सुंदर कथा ६६ (श्री भक्तमाल – श्री दास जी ) Sri Bhaktamal – Sri Daas ji

श्री दास जी महाराज नामक एक संतसेवी महात्मा हुए है ।श्री दास जी संतो की सेवा को भगवान् की सेवा से बढ़कर मानते थे । एक बार श्रीदास जी के यहा कई सन्त आये ।स्नाध्या – आरती हुई । रात्रि भोजन के वाद श्रीदास जी संतो की चरण सेवा में लग गये । मंदिर में ठाकुर जी को शयन कराना भूल गये । प्रात:काल मंगला के समय श्री दास जी जब मंदिर जाने लगे तो मंदिर के किवाड़ भीतर से बन्द मिले । प्रयत्न करने पर भी किवाड नहीं खुले । तब श्रीदास जी बड़े असमंजस में पड गये । इतने में आकाश वाणी हुई – अब किवाड नहीं खुलेंगे , मेरी सेवा रहने दो, अब सन्तो की ही सेवा करो । मै रातभर सिंहासन पर खडा रहा हूँ तुमने मुझे शयन ही नहीं कराया ।

यह सुनकर श्री दासजी ने सरल भाव से निवेदन किया -प्रभो ! सन्त-सेवा में लगे रहने के कारण यदि आपकी सेवा में चूक हुई तो आपके नाराज होने का भय मुझे बिलकुल भी नहीं है । परंतु आपकी सेवा में लगा रहूँ और संत – सेवा में भूल-चूक हो जाय, तब मुझे आपकी नाराजगी का भारी भय है , भगवान् से अधिक महिमा तो भगवान् के भक्तो की है । यह सुनते ही प्रभु प्रसन्न हो गये । किवाड खुल गये और भगवान् कहने लगे – हम तुमपर बहुत प्रसन्न है , इस भाव् से संत सेवा करनेवाले मुझे अपने वश में कर लेते हैं । ऐसा कहकर भगवान ने श्रीदास जी को प्रत्यक्ष होकर दर्शन दिया और अनेक शुभाशीर्वाद दिए ।

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