सुंदर कथा ७१(श्री भक्तमाल – श्री धनुर्दास जी ) Sri Bhaktamal – Sri Dhanurdas ji

श्री रामानुज संप्रदाय के पूर्वचार्यो द्वारा लिखे गए ग्रंथो में धनुर्दास स्वामी जी के जीवन के कुछ प्रसंग मिलते है । श्री कलिवैरिदास स्वामी जी ,भक्त चरितांक ,श्री तोताद्रि मठ के संत और अन्य आचार्यो के आशीर्वाद से प्रेरित चरित्र । कृपया अपने नाम से प्रकाशित ना करे । http://www.bhaktamal.com ®

मद्रास प्रांत में त्रिचनापल्ली के पास एक स्थान है उदयूर । इसका पुराना नाम निचुलापुरी है । यह वैष्णवों का एक पवित्र तीर्थ है । आज से लगभग एक हज़ार वर्ष पूर्व यहां एक धर्नुदास नाम का पहलवान रहता था। अपने बल तथा अद्भुत आचरण के लिये धनुर्दास प्रख्यात था । दक्षिण भारत में धनुर्दास को पिल्लै उरंगा विल्ली के नाम से जाना जाता है । धनुर्दास राजा के सभा के एक महान पहलवान थे । उस पहलवान ने हेमाम्बा नामक एक अत्यंत सुन्दर वेश्या की सुन्दरता पर बहुत मोहित होकर उसे अपनी प्रेयसी बनाकर घर में रख लिया था । वह उस वेश्या के रूप पर इतना मोहित था की जहां भी जाता, उसे साथ ले जाता । अंत में उसके रूप में आसक्त होकर उसे अपनी पत्नी बना लिया , स्त्री ने भी उसे पति रूप में स्वीकार कर लिया था । 

रास्ते से जब धनुर्दास चलता तो स्त्री के आगे-आगे उसे देखते हुए पीठ की ओर उलटे चलता । कही बैठता तो उस स्त्री को सामने बैठाकर ही बैठता ।  उसका व्यवहार सबके लिए कौतूहलजनक था; परंतु वह निर्लज्ज होकर उस स्त्री को देखना कभी भी नहीं छोड़ता था । दक्षिण भारत का एक सर्वश्रेष्ठ तीर्थ है – श्रीरंग क्षेत्र । त्रिचनपल्ली से यह श्रीरंगम् पास ही है। वर्ष में कई बार यहां महोत्सव होता है। दूर-दूर से लाखों यात्री आते है । एक बार श्रीरंगनाथ का वासन्ती महोत्सव (चैत्रोत्सव)चल रहा था। धर्नुदास जी की प्रेयसी ने भी उत्सव देखना चाहा। धर्नुदास उसे तथा नौकरों-चाकरों के साथ निचलापुरी से श्रीरंगम् आ गया।

गर्मी के दिन, नौ-दस बजे की कड़ी धूप और मार्ग में खचाखच भीड़ । जब की भीड़ के मारे शरीर को सम्हालना तक कठिन था, उस समय भी वहां धर्नुदास एक हाथ में छाता लेकर अपनी प्रेयसी को छाया किए हुए था और स्वयं धूप में, पसीने से लथपथ होकर उस स्त्री की ओर मुख करके पीठ की ओर पीछे चल रहा था। उसे मार्ग के नीचे – ऊँचे की सुधि नहीं थी । अपने शरीर का ध्यान तक नहीं था। उन दिनों श्रीरामानुजाचार्य जी श्रीरंगम् में ही थे। दूसरों के लिए तो धर्नुदास का यह कृत्य पुराना था ,नवीन यात्री उसे कुतूहल से देख रहे थे। श्रीरामानुज स्वामी जी के लिए इस पुरुष का व्यवहार बहुत ही अद्भुत था । उन्होंने आपने अपने शिष्यों से पूछा – वह निर्लज्ज कौन है?परिचय पाकर शिष्य को कहा – उससे जाकर कहो कि तीसरे पहर मठ पर आकर वह मुझसे मिले।

धर्नुदास ने उस शिष्य से स्वामी का का आदेश सुना तो सन्न हो गया ; वह समझ गया आचार्य स्वामी अवश्य मेरी निर्लज्जता पर बिगड़े होंगे । बिगड़ने की तो बात ही है। सब लोग जहां श्रद्धा -भक्ति से भगवान् के दर्शन करने आएं है, वहां भी मैं एक स्त्री के सौन्दर्य पर मुग्ध हूं। मठ पर जाने पर मुझे डांट सुननी पड़ेगी। पता नहीं, आचार्य स्वामी क्या आदेश देंगे। कितना डाँटेंगे । न जाऊँ, यह भी ठीक नहीं । इससे तो उनका अपमान होगा। अन्त में उसने मठ में जाना स्वीकार कर लिया । श्री रामानुजस्वामी ने भगवान् श्रीरंगनाथ से मन्दिर में जाकर उसी समय प्रार्थना की – मेरे दयामय स्वामी ! एक विमुख जीव को अपने सौन्दर्य से आकर्षित करके श्री चरणों में स्वीकार करो।

भोजन करके धर्नुदास मठ पहुँच गया । समाचार पाकर श्री रामानुजा स्वामी ने उसे मठ के भीतर बुला लिया और उसके अद्भुत व्यवहार का कारण पूछा । बड़ी नम्रता से , हाथ जोड़ कर धर्नुदास ने बताया – स्वामी ! मैं उस स्त्री के सौन्दर्य पर पागल हो गया हूं । उसे देखे बिना मुझ से रहा नहीं जाता। कामवासना तो मुझ में कुछ ऐसी प्रबल नहीं है, पर उसका रूप मुझसे छोड़ा नहीं जाता। मैं उसे न देखूं तो बेचैन हो जाता हूं। महाराज ! आप जो आज्ञा करें, मै वही करूँगा, पर उसका साथ न छुड़ायें । श्रीरामानुज स्वामी ने कहा – यदि हम उससे बहुत अधिक सुन्दर मुख तुम्हें दिखलायें तो?

धर्नुदास ने कहा – महाराज ! उससे सुन्दर मुख देखने को मिले तो मैं उस स्त्री का एकदम परित्याग कर सकता हूं। श्री स्वामी जी ने कहा – ऐसा नहीं ! उसका परित्याग तुम मत करो । वह वेश्या थी, तुम्हारे पास आकर अब तुम्हारी स्त्री हो गई । तुम छोड़ दोगे तो फिर वेश्या हो जाएगी। ऐसा नहीं होना चाहिए। वह अब सुधर गई है। उसे तुम पत्नी बनाकर अपने यहाँ रहने दो । तुम जो उसके रूप पर इतने मुग्ध हो, बस, यह ठीक नहीं है। तुम्हें स्वीकार हो तो संन्ध्या के समय जब श्रीरंगनाथ की आरती होती है, उस समय तुम मन्दिर में आकर मुझसे मिलना। अकेले ही आना।

धर्नुदास आज्ञा पाकर विदा हुआ। उसे बड़ा आश्चर्य हो रहा था । आचार्य स्वामी ने उस जैसे नीच पुरुष को मठ में भीतर बुलाया, पुत्र की भांति स्नेह से पास बिठाया और बिना डांटे-फटकारे विदा कर दिया। उसे तो आशा की थी कि आचार्य स्वामी उसे बहुत कुछ कहेंगे। वह भय से थर-थर कांपता आया था, कि कहीं मुझे शाप न दे दें। वह सब कुछ तो नहीं हुआ। घर आकर उसे स्त्री से सब बातें कह दीं। वह स्त्री भी नहीं चाहती थी कि धर्नुदास इस प्रकार उस पर लट्टू रहे, मार्ग में धर्नुदास उसके आगे-आगे पीछे की ओर चले। वह व्यवहार उसे भी लज्जाजनक जान पड़ता था । वह अब सच्चे हृदय से धर्नुदास की पत्नी थी। वह उसका सुधार चाहती थी, किंतु इस भय से कि धर्नुदास उसे छोड़ न दे, कुछ कहती नहीं थी। उसे प्रसन्नता हुई इस आशा से कि आचार्यस्वामी धर्नुदास को कदाचित् सुधार देंगे ।

जब संध्या समय धर्नुदास श्रीरंगजी के मन्दिर में गया तो उसे किसी ने भीतर जाने से रोका नहीं। आचार्य स्वामी ने उसे ध्यानपूर्वक आरती के समय भगवान के दर्शन करने को कहा। धर्नुदास तो आरती के समय ही एकदम बदल गया। जिस सौन्दर्य-सुधासागर के एक सीकर से स्वर्ग का सारा सौन्दर्य निकला है, त्रिभुवन की सुषमा जिसकी छाया के किसी अंश में नहीं, उस सौन्दर्य सार- सर्वस्व की आज धर्नुदास ने एक झलक पाई और जब वह झांकी अदृश्य हो गई तो वह पागल की भांति आचार्यस्वामी के चरणों में लिपट गया। उसने फूट-फूट कर रोते हुए कहा – स्वामी ! मुझे जो आज्ञा दो ,मैं वहीं करूंगा । कहो तो मैं अपने हाथ से अपने देह की बोटी-बोटी काट दूं ; पर वह त्रिभुवनमोहन – मुख मुझे दिखलाओ । ऐसी कृपा करो कि वह मुख मेरे नेत्रों के सामने ही रहे।

धर्नुदास आचार्यस्वामी के समझाने से घर आया। अब स्त्री तो उसे बहुत ही कुरूप जान पड़ने लगी । वह आचार्य स्वामी की आज्ञा से ही उसे पत्नी बनाये रखा था ,उसका त्याग नहीं किया । कुछ दिनों बाद वे दोनों श्रीरामानुजाचार्य जी के शिष्य हो गए। श्रीस्वामी जी ने भी दोनों को साम्प्रदायिक ज्ञान के विषय में बहुत ज्ञान दिया। दोनों का आचरण आदर्श हो गया। धर्नुदास आचार्यस्वामी का अत्यंत विश्वस्त अनुचर हो गया ।
श्री रामानुजस्वामी वृद्धावस्था में कावेरी नदी में स्नान को जाते समय तो किसी ब्राह्मण के कंधे का सहारा लेकर जाते थे ,पर स्नान करके लौटते थे धनुर्दास के कंधे का सहारा लेकर । मठ के ब्राह्मण शिष्य इससे कुढ़ते थे । 

उनमे से एक दिन एक शिष्य ने कहा – महाराज ! आप स्नान करके धनुर्दास को क्यों छूते है ? हमलोग तो आपकी सेवा को सदा प्रस्तुत है । श्री आचार्यस्वामी ने कहा – मै अपने हृदय के अभिमान को दूर करने के लिए ही ऐसा करता हूँ । धनुर्दास का आचरण यहां के  अनेक ब्राह्मणों से उत्तम है ।
आश्रम के लोग धनुर्दास से डाह करते है ,यह देखकर आचार्य जी ने उस भक्त का माहात्म्य प्रकट करके सबका गर्व दूर कर देना चाहा । एक रात अपने एक विश्वस्त शिष्य को उन ब्राह्मण शिष्यो के कपड़ो में से एक – एक बित्ता कपड़ा  फाड़कर चुपचाप ले आनेको उन्होंने कहा । सबेरे अपने फटे कपडे देखकर वे लोग परस्पर झगड़ने लगे ।श्री स्वामीजी ने उन्हें बुलाकर नए कपडे दिए और इस प्रकार संतुष्ट किया । कपडे किसने फाड़े यह बात छिपी ही रही ।

कुछ दिनों बाद उन्ही शिष्यो में से कुछ को बुलाकर स्वामी जी ने कहा – आज हम धनुर्दास को यहाँ अधिक रात तक सत्संग में रोक रखेंगे ।तुमलोग उसके घर जाकर हेमाम्बा (धनुर्दास की पत्नी ) के गहने चुरा लाना और लाकर हमें दे देना । अँधेरा होनेपर वे लोग धनुर्दास के घर गए । किवाड खुले थे और हेमाम्बा पलंगपर लेटी हुई पतिके आने की प्रतीक्षा कर रही थी । श्री वैष्णवो को लुकते – छिपते दबे पैर घर में घुसते देखकर वह समझ गयी की ये लोग कुछ चोरी करने आये है । वैष्णव वेष के प्रति इसके मन में बड़ी श्रद्धा थी अतः उसने नेत्र बंद कर लिए और झूठे खर्राटे लेने लगी । उसे इस प्रकार बेसुध सोते देख आये लोगो ने उनके शरीर पर एक ओर के गहने जो ऊपर थे ,धीरे – धीरे उतार लिये । हेमाम्बा ने सोचा की ये लोग शरीर के दूसरे ओर के गहने भी ले लें तो अच्छा ।

उसने करवट बदली ; किंतु आये लोगोंने समझा कि वह नींद से जगनेवाली है । वे लोग भाग गए । मठपर जब यह लोग पहुँच गए, तब श्री रामनुजस्वामी जी ने धनुर्दास को घर जाने की आज्ञा दी । उसके जानेपर इन ब्राह्मण शिष्यो से स्वामी ने कहा – अब तुमलोग छिपकर फिर धनुर्दास के घर जाओ और देखो के वे दोनों स्त्री- पुरुष क्या बात करते है । वे लोग फिर धनुर्दास के पीछे छिपते हुए उसके घर आये । धनुर्दास घर पहुंचे । पत्नी से सब बातें सुनकर वे बहुत ही दुःखित हो गये । उन्होंने स्त्री से कहा – तुम्हारी धन दौलत की लालच अभी गयी नहीं । तुच्छ गहनों के लोभ में तुमने उन श्री वैष्णवो को करवट बदलकर चौंका दिया । मै तुम्हे अब अपने पास नहीं रखूँगा । वैष्णवो और भक्तो में श्रद्धा,  भक्ति जिसमे नहीं ,उससे मुझे क्या प्रयोजन है । 

बेचारी स्त्री रोते – रोते पतिके पैरोंपर गिर पड़ी । उसने कहा – नाथ ! मैंने तो करवट इसीलिए बदली थी कि शरीर के दूसरे ओर के गहने भी वे लोग ले लें ; पर मेरे दुर्भाग्य से वे भाग गये । मेरे अपराध को आप क्षमा कर दें । अब मै बहुत अधिक सावधान रहूंगी । किसी प्रकार धनुर्दास ने उसको क्षमा किया । वे ब्राह्मण शिष्य जब लौट आये ,तब उनकी बातें सुनकर श्री रामानुजाचार्य जी ने उस दिन के वे फटे कपडे निकालकर उन्हें दिखाते हुए कहा – तुमलोग इतने -से कपड़ो के लिए झगड़ते थे और धनुर्दास की वैष्णव भक्ति तुमने देख ही ली। मै इसीलिए उसका आदर करता हूँ ,और स्नान के बाद उसका सहारा लेकर लौटता हूँ । 

प्रातः काल धनुर्दास को बुलाकर गहने लौटाते हुए उन्होंने कहा – ये गहने मैंने कुछ विशेष कारण से मँगवाये थे । तुम कुछ बुरा मत मानना । धनुर्दास आचार्यस्वामी के चरणों में गिर पड़ा । उसने कहा – प्रभो ! मै तो आपका दास हूँ । मेरा शरीर और जो कुछ भी है,वह सब आपका ही है । इसमें बुरा मानने की क्या बात है । इस घटना के बाद  वे सब ब्राह्मण धनुर्दास स्वामी जी का बहुत आदर करने लगे । 

श्री गुरु परंपरा और मोक्ष :

धनुर्दास जी नित्य प्रति श्री रामानुजस्वामी के सत्संग में जाया करते । एक बार स्वामी जी रामायण के अंतर्गत, विभीषण की शरणागति पर व्याख्यान कर रहे थे ।वहाँ उपस्थित वैष्णव जनों में धनुर्दास उठकर आचार्य स्वामी से अपनी समस्या का हल पूछते हैं – यदि शरणागत भक्त विभीषण को स्वीकार करने के लिए श्री राम लम्बे समय तक सुग्रीव और जामवंत से विचार विमर्ष करते हैं, तो मेरे जैसा संसार के जंजाल में पडे व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति कैसे होगी? श्री रामनु जस्वामी जी उत्तर देते हुए कहते हैं – यदि मुझे (गुरु को) मोक्ष प्राप्त होगा तो तुम्हें भी होगा, अगर मेरे गुरुदेव महापूर्ण स्वामी जी को मोक्ष प्राप्त होगा तो मुझे भी होगा , यदि  दादा गुरु आलवंदार स्वामीजी को मोक्ष प्राप्त होगा तो मुझे और मेरे गुरुदेव को भी होगा ।

इस तरह यह कड़ी है , जिस तरह लोहे की जंजीर है । उसमे एक एक कड़ी सबसे जुडी है । यदि कोई पहली कड़ी पकड़ कर खींचे तो स्वतः ही सब कड़ियाँ साथ आएँगी । इस तरह गुरु परंपरा की माला भगवान् श्री वैकुण्ठ नाथ तक जाएगी । प्रपत्ति (शरणागति ) का अर्थ ही है – शरणागत पहले ही स्वीकार कर लेते है की अंतिम समय में हमें श्रीभगवान् की याद आए या नहीं निश्चित नहीं है । हम पहले ही हार मानते है । प्रभि से प्रार्थना करते है की आप समर्थ है ,आप ही अपनी और से कृपा करके हमें याद कर लेना । भगवान् भी कहते है यदि शरणागत भक्त अंतिम समय में हमें याद न कर पाये तो हम स्वयं ही उसे याद कर लेते है । आगे विभीषण का उदहारण देते हुए स्वामी जी कहते है – जैसे वे चार राक्षस जो विभीषण के साथ आए थे उन्हें भी श्री रामचंद्र जी ने विभीषण के संबंध से स्वतः ही तार दिया ।

श्री रामानुजाचार्य और धनुर्दास में परस्पर प्रेम :

श्री रामानुजस्वामी जी को एकबार श्रीरंगम से तिरुमला जाना था । उस समय मठ के अन्न भण्डार का नियंत्रण धनुर्दास करते थे । स्वामी जी एक श्रीवैष्णव को भण्डार से  कुछ चावल लाने के लिए भेजते हैं। जब धनुर्दास को यह बात पता चलती है की स्वामी जीे श्रीरंगम से बहार जाने वाले है, वे अन्न भण्डार में जाकर बहुत दुखी होकर रोने लगते हैं। श्री रामानुजस्वामी जी में उनका बड़ा प्रेम था ,उनका विरह धनुर्दास जी सहन नहीं कर सकते थे । वह श्रीवैष्णव लोग आचार्यस्वामी जी के पास लौटकर उन्हें पूरी घटना बताते हैं और धनुर्दास का भाव समझकर  स्वामी जी कहते हैं कि वे भी धनुर्दास से वियोग नहीं सह सकते।

भगवान् श्री रंगनाथ की सेवा में सावधानी :

श्री धनुर्दास जी भगवान् श्री रंगनाथ की सवारी के दौरान सावधानी से भगवान् को देखते हुए उनके सन्मुख चला करते थे और अपने हाथों को तलवार पर रखते थे । यदि भगवान् को जरा सा भी झटका लग जाए या कष्ट पहुंचे , तो वे तलवार से स्वयं को घाव मार लेते  । कभी मारा तो नहीं ,इससे स्पष्ट है की वे भगवान की सवारी को ले जाते समय धनुर्दास जी जरा सी भी गलती नहीं करते थे ।

वैष्णव चरण रज का प्रभाव :

धनुर्दास जी के दो भतीजे श्री नारायण भगवान्  के स्वरुप में अनन्य श्रद्धा रखते थे । अन्य किसी भी देवता को किया गया प्रणाम् भगवान् श्रीकृष्ण को ही जाता है ऐसा वे मानते थे । एक दिन वंदर और चोंदर दोनों राजा के साथ बहार जाते हैं। राजा उन्हें एक जैन मंदिर दिखाकर, उसे श्री नारायण भगवान का मंदिर बताते हुए कहता है की- यहां प्रणाम करो । उस मंदिर की वास्तुकला दक्षिण के विष्णु मंदिरो जैसे दिखाई पड़ती थी अतः वे दोनों उसे श्रीविष्णु मंदिर समझकर तुरंत प्रणाम करते हैं । 

उसके बाद राजा उन्हें बताता है कि यह कोई नारायण मंदिर नहीं अपितु एक जैन मंदिर है। वंदर और चोंदर यह जानकर की उन्होंने श्री नारायण भगवान के अतिरिक्त अन्य किसी को प्रणाम किया है, तुरंत मूर्छित  हो जाते हैं। कहते है की बहुत उपायो से ये दोनों नहीं उठे , किसी ने बताया की अनन्य गुरु और नारायण भक्त वैष्णवो की चरण रज से इनकी मूर्छा होगी । धनुर्दास यह वृत्तांत सुनकर उनके पास दौड़ते हुए जाते है और वैष्णवो के चरणों की धूल उनके माथे पर लगाते हैं । दोनों भतीजे उसी समय होश में आकर उठ जाते हैं। 

श्री धनुर्दास और श्री हेमाम्बा का वैकुण्ठ गमन :

कुछ काल बीतनेपर धनुर्दास जी को वैकुण्ठ धाम पधारने की प्रेरणा हुई । वे सभी श्री वैष्णवों को आमंत्रित करके अपने वैकुण्ठ गमन की बात बताते है । सभी श्रीवैष्णवो का पूजन करते है ,भोजन पवाते है और उनका चरण तीर्थ ग्रहण करते है । धनुर्दास जी हेमाम्बा को बताते हैं कि वे वैकुण्ठ प्रस्थान करने वाले है और हेमाम्बा को यहीं रहकर सेवा भगवान् और भक्तो की सेवा करनी है। श्री रामानुज स्वामी जी की पादुकायें अपने मस्तक पर रखकर, वे अपने शरीर का त्याग करते हैं। श्री वैष्णव उनकी अंतिम यात्रा की तैयारी करते हैं, कावेरी नदी का जल लाकर उन्हें ऊर्ध्वपुण्ड्र से सुसज्जित आदि करते हैं। पत्नी हेमाम्बा भी प्रसन्न होती है की पतिदेव अपने प्रियतम प्रभु से मिलने वैकुण्ठ जा रहे है । प्रसन्न मन से उस स्थान की सजावट करती है परंतु जब धनुर्दास के शरीर को वैष्णव लोग पालकी पर ले जाते है और वे सड़क के अंतिम छोर तक पहुँचते है, पत्नी हेमाम्बा धनुर्दास ला वियोग सहन नहीं कर पाती । वह जोर जोर से विलाप करती हुई उसी क्षण अपना शरीर भी त्याग देती है। सभी श्री वैष्णव जान उन्हें देखकर चकित रह जाते हैं और उसी समय उन्हें भी धनुर्दास के साथ ले जाने की व्यवस्था करते हैं। इस तरह हेमाम्बा का भी धनुर्दास ,आचार्य स्वामी और वैष्णवो की सेवा द्वारा उद्धार हो गया  और भगवान् के धाम को पधार गयी।

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