सुंदर कथा ६५ (श्री भक्तमाल – श्री गोपाल जी ) Sri Bhaktamal – Sri Gopal ji

जाबनेर ग्राम में एक संतसेवी भक्त श्री गोपाल जी रहते थे । भगवान् से भक्त को  इष्ट मानने की, सेवा करने की प्रतिज्ञा उन्होंने की थी और उसका पालन किया । श्री गोपाल जी के कुल मे एक सज्जन (काकाजी) विरक्त वैष्णव हो गए थे । उन्होने सन्तो के मुख से इनकी निष्ठा प्रशंसा सुनी कि श्री गोपाल जी भक्तोंको इष्टदेव मानते हैं । तब वे विरक्त संत श्री गोपाल भक्त की परीक्षा लेने के विचार से उनके द्वारपर आये । इन्हें आया देखकर श्री गोपाल भक्त जी ने झट आकर सप्रेम साष्टांग दण्डवत् प्रणाम किया कि -भगवन् ! अपने निज घर में पधारिये । 

उन्होने (परीक्षा की दृष्टि से ) उत्तर दिया कि – मेरी प्रतिज्ञा है कि मैं स्त्री का मुख न देखूंगा । तुम्हरे घर के भीतर जाकर मैं अपनी इस प्रतिज्ञा को कैसे छोड दूं?तब श्री गोपाल जी ने कहा -आप अपनी प्रतिज्ञा न छोडिये। परिवार की सभी स्त्रियां एक ओर अलग छिप जायेंगी । आपके सामने नहीं आयेगी । ऐसा कहकर घर के अंदर जाकर उन्होने सब स्त्रियो को अलग कमरे में छिपा दिया । तब इनको अंदर ले आये । घर की स्त्रियां भी संतो में बड़ी निष्ठा रखती थी  अतः इसी बीच सन्त दर्शन के भाव् से या कौतुकवश एक स्त्री ने बहार झाँककर संत जी को देखा, स्त्री की झांकते ही उन संत ने गोपाल भक्त के गालपर एक तमाचा मारा । श्री गोपालजी के  मन मे जरा सा भी कष्ट नहीं हुआ । 

श्री गोपाल जीे हाथ जोडकर बोले – महाराज जी ! आपने एक  कपोल(गाल ) को तमाचा प्रसाद दिया, वह तो कृतार्थ हो क्या ।  दूसरा आपके कृपाप्रसाद से वंचित रह गया । अत: उसे रोष हो रहा है, कृपा करके इस कपोलपर भी तमाचा  मारकर इसे भी कृतार्थ कर दीजिये । प्रियवाणी सुनकर उन वैष्णव संत के नेत्रो मे आसू भर आये । वह श्रीगोपाल जी के चरणो मे लिपट गए क्या और बोले – आपकी सन्तनिष्ठा अलौकिक है । मैने आकर आपकी परीक्षा ली । आज मुझे आपसे बहुत बडी यह शिक्षा मिली कि भक्त को अति सहनशील होना चाहिये तथा भगवान् के भक्त को भगवान् से भी बढकर मानना चाहिये । 

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