सुंदर कथा ७३ (श्री भक्तमाल – श्री गोरा कुम्हार जी ) Sri Bhaktamal – Sri Gora kumhar ji

पूज्यपाद संत श्री महीपति महाराज , भीमास्वामी रामदासी , श्री नामदेव गाथा के आधार पर और श्री वारकरी संतो के कृपाप्रसाद से प्रस्तुत भाव ।कृपया अपने नाम से प्रकाशित ना करे। http://www.bhaktamal.com  ®

श्री गोरा जी का जन्म :

संतश्रेष्ठ शिरोमणी ज्ञानदेव जी के समकालीन अनेक श्रेष्ठ संत हुए है , उनमे से एक संत गोरा कुम्हार भी एक थे । सारी संत मंडली में संत गोरा कुम्हार सबसे ज्येष्ठ थे अतः उन्हें प्रेम से सब गोरोबा काका अथवा गोरई काका भी कहते थे । महाराष्ट्र के उस्मानाबाद जिले के अंतर्गत धाराशिव नामक गाँव है । इस गाँव का मूल नाम त्रयीदशा है परंतु वर्तमान में इसका नाम तेरेढोकी है । यही पर संत गोरा कुम्हार का जन्म हुआ था ।  संतजन इनका जीवन काल सामान्यतः इ.स १२६७ से १३१७ तक मानते है ।तेरेढोकी श्रीक्षेत्र पंढरपूर से लगभग ३० कोस की दूरी होने के कारण उनका पंढरपूर धाम में आना जाना होता था । वे निष्ठावान वारकरी संत थे । गृहस्थ होते हुए भी परम विरक्त रहे इसीलिए संत नामदेव जी ने गोरई काका को वैराग्य का मेरु कहा है ।

संत श्री गोरा कुम्हार ऊँचे अधिकारी सिद्ध पुरुष थे । उनकी गुरु परंपरा श्री ज्ञानदेव और नामदेव की तरह ही नाथपंथीय थी । इनके गुरुदेव थे सिद्ध संत श्री रेवणनाथ जी । अनेक पीढ़ियो से इनके घर में मिट्टी घड़े मटके ,बर्तन आदि बनाने का काम चला आ रहा था । विट्ठल भक्ति भी गोराई काका के परिवार में पहले से चली आ रही थी । इनके माता का नाम श्रीमति रुक्मिणी बाई और पिता का नाम श्री माधव जी था । माता पिता दोनों ही भगवान् श्री कालेश्वर (शिव ) के निष्ठावान उपासक थे परंतु वे पांडुरंग विट्ठल भगवान् में भी समान श्रद्धा रखते थे । हरी हर को एकत्व मान कर दोनों भजन में मग्न रहते थे । उन्हें आठ संताने प्राप्त हुई परंतु सब के सब मृत्यु का ग्रास बन गए । उनके सारे बच्चे मृत्यु को प्राप्त हो गए इस बात से वे बहुत कुछ दुखी थे परंतु निरंतर भगवान् का भजन चलता रहता था । उन्हें लगता था की सारे के सारे बच्चे मर गए ,कम से कम ये अंतिम एक बच्चा भी रह जाता तो हमें प्रसन्नता होती ।

वे दुखी थे की आगे भगवान् पितरों ,संतो की सेवा करने वाला हमारे वंश में कोई बचा ही नहीं । एक दिन वे कह रहे थे की हमारे प्रभु तो काल के भी काल है परंतु फिर भी काल हमारे बच्चों को खा गया , अंतिम बालक भी नहीं बचा । एक दिन भगवान् दोनों पति – पत्नी के घर आये और उन्हें शमशान भूमि की ओर ले गए । वहाँ प्रथा थी की बच्चे मर जानेपर उन्हें भूमि में गाढ़ दिया जाए , इस भूमि को ‘ गोरी ‘ कहा जाता था । भगवान् ने गोरी से उस अंतिम संतान को मिट्टी से ऊपर खिंचा और उसमे प्राण फूंक दिए । भगवान् बच्चे को माधव – रुक्माबाई को द्वकर अंतर्धान हो गए । गोरी से मृत बच्चे को निकालकर जीवन देने की घटना के कारण इसका नाम गोरा अथवा गोराई पड गया ।

संत गोरा कुम्हार नित्य प्रति संत्संग करते और मटके बनाते समय सतत हरिनाम का समरण करते । आषाढ़ी और कार्तिकी एकादशी को गोराई काका सहकुटुंब पंढरपूर में भगवान् और संतो के दर्शन को जाते थे । इसके अतिरिक्त भी समय निकालकर गोराई काका पंढरपूर जाया करते थे । वहाँ संत नामदेव ,कान्होब पाठक , सावता माली , विसोबा खेचर इनका सत्संग प्राप्त होता । धीरे धीरे गोरा कुम्हार भगवान् की भक्ति बढ़ती गयी । गृहस्थ में रहकर भी परम विरक्त की भाँती रहते थे , निरंतर हरिनाम जपते थे । कच्ची मिट्टी के ढेर को को उचित मात्रा में पानी मिलाकर तैयार किया जाता है और बाद में इस मिश्रण को पैरों से कुचला जाता है। जब चिकनी मिट्टी तैयार हो जाती है तो उसे घड़े का आकार देकर आग में पकाया जाता है । संत गोरा कुम्हार जब मिट्टी को मुलायम बनाने के लिए पैरो से कुचलते थे तब वे हरिनाम स्मरण में अपनी सुध बुध भूल कर उन्मत्त नृत्य करने लगते थे । 

संत श्री गोरा जी की कृपा से नामदेव को सद्गुरुदेव भगवान् की प्राप्ति होना :

भगवान् के सखा नामदेव का अहंकार दूर करके उन्हें सद्गुरु की प्राप्ति करानेवाले भी संत गिरा कुम्हार ही है । नामदेव की कीर्ति सर्वत्र फैलने लगी थी , उनका नाम पुरे देश में प्रसिद्ध होने लगा था । भगवान् ने नामदेव के हाथ से भोजन प्रसाद ग्रहण किया और वे उनके साख है ऐसा सब कहा करते थे । कार्तिकी एकादशी के अवसर पर पंढरपूर क्षेत्र में भक्त भगवान् से मिलने आते है , बड़ा उत्सव होता है ,भजन कीर्तन होता है । एक दिन संत श्री ज्ञानेश्वर ,उनके ज्येष्ठ बंधू और सद्गुरु निवृत्तिनाथ ,सोपान और बहन मुक्ताबाई  – ये चारो कार्तिकी एकादशी के दिन पंढरपूर पधारे । ज्ञानेश्वर जी उम्र में छोटे थे परंतु कर्तुत्व से महान् थे ।उस समय ज्ञानदेव और उनके भाई बहनो के संतत्व की चर्चा सर्वत्र चलती थी । इस बालयोगी और उनके भाई बहनो के दर्शन का इंतज़ार नामदेव बहुत समय से कर रहे थे । चंद्रभागा नदी के तट पर इनसब भाई बहनो ने दूर से नामदेव का दर्शन किया । सब एक दूसरे से मिलकर बड़े प्रसन्न हुए । भगवान् के दर्शन करके वे सब लोग संत श्री गोरई काका के घर पधारे ।

गोराई काका के घर सबकी अच्छी प्रकार सेवा हुई ।नामदेव जी बगल में पांडुरंग जैसी मुद्रा में (कमर पर हाथ रखे ) खड़े थे । निवृत्तिनाथ जी बोले – आज नामदेव यहां पांडुरंग स्वरुप में प्रकट हुए है , हमारा सौभाग्य है की आज हमें उनके दर्शन प्राप्त हुए । वे नामदेव जी के पास गए और साष्टांग् दण्डवत् प्रणाम् किया । ज्ञानदेव ,सोपान ने भी प्रणाम् किया ।वारकरी सम्प्रदाय की रीत ही है की अवस्था में कोई छोटा हो या बड़ा , सभी संत वैष्णव वंदनीय है । संत वेश का वे सब सम्मान करते है। नामदेव जी ने पांडुरंग भगवान् जैसी मुद्रा में खड़े होकर अभयकर दिखाकर आशीर्वाद दिया । नामदेव मन ही मन सोचने लगे की पांडुरंग मेरा सखा है ,मै नित्य भगवान् के सान्निध्य में रहता हूँ । मुझे नमस्कार मतलब पांडुरंग को नमस्कार । इन लोगो को पुनः प्रतिनामस्कार करने की तो कोई आवश्यकता नहीं है । छोटो ने बड़ो को तो प्रणाम् करने की तो रीत ही है ।

सबने नामदेव जी को प्रणाम् किया परंतु अभी श्री मुक्ताबाई ने प्रणाम् नहीं किया था । निवृत्तिनाथ जी मुक्ताबाई से कहते है – आओ मुक्ता ! इस महाभागवत के रूप में साक्षात् पांडुरंग यहां आये है , दर्शन करो । क्या तुम्हे पता नहीं की भक्तो ने भक्तो को भगवत्स्वरूप  समझकर उनमे भगवान् का दर्शन करना चाहिए ? श्री मुक्ताबाई बोली – मै क्षमा चाहती हूँ परंतु मुझे तो पांडुरंग माहि दिखाई पड़ते । दीखते है केवल पांडुरंग के अधिक लाड प्यार से अहंकारी बने नामदेव ।भैया ! भक्तो में भगवान् का दर्शन करना चाहिए ये सत्य है परंतु स्वयं को ही भगवान्  समझकर दुसरो को आशीर्वाद  देना और आप जैसे महान् संतो से स्वागत सत्कार करवा लेना सही नहीं । नित्य भगवान् का सान्निध्य प्राप्त करके भी ये मान अपमान में ही फंसा हुआ है ,इसके घर में कामधेनु होनेपर भी यह छांछ मांगने बहार जाता है ।

जब तक इसका भक्ति का अभिमान दूर नहीं होता तब तक इसको प्रणाम् करने का कोई अर्थ नहीं । भगवान् ने इसके हाथ से भोज प्रसाद ग्रहण अवश्य किया पर इसके अंदर का ‘ मै ‘ अभी गया नहीं । भगवान् ने मस्तक का आकार सोच समझ कर ही मटके जैसा रखा है । पास ही कुम्हार की एक थापी और मटके पडे हुये थे । मुक्ताबाई की दृष्टि उसपर पड़ी और उसने पूछा – काका ! आप इस थापी का उपयोग मटका कच्चा है अथवा पक्का इसका निर्णय करने के लिए करते है ना ? गोराई काका बोले – हाँ बेटी । मुक्ताबाई बोली – हम मनुष्य भी तो मिट्टी के घड़े ही तो है ,इस थापी से हम सबकी कच्चाई – पक्कई की परीक्षा कृपा करके आप बतादो । गोराई काका ने थापी उठायी और सबके सिरपर थपकर देखने लगे । सब भक्त यह कौतुक देखने लगे और आघात भी सहन कर लिया । 

उन सब संतो के सिर से ठीक उसी प्रकार की ध्वनि निकली जिस तरह पक्के मटकों से आवाज आती है । नामदेव के सिरपर थापी लगते ही उसमे से कच्चे घड़े जैसी आवाज आयी । गोराई काका कहने लगे – यह घड़ा कच्चा रह गया है , इसको अभी पक्का करना पड़ेगा । नामदेव क्रोध में भरकर बोले – गोराई काका ! ये क्या कोई आदर सत्कार की रीति है ? गोराई काका ने कहा – तुम्हारा ज्ञान अभी परिपूर्ण नहीं है नामा । भक्ति में अहंकार बाधक है , तुम्हे समर्थ सद्गुरु के सामने नत होना होगा और उसके चरणों में अपना अहंकार लीन करना होगा । नामदेव सीधे पंढरपूर आये और भगवान् के मंदिर में जाकर उनसे कहने लगे – प्रभो ! इन सब संतो ने मेरा घड़ा कच्चा बताया । मेरी हँसी उड़ गयी ,अब मै क्या करू ? भगवान् ने हंस कर कहा – नामा ! तुम्हारा भक्तिभाव निर्मल , तुम्हारा दातृत्व विशाल , तुम्हारा परोपकार महान् परंतु अहंकार भक्ति में बाधक है ।

मै केवल तुम्हारे अंदर ही नहीं अपितु उन सब संतो और कण कण में हूँ । तुम मुझे केवल इस मूर्ति में देखते हो । जब तुम सर्वत्र मेरा दर्शन करने लगोगे तब मन में छोटे बड़े का भेद नहीं रह जायेगा । संत भीतर बहार दोनों में मेरा दर्शन करते है तभी तो छोटे बड़े का भेद नहीं उनमे । तुम्हे समर्थ महापुरुष की शरण ग्रहण करनी होगी । भगवान् ने कहा – नामा ! तुम औंढ्या नागनाथ तीर्थक्षेत्र में जाओ , वहाँ विशोबा खेचर नामके सिद्ध महात्मा को ढूंढ कर उनकी शरण ग्रहण करो । भगवान् श्री विट्ठल की अनुमति लेकर नामदेव उस क्षेत्र में गए जो द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक है । विशोबा खेचर को देखते देखते नामदेव जी महादेव मंदिर में आ गए । वह मंदिर प्रचंड था ,उसके आस पास महादेव के छोटे छोटे बहुत से मंदिर थे । वही पर नामदेव जी ने एक विचित्र दृश्य देखा । एक वृद्ध पागल सा लगने वाला व्यक्ति शिवलिंग पर पेअर रखकर विश्राम कर रहा है । नामदेव जी की तो बुद्धि ही चकरा गयी ।

नामदेव जी ऊँची वाणी में बोले – ओ बाबाजी ! आपको पता भी है आप किसपर पैर रखकर सो रहे है , आपका ध्यान भी है इसकी ओर ? वह वृद्ध व्यक्ति बोला – क्या करुँ बेटा ,आयु अधिक होने के कारण शरीर में बल नहीं है ,दृष्टि कमजोर हो गयी है , मुझे तो कुछ पता नहीं । नामदेव बोले – बाबाजी ! आप शिवलिंग पर पैर रखकर लेटे है । वृद्ध व्यक्ति बोला – अच्छा ऐसी बात है । जहां भगवान् नहीं है वही मेरा पैर कर दो । नामदेव जी ने उनके पैर दूसरी ओर कर दिए परंतु आश्चर्य ! उनके पैरो के निचे फिर शिवलिंग प्रकट हो गया ।  नामदेव जी ने उन बाबाजी को उठाकर बहार लाये और एक खम्बे के पास उन्हें लेटा दिया परंतु वहाँ भी शिवलिंग प्रकट हुआ । फिर से उन्हें उठाकर एक शीला पर लेटा दिया नामदेव ने परंतु वहाँ भी शिवलिंग प्रकट हो  गया ।

नामदेव जी थक कर बैठ गए , उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा था की यह सब क्या हो रहा है । उसी क्षण वह वृद्ध बाबाजी उठ खड़े हुए और नामदेव जी की पीठपर प्रेम से हाथ फेरकर बोले – अरे नामा ! जहां भगवान् नहीं ऐसी जगह तुम्हे कैसे मिलेगी ? वह सर्वत्र है ,चराचर सृष्टि में वह व्याप्त है । श्री ज्ञानदेव और उनके बंधुओं ने तुम्हारे अंदर विट्ठल के दर्शन किये परंतु तुम्हे उनके अंदर विट्ठल नहीं दिखाई पड़े । विट्ठल तो तुम्हारा परम साख है ना ? उनको इतना छोटा क्यों बना रहे हो ? वे विश्वव्यापी है ।  श्री ज्ञानेश्वर ,निवृत्तिनाथ ,मुक्ताबाई जी इनकी होने के पूर्व मै विशोबा सराफ था । श्री ज्ञानदेव जी ने ही कृपा करके मुझे भगवद्भाव प्रदान किया । उनको तुम्हारे द्वारा बहुत से दिव्या कार्य करवाने है जो तुम्हे वही स्वयं समय आने पर बताएँ । नामदेव जी ने साष्टांग् दण्डवत् किया , अब वे पहचान गए की यही तो वे महात्मा है जिन्हें मै ढूंढ रहा था ।

नामदेव जी ने अपना सर्वस्व उनको चरणों में समर्पित कर दिया । विशोबा जी ने नामदेव को आलिंगन प्रदान किया और महापुरुष के संपर्क से उनका अतःकरण अहंकार मुक्त हो दिया । इस तरह से नामदेव समझ गए की गोराई काका की लीला मेरे कल्याण के लिए ही थी । मटका तैयार करते समय कुम्हार केवल बहार से ही नहीं अपितु भीतर से भी हाथ लगता है । भीतर हाथ ना दे तो मटका बन ही नहीं सकता । संत भी एक कुम्हार होते है , वे शरणागत को घड़े की तरह ही पक्का बनाते है । बहार से आधार देने वाले अनेक मनुष्य मिलते है परंतु भीतर से आधार देने वाले केवल संत ही है । 
एक दिन संत गोरा कुम्हार कच्ची मिट्टी के ढेर को पानी मिलकर तैयार कर रहे थे जाता है और मिट्टी को चिकना बनाने हेतु पैरों से कुचल रहे थे । 

श्री गोरा जी के बालक का मिट्टी में दबकर मरना और पत्नी का उन्हें भगवान की कसम देना :

भगवान् के सुंदर रूप का स्मरण और मुख से सतत हरिनाम निकल रहा था । वे भगवान् के नाम संकीर्तन में मग्न होकर उन्मत्त नृत्य कर रहे ते ।उसी समय उनकी पत्नी रामी वहाँ आयी और गोरा जी से कहने लगी – मैे बच्चे को यहाँ छोड़कर नदी किराने पानी भरने जाती हूं ,ध्यान रखना । वह बालक पिता के चरण पकड़ने के लिए मिट्टी में चला गया । विट्ठल नाम में चित्त समरस हो चुके गोरा जी को इस बात का पता ही न चला और वह बालक मिट्टी के ढेर में दबकर मर गया । इधर जब पत्नी लौटकर आयी तो बालक नजर नही आया और मिट्टी रक्त से रंजीत है । सिर पर लाया हुआ पानी का मटका वही फेंककर वह दौड़कर गोरा जी को जोर जोर से झटके मारकर हिलाने लगी । 

किसी तरह गोरा जी भाव अवस्था से बहार आये । पत्नी रोकर और चिल्लाकर कहने लगी की मेरा बच्चा मिट्टी में दबकर मर गया । गोरा जी को पश्चाताप हुआ की बालक मर गया परंतु भीतर वे उच्च कोटि के वैरागी थे । अब जो चला गया उसके लिए शोक करने का कोई अर्थ नहीं ऐसा वे सोचकर वे पुनः भगवान् का नामस्मरण करने लगे । पत्नी क्रोध में भरकर बोली – इस भजन , भक्ति के चलते आज बच्चा मर गया , आग लगे ऐसे भजन को तो । पति और भगवान् के भजन को अपशब्द कहने लगी । जब भजन भक्ति के बारे में अपशब्द कहे तब गोरा जी से रहा नहीं गया और वे पत्नी को मारने दौड़े । पत्नी ने कहा – खबरदार ! मेरे शरीर का स्पर्श नहीं करना ,आपको आपके विट्ठल की कसम है । भगवान् का नाम सुनते ही गोरा जी पिछे हट गए और वहाँ से चले गए ।

पत्नी कई दिनों तक नाराज बानी रही ,कई दिनो से घर में बातचीत भी बंद थी । एक दिन गोरा जी की पत्नी ने सोचा की अब जो हो गया सो हो गया । इन्होंने जानबूझ कर तो कुछ किया नहीं और नाराज रहकर बच्चा दोबारा जीवित भी होगा नहीं । उसने गोरा जी के पास जाकर क्षमा मांगी और कहा की भगवान् की शपथ देकर मुझसे भूल हो गयी । गोरा जी कहने लगे की अब हमने निश्चय कर लिया सो कर लिया ,मै अब तुम्हारे शारीर का स्पर्श नहीं करूँगा । कुछ दिन बाद पत्नी अपने माता पिता के घर गयी और सारी बात वर्णन करके कहने लगी – अब हमारा वंश खतरे में है , यदि वंश आगे बढाना ही है तो मेरी छोटी बहन रामी का विवाह इनके साथ करा दिया जाए । पहले गोरा जी नहीं माने परंतु जब श्वशुर जी ने बहुटी आग्रह किया तब विवाह को हाँ कर दिए ।

विवाह के अवसरपर श्वशुर ने गोरा जी से कहा की दोनों बहिनों के साथ एक- सा व्यवहार रखना ,दोनों में कोई अंतर मत रखना । यह बात सुनते ही गोरा जी ने सोचा की हम बड़ी बहन का स्पर्श करते नहीं और श्वशुर जी कहते है दोनों के साथ एक – सा व्यवहार करना । बस अब तो गोरा जी ने उस नव विवाहिता पत्नी का भी स्पर्श ना करने का निश्चय किया । दोनों बहनो को दुःख हुआ और छोटी बहन रोने लगी । बड़ी बहन ने उसको किसी तरह समझाकर शांत किया । रात्रि में दोनों पत्नियां गोरा जी के दोनों ओर सो गयी और जब गोरा जी को नींद लग गयी तब इन्होंने पतिदेव के हाथ पकड़ पर अपनी छाती पर रख दिए । उन्हें लगा की अब तो गोरा जी पूर्ववत व्यवहार करने लगेंगे । निद्रा से उठकर गोरा जी ने अपने दोनों हाथ पत्नियो की छातीपर देखे । गोरा जी ने सोचा की यह हाथ बड़े पापी है , प्राणसखा विट्ठल भगवान् की शपथ का विचार नहीं किया । इन पापी हाथो को दंड मिलना ही चाहिए ।

श्री गोरा जी द्वारा अपने हाथ कटवा लेना और स्वयं भगवान् लक्ष्मी और गरुड़ का उनके घर नौकरी करना :

पास ही में धारदार नुकीले धारदार फर्श बनाने के पत्थर पड़े थे ,वही जाकर रगड़ते हुए गोरा जी ने अपने दोनों हाथ कटवा दिए । हाथ चले जाने के कारण गोरा जी का काम धंदा बंद हो गया । जिन गोरा जी के घर आया हुआ कुत्ता भी विन्मुख नहीं जाता था ,वे आज पत्नियो सहित उपवास कर रहे है । भगवान् का नाम सतत जपते रहते है और रूपध्यान करते रहते है । कभी किसी से कुछ मांगने ना स्वयं जाते और ना पत्नियों को जाने देते । पेट में अन्न ना जाने से गिरा जी शरीर निस्तेज होने लगा था । भक्तवत्सल भगवान् श्रीकृष्ण से गोरा जी की ऐसी विपन्न अवस्था देखी नहीं जा रही थी । गोरा जी ने कुछ खाया नहीं इसीलिए कृष्ण भी नहीं कहते । रुक्मिणी जी पूछती है पर भगवान् कुछ बोलते नहीं है । गोरोबा शांत परंतु पंढरीनाथ अशांत।

कुछ दिन ऐसे ही बीते तब भगवान् से रुक्मिणी माता ने हठ करके पूछ लिया । भगवान् ने सब वृत्तांत कह सुनाया और कहने लगे की गोरा जी की यह स्थिति मेरे कारण हुई है , पत्नी यही मेरे नाम की शपथ यही नहीं दी होती तो यह सब नहीं होता । गोरा जी मेरी शपथ के कारण बंध गए है। जब कई दिन तक गोरा जी भूखे ही रह गए तब भगवान् ने अंततः गरुड़ जी को बुलाया और रुक्मिणी माता सहित वे गोरा जी के घर को गए । भगवान् ने कमलनाथ कुम्हार का,रुक्मिणी माता ने कुम्हारन और गरुड़ जी ने गधे का रूप धारण कर लिया । वे तीनो गोरा जी के घरपर आये और कहने लगे – क्या यही गोरा कुम्हार का घर है ? गोरा जी ने कहा – हाँ ! आप लोग कौन है और किस काम से आये है ? भगवान् रुपी कुम्हार कहने लगे – मै विठु कुम्हार और यह मेरी पत्नी , हम पंढरपूर से आये है और काम ढूढ़ रहे है । आप कुम्हार है , आपके यहाँ कुम्हारी का कोई काम हो तो हम करने को तैयार है ।

गोरा जी ने कहा – आप यहां रह सकते है और आपके लिए मेरे पास कुम्हारी का काम भी है परंतु देने के लिए पैसे नहीं है , मै आपको पगार नहीं दे सकता । विठु कुम्हार बोला -सुना है आप बहुत सुंदर कीर्तन सेवा करते है ,आप हमें कीर्तन सुनाया करना और जो दो समय का भोजन प्रसाद दे देना । गोरा जी ने उन सबको अपने घरपर रख लिया । गोरा जी विठु कुम्हार को कोई काम नहीं बताते , वे स्वयं सारा काम उत्तम रीति से करता है । प्रातःकाल उठकर गधे के ओवर लादकर मिट्टी लेकर आता और एक से बढ़कर एक बर्तन बनाया करता । रुक्मिणी जी भी उनकी मदत करती और बर्तनों पर सुंदर नक्षी कला बनती । गोरा जी उनके लिए कीर्तन सुनाया करते थे । धीरे धीरे गोरा जी का धंदा बढ़ने लगा , सब जगह यह बात प्रसिद्ध हो गयी की गोरा जी के यहां काम करने वाला विठु कुम्हार बड़े सुंदर आकर और उत्तम मिट्टी के बर्तन बनाता है । 

जो भगवान् विविध प्रकार के मनुष्य ,प्राणी ,कीटक निर्माण करते है और उनमे चैतन्य भरकर पृथ्वी चलते है ,उनके लिए विविध आकार के मिट्टी के बर्तन बनाना कौनसी बड़ी बात है ? गोराई काका का घर धन -धान्य से संपन्न हो गया । गरीबो को हर तरह से मदत होने लगी , संतो की सेवा होने लगी । आगे कुछ दिन बाद आषाढ़ी एकादशी आने वाली थी । निवृत्ती, ज्ञानदेव ,सोपान ,मुक्ताई आदि अनेक संत पंढरपुर जाने के लिए निकले थे । वे जब गोरा जी के गाँव तेरढोकी के समीप पहुंचे तब गाँव के लोगो द्वारा घटित सब प्रकार समझ में आया ।  लोगो ने बताया की पंढरपूर का कोई विठु कुम्हार गोराई काका के लिए बर्तन बनाता है , बहुत होशियार और मेहनती है वह । गोराई काका को उसने बहुत सा धन कमाकर दिया । गोराई काका उसे पगार भी नहीं देते ,कीर्तन के बदले वह सब काम कर दिया करता है ।

सर्वज्ञ ज्ञानदेव जी ने मन से सब सत्य जान लिया । वे कहने लगे – संसार में ऐसा कौन है बिन पगार के केवल कीर्तन के बदले दसूरे के यहां नौकरी करता है ? ऐसे तो भतवत्सल भगवान् ही है । चलो ,चलो ,गोराई काका के घर चलकर देखते है उस विठु कुम्हार को । इधर भगवान् श्री कृष्ण रुक्मिणी जी से बोले – आषाढ़ी एकदशी निकट है ,पंढरपुर में सब भक्त पधारेंगे , हमें चलना चाहिए । इस बहाने से भगवान्  रुक्मिणी और गरुड़ सहित वहाँ से अंतर्धान हो गए । संत जान कीर्तन करते हुए गोरा जी के घर के निकट आया । हरिनाम सुनकर गोरा जी बहार गए तो संतो को देखकर एक अल्लड बालक की भाँती दौड़े । आखों में अश्रुओं की धार है , आलिंगन देने को हाथ तो थे नहीं । प्रेम भरे अंतःकरण से श्री निवृत्तिनाथ ,श्री ज्ञानदेव जी की छाती से छाती लगाकर आवक वाणी से अपनी असमर्थता व्यक्त की , मुक्ताबाई ने भी उनके कंधे से सर लगा दिया ।

गोरा जी ने सबको घर में लिवा लाये ,पत्नी ने बैठे के लिए आसान बिछाये , हाथ – पैर धोने के लिए पानी दिया । ज्ञानदेव जी से और अधिक रहा नहीं गया ,उन्होंने कहा – बुलाओ बुलाओ ! उस विठु को बुलाओ । देखेने तो दो हमारे गोराई काका के विठु कुम्हार को जिसने कीर्तन का पगार लेकर मिट्टी के बर्तन बनाये । गोरा जी की पत्नी विठु को बुलाने अंदर गयी ;परंतु व्यर्थ ! तबतक तो यह माखन चोर अपनी पत्नीसह पसार हो चूका था । बहुत ढूंढा , विविध दिशाओ में आदमी भेजे परंतु ना विठु का पता चला ,ना पत्नी का और ना उसके गधे का ।गोरा जी के आखों से अश्रुओं की धार बहने लगी , मुख से शब्द नहीं निकल रहे थे । उसी समय श्री ज्ञानदेव जी बोले – गोराई काका ! वह विठु कुम्हार नहीं अपितु पंढरिनाथ श्रीकृष्ण ही आपके प्रेम में बंधकर यहां रहते थे और सब काम करते थे ,धन्य है धन्य है गोराई काका आपकी भक्ति धन्य है । 

श्री गोरा जी के हाथ पूर्ववत होना और बालक का जीवित होना :

श्री ज्ञानदेव जी ने गोराई काका की पत्नी से भगवान् द्वारा बनाये बर्तन दिखाने को कहा । जब ज्ञानदेव जी ने उन बर्तनों को देखा तो उन सब से दिव्य तेज निकल रहा था और जब एक बर्तन उठाकर पास में लिया तो उसमे से विट्ठल विट्ठल ऐसी ध्वनि निकल रही थी ।यह लीला देख कर सब संत गोराई काका की जय जय कार करने लगे । अब आषाढ़ी एकादशी का दिन आया ,सब संत मंडली पंढरपुर दर्शन को पधारी । साथ में गोरा जी और उनकी दोनों पत्नियां भी थी ।पंढरपुर में भगवान् के दर्शन किये और सबने नामदेव जी से भेट की । नामदेव गोराई काका का शरीर देख कर कुछ बोल नहीं पाये । एकादशी का पवन अवसर था , नामदेव जी को गोराई काका ने कीर्तन सुनाने को कहा परंतु नामदेव जी गोराई काका की ऐसी दशा देखकर उदास थे । सब संतो के कहने पर नामदेव ने कीर्तन आरम्भ किया ।

विट्ठल विट्ठल पांडुरंग , जय जय रामकृष्ण हरी की ध्वनि पूरे पंढरपुर में होने लगी । बहुत से भीड़ एकत्रित हो गयी , टाल ,मृदंग आदि वद्य बजने लगे । नामदेव जी हाथ ऊँचे करके कीर्तन करने लगे । सारा संत समुदाय और भक्तजन भी हाथ ऊँचे करके तालियां बजा रहे थे । गोराई काका आनंद अतिरेक में नृत्य करने लगे और देखते देखते चमत्कार हो गया । गोराई काका के के हाथ निकल आये , उन्होंने भी अपने हाथ ऊपर उठा लिए और तालियां बजाकर झूमने लगे । सभी संत इस चमत्कार को देखकर प्रसन्न हुए ,स्वयं भगवान् विट्ठल भी वहाँ कीर्तन में नृत्य कर रहे थे ।गोरा जी की दोनों पत्नियां संती और रामी भी यह चमत्कार देखकर बहुत प्रसन्न हुए । दोनों विट्ठल विट्ठल पांडुरंग गाने लगी । 

कीर्तन समाप्त होते ही दसूरा चमत्कार हुआ , गोरा जी की पत्नी रामी ने अनुभव किया की उसके पैर के पास आकर कोई बालक माँ ! माँ ! कह रहा है । निचे देखा तो आश्चर्य ! यह तो उसका वही बालक था जो मिट्टी में दबकर मर गया था । भगवान् पांडुरंग भी बहुत प्रसन्न थे ,प्रसन्नता के कारण उनके आँख से अश्रु बाह रहे थे ।नामदेव की दासी संत जनाबाई भीड़ में खड़े भगवान् को आश्चर्य से  देख रही थी ।भगवान् गोरा जी के सामने प्रकट हुए और उन्हें आलिंगन प्रदान किया । भगवान् ने कहा की मेरी शपथ में बंधकर तुमने दोनों पत्नियो का स्पर्श नहीं किया परंतु अब मै स्वयं कह रहा हूं की तुम अब किसी शपथ के बंधन में नहीं हो । तुम अपनी दोनों पत्नियो के साथ प्रेम से संसार कैट हुए भजन में लगे रहो । उसके बाद अन्य संतो से भी भगवान् मिले और अंतर्धान हो गए । 

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