सुंदर कथा ९४ (श्री भक्तमाल – श्री केशवभट्ट काश्मीरी जी ) Sri Bhaktamal – Sri Keshavbhatt ji

श्री केशवभट्ट जी मनुष्यों मे मुकुटमणि हुए । जिनकी  महा महिमा सारे संसार मे फैल गयी । आपके नाम के साथ  ‘काश्मीरी’ यह विशेषण अति प्रसिद्ध हो गया था । आप पापों एवं पापरूप लोगों को ताप देने वाले तथा जगत के आभूषण स्वरूप थे । आप परम सुदृढ श्री हरिभक्तिरूपी कुठार से पाखण्ड धर्मरूपी वृक्षो का समूलोच्छेद करनेवाले हुए । आपने मथुरापुरी में यवनों के बढते हुए आतंक को देखकर उनसे वाद विवादकर उन परम उद्दण्ड यवनों को बलपूर्वक हराया । अनेकों अजेय काजी आपकी सिद्धि का चमत्कार देखकर एकदम भयभीत हो गये । आपका उपर्युक्त सुयश सारे संसार मे प्रसिद्ध है, सब सन्त इनके साक्षी है ।

आपका जन्म काश्मीरी ब्राह्मण कुल मे बारहवी शताब्दी के लगभग हुआ माना जाता है । कुछ इतिहासवेत्ताओं का कथन है कि काशी मे श्री रामानन्द जी और नदिया मे  श्री चैतन्यदेव जी से आपका सत्संग हुआ था । एक बार दिग्विजय (देश के सभी विद्वानों को शास्त्रार्थ में हराते हुए यात्रा करना ) निमित्त पर्यटन करते हुए आप नवद्वीप (बंगाल) मे आये । वहाँ का विद्वद्वर्ग आपसे भयभीत हो गया । तब श्री कृष्णचैतन्य महाप्रभु अपने शिष्यवर्ग को साथ लेकर श्री गंगाजी के परम सुखद पुलिनपर जाकर बैठ गये और बालकों को पढाते हुए शास्त्रचर्चा करने लगे । उसी समय टहलते हुए श्री केशवभट्ट जी भी आकर आपके समीप बैठ गये । तब श्रीमहाप्रभुजी अत्यन्त नम्रतापूर्वक बोले -सारे संसार में आपका सुयश छा रहा है, अत: मेरे मन मे यह अभिलाषा हो रही है कि मै भी आपके श्री मुख से कुछ शास्त्र सम्बन्धी चर्चा सुनूँ ।

श्री कृष्णचैतन्य के इन वचनों को सुनकर श्री केशवभट्ट जी
बोले कि तुम तो अभी बालक हो और बालकों के साथ पढते हो, परंतु बातें बडोंक्री तरह बहुत बडी बडी करते हो । परंतु तुम्हारी नम्रता सुशीलता आदि देखकर मैं बहुत प्रसन्न दूं अत: तुम्हारा जो भी सुनने का आग्रह हो वह कहो, हम वही सुनायेंगे । श्री महाप्रभु जी ने कहा – आप श्री गंगाजी का स्वरूप वर्णन करिये । तब श्री केशवभट्ट जी ने तत्काल स्वरचित नवीन सौ श्लोक धाराप्रवाह कह सुनाये । उन्हें सुनकर श्री महाप्रभुजी की बुद्धि भाव विभोर हो गयी । तत्पश्चात उन्ही सौ श्लोको में से  एक श्लोक कणठस्थ करके श्री महाप्रभुजी ने भी श्री केशवभट्ट जी को सुनाया और निवेदन किया कि इस एक व्याख्या एवं दोष और गुणों का भी वर्णन करिये। सुनकर श्री केशवभट्टजीने कहा कि भला मेरी रचना मे दोष कहां ? श्री महाप्रभुजी ने कहा – काव्य रचना मे दोष का लेश रहना स्वाभाविक ही है । यदि आप मुझे आज्ञा दे तो मै इसके दोष गुण कह सुनाऊँ। 

तब आपने कहा – अच्छा, तुम्ही कहो । तब श्री महाप्रभुजी ने उस श्लोक की गुण – दोषमयी एक नवीन व्याख्या कर दी । श्री केशवभट्ट जी ने कहा – अच्छा, अब हम प्रातःकाल तुमसे फिर मिलेंगे और इसपर अपना विचार व्यक्त करेंगे । ऐसा कहकर आप अपने निवास स्थानपर चले आये और एकांत मे श्री सरस्वती जी का ध्यान किया । केश्वभट्ट जी को सरस्वती सिद्ध थी । श्री सरस्वती जी तत्काल एक बालिका के रूप में इनके सम्मुख आ उपस्थित हुई । आपने उपालम्भ भरे स्वर मे कहा कि सारे संसार को जितवा करके आपने एक बालक से मुझे हरा दिया ।

श्री सरस्वती जी ने कहा- वे बालक नहीं है, वे तो साक्षात् लोकपालक भगवान श्रीकृष्ण है और मेरे स्वामी है । भला मेरी सामर्थ्य ही कितनी है जो मै उनके सम्मुख खडी होकर वाद विवाद कर सकूं ! श्री सरस्वती जी की यह सुख स्त्रोततमयी वाणी सुनकर श्री केशवभट्ट जी मन में बड़े हर्षित हुए और वाद विवाद के भाव का परित्याग करके श्री कृष्णचैतन्य महाप्रभुजी के पास आये तथा बहुत प्रकार से विनय प्रार्थना की । तब श्री महाप्रभुजी ने कृपापूर्वक कहा कि वाद विवादके प्रपंच को छोड़कर फलस्वरूपा भक्ति का रसास्वादन कीजिये, अब आज से किसी को भूलकर भी नही हराइये । श्री केशवभट्ट जी ने श्रीमहाप्रभु जी की यह बात हृदय मे धारण कर ली और शास्त्रार्थ तथा दिग्विजय छोडकर एकांतिक भक्ति सुख मे निमग्न रहने लगे ।

आपके समय मे दिल्ली का बादशाह अलाउद्दीन खिलजी था, उसके उग्र स्वभाव से हिन्दू प्रजा ऊब उठी थी। उसने घोषणा की कि सारे हिन्दू मन्दिर तोड़ दिये जायँ । उस समय मथुरा के सूबेदार के आदेशानुसार एक फ़कीर ने लाल दरवाजेपर एव यन्त्र टाँगा, जिसके प्रभाव से जो भी हिन्दू उस दरवाजे से निकलता वह मुसलमान बन जाता और दूसरे लोग जबरन उसे अपने धर्म मे शामिल कर लेते । इस महान् विपत्ति से बचने के लिये सभी ब्रजवासी श्री केशव भट्टजी के पास पहुँचे । श्रीआचार्यदेव स्वयं शिष्यसमूह को साथ ले उस स्थानपर गये और उनके वैष्णव तेज से वह यन्त्र निष्फल हो गया। इस तरह आपने धर्म की रक्षा की ।

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