सुंदर कथा ८९ (श्री भक्तमाल – श्री पूर्णसिंह जी ) Sri Bhaktamal – Sri Purna singh ji

श्री पूर्णसिंह जी परम सदाचारी , वीर एवं महान भगवद्भक्त थे । श्री कृष्ण प्रभु इनके इष्टदेव थे । ये आमेर नरेश श्री पृथ्वीराज जी के पुत्र थे । उनकी माता का नाम पदारथ देवी था । कविहृदय, परम भागवत श्री पूर्णसिंह जी नित्य नूतन सुंदर सुंदर पद रचकर अपने श्री ठाकुर जी को सुनाते । श्री ठाकुर जी को भी इनके पदों को सुनने मे बडा सुख मिलता । यदि कभी किसी कार्यविशेष की व्यस्तता में श्री पूर्णसिंह जी पद नही सुना पाते तो श्री ठाकुर जी स्वप्न मे इनसे पद सुनाने का अनुरोध करते । ऐसे दीवाने हो गए थे ठाकुर जी इनके पदों के ।  एक दो बार इस प्रक्रार का प्रसंग प्राप्त होनेपर इन्होंने दृढ नियम बना लिया की अब मै हर दिन भगवान को पद सुनाऊँगा  । बहुत समय तक नियम अक्षुष्ण रूप से चलता रहा । परंतु एक बार किसी राज्यकार्यवश इन्हें पद सुनाने का ध्यान नही रहा ।

जब कार्य से फुरसत मिली तो श्री ठाकुर जी का दर्शन करने मंदिर मे गये । परंतु वहाँ इन्हे श्री ठाकुर जी का श्री विग्रह ही नही दिखायी पड़ा । पुजारी से पूछा – श्री ठाकुर जी की प्रतिमा कहाँ गयी ? पुजारी जी ने कहा – प्रतिमा तो सिंहासन पर ही विराजमान है । श्री पूर्णसिंह जी की समझ मे नहीं आ रहा था कि आखिर मुझे क्यो नहीं दर्शन हो रहा है ? बहुत विचार करने के बाद याद आयी कि मैंने श्री ठाकुर जी को आज पद नही सुनाया । फिर तत्काल पद सुनाने लगे तो श्री ठाकुर जी भी मन्द मन्द मुसकराते हुए इन्हे दर्शन देने लगे । भक्ति मार्ग पर यदि भक्त कोई नित्य नियम निश्चित कर लें तो समय समय पर उसके नियम की परीक्षा होती है । श्री भगवान भी भक्त के नित्य नियम की प्रतीक्षा करते रहते है अतः संसार के कार्यो से पहले नियम को प्रधानता देनी चाहिए यह शिक्षा इस चरित्र से प्राप्त होती है ।

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