सुंदर कथा ८५ (श्री भक्तमाल – श्री सेन जी ) Sri Bhaktamal – Sri Sena ji

भीष्म: सेनाभिधो नाम तुलायां रविवासरे ।
द्वादश्यां माधवे कृष्णे पूर्वाभाद्रपदे शुभे ।
तदीयाराधने सक्तो ब्रह्मयोगे जनिष्यति ।।

श्री भीष्म जी ही स्वयं भक्त सेन के रूप में अवतरीत हुए। वघेलखण्ड मध्य प्रदेश के बांधवगढ़ मे सेनभक्त का प्राकट्य हुआ । आपका जन्म विक्रम संवत १३५७ में वैशाख कृष्ण द्वादशी, पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र, तुला लग्न , शुभ योग रविवार को हुआ । आपने स्वामी श्री रामानंदाचार्य जी की आज्ञा से भक्तों की सेवा को प्रधानता दी । कुछ विद्वान मानते है कि इनका जन्म स्थान ग्राम सोहल थाठीयन जिला अमृतसर साहिब में १३९० ईस्वी में हुआ था  । परंतु भक्तमाल, अगस्त्य संहिता और महाराज श्री रघुराजसिंह जी द्वारा रचित श्री राम रसिकावली से इनका जन्म बांधवगढ़ ही निश्चित होता है । इनके पिता का नाम श्री मुकन्द राय जी, माता का नाम जीवनी जी एवं पत्नि का नाम श्रीमती सुलखनी जी था । इनके दो पुत्र और एक पुत्री थे ।

श्री भक्तमाल में वर्णन है कि बघेलखण्ड का बांधवगढ़ नगर अत्यन्त समृद्ध था । महाराज वीरसिंह वहाँ के राजा थे । इसी नगर मे एक परम सन्तोषी, उदार, विनयशील व्यक्ति रहते थे; उनका नाम था श्री सेन जी। यतिराज श्री स्वामी रामानंदाचार्य के द्वादश शिष्यो मे श्री सेन जी का नाम अत्यंत आदरपूर्वक लिया जाता है ।

राजपरिवार से उनका नित्य का सम्पर्क था; भगवान की कृपा से दिनभर की मेहनत मजदूरी से जो कुछ भी मिल जाता था, उसीसे परिवारका भरण पोषण और सन्त सेवा करके वे निश्चिन्त हो जाते थे । वे नित्य प्रात:काल स्नान, ध्यान और भगवान के स्मरणपूजन और भजन के बाद ही राजसेवा के लिये घर से निकल पड़ते थे और दोपहर को लौट आते थे । जातिके नाई थे । राजाका बाल बनाना, तेल लगाकर स्नान कराना आदि ही उनका दैनिक काम था । एक दिन वे घर से निकले ही थे कि उन्होंने देखा एक भक्तमण्डली मधुर-मधुर ध्वनि से भगवान के नामका संकीर्तन करती उन्हींके घर की ओर चली आ रही है । सेन ने प्रेमपूर्वक सन्तो को घर लाकर उनकी यथाशक्ति सेवा-पूजा की और सत्संग किया । सेन जी संतो की सेवा करते करते यह भूल गए कि राजसेवा में पहुंचना है ।

उधर महाराज वीरसिंह को प्रतीक्षा करते-करते अधिक समय बीत गया । इतने मे सेन नाई के रूप मे स्वयं लीलाबिहारी रघुनाथ जी राजमहल मे पहुँच गये । सदा की भाँति उनके कंधेपर छुरे, कैंची तथा अन्य उपयोगी सामान तथा दर्पण आदि की छोटी-सी पेटी लटक रही थी । उन्होने राजाके सिर मे तेल लगाया, शरीर मे मालिश की, दर्पण दिखाया । जिनके दर्शन मात्र से बड़े बड़े महात्मा मोहित हो जाते है, जिनके दर्शन मात्र से महात्माओ की समाधि लग जाती है, उन रघुनाथ जी के कोमल हाथो के स्पर्श से राजा को आज जितना सुख मिला, उतना और पहले कभी अनुभव मे नही आया था । सेन नाई राजा की पूरी-पूरी परिचर्या और सेवा करके चले गये ।

उधर जब भक्तमण्ड ली चली गयी तो थोडी देर के बाद भक्त सेन को स्मरण हुआ कि मुझे तो राजा की सेवा में भी जाना है । उन्होंने आवश्यक सामान लिया और डरते-डरते राजपथपर पैर रखा । वे चिन्ताग्रस्त थे, राजा के बिगड़ने की बात सोचकर वे डर रहे थे । एक साधारण राजसैनिक ने उनको देखते ही टोक दिया – सेन जी कही आप कुछ भूल तो नहीं आये ? सेन जी ने कहा – नहीं तो, अभी तो राजमहल ही नहीं जा सका । सेन आश्चर्यचकित थे ।

सैनिक ने कहा – सेन जी ,आपको कुछ हो तो नहीं गया है ? मस्तिष्क ठीक -ठिकाने तो है न ? भगवान के भक्त कितने सीधे-सादे होते है , इसका पता तो आज ही चल सका ।  सैनिक कहता गया – आज तो राजा आपकी सेवा से इतने अधिक प्रसन्न है कि इसकी चर्चा सारे नगर मे फैल रही है ।  सैनिक आगे कुछ न बोल सका । सेन ने सोचा कि यह मजाक उड़ा रहा होगा , अवश्य ही महाराज बड़े क्रोधित होंगे । न जाने आज महाराज क्या दंड देंगे । लगता है आज सेवा से ही निलम्बित कर देंगे ।

सेन जी डरते डरते राजमहल के अंदर पहुंचे । राजा वीरसिंह सिंहासन पर विराजमान थे और उन्हीं का नाम लेकर कोई स्तुति हो रही थी । उतने में ही सेन पर राजा की दृष्टि पड़ी । राजा सिंहासन छोड़कर दौड़कर सेन के पास आए ।  सेन ! अभी तो तुम इतनी सुंदर सेवा करके गए थे । क्या कोई आवश्यक कार्य पड़ गया की पुनः यहां आना पड़ा ?

सेन जी ने कहाँ – महाराज ! मेरे घर पर संत भगवान पधारे थे  उन की सेवा और सत्संग में भूल गया । आप अपराध क्षमा करे। महाराज बोले – सेन ! तुम क्या कह रहे हो ? अभी तो तुम स्नान तेल मालिश इत्यादि करके गए हो। सेन जी को विश्वास हो गया कि मेरी प्रसन्नता और सन्तोष के लिये भगवान को मेरी अनुपस्थिति मे नाई का रूप धारण करना पडा । वे अपने आपको धिक्कार ने लगे कि एक तुच्छ-सी सेवपूर्ती के लिये शोभा निकेतन श्री राघवेन्द्र सरकार को बहुरूपिया बनना पडा । प्रभु को इतना कष्ट उठाना पड़ा । उन्होंने भगवान के चरण-कमल का ध्यान किया, मन-ही -मन प्रभुसे क्षमा माँगी ।

सेन जी रोने लगे और महाराज से कहा – वह मै नही था, मै तो घर पर संतो की सेवा में व्यस्त था । आप बड़े पुण्यात्मा है ,आज जिसने नाई के रूप में आपकी तेल मालिश और स्नान आदि किया है वह त्रिभुवन के स्वामी भगवान श्रीराम ही थे । राजा ने अपना मुकुट उतारकर भक्तराज सेन जी के चरणों मे रख दिया और सेन जी चरण पकड़ लिये । वीरसिंह ने कहा – राजपरिवार जन्म-जन्म तक आपका और आपके वंशजो का आभार मानता रहेगा । भगवान ने आपकी ही प्रसन्नता के लिये अपना मंगलमय दर्शन देकर हमारे असंख्य पाप-तापों का अन्त किया है ।

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