सुंदर कथा ५८ (श्री भक्तमाल – श्री निषाद वसु और उसका पुत्र) Sri Bhaktamal – Sri Nishad Vasu aur uska putra

दक्षिण भारत में वेंकटगिरि ( तिरुपति बालाजी ) सुप्रसिद्ध तीर्थ है । महर्षि अगस्त्य की प्रार्थना से भगवान् विष्णु ने वेङ्कटाचल को अपनी नित्य निवास – भूमि बनाकर पवित्र किया है । पर्वतके मनोरम शिखरपर स्वामिपुष्करिणी तीर्थ है, जहाँ रहकर पार्वतीनन्दन स्कन्द स्वामी प्रतिदिन श्रीहरि की उपासना करते हैं । उन्हींके नामपर उस तीर्थ को स्वामि पुष्करिणी कहते हैं । उसके पास ही भगवानका विशाल मन्दिर है, जहाँ वे श्रीदेवी और भूदेवीके साथ विराजमान हैं । सत्ययुग में अंजनागिरि, त्रेता में नारायण गिरि, द्वापर में सिंहाचल और कलियुग में वेङ्कटाचल को ही भगवान का नित्य निवास – स्थान बताया गया है । कितने ही प्रेमी भक्त यहाँ भगवानके दिव्य विमान एवं दिव्य चतुर्भुज स्वरुपका सुदुर्लभ दर्शन पाकर कृतार्थ हो चुके हैं । श्रद्धालु पुरुष सम्पूर्ण पर्वतको ही भगवत्स्वरुप मानते हैं ।

पूर्वकालमें वेंकटाचलपर एक निषाद रहता था । उसका नाम था वसु । वह भगवानका बड़ा भक्त था । प्रतिदिन स्वामि पुष्करिणी में स्नान करके श्री निवास की पूजा करता और श्यामाक ( सावाँ ) के भात में मधु मिलाकर वही श्री भूदेवियोंसहित उन्हें भोगके लिये निवेदन करता था । भगवान के उस प्रसाद को ही वह पत्नी के साथ स्वयं पाता था । यही उसका नित्यका नियम था । भगवान् श्रीनिवास उसे प्रत्यक्ष दर्शन देते और उससे वार्तालाप करते थे । उसके और भगवानके बीचमें योगमायाका पर्दा नहीं रह गया था । उस पर्वतके एक भागमें सावाँका जंगल था । वसु उसकी सदा रखवाली किया करता था, इसलिये कि उसीका चावल उसके प्राणाधार प्रभुके भोगमें काम आता था । वसुकी पत्नीका नाम था चित्रवती । वह बड़ी पतिव्रता थी ।

दोनों भगवानकी आराधना मे संलग्न रहकर उनके सान्निध्य का दिव्य सुख लूट रहे थे । कुछ कालके बाद चित्रवती के गर्भसे एक सुन्दर बालक उत्पन्न हुआ । वसु ने उसका नाम ‘वीर’ रखा। वीर यथानाम – तथागुणः था । उसके मनपर शैशवकाल से ही माता – पिता दोनों के भगवच्चिन्तन का गहरा प्रभाव पड़ने लगा । जब वह कुछ बड़ा हुआ, तब प्रत्येक कार्यमें पिताका हाथ बँटाने लगा । उसके अन्त: करण में भगवानके प्रति अनन्य भक्ति का भाव भी जग चुका था । भगवान् बड़े कौतुकी हैं । वे भक्तोंके साथ भाँति – भाँति के खेल खेलते और उनके प्रेम एवं निष्ठाकी परीक्षा भी लेते रहते हैं । एक दिन वसुको ज्ञात हुआ कि घरमें मधु नहीं हैं । भगवानके भोगके लिये भात बन चुका था । 

वसुने सोचा की मधु के बिना मेरे प्रभु अच्छी तरह भोजन नही कर सकेंगे । अतः वह वीरको सावाँके जंगल और घरकी रखवालीका काम सौंपकर पत्नीके साथ मधुकी खोजमें चल दिया । बहुत विलम्ब के बाद दूरके जंगल में मधु का छत्ता दिखायी दिया । वसु बड़ा प्रसन्न हुआ । उसने युक्ति से मधु निकाला और घरकी और प्रस्थान किया । इधर निषाद – कुमार वीरने यह सोचकर कि भगवान के भोग में विलम्ब हो रहा है  ,तैयार किये हुए भातको एक पात्रमें निकाला । उसमें से कुछ अग्निमें डाल दिया और शेष सब भात वृक्षकी जड़ में स्थापित करके भगवानका आवाहन किया । भगवानने प्रत्यक्ष प्रकट होकर उसका दिया हुआ भोग स्वीकार किया । तत्पश्चात् प्रभुका प्रसाद पाकर बालक वीर माता – पिताके आनेकी बाट देखने लगा । वसु अपनी पत्नीके साथ जब घर पहुँचा, तब देखता है, वीरने भातमेंसे कुछ अंश निकालकर खा लिया है । इससे उसे बड़ा दुःख हुआ । 

प्रभु के लिये जो भोग तैयार किया गया था , उसे इस नादान बालक ने उच्छिष्ट कर दिया ! यह इसका अक्षभ्य अपराध है । यह सोचकर वसु कुपित हो उठा । उसने तलवार खींच ली और वीरका मस्तक काटनेके लिये हाथ ऊँचा किया । इतनेमें ही किसीने पीछेसे आकर वसु का हाथ पकड़ लिया । वसुने पीछे वृक्षकी ओर घूमकर देखा तो भक्तवत्सल भगवान् स्वयं उसका हाथ पकड़े खड़े हैं । उनका आधा अङ्ग वृक्षके सहारे टीका हुआ है । हाथोंमें शङ्ख, चक्र और गदा सुशोभित हैं । मस्तकपर किरीट, कानोंमें मकराकृति कुण्डल, अधरोंपर मन्द मन्द मुसकान और गलेमें कौस्तुभमणिकी छटा छा रही है । चारों ओर दिव्य प्रकाशका पारावार – सा उमड़ पड़ा है ।

वसु तलवार फेंककर भगवान के चरणों में गिर पड़ा और बोला – देवदेवेश्वर ! आप क्यों मुझे रोक रहे हैं ? वीर ने अक्षम्य अपराध किया है । भगवान् अपनी मधुर वाणी से कानों मे अमृत उड़ेलते हुए बोले – वसु ! तुम उतावली न करो ! तुम्हारा पुत्र मेरा अनन्य भक्त है । यह मुझे तुमसे भी अधिक प्रिय है । इसीलिये मैंने इसे प्रत्यक्ष दर्शन दिया है । इसकी दृष्टि मे मैं सर्वत्र हूँ, किंतु तुम्हारी दृष्टि मे केवल स्वामि पुष्करणी के तटपर ही मेरा निवास हैं ।( संतो द्वारा सर्वत्र भगवत्दर्शन यही सबसे ऊँची अवस्था है । नामदेव जी को भी गुरु प्राप्ति के बाद ही सर्वत्र भगवान् के दर्शन होने लगे – प्रेतों में ,कुत्ते में । )भगवान का यह वचन सुनकर वसु बड़ा प्रसन्न हुआ । वीर और चित्रवती भी प्रभु के चरणो मे लोट गये । उनका दुर्लभ कृपा – प्रसाद पाकर यह निषाद – परिवार धन्य – धन्य हो गया !

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