सुंदर कथा ९१ (श्री भक्तमाल – श्री गोस्वामी विट्ठालेशसुत जी ) Sri Bhaktamal – Sri Goswami Vitthaleshsut ji

गुसाईं श्री विट्ठलनाथ जी के पुत्रों को सर्वभूत सुहृद साक्षात श्री गिवर्धनधारी श्रीकृष्ण जानकर उनका ध्यान करना चाहिए । उनके नाम है –

१. श्री गिरिधर जी, जो बड़े रसिक एवं अत्यंत सुंदर शील स्वभाव वाले थे । २. श्री गोविन्दजी का स्वभाव भी वैसा ही था। ३. श्री बालकृष्णजी महायशस्वी हुए । ४. श्री गोकुलदास जी बडे धीर महापुरुष हुए । ५. श्री रघुनाथ जी महाराज एवं ६. श्री यदुनाथ जी महाराज अपने समगुणों से भजने योग्य हुए । ७. श्री घनश्याम जी सदा-सर्वदा प्रभुप्रेम मे पगे रहते थे, बड़े अनुरागी थे, हृदय मे हमेशा प्रभुक्री स्मृति सँजोये रहते थे । इनका भजन करना चाहिए ये सातों प्रत्यक्ष भगवादविभूति  थे, भगवद्भजन मे परम प्रवीण एवं समर्थ थे तथा श्री कृष्ण की ही भाँति ये भी संसार का उद्धार करनेवाले थे । भक्तमाल में श्री नाभादास जी स्पष्ट कहते है कि इन सातों महापुरुषों का यशोगान करना चाहिये , नित्य स्मरण करना चाहिए ।

गुसाई श्री विट्ठलनाथ जी का श्री ठाकुर जी के प्रति वही भाव था, जो नन्दरायजी और यशोदारानी का बालकृष्ण के प्रति था । श्री ठाकुर जी ने भी इनके वात्सल्यभाव को स्वीकार किया था और उनके साथ छोटे बालक-जैसी ही लीला किया करते थे । वे कभी दूध पीने मे आना कानी करते, कभी सोने मे तो कभी बन्दर से डरकर उनकी की गोद मे छिप जाते । श्री गुसाँई जी उनकी इस लीला से आनन्दविभोर हो जाया करते थे । उनके वात्सल्य भावपर रीझकर एकबार श्री ठाकुर जी प्रकट हुए और उनसे वर माँगने को कहा । तब आपने यह वर माँगा कि आपने द्वापर मे श्री नन्दराय जी को जैसी बाललीला का सुख दिया एवं उनका आपमे जैसा वात्सल्य-स्नेह था, वैसा ही सुख एवं वैसा ही स्नेह आप कृपा करके हमको भी प्रदान करें।

तब श्री ठाकुर जी ने कहा-पिता के रूप मे तो मुझे आप पितृसुख दे देंगे, पर बिना माता के मेरी बाललीला का पूर्ण विकास कैसे होगा ? अत: पहले आप मेरे रिक्त मातृपद की पूर्ति करें , फिर आपको परम प्रभावशाली सात पुत्रों की प्राप्ति होगी । उन सभी पुत्रों मे पाँच-पाँच वर्षतक मेरा आवेश रहेगा । इस प्रकार अगप को दीर्घकाल तक मेरा वात्सल्य सुख प्राप्त होता रहेगा । कालान्तर मे प्रभुकृपा से आपको सात पुत्रों की प्राप्ति हुई और आप दीर्घकालतक वात्सल्य रससिन्धु मे अवगाहन करते रहे । आपने अपने सातों पुत्रों के लिये सात गद्दीयों की स्थापना की, जिससे वैष्णव धर्म और भगवद्भभक्ति का खूब प्रचार-प्रसार हुआ । लीला संवरणकाल मे आपने अपने सभी पुत्रों को श्री ठाकुर जी का एक-एक सेवा -विग्रह प्रदान किया था, जिनकी आज भी परम्परागत रूप से सेवा – पूजा हो रही है ।

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s