सुंदर कथा ८८ (श्री भक्तमाल – श्री भूगर्भगुसाई जी ) Sri Bhaktamal – Sri Bhugarbh gusai ji

श्री भूगर्भगेसाईं जी श्रीचैतन्य महाप्रभु जी के कृपापात्र श्री गदाधर पण्डित जी के शिष्य थे । आप श्री लोकनाथ  गोस्वामी जी के साथ वृन्दावन आये थे और  फिर वृन्दावन मे ही रह गये, वृन्दावन से बाहर कही नहीं गये । ये संसार से परम विरक्त एवं भगवान की रूपमाधुरी मे अत्यन्त अनुरक्त थे । रसिक भक्तजनो के साथ  मिलकर आप उसी रूप माधुरी का आस्वादन करते रहते । भगवान का मानसी चिन्तन, मानसी अर्चन वन्दन ही आपके जीवन का आधार था । भगवान की मानसी मूर्ति को निरन्तर निहारा करते थे । आपके मन की वृत्ति सदा उसी युगलस्वरूप के चिन्तन मे लगी रहती थी ।

श्री गोवर्धन जी की नित्य परिक्रमा करना आपकी दैनिकचर्या का अंग था । एक दिन आप प्रेम मे बेसुध हुए परिक्रमा कर रहे थे कि एक शिला से आपका पैर टकरा गया । पैर से रक्त की धारा बहने लगी थी, पीडा अधिक होने से चलना दूभर हो गया था । किसी प्रकार ‘ हा कृष्ण हा कृष्ण ‘ करते दिन कटा, शाम होने को आयी, अब आपको और क्लेश होने लगा कि ठाकुरजी की सायंकाम की पूजा आरती कैसे होगी ? भक्तवत्सल भगवान से अपने भक्त का कष्ट न देखा गया, वे एक बलिष्ठ शरीर वाले साधु के रूप मे आपके पास आये और आपके मना करने के बावजूद आपको कन्धेपर बिठाकर कुटीतक छोड़ गये । जब आपने उन्हे धन्यवाद देना चाहा तो वे अन्तर्धान हो चुके थे ।

अब आपको यह समझने मे देर न लगी कि मेरे आराध्य श्री ठाकुर जी ही साधु के वेश मे मुझे कन्धेपर बैठाकर यहाँ तक लाये थे । अब तो आपके दुःखका पारावार न रहा । आप यह सोच-सोचकर रोने लगे कि मुझसे तो श्री ठाकुर जी की सेवा हो न सकी, उल्टे मैने ही उनसे सेवा करा ली । उनकी इस व्याकुलता को देखकर श्री ठाकुर जी ने उनसे स्वप्न मे कहा- गुसाईं जी ! भक्तों का दुख मुझ से देखा नही जाता । जबतक मै उनका दुख दूरकर उन्हे सुखी नही कर देता, तबतक मेरे मन को विश्राम नही मिलता, अत: आप व्यर्थ संकुचित न हो । भगवान की इस प्रकार की अमृतमयी वाणी सुनकर और उनकी भक्तवत्सलता देखकर आप गद्गद हो उठे । ऐसे भगवत्कृपा पात्र थे श्रीभूगर्भ गोसाई जी ।

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