सुंदर कथा ८८ (श्री भक्तमाल – श्री भूगर्भ गोस्वामी जी ) Sri Bhaktamal – Sri Bhugarbh goswami ji

जब भगवान श्रीकृष्ण ने भूगर्भ गोस्वामी जी को कंधे पर उठाकर अपनी कुटिया पर छोड़ आये –

श्री गोवर्धन जी की नित्य परिक्रमा करना भूगर्भ गोस्वामी जी की दैनिकचर्या का अंग था । किसी भी परिस्थिति मे बाबा परिक्रमा का नियम छोड़ते नही थे । एक दिन आप प्रेम मग्न होकर श्रीकृष्ण नाम जपते हुए परिक्रमा कर रहे थे कि एक शिला से आपका पैर टकरा गया । पैर से रक्त की धारा बहने लगी थी, पीडा अधिक होने से चल नही पा रहे थे । किसी प्रकार ‘ कृष्ण कृष्ण कृष्ण ‘ करते दिन कटा, शाम होने को आयी, अब आपको और क्लेश होने लगा कि ठाकुरजी की सायंकाल की पूजा आरती कैसे होगी ? प्रभु से अपने भक्त का कष्ट न देखा गया, वे एक बलिष्ठ शरीर वाले साधु के रूप मे आपके पास आये और आपसे कहा – बाबा! लगता है चोट अधिक लग गयी है, मेरे कंधे पर चढ़ जाओ मैं आपको अपने स्थान तक पहुंचा देता हूं । बाबा किसी से कोई सेवा लेते नही थे अतः मना किया । पर माना करने के बावजूद साधु रूप वाले श्रीकृष्णआपको कन्धेपर बिठाकर कुटीतक छोड़ गये । जब आपने उन्हे धन्यवाद देना चाहा तो वे अन्तर्धान हो चुके थे ।

अब आपको यह समझने मे देर न लगी कि मेरे आराध्य श्री ठाकुर जी ही साधु के वेश मे मुझे कन्धेपर बैठाकर यहाँ तक लाये थे । अब तो आपके दुःखका पारावार न रहा । आप यह सोच-सोचकर रोने लगे कि मुझसे तो श्री ठाकुर जी की सेवा हो न सकी, उल्टे मैने ही उनसे सेवा करवा ली । उनकी इस व्याकुलता को देखकर श्री ठाकुर जी ने उनसे स्वप्न मे कहा- बाबा ! भक्तों का दुख मुझ से देखा नही जाता । जबतक मै उनका दुख दूरकर उन्हे सुखी नही कर देता, तबतक मेरे मन को विश्राम नही मिलता, अत: आप व्यर्थ संकुचित न हो । भगवान की इस प्रकार की अमृतमयी वाणी सुनकर और उनकी भक्तवत्सलता देखकर आप गद्गद हो उठे । ऐसे भगवत्कृपा पात्र थे श्रीभूगर्भ गोस्वामी जी महाराज ।

Photo Credits : Sri Govardhan Das Gyanish Prabhu, Facebook

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