सुंदर कथा ८७ (श्री भक्तमाल – श्री मथुरादास जी ) Sri Bhaktamal – Sri Mathuradas ji

श्री मथुरादास जी नामक एक संत हुए । श्री मथुरादास जी तिजारे ग्राम में निवास करते थे । सर्वदा भगवन्नाम का कीर्तन करते रहते थे । आप मे शुद्ध आचार, यथालाभ संतोष, मैत्रीभाव, सुन्दरशील आदि सभी सद्गुण विशेषरूप से प्रकाशित थे । जिस प्रकार हाथ के दीपक से अन्धकार मिट जाता है और वस्तुएं दिखायी पड़ती है उसी प्रकार भगवत्तत्त्व – ज्ञान के द्वारा आपका हृदय प्रकाशित था ।

आपके हृदय मे प्रभु का विश्वास था और उन्हीं का बल था । श्रीकृष्ण की सेवाके निमित्त जल का घडा आप अपने सिरपर रखकर बडे नेम और प्रेम से लाते थे । आपकी अपने गुरुदेव श्री वर्धमान जी के वचनों मे बडा प्रेम था । आप उनके उपदेशों का संग्रह एवं पालन करते थे । आपने गुरु की आज्ञा का उल्लंघन कभी नहीं किया ।

श्री मथुरादास जी ने तिजारे ग्राम मे निवास करते हुए भगवद् -भक्ति की खूब आराधना की और प्रजा मे भक्ति का प्रचुर प्रचार-प्रसार किया । एक बार तिजारे ग्राम में साधु वेषधारी एक जादूगर आया । वह सबको दिखाकर भगवान् शालग्राम की सेवा करता था । विशेष बात यह थी कि उसके शालग्राम जी सिंहासनपर ( कठपुतली कि तरह) हिलते डोलते रहते थे । इस चमत्कार को देखने के लिये जनता की भीड़ एकत्र हो जाती थी । वहाँ जो श्री मथुरादास जी के शिष्य सेवक थे, उनके मन मे भाव आया कि ये बडे भारी सिद्ध सन्त है, तभी तो भगवान् इनके आधीन है । उन लोगोंने इस प्रभाव का वर्णन
श्री मथुरादास जी के सामने किया और कहा कि उस

सन्त की सेवा सभीको अच्छी लगती है । कुछ समय के लिये आप भी चलिये और उसकी उपासना की रीति- भाँति देखिये । श्री मथुरादास जी सर्वज्ञ थे । जादूगर ढोंगी है, भक्त नही है, इस रहस्य को समझकर बोले – मेरे चलने से उसकी माया (जादू ) नही चलेगी, तब उसके मन मे दुख हो जायगा, अत: हम वहाँ नही जायेंगे ।

सभी शिष्य-सेवकों ने चरणों मे पड़कर एक बारी चलकर देखने की प्रार्थना की । तब आप वहाँ गये, जहाँ उसने अपना ढोंग फैला रखा था । ये जाकर उसके पास खड़े हो गये । फिर जब उसने शालग्राम जी को हिलाना-डुलाना चाहा तो वे नहीं हिले-डोले । अब उसके मन मे बडा भारी शोक हुआ । वह समझ गया कि अभी -अभी जो यह साधु आया है इसीका यह प्रताप है । लोगो ने उस भक्तवेश धारी जादूगर की बहुत हंसी उड़ाई ।

वह जादूगर सोचने लगा कि यह संत मथुरादास हमारी सिद्धियों मे बाधक है, अतः तन्त्र मन्त्र जप आदि करके इसे मार डालूं । इस विचार को उसने अपने मन में दुढ़ किया और फिर मथुरादास जी को मारने के लिये मूठ चलायी (मारने के उनके पीछे लिए तंत्र चलाया) । वह श्री मथुरादास जी के भक्ति और वैष्णव तेज के सामने आकर उस जादूगर का तंत्र व्यर्थ हो गयी । तंत्र मंत्र आदि का नियम है कि यदि वह जिस व्यक्ति पर लक्षित करके छोड़ा गया है , उसपर असर न चले तो वह उलटकर चलाने वाले व्यक्ति के पास जाकर उसको हानि पहुंचाता है । उस जादूगर

का तंत्र वापस उसी को ही लगा । उसको बहुत पीड़ा होने लगी और अंत मे वह मूर्छित होकर वह पृथ्वीपर गिर गया । बहुत प्रकार से जब उसकी मोर्चा दूर नही हुई तब लोगों को ऐसा लगा कि यह मर गया । उसके कुछ चेले जाकर श्री मथुरादास जी के चरणों मे पड गए और क्षमा याचना करने लगे । दयालु सन्त श्री मथुरादास जी को उनपर दया आ गयी । वे कृपा उसके पास पहुंचे और उन्होंने भगवान का चरणामृत उसके मुख में डाल करके उसे जीवित किया । जादूगर चरणों मे गिर गया और शरण मे आया । श्री मथुरादास जी ने उसे समझाया कि मनुष्य जन्म बड़ी कृपा करके भगवान ने दिया है , उसे तंत्र मंत्र में बर्बाद न करके भगवान और संतो की सेवा में लगाओ । फिर कुछ काल तक उसने श्री मथुरादास जी के यहां सत्संग किया । श्री मथुरादास जी ने उसे सेवारूपी भक्ति मार्ग का उपदेश दिया और अपने घर भेज दिया ।

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