सुंदर कथा ९९ (श्री भक्तमाल – श्री पीपा जी ) Sri Bhaktamal – Sri Peepa ji

पूज्य श्री नारायणदास भक्तमाली मामाजी, श्री राजेंद्रदासाचार्य जी , बाबा गणेशदास जी द्वारा श्री रामानंद पुस्तकालय की भक्तमाल और गीता प्रेस भक्तमाल से श्री पीपानंदचार्य जी का चरित्र :

मनु: पीपाभिधो जात उत्तराफाल्गुनी युजी ।
पूर्णिमायां ध्रुवे चैत्र्यां धनवारे बुधस्य च ।।

श्री मनु जी महाराज कलियुग मे धर्मप्रचार के लिये राजस्थान प्रान्त के गांगरोनगढ़ के राजघराने मे वि.सं १४१६ की चैत्रीय पूर्णिमा उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र, ध्रुवसंज्ञक योग मे बुधवार के दिन श्री पीपा जी के रूप मे अवतरित हुए ।

भक्तवर श्री पीपा जी पहले भवानी देवी के भक्त थे । मुक्ति मांगने के लिये आपने देवी का ध्यान किया, देवी ने प्रत्यक्ष दर्शन देकर सत्य बात कही कि -मुक्ति देने की शक्ति मुझमे नहीं है, वह शक्ति तो भगवान मे है । उनकी शरण मे जाना ही सुदृढ साधन है । देवीजी केउपदेशानुसार आचार्य श्रीरामानन्द जी के चरणकमलों का आश्रय पाकर श्रीपीपाजी अति भक्तिकी अन्तिम सीमा हुए । गुरुकृपा एवं अतिभक्ति के प्रभाव से आपमे असंख्य अमूल्य सदूगुण थे, उन्हें सन्तजन सदा गाते रहते है । भक्त ,भगवन्त और गुरुदेव की आपने ऐसी आराधना की कि उसका स्पर्श करके अर्थात् देख-सुन और समझ करके सम्पूर्ण वैष्णवो की आराधना-प्रणाली अत्यन्त सरस हो गयी । आपने अपने प्रभावसे सम्पूर्ण संसार का कल्याण किया । इसका प्रमाण यह है कि आपने परम हिंसक सिंह को उपदेश देकर अहिंसक और विनीत बना दिया ।

१. श्री स्वामी रामानंदाचार्य का शिष्य बनने की कथा :

गागरौनगढ़ नामक एक विशाल किला एवं नगर है, वहाँ पीपा नामक एक राजा हुए । वे देवी के बड़े भक्त थे । एक बार उस नगर मे साधुओं की जमात आयी । राजाने जमात का स्वागत करके कहा – देवीजी को चालीस मन अन्न का भोग लगता है, सभी लोग प्रसाद लेते है, आपलोग भी देवीजी का प्रसाद ग्रहण कीजिये । साधुओं ने कहा-हमारे साथ श्री ठाकुर जी हैं, हम उन्ही को भोग लगाकर प्रसाद लेते है, दूसरे देवी – देवताओं का नही । तब राजाने उन्हें सीधा-सामान दिया । साधुओं ने रसोई करके भगवान का भोग लगाया और मन ही मन प्रार्थना की -हे प्रभो ! इस राजा की बुद्धि को बदल दीजिये, इसे अपना भक्त बना लीजिये ।रात को जब राजा महल में सोया तो उसने एक बडा भयानक स्वप्न देखा कि एक विकराल देहधारी प्रेत ने उसे पटक दिया है और उस कारण राजा भयभीत होकर रोने लगा । जागते ही राजाने स्वप्न की घटनापर विचार किया, तब उसे वैराग्य हो गया । अब राजा के सोचने -विचारने की रीति दूसरी हो गयी । उसे भगवान की भक्ति विशेष प्रिय लगने लगी ।

राजा ने देवी से माया से मुक्ति एवं भगवत्प्राप्ति का मार्ग पूछा, तब देवी जी ने सही बात कही कि -काशी मे विराजमान श्री स्वामी रामानन्दजी को अपना गुरु बनाओ और उनके बताये हुए मार्गपर चलकर भगवान को प्राप्त करो । देवी जी की आज्ञा पाकर राजा ने काशी को प्रस्थान किया । श्रीस्वामी जी के दर्शनो की इच्छा से राजा ने जब श्रीमठ मे प्रवेश करना चाहा तो द्वारपालों ने कहा कि आचार्यश्री की आज्ञा के बिना कोई भी भीतर नही जा सकता है । आप अपना परिचय दें । हन्होंने कहा – हम गागरौनगढ़ के राजा है । तब द्वारपालों ने इनका संदेश स्वामी जी को सुनाया । श्री रामानंद स्वामी जी ने कहा कि हमलोग तो विरक्त है, राजाओं से हमे क्या प्रयोजन ?

यह सुनकर पीपाजी ने राजशाही वेष का करके फिर शरणागति की प्रार्थना कहला भेजी । देहासक्ति का निराकरण करने के लिये श्रीस्वामी जी ने आदेश दिया – कुएँ मे गिर पडो । आज्ञा सुनते ही मन मे अत्यन्त प्रसन्न होकर पीपा जी कुएँ मे गिरने चले । परंतु श्री स्वामी जी के सेवकों ने पीपा जी को पकड़ लिया । इनकी दृढ़ निष्ठा देखकर श्रीस्वामी जी बड़े प्रसन्न हुए और इन्हें बुलाकर दर्शन दिया । आचार्य श्रीस्वामी रामानन्दाचार्य जी ने भक्त पीपा को मन्त्र-दीक्षा देकर अपना शिष्य बनाया और इनके ऊपर विशेष कृपा की। गुरुदेव के अनुग्रह से श्री पीपाजी ने भगवद्भक्ति को दृढ़तापूर्वक अपने हृदय मे धारण किया । श्री स्वामी जी ने इन्हें आज्ञा दी कि अब तुम अपनी राजधानी गागरौनगढ़ को जाओ और वहीं घर मे रहकर साधु सन्तो की सेवा करो ।

एक वर्ष बीतनेपर जब हम तुम्हारी सेवा को सरस जानेंगे और यह देख लेंगे कि तुम सन्तो की सेवा में सुख मानते हो और तुम्हारी सेवा से सुखी होकर सन्त तुम्हारे यहाँ से विदा होते हैं, तब हम तुम्हारे घर आयेंगे, वहीं हमारा दर्शन करना । श्रीस्वामी जी की ऐसी आज्ञा पाकर श्री पीपा जी घर को लौट आये और बडी सुन्दर रीति से सन्तसेवा करने लगे । जब वर्ष पूरा होने लगा, तब आपने गुरुदेव भगवान को एक पत्र मे लिखकर भेजा कि दासपर आप कृपा कीजिये, अपने वचनों का पालन कीजिये । पत्र पाकर श्री स्वामी जी अपने प्रिय चालीस भक्तों को साथ लेकर गागरौनगढ़ चले ।

२. पीपा जी की रानी श्रीसीता सहचरी का श्री रामानंद स्वामी जी की शिष्या बनना :

आचार्य श्री रामानन्दजी महाराज कबीरदास, रैदास आदि अपने चालीस शिष्य- सेवकों को साथ लेकर गागरौनगढ़ के निकट पहुँचे । श्रीगुरुदेव के शुभागमन का समाचार पाते ही पीपा जी पालकी लेकर आये । आपने स्तुति करके गुरुदेव को तथा सभी साधु संतो को अलगअलग दण्डवत् प्रणाम किया । उत्साहपूर्वक बहुत-सा धन ( मुहरें ) न्यौछावर करके, लुटा करके समस्त समाज अपने राजभवन में पधराया । श्री स्वामी जी ने पीपाजी की भक्तभगवन्त मे दृढ भक्ति तथा सेवा की सुन्दर रीति देखकर उनसे कहा -तुम्हारी इच्छा हो तो घरपर रहकर सेवा करो अथवा विरक्त होकर भजन करो, दोनों ही तुम्हारे लिये समान है । श्रीगुरुदेव मे तथा उनकी आज्ञा मे विश्वास करके उनके श्रोचरणो में पड़कर पीपा जी ने प्रार्थना की कि अपने चरणों मे (अपने पास) ही रखिये ।

श्री पीपाजी जब घर छोड़कर श्री स्वामीजी के साथ चलने को तैयार हुए, तब उनकी सभी बीसों रानियाँ भी उनके साथ चलने के लिये तैयार हो गयीं । तब श्रीपीपाजीने कहा – यदि तुम सबको मेरे साथ ही चलना है तो कमरी को फाड़कर उसकी अलफी पहन लो और मूल्यवान वस्त्र तथा सभी गहने उतारकर फेंक दो । साधुवेष धारण करके चलो । ऐसा त्याग वे नहीं कर सकीं, सभी रोने लगीं । परंतु उनमे से जो सबसे छोटी रानी सीता सहचरी जी थीं, वे इसके लिये तैयार हो गयी । उन्होंने अलफी गले मे डाल ली, सभी आभूषण उतार दिये, तब राजाने दूसरी आज्ञा दी कि अधोवस्त्र मात्र रखो, इस अलफी को भी उतारकर फेंक दो । सुनते ही सीता सहचरी अलफी उतारकर फेंकने लगी । यह देखकर श्रीस्वामी जी को दया आ गयी । उन्होंने श्रीपीपाजी को आज्ञा दी कि इनको (सीता सहचरी) साथ मे ही रखो ।

३. श्री पीपा जी और उनकी रानी को श्रीकृष्ण दर्शन

श्री स्वामी जी के अधिक आग्रह करने और शपथ दिलानेपर श्री पीपा जी सीता सहचरी को अपने साथ ले चलने के लिये तैयार हो गये । राजा को रोकने के लिये रानियों ने एक ब्राह्मण को बहुत सा धन देकर उसे प्रेरित किया, उसने कहा – मैं राजा को कदापि न जाने दूंगा । श्री पीपा जी के समझानेपर भी उसने अपना हठ नही
छोड़ा । पीपा जी जब रुकने को तैयार नही हुए, तब उस ब्राह्मण ने विष खा लिया और मर गया । तब श्री स्वामी रामानंदाचार्य जी ने उसे जीवित करके उसे और रानियों को लौटा दिया । कालान्तर मे श्रीपीपा जी और श्रीसीता सहचरी जी सन्त-समाज के साथ आनन्द दायिनी श्री द्वारकापुरी पहुँचे । कुछ दिनोंतक सभी लोग वहाँ रहे ।

जब श्री स्वामी जी अपने शिष्य-सेवको को लेकर वहाँ से काशीपुरी को चले, तब श्री पीपा जी ने प्रार्थना करके कुछ दिन द्वारका मे रहने की आज्ञा माँगी और आज्ञा पाकर वहीं रह गये । रहते-रहते इन्हें भगवान के दिव्य द्वारकापुरी के दर्शनो की ऐसी उत्कट उत्कण्ठा हुई कि आप समुद्र मे कूद पड़े । उसी क्षण श्रीकृष्णने अपने कुछ सेवकों को इन्हें लिवा लाने के लिये भेजा, वे इन्हें सादर लिवा लाये । श्री पीपाजी ने दिव्य द्वारका का दर्शन किया । भगवान् श्रीकृष्ण बड़े प्रेमसे मिले और फिर सीता सहचरीसमेत श्री पीपाजी सानन्द सात दिनतक वहाँ रहे । सात दिन बाद भगवान् श्रीकृष्णने इन लोगों को इस दिव्य द्वारकासे उस द्वारका को जाने की आज्ञा दी । परंतु ये वहाँसे जाना नहीं चाहते थे । तब श्रीश्यामसुन्दर ने बड़े प्रेमसे कहा – मेरे जिस रूप के दर्शन तुमने किये हैं, वहाँ जाकर भी उसे ही देखते रहोगे, अत: विरहव्यथा न व्यापेगी ।

 यदि तुमलोग नहीं जाओगे तो संसार मे भक्त और वो भी पीपा जी और सीता सहचरी जैसे उच्च कोटि के भक्त डूब गये ‘ यह जो कलंक लग गया कैसे मिटेगा ? इसके पश्चात् भगवान ने शंख-चक्र की छाप प्रदान की । भगवान स्वयं भक्तत्वर श्रीपीपा और सीता को पहुँचाने के लिये चले । समुद्र के बाहरतक पहुँचाकर भगवान लौट आये । सपत्नीक श्री पीपाजी जब समुद्र से तटपर आये तो लोगोंने एक विचित्र बात देखी कि आप दोनों के वस्त्र सूखे हैं, परंतु हृदय प्रेम से सराबोर है । जिन लोगों में समुद्र मे कूदते हुए इन्हें देखा था, उन्होंने पहचान लिया और सभी लोग आकर आप दोनों के पैरों मे लिपट गये । श्री पीपाजीने भगवान की दी हुई शंख-चक्र की छाप लोगों के शरीरपर लगायी ।

द्वारका में आपके दर्शनो के लिये नित्य भारी भीड़ होने लगी, तब सीता सहचरी जी ने श्री पीपाजी को समझाकर कहा कि – अब यहाँ से कहों अन्यत्र चलो, यहाँ भजन मे बाधा हो रही है । दोनों द्वारका से चल दिये । यात्रा करते करते आगे पहुँचते ही हन्हें पठान मुसलमान मिल गये । उन्होंने सीता सहचरी को छीन लिया । उसी समय भगवान दौड़कर आ गये और दुष्टों को मारकर सीता सहचरी को ले आये । इस प्रकार इनकी रक्षा करके और दर्शन देकर प्रभुने इन्हें आनन्दित किया ।

४. हिंसक सिंह को अहिंसक वैष्णव बनाना :

श्री पीपा जी ने श्रीसीता सहचरी से कहा -देखो, कैसे -कैसे संकट आते हैं अत: अच्छा होगा कि भी तुम घर को चली जाओ । श्री सीता सहचरी ने उत्तर दिया – भगवन् ! हरि ही भयको हरनेवाले है, रक्षक है , वे ही रक्षा करेंगे । इसके उपरान्त दोनों उसी मार्ग से चले जिसमें एक सिंह रहता था । जो बहुतों को मारकर खा चुका था, परंतु इनके दर्शन से उसका अन्त:करण पवित्र हो गया । वह विनीत भावसे इनके निकट बैठ गया । इन्होंने उसे शिष्य करके समझाया कि अब तुम वैष्णव हो गये, अत: किसीकी हिंसा न करना । इसके बाद वे दूसरे गांव में पहुँचे । वहाँ आपने शेषशायी भगवान के दर्शन किये और दुकानदार के न देनेपर सूखे बांस को हरा करके एक हरा बाँस भगवान को अर्पण किया । वहाँसे चलकर आप परम प्रेमी भक्त श्री चीधरजी के यहाँ पहुँचे ।

५. श्री चीधरदम्पती की संतनिष्ठा

भक्त चीधरजी और उनकी धर्मपत्नी ने देखा कि परम भागवत श्री पीपाजी अपनी स स्त्रीसमेत पधारे हैं तो वे परम प्रसन्न हुए, परंतु घरमे खाने-पीने का कुछ भी सामान नहीं था । श्री चीधरजी की स्त्री ने अपना वस्त्र-लहँगा उतारकर दे दिया । श्री चीधर जी उसे बेचकर खाने का सीधा सामान ले आये और श्री पीपाजीके सामने रखकर बोले – महाराज ! रसोई कीजिये और भगवान का भोग लगाइये । लहँगा बिक जानेके कारण भगतिनका शरीर नग्न हो गया था, अत: श्रीचीधर जी ने उन्हें कोठरी मे छिपा दिया । श्रीसीता सहचरीजी ने रसोई तैयार कर दी, भगवान का भोग लग गया । श्री पीपाजी ने श्रीचीधर भक्त से कहा -भगतिन को बुला लाइये, आप और हम सब एक साथ ही बैठकर प्रसाद पायेंगे । श्री चीधरजी ने कहा- आपलोग प्रसाद पायें, उसे सीथ-प्रसाद प्रिय है । वह बाद मे पा लेगी । तब श्रीपीपा जी ने सीता सहचरी से कहा -तुम भीतर जाकर उन्हें बुला लाओ और उन्हें भी साथ ही प्रसाद पवाओ । तब वे भीतर गयीं तो उन्होंने जाकर देखा कि वह नग्न बैठी है ।

सीता सहचरीजी ने जब भगतिन को नग्न देखा तो पूछा – कहिये, क्या बात है, आपका शरीर उघारा है ? तब श्री चीधरजी की स्त्री ने कहा – हमलोगों को सन्त सेवा हृदय से अत्यन्त प्रिय लगती है । अत: हमारा समय इसी प्रकार बीतता है । जब सन्त भगवान् पधारते है, तब उनका दर्शन-सत्संग एवं स्वागत करके हमे अपार सुख होता है । उस परमानन्द के सामने यह नश्वर शरीर ढका है अथवा उघारा है, इसकी क्या चर्चा की जाय । सीता सहचरी जी ने जब ये बातें सुनीं, तो सब रहस्य उनकी समझ मे आ गया । इसके उपरान्त सीता सहचरी जी ने अपनी धोतीमे से आधी फाड़कर उन्हें दिया । उसे उन्होंने पहन लिया, तब उनका हाथ पकड़कर उन्हें घरसे वहां लिवा लायीं जहां सब प्रसाद पाने बैठे थे । सब ने एक साथ बैठकर प्रसाद पाया । सन्त-सेवा के प्रति निष्ठा की इस अनोखी घटना को सीता सहचरी जी ने बादमें शयन करते समय पीपाजी को सुनाया ।

६. श्री सीता सहचरी की संतसेवा

सपत्नीक भक्त श्रीचीधरजी की सन्त सेवा निष्ठा से प्रभावित होकर सीता सहचरी जी ने अपने पतिदेव से कहा – भक्त चीधर और उसकी स्त्री हर अवस्था मे संत सेवा करते ही है । हमारे पास संतो की सीए करने के लिए गिरवी रखने के लिए भी कुछ नही है ,अब तो हमारा धर्म यह है कि हम वेश्यावृत्ति अपनाकर सन्त-सेवा करें । ऐसा निश्चयकर वे दोनों वहां जाकर बैठे, जहाँ अनाज की बडी मण्डी थी । श्रीसीता सहचरी की अपार सुन्दस्ता से आकृष्ट हो करके वे लोग एकत्र हो गये जो रूप निरखनेके लोभी थे । समीप आकर जब उन लोगों ने उनको देखा तो उनके नेत्रोंका रोग डोर हो गया अर्थात् उनकी विषय दृष्टि नष्ट हो गयी । लोगोंने श्रीसीता सहचरीजी से पूछा कि आप कौन है ? आपके साथ ये सज्जन आपके कौन है ? इन्होने उत्तर दिया – हम वेश्या है, हमारे घरद्वार कुछ भी नहीं है और हमारे साथ मे यह हमारा सेवक है । यह सुनकर वे सब स्तब्ध खड़े-के-खड़े ही रह गये । फिर जिन लोगों ने उन्हें द्वारका मे देखा था, उन्होंने पहचानकर बताया – अरे ! ये परमभक्त श्रीपीपाजी और ये उनकी धर्मपत्नी सीता सहचरीजी है । तब तो लोगों ने उनके आगे अन्न-वस्त्र और मुहरों के ढेर लगा दिये । श्री पीपाजी ने वह सब सामान भक्त चीधर के यहां भेज दिया जहां नित्य संतो का आना जाना लगा रहता है ।

७. श्रीपीपा जी को स्वर्णमुहरों की प्राप्ति और उनका त्याग

श्री चीधर भक्त से आज्ञा माँगकर उनसे विदा लेकर सीता सहचरीसमेत श्री पीपाजी टोंड़े ग्राम आये और गाँव से बाहर कुटी बनाकर रहने लगे । एक दिन आप स्नान करने के लिये गये थे तो वहाँ एकाएक आपको मुहरों से भरे हुए कई मटके दिखायी पड़े । उस मिले हुए धन को त्यागकर आप चले आये । रात मे सीता सहचरी जी से आपने बताया कि उस सरोवरपर स्वर्णमुद्राओं से भरे मटके मै छोड़ आया हूँ । सुनकर उन्होंने कहा -अब आप उस तालाबपर स्नान करने मत जाइयेगा ।

संयोगवश चोरी करने की इच्छा से वहीं कही कुटी के पास छिपे हुए चोरों ने यह बात सुन ली । वे तुरंत उसी सरोवरपर गये और जाकर देखा तो उन पात्रों मे साँप भरे हुए है । चोरोंने समझा कि वे हमे साँपों से कटवाकर मरवा डालने के लिये ही ऐसी बातचीत आपस मे कर रहे थे । बदला लेने की भावना से उन चोरोंने मुहरभरे सभी मटके उखाड़े और श्री पीपाजी की कुटी में पटककर भाग गये । जब श्री पीपा जी ने गिना, तब मालूम पड़ा कि सात सौ बीस सोने की मुहरें है और एक-एक मुहर तौल में पाँच-पाँच तोलेकी है ।

८. राजा सूर्यसेनमल का श्रीपीपा जी का शिष्य बनना

श्रीपीपाजी उस धन से साधु महात्माओं को निमन्त्रण देकर बडे – बडे विशाल भण्डारे करने लगे । असंख्य सन्त प्रसाद पाने लगे । इस प्रकार खिला पिलाकर सम्पूर्ण धन को श्री पीपा जी ने तीन दिन में समाप्त कर दिया । आपकी इस विशाल कीर्ति को टोंड़े के राजा सूर्यसेनमल ने सुना तो वह दर्शन करने के लिये आया और दर्शन करके बहुत प्रसन्न हुआ । फिर बडी नम्रता से राजा ने प्रार्थना की और कहा- आप मुझे शिष्य बना लीजिये । जैसी आज्ञा मुझे देंगे मैं वही करूँगा । तब आपने आज्ञा दी कि यदि ऐसा है तो आप अपनी सब सम्पत्ति और रानियों को यहां लाकर मुझको अर्पण कर दो । राजाने राज्य और रानियां उन्हे अर्पण कर दी । इस प्रकार श्री पीपाजी ने राजा की परीक्षा लेकर उसको मन्त्र दीक्षा दी ।

फिर सम्पत्ति और रानियों को लौटाकर कहा कि सम्पूर्ण राज्य तथा ये रानियां आज से अब हमारी है, इनमें अब ममता न रखना । मेरी आज्ञा से इनका पालन पोषण करना । रानियों को आज्ञा दी कि सन्तो की सेवा करना । इसके बाद राजा ने बहुत अनुनय विनय करके गुरुदेव को एक घोडा और सन्त-सेवार्थ बहुत सा धन भेंट किया । आपने उसमे से कुछ धन रख लिया । शेष लौटा दिया । गुरुदेव के उपदेशानुसार राजाने अहंकार को त्याग दिया और सभी जीव-जन्तुओं को अपनेसे बडा मानने लगा । यह समाचार सुनकर राजा के भाई बन्धु जल भुन गये, परंतु महान् प्रतापी श्री पीपाजी से वे कुछ भी कह न सके । इसी बीच एक व्यापारी बैलों को खरीदने के लिये टोंड़े गाँव को आया । राजा के भाइयों ने उसे बहकाया कि पीपा भगत बैलों के बहुत बड़े व्यापारी है, उनके पास बहुत अच्छे -अच्छे बैल है, वही चले जाओ ।

९. श्रीपीपा जी के जीवन की विलक्षण घटनाएं

राजा के भाइयो और उनके लोगो के बहकाने मे आकर वह व्यापारी श्री पीपाजी के पास आया और थैली खोलकर रुपये इनके सामने रखते हुए बोला – मै बैल लेने आया हूँ , मुझे बैल दीजिये । श्री पीपाजी ने कहा-आपको जितने बैल चाहिये, उतने मिल जायेंगे, परंतु आज अभी यहाँ नही है । गाँव मे चरने के लिये भेज दिये गये है । कल दोपहर को आकर आप ले लीजियेगा । इसके बाद वह व्यापारी तो रुपये देकर चला गया । आपने सन्तो को बुलवाकर भण्डारा महोत्सव कर दिया ।  उसी में सब रुपये खर्च कर दिये । वह बनजारा निर्धारित समयपर आ गया और बोला- मुझे बैल दीजिये । बैल कहाँ है ?उस समय पंगत हो रही थी, सैकडों सन्त बैठे प्रसाद पा रहे थे । श्री पोपाजी ने पंगत की और हाथ से संकेत करके कहा – यही सब मेरे बैल ( धर्मस्वरूप सन्त ) है, मै इन्ही का व्यापार करता हूँ ।

इनमे से जितने आपको चाहिये, आप उतने ले जाइये । उस व्यापारी ने सन्तो के दर्शन किये, उसके हृदय मे भक्ति का भाव भर गया । वह उसी समय बाजार गया और वस्त्र लाकर उसने सभी साधुओं को पहनाया । एक दिन श्री पीपाजी घोड़ेपर चढ़कर स्नान करने के लिये सरोवरपर गये । घोडे को वहीं छोड़कर आप स्नान करने लगे । इतने मे ही दुष्ट चोरों ने आकर घोडा पकड़ लिया और उसे छिपाकर बांध दिया । आप स्तान केरके आये तो घोडा ज्यों का त्यों वहींपर खडा मिला । घोड़ेपर चढकर आप अपने आश्रम मे आ गये । जब चोरों ने यह चमत्कार देखा तो वे डर गये और जहां घोडा छुपाया था वहां आये । तब वह घोडा नहीं दिखायी पडा । उन्होंने चोरी छोड़कर शिष्यता स्वीकार की ।

१०. श्री पीपादम्पती के संतनिष्ठा की अद्भुत कथा

एक बार श्री पीपा जी राजा सूर्यसेनमल के यहाँ एक झगड़े का फैसला करने के लिये गये थे । आपके चले जानेके बाद कुटीपर कुछ संतजन पधारे । संयोगवश उस दिन कुटी मे अन्न-धन कुछ भी नही था । संत- सेवा के लिये कहीं जाकर कुछ ले आऊं, ऐसा विचारकर श्री सीता सहचरी जी बाजार को गयीं । वहाँ इन्हें देखकर एक दुराचारी बनियेने बुलाकर पूछा -आपने सामान की आवश्यकता बतायी ,वह सब मैं देता हूँ । उसने सब सीधा सामान देकर कहा – आप रातको मेरे पास अवश्य आइये । सब सामग्री लेकर आप कुटीपर आयी । रसोई हुई और भोग लगाकर जब महात्मालोग भोजन कर रहे थे, उसी समय श्री पीपाजी पधारे । उन्होंने पूछा कि सामान कहां से आया तो श्री सीता सहचरी जी ने सब बात बतला दी ।

उसे सुनकर श्री पीपा जी ने उसकी सन्त रपेचा निष्ठा की बडी प्रशंसा की । सायंकाल को श्रृंगार करके श्री सीता सहचरी जी बनिये के पास जब जाने को तैयार हुई तो उसी समय पानी बरसने लगा । कीचड हो गया, कैसे जाये, श्रृंगार बिगड़ेगा । तब श्री पीपाजी ने उन्हे कन्धेपर चढा लिया और उस बनिये को प्रसन्न करने के लिये चल दिए । श्री पीपाजी ने सीता सहचरी जी को लेजाकर बनिये के द्वारपर उतार दिया । वे भीतर चली गयी । आप बाहर द्वारपर बैठ गये । इनके दर्शन चिन्तन से एवं अन्न के सन्त- भगवंत की सेवा मे लगने से उसकी बुद्धि शुद्ध हो चुकी थी अतः मुखपर दृष्टि न पड़कर उस बनिये की दृष्टि इनके चरणोंपर पडी । इनके सूखे श्रीचरणों को देखकर उसने पूछा – माताजी ! आप यहाँतक कैसे आयी है ? इन्होंने उत्तर दिया – स्वयं श्रीस्वामी जी अपने कन्धेपर बिठाकर लाये है । फिर उसने पूछा- वे कहाँ है ?

आपने कहा – तुम जाकर देखो, वे बाहर ही होंगे । यह सुनकर वह सीता सहचरी जी के चरणों मे गिर पडा और रोने लगा । फिर बाहर आकर श्री पीपाजी के चरणों को पकड़कर बोला – आप कृपा करके हमारी रक्षा करो, आप तो जीवमात्र को सुख देनेवाले सन्त है । श्री पीपाजी ने कहा – आप अपने मन मे किसी प्रकार की शंका एवं भय न करो । नि:संकोच एबं निडर होकर अपना काम करें । आपने हमलोगों के साथ बडा भारी उपकार किया है । जिस धनके वास्ते सहोदर भाई भी परस्पर लड़ते और मरते-मारते है । वह धन आपने बिना रुक्का लिखाये ही सन्तो की सेवा के लिये दे दिया । वह बनिया लज्जा और ग्लानि के मारे दबा मरा जा रहा था । वह चाहता था कि धरती फट जाय और मै उसमे समा जाऊँ तो अच्छा है । श्री पीपाजी ने उसे इस प्रकार दुखी देखा तो उम्हें बडी दया आयी । उसका पश्चाताप सच्चा जानकर उसे दीक्षा दी, वह भगवद्भक्ति पाकर कृतार्थ हुआ ।

११. राजा सूर्यसेनमल को ज्ञान प्रदान करना

श्री पीपाजी के सीता सहचरी को कन्धेपर चढाकर बनिये के यहाँ पहुँचाने की बात चलते चलते राजा सूर्यसेनमल के कानों मे पडी । राजा की भरी सभा मे भक्तिविमुख ब्राह्मणों ने श्री पीपाजी की निन्दा करते हुए कहा- उनका यह आचरण धर्मशास्त्र के बिलकुल विरुद्ध है । राजा के मन मे भी यही आया, इसलिये गुरुदेव के श्रीचरणों मे भी उसकी प्रीति घट गयी । यह जानकर समर्थ श्री पीपा जी उसे समझाने एवं उसके हृदय मे भक्ति सुस्थिर करने चले । राज द्वारपर पहुंचकर द्वारपालों के द्वारा अपने आगमन की सूचना भेजी । भीतर से राजाने कहला भेजा कि इस समय पूजा कर रहे है । कुछ देर बाद आयेंगे । यह सुनकर श्री पीपाजी ने कहा – राजा बडा मूर्ख है, मोची के घरपर बैठकर जूते गांठ रहा है और कहता है कि मै सेवा पूजा कर रहा हूं । राजा ने द्वारपालों के मुख से जब यह बात सुनी तो दौड़कर आया और चरणों मे गिर पडा । वह आश्चर्यचकित था, वस्तुत: तन से राजा पूजा में बैठा था परंतु मन से राजा मोची के घरपर पहुंच गया था (जूतियां खरीदने का विचार कर रहा था )।

उस राजा के महल मे एक अत्यन्त रूपवती, परंतु बंध्या रानी थी । उसमें राजा की विशेष आसक्ति जानकर श्री पीपाजी ने कहा- तुम शीघ्र उस रानी को मेरे पास ले आओ । राजा महल की ओर चला, परंतु उसे बडा शोक और संकोच हो रहा था कि मै रानी को कैसे लाऊँ (राजा सोच रहा था कि कही गुरुदेव ने उसे अपनी सेवा में रख लिया तो हम क्या करेंगे क्योंकि राजा उस रानी में बहुत आसक्त था)। चलते समय उसके पैर डगमगा रहे थे । रनिवास मे घुसते ही उसे भयंकर सिंह दिखायी पडा जो पीपा जी अपने योगबल से बने थे । सिंह को देखकर राजा डर गया और वहीं खडा हो गया ।

पीछे लौटने मे बुराई होगी क्योंकि गुरुदेव की आज्ञा का पालन न होगा और आगे जानेका साहस राजा कर नही पा रहा था । किसी तरह साहस करके आगे बढ़ा तो वह सिंह गायब हो गया । राजा किसी प्रकार रानी के पास पहुँचा तो उसके पास अभी अभी जन्मा हुआ एक बालक दिखायी पडा । अब राजा की समझ मे आया कि गुरुदेव भगवान मे कितनी सामर्थ्य है । वही पृथ्वीपर साष्टांग दण्डवत् प्रणाम करके राजाने स्तुति की – हे प्रभो ! हम आपकी माया को नही जान सकते है । आपके सिंह एवं शिशु दोनो ही रूप वन्दनीय है । राजा की प्रार्थना से प्रसन्न होकर निज स्वरूप से श्रीपीपाजी वहीं प्रकट हो गये और फटकारते हुए बोले – कहो, वह पहलेवाला रंग कहाँ गया ? जब तुमने लोक लज्जा और मोह का त्याग करके सारा राज्य और रानियाँ मुझे अर्पण की थी और मेरे शिष्य हुए थे ।

१२. दुराचारी भगवद्विमुखो पर कृपा

अब जब राजा का अन्त: करण पवित्र हो गया, तब श्री पीपाजी ने उसे अनन्य भक्ति का उपदेश दिया । एक दिन एक साघुरूपधारी दुराचारी श्री पीपा जी के पास आकर बोला – आप अपनी स्त्री को मुझे एक रात के लिये दे दें । आपने कहा – ले जाओ । उसने सीता सहचरी जी से कहा – आप मेरे संग दौड़कर चलो । आज्ञा के अनुसार ये उसके साथ दौडती हुई चलने लगी । परंतु दौडते-दौडते सारी रात बीत गयी फिर भी उसका घर नही आया । प्रात:काल हो गया । ये बैठ गयी और बोली कि अब मै आपके साथ एक पग भी नहीं चल सकती हूँ क्योंकि मेरे स्वामीजी की यह आज्ञा थी कि इनके साथ एक रात रहना । सो वह रात बीत गयी । उसने सोचा कि थक गयी है, अत: पालकी या गाडी ले आऊँ, उसमे बिठाकर ले चलूँ । वह गाँव मे पालकी डोहने वाले को ढूंढने के लिए घर मे पुछने गया तो घर-घर मे श्रीसीता सहचरी के दर्शन हुए । तब उसकी आँखें खुली । वही आकर बोला- माताजी ! चलो, आपको स्वामीजी के पास पहुँचा आवे । आश्रम मे आकर वह श्री पीपाजी के और श्रीसीता सहचरीजी के पैरों मे गिर पडा, उसके मनसे कामवासना दूर हो गयी और सन्तभगवन्त की भक्ति मे दृढ़भाव हो गया ।

एक बार चार कामी-कुटिल दुष्टों ने सुन्दर माला तिलक आदि धारण कर लिया और श्री पीपाजी के निकट आकर बडी नम्रता से बोले – आप सच्चे सन्तसेवी है, आप अपनी स्त्री हमे दे दीजिये । श्री पीपाजी ने उन्हे कामभाव से व्याकुल होकर प्रतीक्षा करते देखा तो कहा – आपलोग कोठे के अंदर जाइये वहां सीता सहचरी श्रृंगार करके बैठी है । जैसे ही ये लोग कोठे के द्वारपर गये, वैसे ही एक सिंहनी इन सबके ऊपर इन्हे फाड़ डालने के लिये झपटी । परंतु उसने साधुवेष जानकर फाड़ा नही । वे चारो भयभीत होकर भागे और श्री पीपाजी से नाराज होकर बोलने लगे कि तुमने तो वहीपर हमलोगों को मरवाने के लिये सिंहनी बैठा रखी है, तुम साधु नही दुष्ट मालूम पड़ते हो । हँसकर आपने कहा – आपलोग अपने हृदय की कुत्सित भावनाओं को देखिये । अनधिकार भोगभावना ही सिंहनी है । सद्भाव से पुन: जाकर देखिये । उन लोगों ने फिर जाकर देखा तो सीता सहचरी जी विराजमान है । वे सब चरणों मे पड़कर रोने एवं अपराध क्षमा करने की प्रार्थना करने लगे । श्री पीपाजी की ने उन्हें धर्म के मार्गपर चलने का उपदेश दिया , पीपा जी बात को सत्य मानकर (बात पर विश्वास रखकर) वे सब उनके शिष्य बन गये ।

१३. ग्वालिन को शिष्या बनाना

श्री पीपाजी के यहाँ विराजमान साधु सन्तो ने एक दिन दही पाने की इच्छा प्रकट की कि आज तो श्री रघुनाथजी का दहीभोग आरोगने का मन है । उसी समय एक ग्वालिन दही बेचती हुई उधर आयी । इससे यह जाना गया कि भगवान् अपने भक्तों के मनोरथ पूर्ण करते है । श्री पीपाजी ने दहीका मूल्य पूछा तो उस ग्वालिनने तीन आना बताया । परंतु उस समय श्री पीपाजी के पास एक भी पैसा नही था । उन्होंने उससे कहा – तू दही दे दे, पैसे अभी नही है, आज जो भी कुछ भेट मे आ जायगा, वही तुझको मिल जायगा । यदि कुछ न आया तो तुम्हारा दही ही भेंट समझा जायगा। ग्वालिन ने स्वीकार कर लिया । दही का भोग लगा, साधुओं ने शक्कर (मिश्री) मिलाकर भोग लगाया और बड़े प्रेम से दही पिया । उसी समय श्री पीपाजी का एक शिष्य आया और उसने एक मोतीमाला के समेत बहुत-सा धन भेंट किया । इन्होंने मोती माला और सम्पूर्ण धन ग्वालिन को दे दिया । उस ग्वालन का दही संतो के पेट को संतुष्ट कर जाने के कारण और संत पीपा जी के द्वारा मीले हुए शुद्ध धन से उसकी बुद्धि निर्मल हो गयी । वह उस धनको घर लायी, उसके मन मे संत सेवा के निमित्त धन दान का संकल्प उठा । उसने उस धन मे से बहुत थोड़ा परिवार खर्च के लिए अपने पास रखा, शेष को भक्त भगवंत – सेवा में खर्च करके श्री पीपा जी की शिष्या बन गयी ।

१४. श्री रंगदास जी को भक्ति का मर्म समझाना

एक बार श्री पीपाजी श्रीअनन्तानन्द स्वामी (पीपा जी के गुरु भाई ) के शिष्य श्री रंगजी के यहाँ पहुँचे, उस समय वे भगवान का मानसी पूजन कर रहे थे । श्री पीपाजी उनकी पौरपर (घर के बाहार बैठने का स्थान) बैठे रहे । श्री रंगजी मानसी पूजा में भगवान का श्रृंगार कर रहे थे । पहले मुकुट धारण कराकर तब फूलों की माला पहना रहे थे । वह किंचित छोटो होनेसे मुकुट मे अटक रही थी । उनकी समझ मे नहीं आ रहा था कि कैसे पहनाऊँ ? श्री पीपाजी का मानसी-सेवा मे प्रवेश था, अत: बाहर से ही कहा कि माँठ खोलकर धारण करा दीजिये । श्री रंगजी ने ऐसा ही किया । फिर तुरंत ही विस्मित होकर आँख खोलकर इधर-उधर देखने लगे कि किसने इतनी गुप्त भावना को प्रत्यक्ष देखकर मुझे उपाय बताया है । जब वहाँ कोई नहीं दिखायी पडा तो उत्सुकतावश बाहर आये ।

परम तेजोमय दिव्य भव्य, प्रसन्न मुख श्री पीपाजी को देखकर श्री रंगनाथ जी ने पूछा -आप कौन है, कृपा करके अपना नाम बताइये । श्री पीपाजी ने मुसकराकर कहा- सन्तो से इस प्रकार कुछ पूछने की विधि नहीं है । यह सुनकर श्रीरंगजी बड़े लज्जित हुए और समझ गये कि यह कोई परम ज्ञानवान सिद्ध पुरुष है । अत: गीतोक्त विधिसे पुन: परिचय पूछा । जब श्री पीपाजी ने अपना नाम, ग्राम बताया तो सुनते ही वह इनके श्रीचरण-कमलों मे लोट पोट हो गये । इसके बाद वे हाथ जोड़कर बडी विनम्रता पूर्वक बोले -प्रभो ! मेरा मन तो यह था कि जब आप आयेंगे तो मै गाजे बाजे केसाथ चलकर आपकी अगवानी करूँगा । परंतु आप तो बिना किसी पूर्व सूचना के एकदम द्वारपर ही आ गये ।

आप कृपा करके बाग मे पधारें, मै आपकी अगबानी करने चलूँगा । श्रीपीपाजीने कहा-अरे भाई ! अब तो हम घरपर आ ही गये, अब अगवानी की क्या जरूरत रह गयी ? उन्होंने कहा – फिर तो महाराज, मेरी अभिलाषा अपूर्ण ही रह जायगी । अन्त मे उनके प्रेमसे हारकर श्री पीपाजी घर से एक क्रोस दूर बाग मे जाकर विराजे । श्री रंगजी खूब बाजे बज़चाते हुए मुहरे लुटाते हुए, प्रेम में मग्न होकर नृत्यगान करते हुए पालकी लेकर श्री पीपा जी को लाने चले । श्री पीपाजी ने कहा कि पालकीपर तो हमारे श्री सद्गुरुदेव जी (श्री स्वामी रामानन्दाचार्य जी )चलते है, भला मै पालकीपर कैसे चल सकता हूं । यदि आपका ऐसा हो भाव है तो श्री रामानंद स्वामीजी की छवि को पालकीपर पधराकर ले चलें, मै पैदल चलूँगा । ऐसा ही हुआ । श्रीपीपाजी उनके प्रेम को देखकर एक महीने तक उनके घर रहे । श्रीपीपाजीके सत्संगसे सम्पूर्ण गांव श्रीरामरंग मे रंग गया ।

इसी प्रकार आपने दो सस्त्रियों को भक्ति का चेत कराया, ब्राहाण कन्या का विवाह कराया, इत्यादि विविध चरित्रों को प्रदर्शित कर श्री पीपाजी ने भक्ति का विस्तार किया । उनके उदात्त चरित्र का महान् विस्तार है ।

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