सुंदर कथा ६३ (श्री भक्तमाल – श्री अंगद सिंह जी ) Sri Bhaktamal – Sri Angad Singh ji

श्री अंगदसिंह जी का अपनी स्त्री की भक्ति से प्रभावित होकर भक्त बनना :

रायसेनगढ(वर्तमान मध्य प्रदेश विंध्य पर्वत श्रंखला की तलहटी ) के राजा सिलाहदी सिंह थे । उनके चाचा अंगद सिंह जी पहले भगवद्विमुख थे, पर उनकी पत्नी भगवद्भक्ता थी । एक बार उनके श्रीगुरुदेव घरपर आये और भक्ता शिष्या की प्रार्थनापर वे सुखपूर्वक सुखस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण की कथा कहने लगे । अंगद जी को भक्ति पसंद नही थी इसलिए अलग कक्ष में कथा करने लगे । इसी बीच अंगद जी आ गये और फटकारते हुए श्री गुरुदेव से बोले -स्त्री जाति के साथ यहां क्या का रहे हो ? इतना सुनते ही श्री गुरुदेव महाराज वहाँ से चले गये ।  श्री अंगद जी की पत्नी ने अपने गुरूदेव के अपमान से दुखित होकर अन्न- जल का परित्याग कर दिया ।

श्री अंगद सिंह जी तो संसारी सुखो के वशीभूत थे । अत: स्त्री को मनाते-मनाते इन्होने उसके पैर पकड़ लिये और कहा -अब जो कुछ भी तुम कहो, मै वाही करूँगा । उस समय मेरी बुद्धि नष्ट हो गयी थी । अत: अनुचित वाक्य मुंह से निकल गये । पतिदेव के दैन्य को देखकर उस भक्ता का हृदय दया से भर गया । उसने कहा- अब आप मेरे चरणो को छोडकर मेरे गुरुदेव के चरणो में जा पडिये और उन्हें प्रसन्नकर उनको अपना गुरु बनाइये । स्त्री की यह बात सुनकर अंगद जी श्रीगुरुजी के पास गये और बड़े प्रेम के साथ उन्हें घर लिवा लाये । दीनभाव से विनत्तीका उनके शिष्य बन गये । उन्हें सादर भोजन कराकर उनका उच्छिष्ट प्रसाद लिया ।

संत की सीथ प्रसादी का माहात्म्य और अंगद जी को अमूल्य हीरे की प्राप्ति :

संत की सीथ प्रसादी (उच्छिष्ट प्रसादी) पाकर अब श्री अंगद जी के हृदय मे शीघ्र भक्त भगवान् और श्री गुरुदेव में एक नवीन प्रीति प्रकट हो गयी । अपने भतीजे राजा सिलाहदी सिंह के आदेशानुसार एक बार आपने एक शत्रु राजा के ऊपर चढायी की और विजय प्राप्त कर ली । राजभवन की लूट मे इन्हें शत्रु राजा की टोपी मिल गयी । उस टोपी के अंदर सौ नग जड़े हुए थे, उनमे से एक नग सबसे मूल्यवान था । टोपी के निन्यानबे (९९) नग बेच बेचकर श्री अंगद जी ने पूज्य संतो की सेवा कर दी और एक नग जो सबसे बडा कीमती था, उसे आपने अपनी पगडी में  लपेटकर रख लिया और मन मे निश्चय किया कि इसे मै श्री जगन्नाथ भगवान् को अर्पण करूँगा । 

हीरे की प्राप्ति के लिए भक्त अंगद को विष देना ,किंतु विष का निष्प्रभावी होना :
फौजी सिपाहियों में कानाफूसी होते – होते सौ नगों से जडी हुई उस टोपी की बात राजा सिलाहदी सिंह ने सुन ली । राजा ने उन लोगों से कहा कि चाचाजी ! आज यदि उस एक हीरे को दे दें तो निन्यानवेे हीरे हम माफ कर देंगे । तुमलोग जाकर चाचा जी को समझाओ । लोगों ने आकर इन्हें खूब समझाया बुझाया। अनेक युक्तियां की, परंतु अंगद जी ने किसी की भी बात नहीं मानी । तब श्री अंगद सिंह जी की एक बहन, जो इनके यहाँ रसोई बनाया करती थी, राजाने उसके पैर छूकर एवं लोभ लालच देकर भेद नीति से उससे कहा कि तुम अंगद जी को विष देकर मार डालो, फिर मैं तुम्हें बहुत सा धन -धरती दूंगा । उसने राजा की बात मान ली, विष घोलकर भोजन मे मिला दिया और नित्य की भाँती भगवान् कोभोग भी लगा दिया । फिर अपने भाई अंगद जी को कहा – आओ, भगवान् को भोग लग गया है ,भोजन कर लो । थाली परोसकर उनके भाई अंगद के सामने रख दी । 

श्री अंगद जी की बहन की एक लडकी थी । ये जब भोजन करते थे तो श्री राधा जी की सखी मानकर उसे भी साथ बैठा लेते थे । अपनी लडकी को बचाने के लिये उसने उसे कही किसी के घर छिपा दिया था । अंगद जी उस बालिका के बिना भोजन नहीं कर रहे थे । अंगद जी की बहन सोचने लगी – हाय ! मेरे भैया मेरी बेटी से कितना स्नेह करते है, उन्हें राधा जी की सखी मानकर भोजन कराते है और मै उन्हें विष देकर मारने चली हूं ।अपनी लडकी मे अपने भाई का ऐसा अपार प्रेम देखकर उसके मनमे भ्रातृ प्रेम उमड़ आया । भाई के मृत्यु से डरकर वह रोने लगी । गले से लगकर रोते रोते उसने सब बात सत्य कह दी । 

वह कहने लगी -अब तुम इसे मत खाओ और ऐसा कहकर वह विषमिले भोजन की थाली को लेकर वहाँ से जाने लगी । यह देखकर श्री अंगद जी ने कहा -तूने विषमिले सामान का भगवान् को भोग लगा दिया और अब हमें खाने से रोकती है । यह तो भगवान् का प्रसाद हो गया ।ऐसा कहकर उन्होने उसे ढकेलकर बाहर निकाल दिया और भगवदिच्छा बलवती मानकर पुन: किवाड़ बन्दकर सब प्रसाद पाकर लेट गये । श्री अंगद जी के ऊपर विष का कुछ भी प्रभाव नहीं  हुआ । उलटे प्रसाद में निष्ठा एवं प्रेम से इनके मुखपर नयी चमक आ गयी, परंतु इनके मन मे इस बातका असह्य कष्ट बना हुआ था कि विषमिश्रित  पदार्थ भगवान् को भोग लगाया गया ।

श्री जगन्नाथ भगवान् द्वारा प्रत्यक्ष हाथ बढ़ाकर हीरे को प्राप्त करना :

श्री अंगद सिंह जी ने सोच विचारकर हीरा भगवान् को धारण कराने की इच्छा से श्री जगन्नाथ पुरी की ओर प्रस्थान किया । समाचार पाते ही खीझकर राजा ने सिपाहियों को भेजा, उन्होने आकर अंगद जी को सब ओरसे घेर लिया । राजा ने भेजे हुए राजपुरूषों ने कहा -आप हीरा यही हमारे सामने रख दीजिये, अन्यथा युद्ध करने के लिए तैयार हो जाइये । यह सुनकर श्री अंगद जी ने कहा – आपलोग थोडा ठहरिये, मैं इस कुण्ड मे स्नान करके अभी हीरा दिये देता हूँ । अंगद जी के मन मे तो भगवत्प्रेम ओत-प्रोत था । अत: उन्हे न देकर यह कहते हुए हीरा जल मे डाल दिया कि प्रभो ! यह आपकी वस्तु है, कृपया आप इसे स्वीकार कीजिये । प्रेमभरी भक्त की यह वाणी श्री जगन्नाथ जी को अति प्यारी लगी । आजानुबाहु प्रभु ने सात सौ कोस (एक कोस लगभग ३ किलोमीटर के बराबर माना जाता है ) लम्बा हाथ बढाकर उसे ले लिया और अत्यन्त सुख पाकर अपने वक्षस्थलपर धारण कर लिया । 

श्री अंगद जी के भक्तिभाव से राजा का भी भक्त बन जाना :

श्री अंगद जी उस हीरे को कृण्ड में फेंक कर (दुखित मन) अपने घर आ गये । उधर राजपुरुष लोग जल मे कूद पड़े और हीरे को ढूंढने लगे । महान् प्रयत्न करनेपर भी जब वह हीरा उन्हें न मिला तो वे लोग व्याकुल हो  गये । समाचार पाकर राजा भी वाही आ गया । उसने कुण्डका सब पानी बाहर निकलवाया । फिर भी जब हीरा न मिला तो कीचड़ में ढुँढ़वाया । कीच (कीचड़) में भी न मिलनेपर राजा दुःख सागर में डूब गया । इधर श्री जगन्नाथ जी ने अपने पण्डो (पुजारियों ) को आज्ञा दी कि तुम जाकर भक्त अंगदसिंह जी को खबर दो की तुम्हारा हीरा प्रभु को मिल गया है और उन्होंने उसे अपने वक्ष स्थलपर धारण कर लिया है ।

इस मंगलमय समाचार को जब पण्डो ने आकर अंगद जी को सुनाया तो इन्हें इतना आनन्द हुआ की अपने शरीर की सुधि बुधि न रही । श्री अंगद सिंह जी ने पुरी मे जाकर देखा तो वही हीरा भगवान् श्री जगन्नाथ जी के हृदयपर जगमगा रहा है । श्री अंगदजी के इस भक्ति के चमत्कार को देख सुनकर राजा के हदय में महान दुख हुआ ।राजा जान गया की असल हीरे तो भक्तहृदय अंगद जी ही है । अपने द्वारा भक्त का अपमान हुआ जानकार राजा ने अन्न खाना छोड़ दिया तथा ब्राह्मणों को अंगद जी को लिवा लाने के लिये श्री जगन्नाथ पुरी को भेजा। 

राजा ने  उनसे कहा कि जैसे भी हो, किसी न किसी प्रकार से आपलोग अंगद जी को लिवा लाओ । यदि वे मेरे नगर में आयें तो मै अपने बड़े भाग्य मानूंगा । ब्राह्मणों ने राजा के कथनानुसार पुरी मे जाकर श्री अंगद जी से राजा के दुख को सुनाया और प्रार्थना की कि -अब आप वही पधारो । अंगद जी किसी भी तरह से जब आने को तैयार न हुए तब ब्राह्मण लोग धरना देकर पड़ गये और राजा के अन्न छोड़ देने की बात बताई । तब श्री अंगद जी को दया आयी और वे राजा के दुख को दूर करने के लिये ब्राह्मणों के साथ चल दिये । जब श्री अंगद जी नगर के समीप आये तो राजाने सुना । तत्काल राजा दौडता हुआ अत्या और अंगद जी के चरणों से लिपट गया । अंगद जी ने राजा को छाती से लगा लिया । आखों से आंसू बहने लगे । राजाने अपना सर्वस्व श्री अंगद जी के श्री चरणों में समर्पित कर दिया । इस प्रकार नव जीवन प्राप्तक्रर जीवनपर्यंत राजा ने हरिभक्तिमय आचरण किया । 

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