर अपने शरीर त्याग दिए थे । आज भी रेमुणा में खीरचोरा गोपीनाथ के आँगन के एक ओर श्री रसिक मुरारी जी की पुष्प समाधि है और साथ ही उनके सात सेवक भक्तों की समाधि भी है । श्री रसिक जी के तिरोभाव के उपलक्ष में रेमुणा में प्रत्येक वर्ष बारह दिन का विशेष महोत्सव मनाया जाता है जो माघ महीने में शिव चतुर्दशी से प्रारंभ होता है ।

श्री रासिकमुरारी जी को और भी बहुत नामो से जाना जाता है जैसे की रासिकानंद प्रभु ,रासिकदेव गोस्वामी । श्री रासिकानंद प्रभु को संतो द्वारा भगवान् श्रीकृष्ण के पौत्र श्री अनिरुद्ध जी का अवतार माना गया है ।

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