सुंदर कथा ६८ (श्री भक्तमाल – श्री सिलपिल्ले की भक्त- दो कन्याएँ ) Sri Bhaktamal – Sri Silpille ki bhakt

http://www.bhaktamal.com ® पूज्यपाद श्री भक्तमाली जी के टीका ,प्रियादास शरण एवं पुराने संतो के लेख पर आधारित  । कृपया अपने नाम से प्रकाशित न करे ।

सिलपिल्ले (कृष्ण )भगवान् की भक्त – दो कन्याएँ
श्री भक्तमाल ग्रंथ में नाभादास जी ने लिखा है – ठाकुर सिलपिल्ले ( श्रीकृष्ण ) की दो भक्ता कन्याएं थी । इनमे एक राजा की कन्या थी और दूसरी जमींदार की कन्या थी । एक दिन राजा के महल में एक संत भगवान् पधारे । वे संत प्रेम से महल में कुछ दिन विराजे । राजा और जमींदार दोनों की की कन्याएं महल में खेल रही थी उसी समय उनकी दृष्टि संत की और गयी । उस समय संत भगवान् अपने शालिग्राम जी की सेवा में मग्न थे ।उन दोनों कन्याओं ने देखा की संत जी एक गोल काले पत्थर ( शालिग्राम ) जी को स्नान करवा रहे है , सुंदर तुलसी दाल पधरा रहे है , प्रेम से पद गाकर सुना रहे है , चंदन और सुगंध अर्पण कर रहे है , पभोग अर्पण कर रहे है । संतो ने कहा है की जिस समय की यह घटना है उस समय इनकी उम्र आठ वर्ष की थी । 

उन दोनों कन्याओं ने संत भगवान् से कहा की यह आप क्या कर रहे है ? संत भगवान् ने उन दोनों की बताया की यह पत्थर नहीं अपितु स्वयं श्री भगवान् है और मै इनकी सेवा कर रहा था । संत जी ने उन दोनों को भगवान् का चरणामृत और प्रसाद भी दिया जिससे उनके मन में भी सेवा करने की उत्कण्ठा हुई । संत जी का महल में प्रवचन भी हुआ जिसे सुनकर दोनों कन्याओं के हृदय में और अधिक भगवत्प्रेम जाग उठा । उन्होंने संत भगवान् से विनती करते हुए कहा की हमें भी आप जैसी सेवा हमें भी करनी है ,हम भी सुकुमार श्यामसुंदर की पूजा करेंगी ,हमें  आप ठाकुर जी की मूर्ति दे दीजिये ।उन दोनों के मन में भाव आया की यही संत हमारे सद्गुरुदेव भगवान् है ।

उन संत ने दोनों कन्याओ के भाव को देखकर मन में विचार किया की यह दोनों तो अभी बहुत कम आयु की है ,बच्चियां है । कही भगवान् की सेवा में कोई त्रुटि न हो जाए ,कोई अपराध न हो जाए । शिष्य के द्वारा यदि त्रुटि हो जाए तो अपराध गुरु को लगता है । संत ने सोचा की जब यह बड़ी हो जाएँगी तब हम इन्हें भगवान् की मूर्ति प्रदान करेंगे । पहले तो संत ने मन कर दिया परंतु दोनों कन्याको के आखों से अश्रुपात होने लगा । संत ने देखा की यह भगवान् के लिए रो रही है , भले की यह अनभिज्ञ है ,छोटी है परंतु अवश्य यह दोनों पूर्व जन्म की कोई महान् भक्ता है ।संत जी ने विचार किया की बचपन से ही दोनों को भगवान् के सेवा का अभ्यास भी कराना है और अपराध से भी बचाना है अतः उन्होंने बिच वाला रास्ता अपनाया । दोपहर के समय जब संत भगवान् शौच आदि क्रियाएँ करने नदी किनारे गए थे , वही नदी के तट से उन्होंने दो काले पत्थर उठाकर साथ लेकर आये ।

संत जी ने वह साधारण काले पत्थर दोनों कन्याओं को प्रदान किये और कहा की जैसे सेवा हम करते है ठीक उसी तरह नित्य तुम लोग भी इनकी सेवा करना ।जब कन्याओं ने कहा की इनका नाम क्या है तब संत ने कहा -तुम्हरे इन भगवान् का नाम है सिलपिल्ले जी । गुरुदेव के आज्ञानुसार दोनों प्रेम से सेवा करने लगी । सेवा करते करते उनके हृदय में बड़ा भारी अनुराग बढ़ गया । कभी वह कीर्तन करती , कभी नृत्य करती ,दोनों आनंद में मग्न रहने लगी । संत ने तो केवल साधारण पत्थर प्रदान किये थे ,न कोई शालिग्राम है न भगवान् का श्रीविग्रह है परंतु गुरुदेव के वचनो में ऐसा दृढ़ विश्वास था की इनकी सेवा सिद्ध होने लगी । उन दोनों को कभी उन शिलाओं में श्रीकृष्ण के दर्शन होते ,कभी श्रीकृष्ण उनसे बातें करते और कभी मंद मंद मुस्कुराते ।भगवान तो भाव ग्राही है , जो कोई शुद्ध सरल भाव से उनकी सेवा करे उनपर प्रभु रीझ जाते है । इस तरह नाम जप करती , संत वाणी का गायन करती ,कीर्तन, नृत्य करती और  सारा समय सिलपिल्ले ठाकुर की सेवा में मग्न रहती ।

जमींदार के कन्या की कथा :

सिलपिल्ले भक्त जमींदार कन्या के दो भाई थे । दोनों भाई बड़े बलवान थे और धन भी बहुत था । धन और संपत्ति के कारण से दोनों में वैर था । गाँववालो ने दोनों भाइयों से कहा की पास रहोगे तो लड़ाई झगड़ा होता रहेगा , एक दूसरे से दूर रहोगे तो लड़ाई नहीं होगी । बड़ा भाई अपना गाँव छोड़ कर दूसरे गाँव में जाकर बस गया परंतु उसके हृदय में जलन थी की मेरा गाँव छुट गया , घर संपत्ति छुट गयी । अवश्य अवसर पाकर मै छोटे भाईपर आक्रमण करुंगा । भक्त कन्या अपने छोटे भाई के साथ गाँव में ही रहती थी और अपने सिलपिल्ले भगवान् की सेवा में मग्न रहती थी । एक दिन बड़े भाई ने अपने कुछ बलवान साथियों को लेकर छोटे भाईपर रात्रि में आक्रमण कर दिया और बहुत सी संपत्ति लूट लिया । गाँव के लोगो ने रोकने का प्रयत्न किया परंतु उन्हें भी इसके बलवान साथियो ने पीटा और लूटा ।

छोटे भाई के घर पर जब सामान लूटा गया उस मे सिलपिल्ले भगवान् भी साथ चले गए । धन संपत्ति की कमी तो थी नहीं अतः सोने का सिंहासन और आभूषण देखकर भगवान् सिलपिल्ले भी लूट लिए गये थे । ( जहां सिलपिल्ले भगवान का सिंहासन रखा हुआ था उसके आस पास बहुत से शालिग्राम रखे हुए थे जिनकी सेवा उनके पूर्वज करते आये थे) प्रातःकाल जब भक्त कन्या उठकर भगवान् की सेवा में गयी तो देखा की भगवान् का सिंहासन नहीं है । इससे उस भक्ता को महान कष्ट हुआ , ऐसा छटपटाने लगी जैसे जल बिन मछली । बहुत रोने और तड़पने लगी ,उसने खाना पीना छोड़ दिया । गाँव वालो ने कहा की वह तो एक पत्थर ठाकुर थे ,कोई सुंदर ठाकुर नहीं थे । 

हम लोग तुम्हारे लिए अष्टधातु की सुंदर बंसीधर की मूर्ति लाकर देंगे परंतु उस भक्ता ने कहा की हमें तो गुरूजी ने प्रदान किये हुए अपने सिलपिल्ले भगवान् ही चाहिए । गांव के लोगो ने कहा की वह ठाकुर तो बड़ा भाई लूट कर साथ ले गया ,अब उसके पास बहुत बलवान आदमी है तो उससे मांगने कौन जाए ?लेकिन स्त्री पर वे हाथ नहीं उठाएंगे । वैर तो भाइयों में है परंतु तुमसे दोनों भाइयों का प्रेम है । तुम जाकर अपने ठाकुर जी मांग कर ले आओ ।

तब वह भक्ता उस गाँव में गयी जहां दोनों भाइयो में बड़ा वाला भाई रहता था । उस समय वह द्वारपर अपने साथियों के साथ बैठक में बैठा था ।वह भक्ता कहने लगी की भैया हमें और कुछ नहीं चाहिए बस आपने जो सामान लूटा है उसमे मेरे ठाकुर जी भी आ गए । आप मेरे ठाकुर जी वापस कर दो । भाई ने कहा की भीतर चली जाओ , वहाँ लूट के सामान के बिच में एक स्थानपर सभी ठाकुर विराजमान है ,उनमे से अपने ठाकुर को पहचान कर ले जाओ ।वह भक्ता बहुत तड़प तड़प कर रो रही थी , उसकी अवस्था देखकर बैठक में जो लोग बैठे थे उनमे से एक व्यक्ति बोला – तुम १० कोस से पैदल चलकर अपने ठाकुर के लिए यहां आयी हो , विलाप कर रही हो । क्या तुम्हारे उस ठाकुर में कोई सामर्थ्य नहीं है ?यदि तुम्हारे में इतनी ही भक्ति है तो यहिंसे बुला लो , घरमे जाने और पहचान ने की क्या जरुरत है ? 

उस भक्ता ने भगवान् से प्रार्थना की के प्रभु ! मेरे अंदर ऐसा भक्ति भाव और प्रेम नहीं है की मै आपको पुकारूं और आप चले आओ । मेरे अंदर इतना सामर्थ्य नहीं है की मै ऐसा दावा कर सकु की मेरे पुकारने से भगवान् चले आएंगे । आप स्वयं कृपा करके हमारे पास चले आओ नहीं तो ये सब लोग हँसी उड़ाएंगे की इनके ठाकुर में कोई सामर्थ्य नहीं है ,सब यही कहेंगे की यह तो केवल पत्थर है । मै आपकी दासी हूँ , मुझे अपनी हँसी उड़ने की चिंता नहीं है परंतु यदि ये लोग आपकी हँसी उड़ाए तो हमें कष्ट होगा । मुझसे ऐसा कौनसा अपराध हो गया जो आप हमें छोड़ कर चले गए ।

प्रभु ! इन दुष्टो के हृदय में भक्ति बढे ऐसी कोई लीला करे। मेरी विनती है की आप शीघ्र घर से बहार आएं । बैठक में बैठे सब लोग हँसी उड़ाने के इंतज़ार में बैठे हुए थे और देखते देखते सिंहासन चलते चलते उस कन्या के पास आ गया और उछलकर ठाकुर से आकर उसके हृदय से लग गए । जैसे ही यह लीला उसके भाई और उसके साथियो ने देखी उसी क्षण सब लोग उस भक्ता के चरणों में पड़ गए । उन्होंने क्षमा याचना की और कहा की हम आपके इस भक्ति भाव को नहीं पहचान सके । भाई ने कहा की मेरे बड़े भाग्य है की मेरी बहन ऐसी उच्चकोटी की भक्ता है । आज मेरा घर पवित्र हो गया और इनके दर्शन भी हो गए ।

इस घटना के बाद उस भक्ता कन्या ने सबको सदुपदेश दिए और वे सभी दुष्ट भगवान् और संतो की सेवा में लग गए । छोटे भाई को भी जब इस लीला के बारे में पता चला तो वह भी भगवान् और संत सेवा में लग गया । दोनो भाईयो में वैर समाप्त हो गया और समस्त परिवार सेवा में लग गया ।

राजा के कन्या की कथा :

सिलपिल्ले की भक्त राजकन्या को विषय – सुखो से पूर्ण वैराग्य हो गया था । भक्तमाल में इसके नाम का वर्णन नहीं है परंतु संतो ने इसका नाम चंद्रलेखा बताया है । इसका विवाह बाल्यकाल में ही एक लड़के के साथ निश्चित कर दिया गया था परंतु अभी गौना ( विवाह के पश्चात पत्नी को अपने माता पिता के घर से पहली बार पति अपने घर ले जाता है । गौना होने तक लड़की अपने माता पिता के घर ही रहती है । ) नहीं हुआ था अतः वह अपने माता पिता के साथ ही रहती थी । उसे यह नहीं पता था की उसका विवाह तय हो चूका था ।  चंद्रलेखा के चित्त की वृत्तियां श्री सिलपिल्ले भगवान् की सेवा में लगी रहती थी । उसे विवाह करने की इच्छा नहीं थी ,उसका हृदय तो वैराग्य के रंग से रंगा हुआ था परंतु अब पिता ने बाल्य काल में ही विवाह निश्चित कर दिया था यह जानकार लोक लज्जा के कारण वह कुछ नहीं बोली ।जब उसकी विवाह के योग्य उम्र हो गयी तब विवाह हुआ और उसके बाद गौने की विदाई करने पतिदेव आये ।

दैवयोग से उसका विवाह जिससे हुआ ,वह और उसके घर के सभी लोग भक्ति से विमुख थे । राजा की बेटी थी , गुप्तचरों से पता चल गया था की यह लड़का और उसके घरवाले सभी भक्ति विमुख है । अब विवाह और गौना हो चूका था अतः घरवालों ने उसको अपने पति के साथ विदा कर दिया । अपने ठाकुर जी को जिस पिटारी में रखा था उसे हृदय से लगाये हुए चंद्रलेखा जी अपने पतिदेव के साथ ससुराल को जाने लगी । रास्ते में उसका पति उसके पास आया और वार्तालाप करके पति ने उससे प्रेम करना चाहा परंतु चंद्रलेखा ने देखा की न इसके गले में तुलसी माला है , न मुख में हरिनाम है और न कोई भक्ति के लक्षण है । हृदय में सोचने लगी की हे प्रभु ! ये कैसे विमुख का संग हमें मिल गया , इस विषयी पुरुष का संग करने से ,नास्तिक का संग करने से भक्ति की हानि होगी ।

चंद्रलेखा जी ने पतिदेव से कहा – हमारा स्पर्श मत करना । पतिदेव ने कहा – स्पर्श क्यों ना करे ,आप हमारी पत्नी है ।चंद्रलेखा ने कहा की मै रोगी हूं , मेरे हृदय में ऐसा रोग है की यदि तुम्हे लग गया तो किसी काम के नहीं रहोगे । मुझे छुना मत अन्यथा तुम्हे भी यह रोग लग जायेगा । पतिदेव ने पूछा की आपको ऐसा कौनसा रोग है जिस कारण हम आपको स्पर्श नहीं कर सकते ? उसने कहा यदि आपको मुझसे बात करना चाहते हो तो पहले अपने हृदय में भगवद्भक्ति की चाहना करो , किसी संत का आश्रय लेकर भजन करो । जो भगवान् और संत से विमुख है उसका स्पर्श मै नहीं करुँगी । पतिदेव ने ठीक से देखा तो चंद्रलेखा जी के हृदय से लगी पिटारी दिखाई पड़ी और उस पिटारी में विराजमान थे सिलपिल्ले भगवान् । पतिदेव ने सोचा की लगता है इस पिटारी में ही कोई जादू है , जब तक यह पिटारी इसके हृदय से लगी है तब तक हमें हृदय से कैसे लगने नहीं देगी ? इसका मन इस पूजा -पाठ की पिटारी में लगा है , इसे लेकर अलग कर देना चाहिए ।

यात्रा के दौरान थकान के कारण चंद्रलेखा जी को कुछ देर निद्रा आ गयी और अवसर पाकर पतिदेव ने उस पिटारी को चुराकर नदी में फेंक दिया । चंद्रलेखा ने जागनेपर देखा की ठाकुर जी और पिटारी नहीं है , बहुत ढूंढा पर नहीं मिले । पहले ही चंद्रलेखा को भक्ति से विमुख पति मिलने का दुःख था और अब जिनका आसरा था वह ठाकुर जी भी नहीं दिखाई पड रहे है । चंद्रलेखा जी ने अन्न जल का त्याग कर दिया और कहा की जब तक मेरे सिलपिल्ले ठाकुर नहीं मिल जाते तब तक मै अन्न जल ग्रहण नहीं करुँगी । पति ने उसे अनेक प्रकार से प्रसन्न करना चाहा , परंतु जिनके सर्वस्व भगवान् छिन लिए गए हो, वह भला प्रसन्न कैसे हो ? व्याकुल हो कर रोने लगी और रोते रोते ही अपने पतिदेव के घर पहुंची । उसकी ऐसी हालात देखकर सांस ने पूछा की यह क्यों रो रही है ? बार बार तफप तड़प कर भगवान् का नाम क्यों लेती है ? 

पतिदेव ने कहा – रास्ते मे जब मैंने इसे स्पर्श करने की कोशिश की तब इसने कहा की भगवान् से विमुख व्यक्ति का स्पर्श हमें पसंद नहीं । यदि मुझे स्पर्श करना है तो अपने हृदय में भगवान् की भक्ति धारण करो । मैंने सोचा की इसने जो भगवान् की पिटारी अपने हृदय से लगा राखी है , यही इस मुसीबत की जड़ है । मैंने अवसर पाकर पिटारी नदी में फेंक दी और सोचा की अब मेरी पत्नी मुझसे प्रेमपूर्ण बातें करेगी ,मुझे शरीर का स्पर्श करने देगी परंतु हुआ इसके विरुद्ध । चंद्रलेखा की सांस ने कहा की हम तुम्हारे लिए अच्छे नए ठाकुर बनवा देंगे ,जैसे तुम्हे चाहिए वैसे बनवा देंगे परंतु इसने कहा की मुझे तो मेरे सिलपिल्ले ठाकुर ही चाहिए जिनकी सेवा मै किया करती थी । 

सास ने बहुत समझाया और अपने हाथ से भोजन खिलाने लगी ,पर खाने की क्या बात ,उसे उन लोगो से बोलना भी अच्छा नहीं लग रहा था । चंद्रलेखा उच्च कोटि की भक्ता थी , उसने कभी भी अपनी सांस से नहीं कहा की यह सब अनर्थ मेरे पतिदेव के कारण हुआ है । वह यही कहती थी की मुझसे कोई अपराध हो गया होगा इसीलिए प्रभु मुझे छोड़कर चले गए । जैसे राजा दशरथ ने कैकेयी को दोष नहीं दिया , उन्होंने यही कहा की मेरे पूर्व के किसी पाप के कारण सीताराम जी से वियोग हुआ है , इसमें कैकेयी का कोई दोष नहीं ।

सच्चे भक्त की यही पहचान है । चंद्रलेखा की सांस ने सोचा की इसने अन्न जल त्याग दिया है और यह यदि मर गयी तो इसके घरवालो को हम क्या जवाब देंगे ? घरवालो ने कहा – हम सब तेरे पाँव पड़ते है , अब तू जो कहेगी वैसा ही हम करेंगे । चंद्रलेखा ने कहा – आप हमें वही लेकर चलो जहां पर मेरे प्राणप्यारे सिलपिल्ले भगवान् को नदी में मेरे पतिदेव दाल आये । घरवाले चंद्रलेखा को लेकर नदी किनारे गए जहां जल में पिटारी फेंकी गयी थी । पतिदेव ने कहा की यही जगह है जहां उस पिटारी को हमने फेंक था , प्रभु का स्मरण आते ही उसे चक्कर- सा आ गया और वह मूर्छित होकर भूमिपर गिर पड़ी । किसीतारह मूर्छा दूर होनेपर उसके नेत्रों से अश्रुधारा बहने लगी और वह अत्यंत दुःखित स्वरसे अपने प्राणनाथ सिलपिल्ले भगवान् को पुकारने लगी  ।

भगवान श्यामसुंदर तो भक्तो के वश में रहते है । जैसे कामवश कामी व्यक्ति स्त्री की ओर  खिंचा चला आता है वैसे ही भक्तिवश भगवान्  भी चंद्रलेखा जी की ओर खींचे चले आये । भक्ता चंद्रलेखा की दीन पुकार सुनते ही सिलपिल्ले भगवान् दौड़कर उसके हृदय से आ लगे , उनके साथ वह पिटारी भी आ गयी ।उस भक्ता के पतिदेव ,सास और ससुर आदि सबने जब ऐसा चमत्कार देखा तो वे बड़े प्रभावित हुए । उस भक्ता ने अपनी भक्ति से उन सब भगवान् से विमुख लोगो को भक्त बना दिया । वे सभी कहने लगे की हम सबके भाग्य जग गए जो ऐसी बहु घर आयी । वे सभी भगवान् और संतो की सेवा में लग गए । इस तरह किसी भी प्रकार क्यों न हो ,एक भक्त के संग से सारा परिवार भगवान् की भक्ति में लग कर तर गया ।

One thought on “सुंदर कथा ६८ (श्री भक्तमाल – श्री सिलपिल्ले की भक्त- दो कन्याएँ ) Sri Bhaktamal – Sri Silpille ki bhakt

  1. रामदयाल जडिया कहते हैं:

    मैं भगतांरो दास
    भगत म्हारी मुकुट मणी

    भगवान कहते हैं कि जो व्यक्ति मुझमें अनन्य चित्त होकर सदा
    ही निरंतर मुझ पुरुषोत्तम को स्मरण करता है,उस नित्य निरंतर मुझ में लगे हुए योगी के लिये मैं सुलभ हूँ, अर्थात उसे सहज ही प्राप्त हूँ।
    ऐसे भक्तों के पीछे पीछे भगवान चलते हैं।
    कबिरा जल निर्मल भया,जैसे गंगा नीर ।
    पाछे पाछे हरि फिरे ,कहत कबीर कबीर ।।

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