सुंदर कथा ७२ (श्री भक्तमाल – श्री गरुड जी ) Sri Bhaktamal – Sri Garud ji

भगवान् श्रीहरि के वाहन और उनके रथ की ध्वजा में स्थित विनता नंदन गरुड भगवान की विभूति हैं । वे नित्यमुक्त और अखंड ज्ञानसम्पन्न हैं । उनका विग्रह सर्ववेदमय है । श्रीमद्भागवत में वर्णन है कि बृहद्रथ और रथन्‍तर नामक सामवेद के दो भेद ही इनके पंख हैं । उडते समय उन पंखो से सामवेद की ध्वनि निकलती रहती है । वे भगवान् के नित्य परिकर और भगवान् के लीलार्स्वरूप हैं । देवगण उनके परमात्मरूप की स्तुति करते हुए कहते है – 

खगेश्वरं शरणमुपागता वयं महौजसं ज्वलनसमानवर्चसम् तडित्प्रभं वितिमिरमभ्रगोचरं महाबलं गरुडमुपेत्य खेचरम्।।
( महाभारत, आदिपर्व २३ । २२ )

अर्थात् आप ही सभी पक्षियों एवं जीवों के ईश्वर हैं। आपका तेज महान् है तथा आप अग्नि के समान तेजस्वी हैं । आप बिजली के सदृश चमकते है । आपके द्वारा अविदद्या का नाश होता है । आप बदलो की भाँति आकाश में स्वच्छन्द विचरण करनेवाले महापराक्रमी गरुड है । हम सभी आपके शरणागत हैं । 

श्रीमद्भागवत पुराण में भगवान् का कथन है- सुपर्णोऽहं पतत्त्रिणाम् ( श्रीमद्भागवत ११ । १६ । १५ ) पक्षियों में मैं गरुड हूँ । श्रीमद्भगवत गीता में भगवान् कहते है वैनतेयश्च षक्षिणाम् ( गीता १० । ३० ) अर्थात पक्षियो में मैं विनता का पुत्र गरुड हूँ । 

गरुड जी का आविर्भाव –

सत्ययुग की बात है, दक्ष प्रजापति की दो कन्याएँ थी – कद्रू और विनता । इन दोणो का विवाह महर्षि कश्यप से हुआ । महर्षि कश्यप ने दोनों धर्मपत्नियो को प्रसन्नतापूर्वक वर देते हुए कहा – तुम में जिसकी जो इच्छा हो, वर मांग लो । कद्रू ने तेजस्वी एक हजार नागों को पुत्र रूप में पाने का वर मांगा जबकि विनता ने बल, तेज, पराक्रम में कद्रू के पुत्रो से श्रेष्ठ दो ही पुत्र मांगे । तुम दोनों यत्नपूर्वक अपने अपने गर्भ की रक्षा करना – ऐसा कहकर महर्षि कश्यप वन में तपस्या करने चले गये । कद्रू ने एक हजार तथा विनता ने मात्र दो अण्डे दिये । कद्रू के पुत्र अंडो से निकल गये परंतु विनता के दोनों अण्डो से कोई बच्चा बाहर नही निकला । 

विनता ने उत्सुकतावश एक अण्डे को तोड दिया और देखा कि उसके पुत्र के शरीर का ऊपरी भाग तो विकसित हुआ है परंतु निचला भाग अविकसित है । उस बालक अरुण ने क्रोध मे आकार शाप दिया की उसने उसके शरीर के विकास मे बाधा पहुंचायी है, अत: वह ५०० वर्ष तक कद्रू की दासी बनेगी । परंतु यह भी कहा कि दूसरे अण्डे से जो बच्चा निकलेगा, वह उसे शापमुक्त करेगा । शर्त यह है कि वह धैर्यपूर्वक अण्डे से बालक के निकलने की प्रतीक्षा करे । यह कहकर अरुण आकाश में उड गये । अरुण ही सूर्यदेव के रथ के सारथी बन गये । तदनन्तर समय पूरा होनेपर सर्पसंहारक गरुड जी का जन्म हुआ । 

गरुड जी की तेजोमयी कान्ति –

गरुड जी जन्म से ही महान् साहस और पराक्रम से सम्पन्न थे । उनके तेज से सम्पूर्ण दिशाएँ प्रकाशित हो रही थी । उनमें अपनी इच्छा से नाना रूप धारण करने की क्षमता भी थी । उनका प्राकट्य आकाशचारी पक्षी के रूप मे ही हुआ । वे जलती हुई अग्नि के समान उद्भासित होकर प्रलयकाल की अग्नि के समान प्रज्वलित एवं प्रकाशित हो रहे थे । उनका शरीर थोडी ही देर मे विशाल हो गया तथा भयंकर आवाज के साथ वे आकाश में उड़ गये । सभी देवतागण भगवान् के रूप मे उनकी स्तुति करने लगे –

त्वं प्रभुस्तपन: सूर्य: पस्मेष्ठी प्रजापति: । 
त्वमिन्द्रस्त्वं हयमुखस्त्वं शर्वस्त्वं जगत्पति: ।। 
त्वं मुखं पद्मजो विप्रस्त्वमग्नि: पवनस्तथा । 
त्वं हि धाता विधाता च त्वं विष्णु: सुरसत्तम: ।। 
(महाभारत आदिपर्व २३ । १६-१७ )

आप ही प्रभु ,तपन, सूर्य, पस्मेष्ठी और प्रजापति है । आप ही इन्द्र, हयग्रीव, शिव तथा जगत्पति है । आप ही भगवान् के मुखस्वरूप ब्राह्मण, पद्मयोनि ब्रह्मा तथा विज्ञानवान् विप्र है ।आप ही अग्नि, वायु , धाता, विधाता , तथा देवश्रेष्ठ श्री विष्णु है । खगश्रेष्ठ ! आप अग्नि के समान तेजस्वी इस रूप को शान्त कीजिये । क्रोध में भरे हुए यमराज के समान आपकी कान्ति देखकर हमारा मन चंचल हो रहा है । आप अपना तेज समेटकर हमारे लिये सुखदायक हो जाइये । देवताओं की स्तुति सुनकर गरुड जी ने अपने तेज को समेट लिया ।

माता की दासत्वमुक्ति हेतु अमृत लाना –

एक दिन कद्रू और विनता दोनों ने उच्चै:श्रवा घोड़े को आकाश मे देखा और दोनों में इस घोड़े के रंग को लेकर बहस होने लगी । विनता ने कहा यह घोड़ा पूर्ण श्वेत है किन्तु कद्रू ने कहा की घोड़े की पूँछ काली है। दोनों में शर्त लगी कि जिसकी बात गलत निकली वह दूसरी बहन की दासी बन कर रहेगी। अगले दिन दोनों ने निश्चय किया की वो उड़ कर जायेगी और घोड़े के रंग की जाँच करेंगी। कद्रू ने अपने पुत्रों से कह दिया की वे जाकर उच्चै:श्रवा घोड़े की पूँछ पर बालों की तरह लिपट जायें जिससे उसकी पूँछ काली लगे। उन सब ने ऐसा ही किया और इस कारण से विनता शर्त हार गयी । 

गरुड जी की माता विनता सर्पो की माता कद्रू की दासी बन कर रहने लगी थी । इससे गरुड को बहुत दुख था, उन्होचे सर्पो से अपनी माता को दास्य भाव से छुडाने के लिये शर्त जाननी चाही । इसपर सर्पो ने कहा कि यदि तुम हमे अमृत लाकर दे दो तो तुम्हारी मां दास्य भाव से मुक्त हो जायगी । अत: गरुड अमृतकलश लाने का निश्चय किया । अमृत कलश इंद्र द्वारा रक्षित था, जिसकी देवगण रक्षा कर रहे थे । देवगुरु बृहस्पति जी ने सभी देवताओं को यह कहकर सतर्क किया कि पक्षिराज गरुड महान् शक्तिशाली है, वे अमृत का हरण करने आ रहे है ।देवगुरु बृहस्पति जी की बात सुनकर सभी देवता युद्ध करने के लिये तैयार हो गये किंतु पक्षिराज गरुड को देखकर वे काँप उठे ।

विश्वकर्मा अमृत की रक्षा कर रहे थे, परंतु गरुड जी से युद्ध मे वे पराजित हो गये । पक्षिराज गरुड ने अपने पंखो से धूल उडाकर समस्त लोको मे अन्धकार का दिया । देवगणों को अपनी चोंच से घायल का दिया । इसके उपरान्त गरुड जी ने अपना लघु रूप बनाकर अमृत का हरण कर लिया । पक्षिराज गरुड को अमृत का अपहरण कर ले जाते देख इन्द्र ने रोष में भरकर वज्र से उनपर प्रहार किया । विहंगप्रवर गरुड जी ने वज्र से आहत होकर भी हंसते हुए कहाँ- देवराज ! जिनकी हड्डी से यह वज्र बना है, उन महर्षि का मै सम्मान करता हूं । शतक्रतो ! उन महर्षि के साथ ही साथ आपका भी सम्मान करता हूँ इसलिये अपना एक पंख जिसका आप अन्त नहीं पा सकेंगे ,को मै त्याग देता हूँ । आपके वज्र से मै आहत नहीं हुआ हूं  । उस गिरे हुए पंख को देखकर देवता लोगो ने कहा –

सुरुपं पत्रमालक्ष्य सुपर्णोऽयं भवत्विति । 
तत् दृष्टा महदाश्चर्यं सहस्राक्ष: पुरन्दर: ।
खगो महदिदं भूतमिति मत्वाभ्यभाषत ।।
(महाभारत आदिपर्व ३३ । २४) 

जिसका यह सुंदर पंख है ,वह पक्षी सुपर्ण नाम से विख्यात हो । वज्र की असफलता देख सहस्त्रनेत्र वाले इंद्र ने मन ही मन विचार किया – अहो ,यह पक्षीरूप में कोई महान् प्राणी है । यह सोचकर इंद्र ने कहा – 

बलं विज्ञातुमिच्छामि यत्ते परमनुत्तमम् ।
सख्यं चानन्तमिच्छामी त्वया सह खगोत्तम ।।
(महाभारत आदिपर्व ३३।२५)

विहंगप्रवर ! मैं आपके बलको जानना चाहता हूँ और आपके साथ ऐसी मैत्री स्थापित करना चाहता हूँ जिसका कभी अन्त न हो । गरुड जी ने कहा –

कामं नैतत् प्रशंसन्ति सन्त: स्वबलसंस्तवम् । गुणसंकीर्तनं चापि स्वयमेव शतक्रतो ।। ( महाभारत आदिपर्व ३४। २) 

शतक्रतो ! साधु पुरुष स्वेच्छा से अपने बलकी प्रशंसा तथा अपने ही मुखसे अपने गुणों का बखान अच्छा नहीं मानते, किंतु सखे ! तुमने मित्र मानकर पूछा है, इसलिये मै बता रहा हूँ –

सपर्वतवनामुर्वीं ससागरजलामिमाम् ।
वहे पक्षेण वै शक्र त्वामप्यत्रावलम्बिनम् ।।
सर्वान् सम्पिण्डितान् वापि लोकान् सस्थाणुजंगमान् ।
वहेयमपरिश्रान्तो विद्धीदं मे महत् बलम्।। 
( महाभारत आदिपर्व ३४ । ४,५ ) 

अर्थात् हे इन्द्र ! पर्वत, वन और समुद्र के जलसहित सारी पृथ्वी को तथा इसके ऊपर रहनेचाले आपको भी अपने एक पंखपर उठाकर मै बिना परिश्रम के उड सकता हूँ अथवा सम्पूर्ण चराचर लोको को एकत्र करके यदि मेरे  ऊपर रख दिया जाय तो मै सबको बिना परिश्रम के ढो सकता हूँ । इससे तुम मेरे महान् बल को समझ लो ।

अमृत लेकर लौटते समय भगवान् से वरप्राप्ति –

भगवान् विष्णु ने गरुड जी के पराक्रम से संतुष्ट होकर उन्हे वर मांगने के लिये कहा । गरुड जी ने वर माँगा -हे प्रभो ! मैं आपके ध्वज मे स्थित हो जाऊँ । हे भगवन् ! मैं बिना अमृत पान के ही अजर-अमर हो जाऊं । भगवान् नेे एवमस्तु कहकर वर प्रदान किया । उसके उपरान्त गरुड जी ने भगवान् विष्णु जी को वर मांगने कहा । भगवान्  विष्णु ने वर माँगा –

तं वव्रे वाहनं विष्णुर्गरुत्मन्तं महाबलम्। । (महाभारत आदिपर्व ३३ । १६) 

महाबली गुरुत्मन् ! आप मेरे वाहन हो जायँ । इस प्रकार भगवान् विष्णु ने गरुड जी को अपना वाहन बनाया और अपने ध्वज के ऊपर स्थान भी दिया। अमृत प्राप्तकर गरुड जी ने नागो के सामने अमृत रखा और अपनी माता विनता को दासत्व मुक्त करा लिया । 

श्री गरुड जी के द्वादश नामो का माहात्म्य –

सुपर्णं वैनतेयं च नागारिं नागभीषणम् । जितान्तकं विषारिं च अजितं विश्वरूपिणम्। गरुत्मन्तं खगश्रेष्ठं ताक्ष्र्यं कश्यपनन्दनम् । द्वादशैतानि नामानि गरुडस्य महात्मन: । य: पठेत् प्रातरुत्थाय स्नाने व श्यनेऽपिवा ।। विषं नाक्रामते तस्य न च हिंसन्ति हिंसका: । सग्रामे व्यवहारे च विजयस्तस्य जायते।। बन्धनान्मुक्तिमाप्नोति यात्रायां सिद्धिरेव च ।। (बृहद्तन्त्रसार) 

महात्मा गरुड के बारह नाम इस प्रकार हैं ( १ ) सुपर्ण (सुन्दर पंखो वाला ) , ( २ ) वैनतेय (विनता के पुत्र), (३) नागारि (नागोके शत्रु), (४) नागभीषण (नागो के लिये भयंकर) , (५) जितान्तक (काल को भी जीत लेनेवाले) , (६) विषारि ( विषके शत्रु) , (७) अजित (अपराजेय), (८) विश्वरूपी (सर्वस्वरूप) , ( ९ ) गरूत्मान् ( अतिशय पराक्रमसम्पन्न) , ( १० ) खगश्रेष्ठ (पक्षियो मे सर्वश्रेष्ठ) , ( ११ ) ताक्ष्र्य (गरुड) तथा ( १२ ) कश्यपनंदन (महर्षि  कश्यप के पुत्र) 

इन बारह नामो का जो नित्य प्रात:काल उठकर स्नान के समय या सोते समय पाठ करता है, उसपर किसी भी प्रकार के विष का प्रभाव नहीं पडता, उसे कोई हिंसक प्राणी मार नहीं सकता, युद्ध में तथा व्यव्हार में उसे विजय प्राप्त होती है, वह बंधन से मुक्ति प्राप्त कर लेता है और उसे यात्रा मे सिद्धि मिलती है ।

12 thoughts on “सुंदर कथा ७२ (श्री भक्तमाल – श्री गरुड जी ) Sri Bhaktamal – Sri Garud ji

  1. दास जिज्ञेश कहते हैं:

    सर्वप्रथम तो मैं अपनी उन गलत टिप्पणीयो के लिए क्षमा मांगते है जो हमने संस्कार चैनल पे whats app के द्वारा की थी और कोई सौगंध दी हो तो उससे भी सभी संतो को
    मुक्त करता हू।

    • श्री गणेशदास भक्तमाली प्रभुचरण कहते हैं:

      भक्तमाल पढ़ कर संतो का महात्म्य पता चलता है । पुराने काल से संतो को फ़साने और बदनाम करने की साजिश चली आ रही है । वह भले ही इस्लाम का काल हो ,अंग्रेज़ो का गो , या आज के सत्ता के लालच में भरे लोगो का । कौन संत कैसे है ये केवल tv और सुनी सुनाई बातो से हम नही कह सकते । सीताराम ।

    • दास जिज्ञेश कहते हैं:

      मै यह बताना चाहता हू महाराजजी की मै वही हू जिसने पिछले साल जिसने संतोषभाई के लिए अपशब्द का प्रयोग किया था । इतना ही नही रामजी के नाम की सौगंध भी दे दी थी । कुछ समय बाद मुझे इसके कारण बहुत आत्मग्लानि हुई । इसलिये यह दास आप सभी संतो से क्षमा मांगता और अपनी रामजी के नाम पे दी हूई सौगंध को सभी संतो और वक्ताओ पर से निरस्त्र करता है और पुनः कहता है कि मुझको बालक समझकर क्षमा करे। आज इस पापमोचिनी एकादशी के दिन हमारे इस महापाप के लिए क्षमा करे

      • श्री गणेशदास भक्तमाली प्रभुचरण कहते हैं:

        आम कोई संत तो नही है परंतु आपने जो पश्चाताप किया है अपनी गलती का यही सर्वोत्तम है । आज एकादशी भी है । अगर कोई धर्म के नाम पर गलत काम करता है तो उसे प्रभु शिक्षा देंगे । हैम लोग किसीको भी कुछ बोलना टाले तो सही है । क्योंकि बाहर से वह यदि ढोंगी भी दिखाई पड़ता हो परंतु भीतर से भक्त होगा तो महापाप पड़ेगा हमे। और बाहर से यदि किसी के शरीर पर माला, तिलक ने भी दिखाई पड़े और वो अंदर से भक्त हो, उसे भी हमने कुछ कह दिया तो भी पाप पड़ेगा क्योंकि वो छुपा हुआ गुप्त भक्त है। इसीलिए किसी की निंदा करने के लिए संत मना करते है । हमने बड़े बड़े लोगो को गिरते देखा है संतो के अपराध से ।

  2. दास जिज्ञेश कहते हैं:

    इसलिए आप हमारा संदेश जगद्गुरु द्वाराचार्य राजेन्द्रदासजी महाराज जी तक पहुंचा दे यह हमारी विन्ती है।क्योंकि वो संतोषभाई का नेतृत्व करते है

  3. दास जिज्ञेश कहते हैं:

    आज अचानक पुजा करते समय मुझे अपनी एक और गलती के बारे मे याद आया कि मैने जगतगुरू स्वामी रामभद्राचार्यजी, श्री कृष्ण चंद्र शास्त्री और श्री मुरलीधरजी महाराज को भी गलती से भिन्न भिन्न प्रकार की सौगंध दे
    दी। जो कि एक बहुत बड़ा पाप था । में अपने इस पाप के लिए क्षमा मांगते हुए अपनी सौगंध, जो मैंने इनके संतो को दी थी उस सौगंध को आज रामनवमी के दिवस पर निरस्त करता हु । साथ साथ जगतगुरू रामभद्राचार्यजी महाराज के जो शिष्य है जो उनकी हर कथा में उनके लंबे नाम उच्चारण द्वारा उनका गुणगान करते है,अगर अंजाने मेरे मेने उन्हे भी ऐसी कोई सौगंध दी हो तो उसे भी निरस्त करता हुए और अनुरोध करता हू कि; अब से वे लोगो के साधारण प्रश्नोत्तर का  स्वयं भी उतर दे; श्री कृष्ण चंद्र शास्त्री महाराज अपनी  कथा जारी रखते हुए  you tube पर अपने सुंदर सुंदर  भजन ङालना पुनः शुरू करे और मुरलीधरजी महाराज अपनी थोड़ी कथाए संस्कार पर भी करते हुए अपनी वही पुरानी सुरताल वाली  हनुमान चालीसा गाए । क्योकि मेरे यह संदेश उनतक सीधे नही पहुंचा सकता तो मेरी आपसे नम्र विनती है कि  आप यह संदेश उनतक पहुंचा दीजिए  जिनके उपर नाम लिखे है और कहिये कि इसे मेरी भूल समझकर क्षमा करे ।और भी बहुत कुछ बताना है, परंतु समय की कमी है ।

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