सुंदर कथा ९६ (श्री भक्तमाल – श्री कान्हार दास जी ) Sri Bhaktamal – Sri Kanhardas ji

श्री कान्हरदास जी ने सन्तो की कृपा से यह महान् लाभ प्राप्त किया कि अपने हृदय मे भगवान को स्थापित किया । इन्होंने गुरुदेव की शरण मे आकर भक्तिमार्ग को सच्चा, सात्विक, सरल और श्रेष्ठ जाना । आपने संसार धर्म को त्यागकर क्या सत्य है और क्या झूठ है, इस बात को पहचाना और सत् ग्रहण तथा असत् का त्याग किया । भगवद्धर्म को स्वीकार किया । आप संसार से उसी प्रकार अलग रहे, जैसै पेड की शाखा से चन्द्रभा अलग और दूर रहता है, लेकिन दिखाने के लिये पेड़ के पास मे बताया जाता है । आप संसार के सभी प्राणियों को समान दृष्टि से देखते थे । अनेक सद्गुणों से युक्त थे । अत: आप महान् थे । आपने अपने मुख से सदा सज्जनों – भक्तों क्री प्रशंसा की । मिथ्या, कटु और परनिन्दारूप कुवचन आपने कभी नहीं कहे ।

भक्तमाल में श्री कान्हरदास जी के विषय मे विवरण इस प्रकार है :

श्री कान्हरदास जी समदर्शी सन्त थे । किसी सन्त से कोई भूल भी हो जाय तो श्री कान्हरदास जी कटु शब्दों का प्रयोग नही करते थे । आप सन्तसेवी तो थे ही, अत: सन्तो का आवागमन आपके यहाँ बना ही रहता था । एक बार दो सन्त आये, वे कई दिनोंसे भूखे थे । जितना प्रसाद था वह आपने उन संतो को दे दिया । परंतु उसे पाकर भी तृप्त न हुए अत: उन्होने कान्हर दास जी के घरसे एक धातुपात्र(बर्तन) ले जाकर हलवाई के हाथ बेच दिया और दोनों ने भरपेट लड्डू-पेडा खाया । यह जानकर आपका शिष्य सन्तो को फटकारने लगा । उस अज्ञानी शिष्य को आपने समझाया, कि सन्त बर्तन बेचकर खा गये तो अपना ही खाये । हम संतो के दास है । यह सब सामग्री रामजी की है और ये संत भी रामजी के ही है । यह जो चाहे वह करने में समर्थ है ।संत भगवान से भी बढ़कर होते है।

सब सामग्री राम की सन्त राम के राम ।
जो चाहैं सोई करैं तू बोलत बेकाम ।।

इस प्रकार आपकी सन्तनिष्ठा अन्दुत थी ।

एक बार श्री कान्हरदास जी को बड़े जोर से बुखार चढ आया । तब ये आसनपर पड़े-पड़े ही प्रभु की मानसी-सेवा करने लगे । भोग लगने के बाद प्रभु ने इनसे कहा कि तुम भी यह प्रसाद लो – प्रसाद बहुत स्वादिष्ट है । तब आपने शिष्य को जोर से पुकारकर कहा- अरे ! प्रसाद लेने के लिये शीघ्र ही पात्र लाओ । शिष्य ने सोचा कि ज्वर की अधिकता के कारण कुछ भी रहे है । अत: पात्र न लाकर खडा ही रहा । तब फिर आपने डाँटकर कहा कि तुम अभी भी यही खड़े हो ,प्रसाद लेने के लिए शीघ्र कटोरा लाओ । तब वह कटोरा ले आया । इनके हाथो में आते ही कटोरा भर गया । तब सबको बड़ा आश्चर्य हुआ । उसमे से जिसने-जिसने प्रसाद लिया । सभी को अद्भुत स्वाद और परमानन्द मिला । ऐसे भगवत्प्राप्त सन्त थे श्री कान्हरदास जी !

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